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🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय १३ — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

३४ श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा); ज्ञान के बीस लक्षण; ज्ञेय परमात्मा; प्रकृति-पुरुष।
१३.० अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥ ० ॥
ⓘ यह श्लोक कुछ संस्करणों में ही मिलता है; गीताप्रेस-क्रमांक में इसे गिना नहीं जाता।
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) केशव! प्रकृतिं पुरुषं च एव, क्षेत्रं क्षेत्रज्ञम् एव च, ज्ञानं ज्ञेयं च एतत् वेदितुम् इच्छामि।
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तथा ज्ञान और ज्ञेय — इन सबको जानना चाहता हूँ।
भावार्थ
यह श्लोक कुछ संस्करणों में मिलता है और कुछ में नहीं; गीताप्रेस आदि की परम्परा में इसे अध्याय की संख्या में नहीं गिना जाता, इसलिये इसे यहाँ '0' क्रम पर रखा गया है। इसमें अर्जुन छह विषयों के बारे में पूछते हैं — प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय। तेरहवें अध्याय से गीता का तीसरा षट्क (13–18) आरम्भ होता है, जिसका मुख्य विषय ज्ञान है — आत्मा और शरीर का भेद, प्रकृति के गुण, और परमात्मा का स्वरूप।
१३.१ श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (हे) कौन्तेय! इदं शरीरं क्षेत्रम् इति अभिधीयते; यः एतत् वेत्ति, तं तद्विदः 'क्षेत्रज्ञः' इति प्राहुः।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' इस नाम से कहा जाता है; और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' — ऐसा उनके तत्त्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं।
भावार्थ
तेरहवाँ अध्याय 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' कहलाता है। भगवान् दो मूल शब्दों की परिभाषा देते हैं — 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ'। क्षेत्र का अर्थ है खेत; शरीर को खेत कहा गया, क्योंकि जैसे खेत में बोया हुआ बीज फल देता है, वैसे ही शरीर में किये गये कर्म फल देते हैं। 'क्षेत्रज्ञ' — खेत को जानने वाला — आत्मा है, जो शरीर को जानता है पर शरीर नहीं है। जैसे किसान खेत से अलग है, वैसे ही आत्मा शरीर से अलग है। यह भेद समझना ही आत्मज्ञान का आरम्भ है।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥
अन्वय
(हे) भारत! सर्वक्षेत्रेषु क्षेत्रज्ञं च अपि मां विद्धि; क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः यत् ज्ञानं, तत् ज्ञानं मम मतम्।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी मुझे ही जान; और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का अर्थात् विकार सहित प्रकृति का और पुरुष का जो तत्त्व से जानना है, वह ज्ञान है — ऐसा मेरा मत है।
भावार्थ
भगवान् एक गहरा सत्य बताते हैं — सब शरीरों में जो क्षेत्रज्ञ (जानने वाली चेतना) है, वह वास्तव में भगवान् ही हैं। अर्थात् हर प्राणी के भीतर जो चेतना है, वह एक ही परमात्मा की चेतना है। और 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान' — शरीर और आत्मा के भेद का ज्ञान — ही सच्चा ज्ञान है। बाकी सारी जानकारी — विज्ञान, कला, इतिहास — उपयोगी है, पर वास्तविक ज्ञान यह जानना है कि 'मैं कौन हूँ'।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥
अन्वय
तत् क्षेत्रं यत् च, यादृक् च, यद्विकारि, यतः च यत्, सः च यः, यत्प्रभावः च (इति) तत् समासेन मे शृणु।
हिन्दी अनुवाद
वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाव वाला है — वह सब संक्षेप में मुझसे सुन।
भावार्थ
