जब दूसरा सत्ययुग चल रहा था, उस सतयुग में सारस्वत नामक एक ब्राह्मण हुए, उन्हें सारे वेद वेदाङ्ग पुराण कंठस्थ थे । उत्तम बुद्धि तो ब्राह्मण के पास थी ही, साथ ही उनके पास अचूक सम्पति और सेवा करने वाले अनेको सेवको की भरमार थी ।।
एक दिन देवयोग से ब्राह्मण एकांत में बैठकर सोचने लगा, यह धन, यह लाभ हानि, यह तो संसार का चक्र है, यह तो ऐसे ही चलता रहेगा । इन सब नाशवान भोगों को लेकर मैं क्या करूँ ??
ब्राह्मण ने सोचा की क्यो न् अपना सबकुछ पुत्र को सौंपकर सरस्वती नदी के किनारे जप करूँ । जब उन्होंने इस कार्य के लिए भगवान की आज्ञा लेनी चाही तो, अंतरात्मा ने कहा :- पहले पितरो ,
देवताओं, तथा मनुष्यो को संतुष्ठ करो ।।
तब श्राद्ध आदि के द्वारा उस ब्राह्मण ने पितरो को प्रसन्न किया । यज्ञ के द्वारा उन्होंने देवताओं को प्रसन्न किया ।। और अतिथियों का सत्कार करके, दान आदि करके , मनुष्य के साथ मनुष्य सा व्यवहार करके, मनुष्य ऋण उतारा …..उसके पश्चात समय आने पर, वह ब्राह्मण पुष्कर तीर्थ चले गए, वहां जाकर उन्होंने नारायणमन्त्र ( ॐ नमो नारायणाय) का जाप करना एवं ब्रह्मपार नामक स्रोत जपना शुरू कर दिया ।।
नारायणदेव प्रगट हो गए …. बोले “वर मांगो”
ब्राह्मण ने कहा ;- मैं आपमे लीन हो जाऊं
नारायणदेव मुस्कुराते हुए कहने लगे, अभी तो यह शरीर धारण किये रहो ….लेकिन जो तुमने अपने पितरो को जल( नार) दिया है, इससे तुम्हारा नाम नारद हो जाएगा ।।
और जब ब्राह्मण के शरीर का अंत हो गया, तब वह ब्रह्मलोक पहुंच गए , और ब्रह्मा ने अपने 10 पुत्रों में नारदजी को भी अपना पुत्र माना, और उसी दिन समस्त देवताओं की सृष्टि हुई ….
टीवी सीरियल आदि में देखकर हम नारदजी का मजाक तक बना देते है…. लेकिन नारदजी कमती माया नही है … अपने स्वाध्याय के विषय मे नारदजी कहते है …
ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि , यजुर्वेदं , सामवेदमाथर्वणं चतुर्थम् , इतिहासपुराणं पञ्चं , वेदानां वेदं , पित्र्यं , राशिं , दैवं , निधिं , वाकोवाक्यमेकायनं , देवविद्यां , ब्रह्मविद्यां , भूतविद्यां , क्षत्रविद्यां , नक्षत्रविद्यां , सर्प देवजनविद्याम् , एतद्भगवोऽध्येमि । – छान्दो ० उ ० ७।१।२
नारदजी ने कहा- मैं ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद , अथर्ववेद- चारों वेदों को जानता हूँ । इनके अतिरिक्त इतिहास पुराण ( ब्राह्मण तथा कल्पादि ) वेदों का वेद – व्याकरण तथा निरुक्त , पित्र्य- वायुविज्ञान , राशि- गणितविद्या , दैव – प्रकृतिविज्ञान , निधि – भूगर्भविद्या , वाकोवाक्य तर्कशास्त्र , एकायन ब्रह्मविज्ञान , इन्द्रिय – विज्ञान , भक्ति शास्त्र , पञ्चभूतज्ञान , धनुर्वेद , ज्योतिष शास्त्र , सर्पविज्ञान , देवजन – विज्ञान- सर्पों को वश में करनेवाली गन्धर्व विद्या को मैं जानता हूँ । इतना मैंने अध्ययन किया है । यह है महर्षि नारद का अद्भुत स्वाध्याय ।।
श्रीनारदजी की कृपा से हम सबका मङ्गल हो ।।
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