श्रीभगवान् बोले — हे पार्थ! मुझमें अनन्य प्रेम से आसक्त मन वाला, अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन।
भावार्थ
सातवें अध्याय से गीता का दूसरा षट्क (7–12) आरम्भ होता है, जिसका मुख्य विषय भगवान् का स्वरूप और भक्ति है। छठे अध्याय के अन्त में भगवान् ने कहा था कि भक्त योगी सर्वश्रेष्ठ है; अब वे बताते हैं कि उन्हें 'समग्र' — सम्पूर्ण रूप से — कैसे जाना जाये। इसके लिये तीन शर्तें हैं: 'मय्यासक्तमनाः' (मन भगवान् में आसक्त हो), 'मदाश्रयः' (भगवान् का ही आश्रय हो) और 'योगं युञ्जन्' (योग का अभ्यास हो)। 'असंशयम्' — बिना किसी संशय के, पूर्ण निश्चय से जानना ही लक्ष्य है।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥
अन्वय
अहं ते इदं सविज्ञानं ज्ञानम् अशेषतः वक्ष्यामि, यत् ज्ञात्वा इह भूयः अन्यत् ज्ञातव्यं न अवशिष्यते।
हिन्दी अनुवाद
मैं तेरे लिये इस विज्ञान सहित तत्त्वज्ञान को सम्पूर्णता से कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता।
भावार्थ
भगवान् 'ज्ञान' और 'विज्ञान' दोनों देने का वचन देते हैं। 'ज्ञान' — भगवान् के निर्गुण, निराकार स्वरूप का बोध; 'विज्ञान' — उनके सगुण, साकार स्वरूप और सृष्टि में उनकी विभूतियों का अनुभवपूर्ण ज्ञान। दोनों मिलकर पूर्ण ज्ञान बनते हैं। इसे जानने के बाद 'कुछ और जानने योग्य शेष नहीं रहता', क्योंकि भगवान् ही सबका मूल हैं; मूल को जान लेने पर शाखाओं को अलग-अलग जानने की आवश्यकता नहीं। जैसे मिट्टी को जानने से मिट्टी के सब बर्तनों का स्वरूप जान लिया जाता है।
हज़ारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिये यत्न करता है, और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्त्व से अर्थात् यथार्थ रूप से जानता है।
भावार्थ
भगवान् इस ज्ञान की दुर्लभता बताते हैं। हज़ारों में कोई एक व्यक्ति ही आध्यात्मिक सिद्धि के लिये प्रयत्न करता है — अधिकांश लोग खाने, कमाने और भोगने में ही जीवन बिता देते हैं। और प्रयत्न करने वालों में भी कोई विरला ही भगवान् को 'तत्त्वतः' — यथार्थ रूप से — जान पाता है। यह निराश करने के लिये नहीं, बल्कि इस ज्ञान का मूल्य बताने के लिये है। जो वस्तु दुर्लभ है, वही सबसे मूल्यवान है। अर्जुन को यह सौभाग्य मिल रहा है कि भगवान् स्वयं उन्हें यह ज्ञान दे रहे हैं।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥
अन्वय
भूमिः आपः अनलः वायुः खं मनः बुद्धिः एव च अहङ्कारः इति इयं मे अष्टधा भिन्ना प्रकृतिः।
हिन्दी अनुवाद
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार — इस प्रकार यह आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है।
भावार्थ
भगवान् अपनी दो प्रकृतियों का वर्णन आरम्भ करते हैं। पहली 'अपरा' — निम्न — प्रकृति आठ तत्त्वों वाली है: पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) जिनसे स्थूल जगत् बना है, और तीन सूक्ष्म तत्त्व (मन, बुद्धि, अहंकार) जिनसे हमारा आन्तरिक जगत् बना है। ध्यान देने योग्य है कि मन, बुद्धि और अहंकार भी जड़ प्रकृति के ही अंग माने गये हैं — वे आत्मा नहीं हैं। हमारा शरीर, विचार और 'मैं' का भाव भी प्रकृति के ही रूप हैं; आत्मा इन सबसे परे है।
