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🔍 नष्ट-प्रश्न — खोई/चोरी वस्तु व गुमशुदा व्यक्ति

प्रश्न-क्षण की कुंडली व पंचांग से — मिलेगा या नहीं, कहाँ और किस दिशा में, कब तक

इससे उस समय का नक्षत्र निकालकर "लोचन" (अंध/मंद/मध्य/सुलोचन) देखा जाता है — वस्तु मिलने के विचार का सबसे प्रचलित नियम।

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मन को शांत करके, एक ही स्पष्ट प्रश्न मन में रखकर पूछें। एक ही प्रश्न बार-बार पूछना प्रश्न-शास्त्र में वर्जित है।

📘 यह टूल कैसे काम करता है?
  1. प्रश्न-कुंडली: जिस क्षण आप प्रश्न पूछते हैं, उस समय और आपके स्थान की कुंडली साइट के पंचांग-इंजन से बनती है (वही इंजन जो कुंडली व पंचांग में है — लाहिरी अयनांश, सूक्ष्म ग्रह-स्पष्ट)। प्रश्न-शास्त्र में प्रश्न का क्षण ही "जन्म" माना जाता है।
  2. लग्न का स्वभाव: चर लग्न (मेष, कर्क, तुला, मकर) — वस्तु दूर/स्थान बदलती; स्थिर (वृष, सिंह, वृश्चिक, कुंभ) — पास ही, घर में; द्विस्वभाव (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) — आसपास/परिचित के पास। लग्न के 3 द्रेष्काण से घर में स्थान — द्वार, मध्य या भीतर।
  3. दिशा: लग्न-राशि की दिशा (मेष-सिंह-धनु पूर्व, वृष-कन्या-मकर दक्षिण, मिथुन-तुला-कुंभ पश्चिम, कर्क-वृश्चिक-मीन उत्तर) और केन्द्र के ग्रह की दिशा (सूर्य पूर्व, शुक्र आग्नेय, मंगल दक्षिण, राहु नैऋत्य, शनि पश्चिम, चन्द्र वायव्य, बुध उत्तर, गुरु ईशान)।
  4. स्थान का प्रकार: चतुर्थ भाव की राशि का तत्त्व (अग्नि/पृथ्वी/वायु/जल) व उसमें बैठे ग्रह।
  5. मिलेगा या नहीं: शुभ ग्रह लग्न, केन्द्र या लाभ (11) भाव में; बली चन्द्रमा; लग्नेश-लाभेश शुभ स्थान में — प्राप्ति के संकेत। पाप ग्रह 7, 8, 12 में; लग्नेश दुःस्थान में या अस्त — हानि के संकेत। हर नियम का अंक (+/−) परिणाम में दिखाया जाता है ताकि आप स्वयं परख सकें।
  6. लोचन: वस्तु खोने के समय का नक्षत्र (चन्द्र-स्पष्ट से, अभिजित सहित) — अंध/मंद/मध्य/सुलोचन।
  7. चोर/व्यक्ति: सप्तम भाव (दूसरा पक्ष) की राशि व ग्रह से स्त्री/पुरुष, परिचित/बाहरी, दिशा; गुमशुदा व्यक्ति के लिए चतुर्थ (घर-वापसी), सप्तम व अष्टम (कष्ट) भाव।
  8. समय: लग्न-स्वभाव से इकाई (चर — दिन, द्विस्वभाव — सप्ताह, स्थिर — मास) व लग्नेश-लाभेश के अन्तर से संख्या; साथ में आगामी 45 दिनों में चन्द्रमा का प्रश्न-लग्न व लाभ-भाव की राशि में गोचर — इंजन से मिनट-स्तर तक।

प्रश्न-ज्योतिष संकेत देता है, गारंटी नहीं। चोरी/गुमशुदगी में पुलिस की सहायता अवश्य लें। विशेष परिस्थिति में आचार्य से व्यक्तिगत परामर्श करें।

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