भगवान् विषय की रूपरेखा देते हैं — क्षेत्र के बारे में चार बातें: वह 'क्या' है, 'कैसा' है, उसके 'विकार' क्या हैं, और वह 'किससे' उत्पन्न हुआ। और क्षेत्रज्ञ के बारे में दो बातें: वह 'कौन' है और उसका 'प्रभाव' क्या है। 'समासेन' — संक्षेप में — बताया जायेगा। यह व्यवस्थित प्रस्तुति गीता की दार्शनिक गहराई का परिचय देती है।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्। ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥
अन्वय
(एतत्) ऋषिभिः विविधैः छन्दोभिः बहुधा पृथक् गीतम्, हेतुमद्भिः विनिश्चितैः ब्रह्मसूत्रपदैः च एव (गीतम्)।
हिन्दी अनुवाद
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्त्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेदमन्त्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भली-भाँति निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।
भावार्थ
भगवान् बताते हैं कि यह ज्ञान नया नहीं — ऋषियों ने इसे बहुत प्रकार से गाया है, वेदों के विविध छन्दों में इसका वर्णन है, और 'ब्रह्मसूत्र' के तर्कपूर्ण और निश्चित सूत्रों में भी इसका प्रतिपादन है। यह श्लोक बताता है कि गीता का ज्ञान उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों की परम्परा पर आधारित है। इसीलिये उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीता — ये तीनों मिलकर 'प्रस्थानत्रयी' कहलाते हैं, जो वेदान्त दर्शन के तीन आधार-स्तम्भ हैं।
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥
अन्वय
महाभूतानि, अहङ्कारः, बुद्धिः, अव्यक्तम् एव च, दश एकं च इन्द्रियाणि, पञ्च च इन्द्रियगोचराः —
हिन्दी अनुवाद
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध —
भावार्थ
क्षेत्र के चौबीस तत्त्व गिनाये गये हैं (सांख्य दर्शन के अनुसार) — पाँच 'महाभूत' (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), 'अहंकार', 'बुद्धि' (महत्तत्त्व), 'अव्यक्त' (मूल प्रकृति), दस 'इन्द्रियाँ' (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ), 'एक' (मन) और पाँच 'इन्द्रियगोचर' (इन्द्रियों के विषय — शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध)। ये सब मिलकर शरीर और जगत् बनाते हैं। आत्मा इन चौबीस से परे पच्चीसवाँ तत्त्व है।
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥
अन्वय
इच्छा, द्वेषः, सुखं, दुःखं, सङ्घातः, चेतना, धृतिः — एतत् सविकारं क्षेत्रं समासेन उदाहृतम्।
हिन्दी अनुवाद
तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देह का पिण्ड, चेतना और धृति — इस प्रकार विकारों के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया।
भावार्थ
क्षेत्र के विकार — 'इच्छा', 'द्वेष', 'सुख', 'दुःख', 'संघात' (शरीर का समूह), 'चेतना' (शरीर में दिखने वाली जीवन-शक्ति) और 'धृति' (धारण-शक्ति)। आश्चर्य की बात है कि इच्छा, द्वेष, सुख और दुःख भी क्षेत्र (शरीर-मन) के ही विकार हैं, आत्मा के नहीं। जब हम दुःखी होते हैं, तो वास्तव में मन दुःखी होता है; आत्मा तो उसकी साक्षी मात्र है। यह समझ हमें भावनाओं से अलग होकर उन्हें देखने की क्षमता देती है।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥
अन्वय
अमानित्वम्, अदम्भित्वम्, अहिंसा, क्षान्तिः, आर्जवम्, आचार्योपासनं, शौचं, स्थैर्यम्, आत्मविनिग्रहः —
हिन्दी अनुवाद
श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह —
भावार्थ
अब भगवान् 'ज्ञान' के बीस लक्षण बताते हैं (श्लोक 7–11)। आश्चर्य है कि यहाँ ज्ञान का अर्थ जानकारी नहीं, बल्कि चरित्र के गुण हैं! पहले नौ — 'अमानित्व' (अभिमान न होना), 'अदम्भित्व' (दिखावा न करना), 'अहिंसा', 'क्षान्ति' (सहनशीलता), 'आर्जव' (सरलता), 'आचार्योपासन' (गुरु की सेवा), 'शौच' (पवित्रता), 'स्थैर्य' (दृढ़ता) और 'आत्मविनिग्रह' (आत्मसंयम)। जिसमें ये गुण नहीं, वह कितना भी पढ़ा-लिखा हो, ज्ञानी नहीं। सच्चा ज्ञान चरित्र में प्रकट होता है।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च। जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥
अन्वय
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम्, अनहङ्कारः एव च, जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् —
हिन्दी अनुवाद
इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना —
भावार्थ
और लक्षण — 'इन्द्रियार्थेषु वैराग्य' (विषय-भोगों में अनासक्ति), 'अनहंकार' (अहंकार का अभाव) और 'जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शन' — जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग में दुःख और दोष को बार-बार देखना। यह अन्तिम गुण भगवान् बुद्ध की कथा की याद दिलाता है, जिन्होंने एक बूढ़े, एक रोगी और एक मृत व्यक्ति को देखकर संसार की नश्वरता समझी और वैराग्य पाया। जीवन के दुःखों पर चिन्तन करना निराशावाद नहीं, बल्कि वैराग्य और ज्ञान का द्वार है।
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥
अन्वय
असक्तिः, पुत्रदारगृहादिषु अनभिष्वङ्गः, इष्टानिष्टोपपत्तिषु च नित्यं समचित्तत्वम् —
हिन्दी अनुवाद
पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना —
भावार्थ
और लक्षण — 'असक्ति' (आसक्ति का अभाव), 'पुत्र-स्त्री-घर आदि में अनभिष्वंग' (उनके साथ अपनी पहचान न जोड़ना, उनसे चिपके न रहना) और 'इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में सदा समचित्तता'। इसका अर्थ परिवार को छोड़ना नहीं, बल्कि उनसे प्रेम करते हुए भी उन पर अपनी खुशी को निर्भर न करना है। प्रेम और आसक्ति में अन्तर है — प्रेम मुक्त करता है, आसक्ति बाँधती है।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥
अन्वय
मयि च अनन्ययोगेन अव्यभिचारिणी भक्तिः, विविक्तदेशसेवित्वं, जनसंसदि अरतिः —
हिन्दी अनुवाद
मुझ परमेश्वर में अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना —
भावार्थ
और लक्षण — 'अनन्य योग से अव्यभिचारिणी भक्ति' (भगवान् में अटल, एकनिष्ठ प्रेम), 'विविक्तदेशसेवित्व' (एकान्त स्थान में रहने की रुचि) और 'जनसंसदि अरति' (भीड़-भाड़ और व्यर्थ की गपशप में रुचि न होना)। ध्यान दें कि ज्ञान के लक्षणों में भक्ति भी शामिल है — गीता में ज्ञान और भक्ति अलग नहीं। एकान्त-प्रियता का अर्थ समाज से भागना नहीं, बल्कि आत्म-चिन्तन के लिये समय निकालना है।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥
अन्वय
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं, तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् — एतत् ज्ञानम् इति प्रोक्तम्; अतः यत् अन्यथा, (तत्) अज्ञानम्।
हिन्दी अनुवाद
अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा को ही देखना — यह सब ज्ञान है; और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है — ऐसा कहा है।
भावार्थ
अन्तिम दो लक्षण — 'अध्यात्मज्ञाननित्यत्व' (आत्मज्ञान में निरन्तर स्थित रहना) और 'तत्त्वज्ञानार्थदर्शन' (तत्त्वज्ञान के लक्ष्य — परमात्मा — को सदा देखना)। फिर भगवान् निष्कर्ष देते हैं — 'एतज्ज्ञानम्' — यही ज्ञान है; और 'अज्ञानं यदतोऽन्यथा' — इसके विपरीत जो कुछ है, वह अज्ञान है। चाहे कोई कितना भी विद्वान् हो, यदि उसमें अभिमान, दम्भ, हिंसा, आसक्ति है, तो वह अज्ञानी है। गीता की ज्ञान की परिभाषा क्रान्तिकारी है — ज्ञान वह है जो जीवन को बदल दे।
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥
अन्वय
यत् ज्ञेयं (अस्ति), यत् ज्ञात्वा (नरः) अमृतम् अश्नुते, तत् प्रवक्ष्यामि; (तत्) अनादिमत् परं ब्रह्म न सत् न असत् उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भली-भाँति कहूँगा। वह अनादि वाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही।
भावार्थ