यह आठ प्रकार के भेदों वाली तो अपरा अर्थात् मेरी जड़ प्रकृति है; और हे महाबाहो! इससे दूसरी को, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात् चेतन प्रकृति जान।
भावार्थ
दूसरी प्रकृति 'परा' — श्रेष्ठ — है, जो 'जीवभूता' — जीव रूप, चेतन — है। यही वह चेतना है जो सब प्राणियों में जीवन के रूप में है और जिससे सारा जगत् 'धार्यते' — धारण किया जाता है, जीवित रहता है। जड़ प्रकृति अपने आप में निष्प्राण है; चेतन प्रकृति (जीवात्मा) के संयोग से ही उसमें जीवन आता है। जैसे बिजली के बिना बल्ब केवल काँच और तार है। दोनों प्रकृतियाँ भगवान् की ही हैं — 'मे' — इसलिये भगवान् जड़ और चेतन दोनों के स्वामी हैं।
हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं, और मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत् का मूल कारण हूँ।
भावार्थ
सब प्राणी इन्हीं दो प्रकृतियों — जड़ और चेतन — के संयोग से उत्पन्न होते हैं। और भगवान् स्वयं सम्पूर्ण जगत् के 'प्रभव' (उत्पत्ति का स्थान) और 'प्रलय' (लय का स्थान) हैं। जैसे समुद्र से लहरें उठती हैं और उसी में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही सारी सृष्टि भगवान् से प्रकट होती है और उन्हीं में समा जाती है। भगवान् सृष्टि के निमित्त कारण (रचयिता) भी हैं और उपादान कारण (सामग्री) भी।
हे धनञ्जय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है; यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुँथा हुआ है।
भावार्थ
यह गीता की अत्यन्त सुन्दर उपमाओं में है — 'सूत्रे मणिगणा इव'। जैसे माला के मोती एक धागे में पिरोये होते हैं, धागा दिखता नहीं पर सब मोतियों को जोड़े रखता है; वैसे ही भगवान् अदृश्य रूप से सारी सृष्टि को धारण किये हुए हैं। मोती अलग-अलग रंग, आकार के हो सकते हैं, पर धागा एक है। संसार की विविधता के पीछे एक ही परम सत्य है। 'मत्तः परतरं नान्यत्' — भगवान् से बढ़कर या उनसे परे कुछ भी नहीं।
हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।
भावार्थ
अब भगवान् बताते हैं कि उन्हें संसार में कैसे पहचाना जाये — हर वस्तु के सार के रूप में। जल का सार उसका 'रस' (स्वाद) है; सूर्य-चन्द्र का सार उनकी 'प्रभा' (प्रकाश) है; वेदों का सार 'प्रणव' (ॐ) है; आकाश का सार 'शब्द' है; मनुष्यों का सार उनका 'पौरुष' (सामर्थ्य, पुरुषार्थ) है। इस दृष्टि से हर अनुभव भगवान् का अनुभव बन जाता है — जल पीते समय उसके स्वाद में, सूर्य के प्रकाश में, किसी के साहस में भगवान् का दर्शन। यह भक्ति की एक सरल और गहरी साधना है।
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥
अन्वय
पृथिव्यां पुण्यः गन्धः च, विभावसौ तेजः च अस्मि, सर्वभूतेषु जीवनं, तपस्विषु तपः च अस्मि।
हिन्दी अनुवाद
मैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध और अग्नि में तेज हूँ, तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।
भावार्थ
विभूतियों का वर्णन आगे बढ़ता है। पृथ्वी का सार उसकी 'पुण्य गन्ध' — पवित्र सुगन्ध (जैसे वर्षा के बाद मिट्टी की सौंधी गन्ध); अग्नि का सार उसका 'तेज'; सब प्राणियों का सार उनका 'जीवन' (प्राण-शक्ति); तपस्वियों का सार उनका 'तप'। 'पुण्य' विशेषण यह संकेत करता है कि भगवान् शुद्ध, स्वाभाविक गन्ध हैं, दुर्गन्ध नहीं। हर जीव में धड़कता जीवन भगवान् का ही रूप है — यह समझ जीवन के प्रति गहरा सम्मान जगाती है।
हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जान; मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।
भावार्थ
भगवान् स्वयं को सब प्राणियों का 'सनातन बीज' बताते हैं। जैसे एक बीज में पूरा वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही भगवान् में सारी सृष्टि बीज रूप में स्थित है। और यह बीज 'सनातन' है — कभी नष्ट नहीं होता; वृक्ष नष्ट हो जाये, पर बीज फिर से नया वृक्ष उत्पन्न करता है। बुद्धिमानों में जो बुद्धि की चमक है और तेजस्वियों में जो प्रभाव है, वह भी भगवान् का ही अंश है। इसलिये किसी को अपनी बुद्धि या तेज पर अहंकार नहीं करना चाहिये — वह भगवान् की देन है।
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात् सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात् शास्त्र के अनुकूल काम हूँ।
भावार्थ
यह श्लोक बहुत सूक्ष्म भेद करता है। भगवान् बल हैं, पर कौन-सा बल? 'कामरागविवर्जित' — काम और आसक्ति से रहित बल, जो रक्षा और धर्म के लिये प्रयुक्त होता है, स्वार्थ और अत्याचार के लिये नहीं। भगवान् काम (इच्छा) भी हैं, पर कौन-सा? 'धर्माविरुद्ध' — धर्म के अनुकूल इच्छा, जैसे विवाह के भीतर संतानोत्पत्ति की इच्छा। इसका अर्थ है कि इच्छा या बल अपने आप में बुरे नहीं; उनका दुरुपयोग बुरा है। धर्म की सीमा में सब कुछ पवित्र है।
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥
अन्वय
ये च एव सात्त्विकाः भावाः, ये च राजसाः तामसाः च, तान् मत्तः एव इति विद्धि; तु अहं तेषु न, ते मयि (सन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजोगुण तथा तमोगुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तू 'मुझसे ही होने वाले हैं' ऐसा जान; परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं।
भावार्थ
यह एक गहरा दार्शनिक श्लोक है। संसार के सभी भाव — सात्त्विक (शान्ति, ज्ञान), राजस (क्रियाशीलता, इच्छा) और तामस (आलस्य, मोह) — भगवान् से ही उत्पन्न होते हैं। पर फिर एक विरोधाभास — 'मैं उनमें नहीं, वे मुझमें हैं'। इसका अर्थ है कि भगवान् इन गुणों के आधार हैं, पर उनसे प्रभावित नहीं। जैसे आकाश में बादल आते-जाते हैं, आकाश उन्हें आधार देता है, पर बादलों से आकाश मैला नहीं होता। भगवान् सबके मूल होते हुए भी सबसे अछूते हैं।
गुणों के कार्य रूप सात्त्विक, राजस और तामस — इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार, प्राणिसमुदाय, मोहित हो रहा है; इसीलिये इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता।
भावार्थ
संसार भगवान् को क्यों नहीं जान पाता? क्योंकि वह तीनों गुणों के भावों से 'मोहित' है। सात्त्विक व्यक्ति ज्ञान और सुख में, राजस व्यक्ति कर्म और महत्वाकांक्षा में, तामस व्यक्ति आलस्य और मोह में उलझा रहता है। तीनों ही गुण अपने-अपने ढंग से बाँधते हैं — सत्त्व भी सोने की ज़ंजीर है। भगवान् इन तीनों से 'परम्' — परे — हैं, इसलिये जब तक मन गुणों में उलझा है, उन्हें नहीं देख पाता। जैसे रंगीन चश्मा पहनकर असली रंग नहीं दिखता।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥
अन्वय
हि एषा गुणमयी मम दैवी माया दुरत्यया; ये माम् एव प्रपद्यन्ते, ते एतां मायां तरन्ति।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं, अर्थात् संसार से तर जाते हैं।
