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जप-अनुष्ठान।

ग्रहशान्ति, महामृत्‍युन्‍जय जाप एवं अनुष्‍ठान, रूद्राभिषेकम् तथा रत्‍नविचार, अनुष्‍ठान पूजा पाठ आदि।

जन्मकुण्डली।

संपूर्ण कुण्‍डली –   3100/- रू – संपूर्ण फलादेश, दशाफल, उपाय एवं वर्षफल सहित।

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पं. श्रीछत्रधर शर्माजी महाराज के द्वारा संकलित और लिखित कुछ पुस्‍तक एवं ग्रन्‍थ तथा उनके द्वारा बनाये गये कुछ साफ्टवेयर के इस पृष्‍ठ पर आपका स्‍वागत है।

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।। श्रीगणेशाय नमः।।

आपका स्वागत है।

सर्वे   भवन्‍तु   सुखिन:    सर्वे   सन्‍तु   निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्‍यन्‍तु मा कश्चिद्दु:ख भागभवेत्।।

सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी अपने जीवन में कल्‍याण का दर्शन करें और इस संसार में कोई भी प्राणी कभी भी किसी भी प्रकार के दु:ख का भागी न बनें।

हमारे उपक्रम –

भगवत्कथा

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हमारे पठनीय लेख-

सूर्यग्रहण पूरी पृथ्वी पर एक साथ क्यों नहीं दिखता ?

     सूर्यग्रहण पूरे पृथ्वी पर एक साथ क्यों नहीं दिखता?         एक जिज्ञासु का प्रश्न- 13 जुलाई 2018 को जो सूर्य ग्रहण लगेगा, वो भारत मे क्यों दृश्य नही है? जबकि ग्रहण लगते समय तक समस्त भारत मे सूर्योदय हो चुका होगा??? पं ब्रजेश पाठक ज्यौतिषाचार्य जी का उत्तर- इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले आइए...

आशौच मीमाँसा-2

आशौच मीमांसा—2 आशौच के भेद  अशौच भेद पर स्मृतियों एवं निबन्ध ग्रन्थों में विस्तार से चर्चा की गई है। प्रधानतया अशौच के दो भेद कहे गये हैं। जननाशौच एवं मरणाशौच। एवं इनकों क्रमश: सूतक एवं शावाशौच कहा जाता है। अर्थात् जननाशौच को सूतक एवं मरणाशौच को शावाशौच कहा जाता है। परन्तु कहीं कहीं मृतकाशौच को भी...

आशौच मींंमासा-1

आशौच मीमांसा—1 आशौच पदार्थ विचार प्रत्येक व्यक्ति में प्रधानतया शरीरात्मा, अन्तरात्मा व विशुद्धात्मा इन तीन आत्माओं की सत्ता मानी जाती है। इन्हीं को क्रमश: शरीर सत्त्व व चेतना तथा भूतात्मा, जीवात्मा व क्षेत्रज्ञ भी कहत हैं। इन्हीं तीनों को अन्तिम विशुद्धात्मा सर्वथा विशुद्ध है, दोशरहित है। अतः...

पितृसमीक्षा—7

पितृ समीक्षा—7 देव वर्ग में अग्नि, वायु व आदित्य ये तीन देव प्रधान हैं। जैसा कि वेद वचन है ''अग्नि सर्व देवमय है'', ''वायु सर्व देवमय है'', ''इन्द्र सर्व देवमय है'' यहाँ इन्द्र व सूर्य की समानता होने से सूर्य या आदित्य के स्थान पर इन्द्र शब्द का प्रयोग किया गया है। सर्व देवमयता का कारण है— क्योंकि...

पितृसमीक्षा—6

पितृसमीक्षा—6 मृत व्यक्ति अपने पुत्रादि द्वारा प्रदत्त श्राद्ध पिण्डादि के द्वारा गति करता है। अत: स्वयं ही अपनी आसक्तियों को न त्याग कर सकने वाले व्यक्ति के पारलौकिक हित के लिये उसके पुत्र तथा सम्बन्धी दिवंगत आत्मा की शान्ति के हेतु जो श्राद्ध दानादि करते हैं, उससे भी मृत व्यक्ति को लाभ अवश्य...

पितृसमीक्षा—5

पितृसमीक्षा—5 साम्पराय की जिस स्थिति के सन्दर्भ में कठोपनिषद् में कहा है यदि कोई व्यक्ति उस स्थिति को नहीं मानता तो शास्त्र उसकी निन्दा करते हुये कहते है कि वित्तमोह से मूढ़ पुरुष को मरने के बाद मेरी क्या स्थिति अथवा गति होगी, इस विषय का भान नहीं होता। शंका:—प्रश्न  यह है कि जो विषय सामान्य...

पितृसमीक्षा—4

पितृसमीक्षा—4 प्रकृति निर्धारित भारतीय संवत्सर विज्ञान के अनुसार प्रत्येक संवत्सर में छ:  मास तक सूर्य विषुवद् वृत्त के उत्तर की ओर रहता है। तथा शेष छ: मास सूर्य विषुवत् रेखा के दक्षिण की ओर होता है। इस प्रकार पूर्व से पश्चिम की ओर गति के अलावा सूर्य की यह एक उत्तर व दक्षिण में उत्क्रमणीय गति भी...

पितृसमीक्षा—3

पितृसमीक्षा—3 जिस अग्नि का वर्णन हमने पूर्व में किया है वह अग्नि अपने प्रसरण यानि फैलने के स्वभाव के कारण तीन प्रकार की  हो जाती है। जो प्रत्यक्ष दिखाई देती है वह अग्नि कहलाती है। अग्नि का ही विरल यानि की सूक्ष्म स्वरूप है वायु एवं अत्यन्त ही विरल स्वरूप है आदित्य यानि सूर्य। इसी प्रकार सोम के भी...

पितृ समीक्षा 1

पितृ समीक्षा -1 पितृ विषय पर बहुत ही वाद—विवाद करते हुये हिन्दू धर्मद्रोहियों ने पितरों से सम्बन्धित वेद वचनों को भी मिथ्या करने का कुत्सित प्रयास किया है। वे सभी स्वयं केा वेद का संरक्षक, वेदवादी कहने वाले हैं। किसी म्लेच्छ ने ये दुराग्रह कभी नहीं किया उनको इससे कोई मतलब नहीं था। दुष्ट एव हठधर्मी...

पितृसमीक्षा—2

पितृ समीक्षा—2 सृष्टि के विकास में तीन प्रधान तत्त्व हैं इन्हें तत्त्व कहें या भाव कह सकते हैं।—(1) अग्नि, (2) सोम एवं (3) यम। अग्नि एवं सोम प्रधान हैं एवं यम इनकी मध्यावस्था होती है। ये तीनों ही देवता रूप से पितृभाव है। इनमें '' त्वमग्ने अंगिरा'' इत्यादि वेद वचन के अनुसरा अग्नि सम्बन्धी देवताओं...
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