✍️ CD Sharma · 📅 22 Aug 2026 · 🏷️ पितृ मंत्र, Pitru Mantra, पितृ दोष निवारण, श्राद्ध पक्ष, पितृ गायत्री, पितृ तर्पण, cdsharma.in
सनातन धर्म में देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण—ये तीन मूलभूत ऋण माने गए हैं। गरुड़ पुराण एवं मत्स्य पुराण के अनुसार, जिस कुल में पितर तृप्त और प्रसन्न रहते हैं, उस कुल की निरंतर उन्नति होती है। पितृ मंत्रों का विधिपूर्वक जप करने से न केवल अतृप्त पूर्वजों को सद्गति प्राप्त होती है, बल्कि साधक को कुंडली के 'पितृ दोष' से भी पूर्ण मुक्ति मिलती है।
१. सर्वपितृ तृप्ति महामंत्र (पितृ स्तुति श्लोक):
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥
२. पितृ गायत्री मंत्र:
ॐ पितृगणाय विद्महे जगतधारिणे धीमहि तन्नो पितृ प्रचोदयात्॥
३. यजुर्वेदीय वैदिक पितृ मंत्र:
ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। अक्षन्नमीमदन्त ह्यवप्रिया अधूषत॥
४. सरल एवं सर्वसुलभ नाम मंत्र:
ॐ पितृदेवताभ्यो नमः अथवा ॐ कुलदेवताभ्यो नमः
१. पवित्रीकरण एवं आचमन
हाथ में जल लेकर अपने ऊपर एवं पूजन सामग्री पर छिड़कें:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
तत्पश्चात तीन बार आचमन करें (ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः) और हाथ धो लें।
२. महासंकल्प (Sankalpa)
दाहिने हाथ में जल, काले तिल, कुश, श्वेत पुष्प और दक्षिणा लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके संकल्प लें:
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य... (वर्तमान संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि बोलें) अमुक गोत्रोत्पन्नः (अपना गोत्र बोलें), अमुक शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं (अपना नाम बोलें) मम समस्त-पितृणां तृप्त्यर्थं, पितृदोष-निवारणार्थं, कुल-वृद्धि-आरोग्य-सुख-शांति-प्राप्त्यर्थं च पितृ-गायत्री-मंत्र (अथवा पितृ-महामंत्र) जपमहं करिष्ये।
(संकल्प का जल भूमि पर या तांबे के पात्र में छोड़ दें।)
३. विनियोगः (Viniyoga)
हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़ें:
ॐ अस्य श्रीपितृमंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, पितरो देवता, सर्वपितृप्रसाद-सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
४. करन्यास एवं अङ्गन्यास (Nyasa)
५. पितृ ध्यानम् (Pitri Dhyanam)
दोनों हाथ जोड़कर पितृदेवों के शांत एवं तेजस्वी स्वरूप का ध्यान करें:
दिव्यान् पितॄन् नित्यतृप्तान् शान्तान् ज्ञानस्वरूपिणः।
वरदानोद्यतकरान् ध्यायेत्सर्वहितैषिणः॥
श्वेताम्बरधरान् शुद्धान् श्वेतमाल्यानुलेपनान्।
विमानस्थान् महाभागान् पितॄन् ध्यायामि संततम्॥
ॐ तृप्यन्तु पितरः समस्तकुलजाः तृप्यन्तु मे पूर्वजाः।
अनेन जपेन पितरः प्रीयन्तां नमो नमः॥
ॐ तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तु। अनेन यथाशक्ति कृतेन पितृमंत्रजपेन मम पितृदेवताः प्रीयन्ताम्, न मम।
(जल भूमि पर छोड़ दें।)
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमध्वं पितृदेवताः॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वराः॥
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