भावार्थ
यह गीता का अत्यन्त महत्वपूर्ण श्लोक है। भगवान् की 'माया' — त्रिगुणमयी शक्ति — 'दैवी' (दिव्य) और 'दुरत्यया' (पार करने में अत्यन्त कठिन) है। अपने प्रयत्न से, बुद्धि या तप के बल से इसे पार करना लगभग असम्भव है। पर एक उपाय है — 'मामेव ये प्रपद्यन्ते' — जो केवल भगवान् की शरण लेते हैं, वे इसे पार कर जाते हैं। क्योंकि माया भगवान् की है; जो माया के स्वामी की शरण में चला जाये, माया उसे कैसे बाँधे? जैसे किसी घर के कुत्ते से बचने का सबसे सरल उपाय है घर के मालिक से मित्रता।
माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किये हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते।
भावार्थ
भगवान् चार प्रकार के लोगों का उल्लेख करते हैं जो उनकी शरण नहीं लेते — 'दुष्कृती' (पाप कर्म करने वाले), 'मूढ़' (मूर्ख, जो अपना हित नहीं समझते), 'नराधम' (मनुष्यों में नीच, जो मनुष्य जन्म पाकर भी उसका दुरुपयोग करते हैं) और 'मायापहृतज्ञान' (जिनका ज्ञान माया ने हर लिया, जो विद्वान् होकर भी अहंकारवश भगवान् को नहीं मानते)। इन सबका मूल है 'आसुर भाव' — अहंकार, दम्भ और स्वार्थ। यह निन्दा नहीं, बल्कि उन बाधाओं की पहचान है जो हमें भगवान् से दूर रखती हैं।
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म वाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी — ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझको भजते हैं।
भावार्थ
अब भगवान् चार प्रकार के पुण्यात्मा भक्तों का वर्णन करते हैं। 'आर्त' — संकट में पड़ा हुआ, जो दुःख दूर करने के लिये भगवान् को पुकारता है (जैसे द्रौपदी, गजेन्द्र)। 'जिज्ञासु' — जो भगवान् को जानना चाहता है (जैसे उद्धव)। 'अर्थार्थी' — जो धन, पद या किसी वस्तु के लिये भगवान् को भजता है (जैसे ध्रुव)। 'ज्ञानी' — जो भगवान् को जान चुका है और निष्काम प्रेम से भजता है (जैसे शुकदेव)। भगवान् किसी को नहीं ठुकराते — चाहे कोई किसी भी कारण से आये, उसे 'सुकृती' — पुण्यात्मा — कहते हैं।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥
अन्वय
तेषां नित्ययुक्तः एकभक्तिः ज्ञानी विशिष्यते; हि अहं ज्ञानिनः अत्यर्थं प्रियः, सः च मम प्रियः।
हिन्दी अनुवाद
उनमें भी नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित, अनन्य प्रेम भक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है; क्योंकि मुझको तत्त्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है।
भावार्थ
चारों में ज्ञानी भक्त सर्वश्रेष्ठ है। क्यों? क्योंकि वह 'नित्ययुक्त' — सदा भगवान् से जुड़ा रहता है, केवल संकट या आवश्यकता के समय नहीं; और 'एकभक्ति' — उसकी भक्ति केवल भगवान् के लिये है, किसी वस्तु के लिये नहीं। बाकी तीन भक्त कुछ पाने के लिये आते हैं; ज्ञानी केवल भगवान् को चाहता है। इसलिये यह प्रेम परस्पर है — 'प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः' — ज्ञानी को भगवान् अत्यन्त प्रिय हैं और भगवान् को ज्ञानी। निःस्वार्थ प्रेम ही सबसे ऊँचा प्रेम है।
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८ ॥
अन्वय
एते सर्वे एव उदाराः; तु ज्ञानी आत्मा एव (इति) मे मतम्; हि सः युक्तात्मा माम् एव अनुत्तमां गतिम् आस्थितः।
हिन्दी अनुवाद
