कुछ याद रहे कुछ भुला दिए
हम प्रतिक्षण बढ़ते जाते हैं,
हर पल छलकते जाते हैं,
कारवां पीछे नहीं दिखता,
हर चेहरे बदलते जाते हैं।
हर पल का संस्मरण लिए,
कुछ धरे, कुछ विस्मृत किए,
अनगिनत शब्दों को सजाकर
कुछ याद रहे कुछ भुला दिए।
कितने पगडंडी पर चले,
कितने उपवन, डगर मिले,
कितने रंगों के पुष्प खिले
कुछ याद रहे कुछ भुला दिए।
कितनी अनछुई यादें,
कितने दर्द, कितनी फरियादें,
कितने मेले, कितने मरघट
कुछ याद रहे कुछ भुला दिए।
कितने रिश्ते नातों को,
कितने लोगों की बातों को,
चमकते दिन, अंधेरी रातों को,
कुछ याद रहे कुछ भुला दिए।
कितने दौर, सवालों को,
कितने भावुक उबालों को,
मेहनत, पांव के छालों को
कुछ याद रहे कुछ भुला दिए।
कुछ स्नेहसुधा करुणा ममता,
कुछ रंगबिरंग, कमता, समता,
समृद्ध समय, सबसे खंगता
कुछ याद रहे कुछ भुला दिए।
बस एक रहा अनछुआ यहां,
कुछ मिला नहीं कुछ हुआ यहां,
मैं का मैं न, मैं बदल सका,
कोई एक राह नहीं चल सका,
एक ढांचे में नहीं ढल सका,
बचपन जवानी बुढ़ापा बना,
अपरिवर्तित किंचित गल न सका।
बस इसी जगह मैं कह न सका
कुछ याद रहे कुछ भुला दिए।
पं. छत्रधर शर्मा
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