अब भगवान् 'ज्ञेय' — जानने योग्य परम तत्त्व — का वर्णन करते हैं, जिसे जानकर 'अमृत' — अमरत्व — मिलता है। वह 'अनादिमत् परं ब्रह्म' है — अनादि परम ब्रह्म। और वह 'न सत् न असत्' — न सत् कहा जा सकता है, न असत्। क्योंकि 'सत्' कहने से वह अन्य सत् वस्तुओं जैसा हो जायेगा, और 'असत्' कहने से उसका अस्तित्व नकारा जायेगा। वह इन दोनों श्रेणियों से परे है — शब्दों और विचारों की पकड़ से बाहर।
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्। सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥
अन्वय
तत् सर्वतः पाणिपादं, सर्वतः अक्षिशिरोमुखं, सर्वतः श्रुतिमत् (च), लोके सर्वम् आवृत्य तिष्ठति।
हिन्दी अनुवाद
वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।
भावार्थ
परम ब्रह्म की सर्वव्यापकता का वर्णन — सब ओर उसके हाथ-पैर, नेत्र, सिर, मुख और कान हैं। अर्थात् सब प्राणियों के हाथ, पैर, आँखें, कान उसी के हैं; वही सबके माध्यम से कार्य करता है, देखता है, सुनता है। यह श्वेताश्वतर उपनिषद् के मन्त्र का अनुवाद है। वह 'सर्वमावृत्य तिष्ठति' — सब कुछ ढककर, व्याप्त करके स्थित है। कोई स्थान उससे खाली नहीं।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥
अन्वय
(तत्) सर्वेन्द्रियगुणाभासं, सर्वेन्द्रियविवर्जितम्, असक्तं, सर्वभृत् च एव, निर्गुणं, गुणभोक्तृ च (अस्ति)।
हिन्दी अनुवाद
वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है; तथा आसक्तिरहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है।
भावार्थ
ब्रह्म के विरोधाभासी गुण — 'सर्वेन्द्रियगुणाभास' (सब इन्द्रियों के गुणों का प्रकाशक) पर 'सर्वेन्द्रियविवर्जित' (स्वयं इन्द्रियों से रहित); 'असक्त' (आसक्ति रहित) पर 'सर्वभृत्' (सबका पालक); 'निर्गुण' (गुणों से परे) पर 'गुणभोक्तृ' (गुणों का भोक्ता)। ये विरोधाभास बताते हैं कि ब्रह्म सामान्य तर्क से परे है। जैसे बिजली स्वयं न प्रकाश है, न गर्मी, न ध्वनि, पर बल्ब में प्रकाश, हीटर में गर्मी और स्पीकर में ध्वनि उसी से है।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥
अन्वय
(तत्) भूतानां बहिः अन्तः च, अचरं चरम् एव च; सूक्ष्मत्वात् तत् अविज्ञेयम्; तत् दूरस्थं च अन्तिके च।
हिन्दी अनुवाद
वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है; और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय है तथा अति समीप में और दूर में भी स्थित वही है।
भावार्थ
और विरोधाभास — ब्रह्म प्राणियों के 'बाहर और भीतर' दोनों है; 'चर' (चलने वाला) और 'अचर' (स्थिर) दोनों है; 'दूर' और 'पास' दोनों है। 'सूक्ष्मत्वात् तदविज्ञेयम्' — अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण उसे इन्द्रियों और मन से नहीं जाना जा सकता। वह अज्ञानी के लिये अत्यन्त दूर है — करोड़ों जन्मों में भी नहीं मिलता; और ज्ञानी के लिये अत्यन्त निकट — अपनी आत्मा ही है। ईशोपनिषद् भी कहता है — 'तद्दूरे तद्वन्तिके'।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥
अन्वय
तत् भूतेषु अविभक्तं च विभक्तम् इव च स्थितम्; तत् ज्ञेयं भूतभर्तृ च, ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च (अस्ति)।
हिन्दी अनुवाद
वह परमात्मा विभाग रहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है; तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णु रूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्र रूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मा रूप से सबको उत्पन्न करने वाला है।
भावार्थ