ये सभी उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है — ऐसा मेरा मत है; क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धि वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गति स्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है।
भावार्थ
भगवान् सभी चारों भक्तों को 'उदार' — महान् — कहते हैं, क्योंकि उन्होंने किसी न किसी कारण से भगवान् की ओर मुख किया है, जो स्वयं में बड़ी बात है। किसी देवता या मनुष्य से माँगने के बजाय भगवान् से माँगना भी श्रेष्ठ है। पर ज्ञानी को भगवान् अपनी 'आत्मा' ही मानते हैं — उसमें और भगवान् में कोई भेद नहीं रहता। वह भगवान् को ही 'अनुत्तम गति' — सर्वोच्च लक्ष्य — मानकर उनमें स्थित है। यह भक्त और भगवान् के एकत्व की अवस्था है।
बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में तत्त्वज्ञान को प्राप्त पुरुष, 'सब कुछ वासुदेव ही है' — इस प्रकार मुझको भजता है; वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
भावार्थ
यह गीता का अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है — 'वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः'। अनेक जन्मों की साधना के बाद व्यक्ति इस सत्य को अनुभव करता है कि 'सब कुछ वासुदेव (भगवान्) ही हैं'। यह केवल बौद्धिक विचार नहीं, बल्कि जीवन्त अनुभव है — हर व्यक्ति, हर वस्तु, हर घटना में भगवान् का दर्शन। ऐसा 'महात्मा' अत्यन्त दुर्लभ है। यह दृष्टि मिलने पर न कोई शत्रु रहता है, न पराया; न भय रहता है, न शोक। यह भक्ति और ज्ञान दोनों का शिखर है।
उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं।
भावार्थ
भगवान् बताते हैं कि लोग अन्य देवताओं की उपासना क्यों करते हैं — विभिन्न कामनाओं के कारण। धन के लिये लक्ष्मी, विद्या के लिये सरस्वती, संतान के लिये किसी और देवता की उपासना करते हैं। ऐसे लोगों का 'ज्ञान हर लिया गया है' — अर्थात् वे यह नहीं समझते कि सब देवताओं के पीछे एक ही परमात्मा है। वे 'अपनी प्रकृति से नियत' — अपने स्वभाव और संस्कारों से प्रेरित — होकर विभिन्न व्रत-नियम अपनाते हैं। भगवान् इसकी निन्दा नहीं करते, केवल यह बताते हैं कि यह सीमित दृष्टि है।
जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ।
भावार्थ
यह भगवान् की अद्भुत उदारता का श्लोक है। जो व्यक्ति जिस किसी देवता की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, भगवान् उसकी उसी श्रद्धा को 'अचल' — दृढ़ — बना देते हैं। वे किसी को अपनी ओर बलपूर्वक नहीं खींचते, बल्कि हर व्यक्ति को उसकी अपनी श्रद्धा के मार्ग पर आगे बढ़ने देते हैं। क्योंकि श्रद्धा स्वयं में पवित्र है, और धीरे-धीरे वह व्यक्ति को परम सत्य की ओर ले जायेगी। यह धार्मिक स्वतन्त्रता और सहिष्णुता का गहरा सिद्धान्त है।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान् ॥ २२ ॥
अन्वय
सः तया श्रद्धया युक्तः तस्य आराधनम् ईहते; ततः च मया एव विहितान् तान् कामान् हि लभते।
हिन्दी अनुवाद
वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किये हुए उन इच्छित भोगों को निःसन्देह प्राप्त करता है।
भावार्थ
वह भक्त अपनी श्रद्धा से देवता की आराधना करता है और उसे इच्छित फल भी मिलते हैं। पर यहाँ एक रहस्य है — 'मयैव विहितान्' — वे फल वास्तव में भगवान् ही देते हैं, देवता के माध्यम से। देवता स्वतन्त्र शक्ति नहीं, बल्कि भगवान् की ही विभिन्न शक्तियाँ या प्रतिनिधि हैं। जैसे एक राजा के विभिन्न मन्त्री विभिन्न विभाग सँभालते हैं, पर सारी शक्ति राजा की ही होती है। इसलिये किसी भी देवता की पूजा अन्ततः भगवान् तक ही पहुँचती है।
परन्तु उन अल्प बुद्धि वालों का वह फल नाशवान् है; तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
भगवान् देव-उपासना और भगवद्भक्ति के फल का अन्तर बताते हैं। देवताओं से मिलने वाला फल 'अन्तवत्' — नाशवान्, सीमित — है। धन मिलेगा, पर खर्च हो जायेगा; स्वर्ग मिलेगा, पर पुण्य क्षीण होने पर लौटना होगा। देवताओं को पूजने वाले देवलोक तक पहुँचते हैं, पर भगवान् के भक्त भगवान् को ही प्राप्त होते हैं — जो अनन्त और शाश्वत है। 'अल्पमेधस्' — अल्प बुद्धि — इसलिये कहा, क्योंकि वे अनन्त को छोड़कर सीमित को चुनते हैं। समझदारी यह है कि सीधे मूल स्रोत से जुड़ें।
बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्म कर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं।
भावार्थ
भगवान् एक सामान्य भ्रम की बात करते हैं। जब वे मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं, तो अज्ञानी लोग सोचते हैं कि वे भी साधारण मनुष्य की तरह जन्मे हैं — पहले अव्यक्त थे, फिर व्यक्त हुए, जैसे कोई भी प्राणी। वे भगवान् के 'परम भाव' — उनके अविनाशी, सर्वोच्च स्वरूप — को नहीं जानते। अवतार का शरीर साधारण शरीर नहीं, बल्कि दिव्य है। श्रीकृष्ण को केवल एक महान् राजनीतिज्ञ या दार्शनिक मानना उनके वास्तविक स्वरूप को न पहचानना है।
योगमायासमावृतः अहं सर्वस्य प्रकाशः न (भवामि); अयं मूढः लोकः मां अजम् अव्ययं न अभिजानाति।
हिन्दी अनुवाद
अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिये यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित, अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात् मुझको जन्मने-मरने वाला समझता है।
भावार्थ
भगवान् सबको क्यों नहीं दिखते? क्योंकि वे 'योगमाया' — अपनी दिव्य शक्ति — से ढके हुए हैं। यह आवरण भगवान् की इच्छा से है, ताकि केवल सच्चे भक्त ही उन्हें पहचान सकें। जैसे बादलों में छिपा सूर्य सबको नहीं दिखता, पर विमान से बादलों के ऊपर जाने वाले को दिखता है। 'मूढ़' लोग, जो बाहरी रूप से आगे नहीं देखते, भगवान् के 'अज' (अजन्मा) और 'अव्यय' (अविनाशी) स्वरूप को नहीं पहचान पाते। भक्ति की आँख से ही वे दिखते हैं।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥
अन्वय
(हे) अर्जुन! अहं समतीतानि वर्तमानानि च भविष्याणि च भूतानि वेद; तु मां कश्चन न वेद।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझको कोई भी श्रद्धा-भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता।
भावार्थ
भगवान् अपनी सर्वज्ञता प्रकट करते हैं — वे भूत, वर्तमान और भविष्य के सब प्राणियों को जानते हैं। काल उनके लिये बाधा नहीं; वे काल से परे हैं। पर उन्हें कोई नहीं जानता — अर्थात् अपने प्रयत्न से, बुद्धि के बल से कोई उन्हें पूरी तरह नहीं जान सकता। जैसे एक छोटा प्याला समुद्र को अपने में नहीं समा सकता। भगवान् को केवल उनकी कृपा से, भक्ति के द्वारा ही जाना जा सकता है। सीमित बुद्धि असीम को कैसे मापे?