ब्रह्म 'अविभक्त' (अखण्ड, अविभाजित) है, पर प्राणियों में 'विभक्त इव' — बँटा हुआ-सा — दिखता है। जैसे एक सूर्य अनेक घड़ों के जल में अनेक प्रतिबिम्बों के रूप में दिखता है, पर सूर्य एक ही है। वह 'भूतभर्तृ' (पालनकर्ता — विष्णु), 'ग्रसिष्णु' (संहारकर्ता — रुद्र) और 'प्रभविष्णु' (सृष्टिकर्ता — ब्रह्मा) है। त्रिमूर्ति एक ही परम सत्य के तीन कार्य हैं।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते। ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥
अन्वय
तत् ज्योतिषाम् अपि ज्योतिः, तमसः परम् उच्यते; (तत्) ज्ञानं, ज्ञेयं, ज्ञानगम्यं (च), सर्वस्य हृदि विष्ठितम्।
हिन्दी अनुवाद
वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्त्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।
भावार्थ
ब्रह्म 'ज्योतिषामपि ज्योतिः' — प्रकाशों का भी प्रकाश — है। सूर्य, चन्द्र, अग्नि सबको प्रकाश उसी से मिलता है; और हमारी चेतना, जो इन प्रकाशों को देखती है, वह भी उसी का प्रकाश है। वह 'तमसः परम्' — अन्धकार (अज्ञान) से परे है। वह 'ज्ञान' (स्वयं चेतना), 'ज्ञेय' (जानने योग्य) और 'ज्ञानगम्य' (ज्ञान से प्राप्य) है। और सबसे सान्त्वनादायक — 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्' — वह सबके हृदय में स्थित है। उसे खोजने कहीं दूर नहीं जाना।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः। मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥
अन्वय
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं च समासतः उक्तम्; मद्भक्तः एतत् विज्ञाय मद्भावाय उपपद्यते।
हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेप से कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्त्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
भावार्थ
भगवान् सारांश देते हैं — क्षेत्र (शरीर-जगत्), ज्ञान (चरित्र के गुण) और ज्ञेय (परम ब्रह्म) — तीनों का संक्षेप में वर्णन हो गया। और इसका फल — 'मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते' — भगवान् का भक्त इसे जानकर भगवान् के स्वरूप को प्राप्त होता है। ध्यान दें — इस गहन दार्शनिक विवेचन के अन्त में भी भगवान् 'भक्त' शब्द का प्रयोग करते हैं। ज्ञान का अधिकारी भी भक्त ही है। गीता में ज्ञान और भक्ति अविभाज्य हैं।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥ १९ ॥
अन्वय
प्रकृतिं पुरुषं च एव उभौ अपि अनादी विद्धि; विकारान् च गुणान् च एव प्रकृतिसम्भवान् विद्धि।
हिन्दी अनुवाद
प्रकृति और पुरुष — इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान।
भावार्थ
अब भगवान् 'प्रकृति' और 'पुरुष' की बात करते हैं — दोनों 'अनादि' हैं, उनका कोई आरम्भ नहीं। प्रकृति जड़ है, पुरुष चेतन। सब 'विकार' (परिवर्तन — शरीर, मन, इन्द्रियाँ) और 'गुण' (सत्त्व, रज, तम) प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। पुरुष (आत्मा) अविकारी है — वह बदलता नहीं। यह सांख्य दर्शन का मूल सिद्धान्त है, जिसे गीता स्वीकार करती है, पर ईश्वर को दोनों के स्वामी के रूप में जोड़ती है।
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते। पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥
अन्वय
कार्यकारणकर्तृत्वे प्रकृतिः हेतुः उच्यते; सुखदुःखानां भोक्तृत्वे पुरुषः हेतुः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
कार्य और करण को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तापन में अर्थात् भोगने में हेतु कहा जाता है।
भावार्थ
प्रकृति और पुरुष के कार्य का विभाजन — 'कार्य' (शरीर) और 'करण' (इन्द्रियाँ) का निर्माण प्रकृति करती है; पर 'सुख-दुःख का भोग' पुरुष (जीवात्मा) करता है। अर्थात् कर्म प्रकृति के हैं, पर उनके फल का अनुभव पुरुष करता है — क्योंकि वह प्रकृति से अपनी पहचान जोड़ लेता है। जैसे कोई सिनेमा देखते हुए पात्रों के सुख-दुःख में स्वयं को सुखी-दुःखी अनुभव करे, जबकि वह केवल दर्शक है।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥
अन्वय
हि प्रकृतिस्थः पुरुषः प्रकृतिजान् गुणान् भुङ्क्ते; अस्य सदसद्योनिजन्मसु गुणसङ्गः कारणम्।
हिन्दी अनुवाद
प्रकृति में स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।
भावार्थ
पुरुष क्यों बँधता है? क्योंकि वह 'प्रकृतिस्थ' — प्रकृति में स्थित, उससे जुड़ा — होकर प्रकृति के गुणों को भोगता है। और 'गुणसंग' — गुणों से आसक्ति — ही उसके 'सत्-असत् योनियों' (अच्छी-बुरी योनियों) में जन्म का कारण है। जैसा गुण प्रधान होगा, वैसी योनि मिलेगी। बन्धन का मूल कारण आसक्ति है; आसक्ति छूटते ही बन्धन छूट जाता है।
उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥
अन्वय
अस्मिन् देहे परः पुरुषः उपद्रष्टा, अनुमन्ता च, भर्ता, भोक्ता, महेश्वरः, परमात्मा इति च अपि उक्तः।
हिन्दी अनुवाद
इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है। वही साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करने वाला होने से भर्ता, जीव रूप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा — ऐसा कहा गया है।
भावार्थ
इस शरीर में एक 'पर पुरुष' — परमात्मा — भी है, जिसके अनेक नाम हैं — 'उपद्रष्टा' (पास बैठकर देखने वाला साक्षी), 'अनुमन्ता' (अनुमति देने वाला), 'भर्ता' (धारण करने वाला), 'भोक्ता' (अनुभव करने वाला), 'महेश्वर' (महान् ईश्वर) और 'परमात्मा'। मुण्डक उपनिषद् की उपमा है — एक वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं; एक फल खाता है (जीवात्मा), दूसरा केवल देखता है (परमात्मा)। परमात्मा हर क्षण हमारे साथ है, हमारा साक्षी और मार्गदर्शक।
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥
अन्वय
यः एवं पुरुषं गुणैः सह प्रकृतिं च वेत्ति, सः सर्वथा वर्तमानः अपि भूयः न अभिजायते।
हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्त्व से जानता है, वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता।
भावार्थ
पुरुष और प्रकृति के भेद को तत्त्व से जानने का फल — 'सर्वथा वर्तमानोऽपि' — किसी भी परिस्थिति में, कोई भी कार्य करते हुए — वह फिर जन्म नहीं लेता। जब यह बोध हो जाता है कि 'मैं' प्रकृति (शरीर-मन) नहीं, बल्कि पुरुष (आत्मा) हूँ, तो कर्म बाँधते नहीं। कर्म प्रकृति करती है, आत्मा साक्षी रहती है। यह ज्ञान जीवन को बदलने की आवश्यकता नहीं, केवल दृष्टि बदलने की बात करता है।
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥
अन्वय
केचित् ध्यानेन आत्मना आत्मनि आत्मानं पश्यन्ति, अन्ये सांख्येन योगेन, अपरे च कर्मयोगेन (पश्यन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान द्वारा हृदय में देखते हैं, अन्य कितने ही ज्ञानयोग द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोग द्वारा देखते हैं अर्थात् प्राप्त करते हैं।
भावार्थ
भगवान् परमात्मा को पाने के विभिन्न मार्ग बताते हैं — कुछ 'ध्यान' से अपने भीतर परमात्मा को देखते हैं (ध्यानयोग); कुछ 'सांख्ययोग' से — विवेक द्वारा आत्मा और अनात्मा का भेद करके (ज्ञानयोग); और कुछ 'कर्मयोग' से — निष्काम कर्म द्वारा। सब मार्ग एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार मार्ग चुनता है — ध्यानशील ध्यान, विचारशील ज्ञान, और कर्मठ कर्म।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥
अन्वय
तु अन्ये एवम् अजानन्तः अन्येभ्यः श्रुत्वा उपासते; ते श्रुतिपरायणाः अपि च मृत्युम् अतितरन्ति एव।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु इनसे दूसरे अर्थात् जो मन्दबुद्धि वाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात् तत्त्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्यु रूप संसार-सागर को निःसन्देह तर जाते हैं।
भावार्थ