(हे) भारत परन्तप! सर्गे सर्वभूतानि इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन सम्मोहं यान्ति।
हिन्दी अनुवाद
हे भरतवंशी अर्जुन! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दुःखादि द्वन्द्व रूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं।
भावार्थ
प्राणी भगवान् को क्यों नहीं जान पाते — इसका मूल कारण बताया गया है: 'इच्छा-द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्व-मोह'। जन्म से ही प्राणी कुछ वस्तुओं को चाहने (इच्छा) और कुछ से बचने (द्वेष) लगता है। इससे सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय, लाभ-हानि जैसे द्वन्द्व उत्पन्न होते हैं, और इन द्वन्द्वों में उलझकर वह मोहित हो जाता है। यह मोह 'सर्गे' — सृष्टि के आरम्भ से, जन्म के समय से ही — लग जाता है। जब तक राग-द्वेष हैं, तब तक सत्य दिखाई नहीं देता।
परन्तु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेष जनित द्वन्द्व रूप मोह से मुक्त दृढ़निश्चयी भक्त मुझको सब प्रकार से भजते हैं।
भावार्थ
पर जो लोग पुण्य कर्मों से अपने पापों को समाप्त कर चुके हैं, वे द्वन्द्व-मोह से मुक्त हो जाते हैं और 'दृढ़व्रत' — दृढ़ निश्चय से — भगवान् को भजते हैं। पुण्य कर्म मन को शुद्ध करते हैं, और शुद्ध मन में राग-द्वेष का मोह कमज़ोर हो जाता है। तब भगवान् की ओर स्वाभाविक आकर्षण उत्पन्न होता है। 'दृढ़व्रत' शब्द महत्वपूर्ण है — ऐसा भक्त परिस्थितियों से डगमगाता नहीं; उसकी भक्ति अटल होती है।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥
अन्वय
ये माम् आश्रित्य जरामरणमोक्षाय यतन्ति, ते तत् ब्रह्म कृत्स्नम् अध्यात्मम् अखिलं कर्म च विदुः।
हिन्दी अनुवाद
जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिये यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।
भावार्थ
जो भगवान् का आश्रय लेकर 'जरा-मरण' — बुढ़ापे और मृत्यु — से मुक्ति के लिये प्रयत्न करते हैं, वे तीन बातें जान लेते हैं: 'ब्रह्म' (परम सत्य), 'अध्यात्म' (आत्मा का स्वरूप) और 'कर्म' (सृष्टि की प्रक्रिया)। यहाँ भगवान् कुछ पारिभाषिक शब्दों का परिचय देते हैं, जिनकी व्याख्या आठवें अध्याय में होगी। ध्यान देने योग्य है कि यह सब ज्ञान 'मामाश्रित्य' — भगवान् की शरण में रहकर — प्राप्त होता है। शरणागति ज्ञान का द्वार खोलती है।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥
अन्वय
ये माम् साधिभूताधिदैवं साधियज्ञं च विदुः, ते युक्तचेतसः प्रयाणकाले अपि च मां विदुः।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव के सहित तथा अधियज्ञ के सहित सबके आत्मरूप मुझे अन्तकाल में भी जानते हैं, वे युक्त चित्त वाले पुरुष मुझको ही जानते हैं अर्थात् मुझको ही प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
सातवें अध्याय का समापन तीन और पारिभाषिक शब्दों के साथ होता है — 'अधिभूत' (भौतिक जगत्), 'अधिदैव' (दैवी शक्तियाँ) और 'अधियज्ञ' (यज्ञ के अधिष्ठाता)। जो भगवान् को इन सब रूपों में जानता है, वह 'प्रयाणकाल' — मृत्यु के समय — भी भगवान् को स्मरण रखता है, और इसलिये उन्हें प्राप्त होता है। मृत्यु के समय का स्मरण अत्यन्त महत्वपूर्ण है, जिसका विस्तार अगले अध्याय में होगा। यह अध्याय 'ज्ञानविज्ञानयोग' कहलाता है, जिसमें भगवान् की दो प्रकृतियाँ, उनकी विभूतियाँ और चार प्रकार के भक्तों का वर्णन है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥
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