उनका क्या जो ध्यान, ज्ञान या कर्मयोग की गहराई नहीं समझते? भगवान् कहते हैं — वे दूसरों (गुरुओं, संतों) से 'सुनकर' श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं, और वे भी मृत्यु को पार कर जाते हैं। 'श्रुतिपरायण' — सुनने में तत्पर — होना भी पर्याप्त है, यदि श्रद्धा हो। यह अत्यन्त उदार वचन है — जो स्वयं शास्त्र नहीं पढ़ सकते, वे संतों से सुनकर भी मुक्त हो सकते हैं। कथा-सत्संग का महत्व इसी में है।
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
अन्वय
(हे) भरतर्षभ! यावत् किञ्चित् स्थावरजङ्गमं सत्त्वं सञ्जायते, तत् क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् (सञ्जायते इति) विद्धि।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान।
भावार्थ
सृष्टि का रहस्य — जो कुछ भी 'स्थावर' (पेड़-पौधे) या 'जंगम' (चलने वाले प्राणी) उत्पन्न होता है, वह 'क्षेत्र' (जड़ प्रकृति) और 'क्षेत्रज्ञ' (चेतन आत्मा) के संयोग से होता है। अकेली प्रकृति निर्जीव है, अकेली आत्मा अप्रकट। दोनों के मिलने से जीवन प्रकट होता है। जैसे बिजली और बल्ब के मिलने से प्रकाश। हर जीवित प्राणी में जड़ और चेतन का यह अद्भुत मेल है।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥
अन्वय
यः सर्वेषु भूतेषु समं तिष्ठन्तं, विनश्यत्सु अविनश्यन्तं परमेश्वरं पश्यति, सः पश्यति।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता है।
भावार्थ
'यः पश्यति स पश्यति' — जो ऐसा देखता है, वही वास्तव में देखता है। क्या देखता है? सब प्राणियों में 'सम' — समान रूप से — स्थित परमेश्वर को; और 'विनश्यत्सु अविनश्यन्तम्' — नष्ट होने वालों में भी नष्ट न होने वाले को। शरीर नष्ट होते हैं, पर उनमें स्थित परमात्मा अविनाशी है। जो केवल शरीरों को देखता है, वह अन्धा है; जो शरीरों में परमात्मा को देखता है, वही सच्चा द्रष्टा है।
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥
अन्वय
हि सर्वत्र समवस्थितम् ईश्वरं समं पश्यन् (सः) आत्मना आत्मानं न हिनस्ति, ततः परां गतिं याति।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि जो पुरुष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परमगति को प्राप्त होता है।
भावार्थ
जो सब जगह समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, वह 'आत्मना आत्मानं न हिनस्ति' — अपने द्वारा अपनी हिंसा नहीं करता। इसका अर्थ है — वह किसी की हिंसा नहीं करता, क्योंकि सबमें अपनी ही आत्मा देखता है; दूसरे को कष्ट देना अपने को ही कष्ट देना है। और वह अपनी आत्मा का पतन भी नहीं करता — अज्ञान और पाप से। अहिंसा का सबसे गहरा आधार यही एकात्म-दृष्टि है। ऐसा व्यक्ति परम गति पाता है।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ २९ ॥
अन्वय
यः च कर्माणि सर्वशः प्रकृत्या एव क्रियमाणानि, तथा आत्मानम् अकर्तारं पश्यति, सः पश्यति।
हिन्दी अनुवाद
और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किये जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है।
भावार्थ
एक और सच्ची दृष्टि — सब कर्म 'प्रकृति के द्वारा' हो रहे हैं, और आत्मा 'अकर्ता' है। जो यह देखता है, वही यथार्थ देखता है। शरीर चलता है, मन सोचता है, इन्द्रियाँ अनुभव करती हैं — ये सब प्रकृति के कार्य हैं। आत्मा इनका साक्षी है, कर्ता नहीं। यह बोध कर्तापन के अहंकार को मिटा देता है, और अहंकार मिटते ही कर्म बन्धन नहीं रहते।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति। तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥
अन्वय
यदा (सः) भूतपृथग्भावम् एकस्थम्, ततः एव च विस्तारम् अनुपश्यति, तदा ब्रह्म सम्पद्यते।
हिन्दी अनुवाद
जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक्-पृथक् भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ
ब्रह्म-प्राप्ति का क्षण — जब व्यक्ति प्राणियों की 'पृथकता' (अलग-अलग होना) को 'एक' (परमात्मा) में स्थित देखता है, और उसी एक से सबका 'विस्तार' देखता है — 'तदा ब्रह्म सम्पद्यते' — उसी क्षण वह ब्रह्म हो जाता है। विविधता में एकता और एकता से विविधता — यह दोहरी दृष्टि पूर्ण ज्ञान है। जैसे समुद्र की अनगिनत लहरों को देखते हुए यह जानना कि सब एक ही जल है।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! अनादित्वात् निर्गुणत्वात् अयम् अव्ययः परमात्मा शरीरस्थः अपि न करोति, न लिप्यते।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है।
भावार्थ
परमात्मा शरीर में रहते हुए भी 'न करोति न लिप्यते' — न कुछ करता है, न लिप्त होता है। क्यों? दो कारण — 'अनादित्व' (उसका कोई आरम्भ नहीं, इसलिये वह किसी कारण-कार्य शृंखला का भाग नहीं) और 'निर्गुणत्व' (वह गुणों से परे है, इसलिये गुणों के कार्य उसे छूते नहीं)। वह 'अव्यय' — अविनाशी — है। शरीर में रहना उसके लिये बन्धन नहीं, जैसे आकाश घड़े में रहकर भी घड़े से बँधता नहीं।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥
अन्वय
यथा सर्वगतम् आकाशं सौक्ष्म्यात् न उपलिप्यते, तथा देहे सर्वत्र अवस्थितः आत्मा न उपलिप्यते।
हिन्दी अनुवाद
जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता।
भावार्थ
आकाश की उपमा — आकाश सब जगह है — शुद्ध और अशुद्ध दोनों स्थानों में, सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनों में — फिर भी 'सौक्ष्म्यात्' — अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण — वह किसी से लिप्त नहीं होता। कीचड़ में आकाश गंदा नहीं होता, आग में जलता नहीं। वैसे ही आत्मा शरीर के हर भाग में व्याप्त है, पर शरीर के रोग, बुढ़ापे, मृत्यु से अछूती रहती है। यह आत्मा की शुद्धता और स्वतन्त्रता का सुन्दर चित्र है।
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः। क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥
अन्वय
(हे) भारत! यथा एकः रविः इमं कृत्स्नं लोकं प्रकाशयति, तथा क्षेत्री कृत्स्नं क्षेत्रं प्रकाशयति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।
भावार्थ
सूर्य की उपमा — जैसे एक सूर्य सारे संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही 'क्षेत्री' (आत्मा) सम्पूर्ण 'क्षेत्र' (शरीर) को प्रकाशित करती है — उसे चेतना देती है। आत्मा के कारण ही शरीर में जीवन है, इन्द्रियों में अनुभव की क्षमता है, मन में विचार हैं। सूर्य जिन वस्तुओं को प्रकाशित करता है, उनके गुण-दोष से प्रभावित नहीं होता; वैसे ही आत्मा शरीर को चेतना देती है, पर उसके विकारों से अछूती रहती है।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा। भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥
अन्वय
ये एवं क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः अन्तरं भूतप्रकृतिमोक्षं च ज्ञानचक्षुषा विदुः, ते परं यान्ति।
हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्त्व से जानते हैं, वे महात्माजन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
तेरहवें अध्याय का समापन — जो 'ज्ञानचक्षु' — ज्ञान की आँख — से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का 'अन्तर' (भेद) और 'भूतप्रकृतिमोक्ष' (प्रकृति से मुक्ति का उपाय) जानते हैं, वे परम को प्राप्त होते हैं। 'ज्ञानचक्षु' शब्द महत्वपूर्ण है — यह भेद भौतिक आँखों से नहीं, ज्ञान की आँख से दिखता है। शरीर और आत्मा का भेद समझ लेना ही मुक्ति का द्वार है। यह अध्याय 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' कहलाता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥

ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।
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