✍️ CD Sharma · 📅 21 Aug 2026 · 🏷️ यजुर्वेद उपाकर्म, श्रावणी कर्म, Yajurveda Upakarma, यज्ञोपवीत धारण, जनेऊ बदलने की विधि, काण्डर्षि तर्पण, cdsharma.in
सनातन वैदिक परंपरा में 'उपाकर्म' (Upakarma) द्विजत्व के नवीनीकरण और वेदाध्ययन के औपचारिक शुभारंभ का महापर्व है। यजुर्वेदीय परंपरा के अनुसार, प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को उपाकर्म संस्कार संपन्न किया जाता है।
'उपाकर्म' का शाब्दिक अर्थ है — 'समीप जाना' अथवा 'नया आरंभ करना', अर्थात् आत्म-निरीक्षण कर पुनः वेदों और ब्रह्मतेज के सान्निध्य में लौटना।
प्राचीन काल में गुरुकुलों में वेदाध्ययन का सत्र श्रावण पूर्णिमा से प्रारंभ होकर पौष मास की पूर्णिमा (उत्सर्जन काल) तक चलता था। वर्षा ऋतु के आगमन पर ऋषि-मुनि स्वाध्याय, जप और तप में लीन हो जाते थे।
इस अनुष्ठान के तीन मुख्य उद्देश्य हैं:
यजुर्वेदीय श्रावणी उपाकर्म मुख्य रूप से सात चरणों में संपन्न होता है:
उपाकर्म के दिन प्रातः काल पवित्र नदी, सरोवर या तीर्थ जल से स्नान कर भस्म/तिलक धारण किया जाता है। इसके पश्चात वर्षभर के पापों के क्षय हेतु 'प्रायश्चित्त संकल्प' लिया जाता है।
ॐ कामोऽकार्षीन्मन्युरकार्षीन्नमो नमः॥
देश, काल, वर्तमान मन्वन्तर, संवत्सर, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि तथा अपने गोत्र व प्रवर का उच्चारण करते हुए भगवान सूर्यनारायण और श्रीहरि को साक्षी मानकर उपाकर्म, यज्ञोपवीत धारण और वेदारंभ का संकल्प लिया जाता है।
यज्ञोपवीत को पंचगव्य अथवा शुद्ध जल से प्रोक्षण कर गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित किया जाता है। इसके बाद पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके हाथ जोड़ें और इस मंत्र का उच्चारण करते हुए नया जनेऊ धारण करें:
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
नया जनेऊ धारण करने के पश्चात पुराना जनेऊ आचमन कर उतारा जाता है और उसे जल में विसर्जित किया जाता है। विसर्जन का मंत्र:
एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया। जीर्णत्वात्ते परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम्॥
यजुर्वेद की संहिताओं और ब्राह्मण ग्रंथों के दृष्टा ऋषियों के प्रति कृतज्ञता अर्पित करने के लिए जल, अक्षत और कुश के अग्रभाग से देव-ऋषि तर्पण किया जाता है।
यजुर्वेद के प्रमुख काण्ड ऋषियों का तर्पण इस प्रकार किया जाता है:
तर्पण के उपरांत वेदों के स्वाध्याय का औपचारिक आरंभ किया जाता है। यजुर्वेद के प्रथम मंत्र का सस्वर पाठ किया जाता है:
ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे...॥
इसके साथ ही ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा उपनिषदों के प्रारंभिक शांति पाठ किए जाते हैं।
श्रावणी पूर्णिमा के ठीक अगले दिन (भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा) को 'गायत्री जप दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन साधक प्रातः संध्यावंदन के उपरांत न्यूनतम 1008 या 108 बार गायत्री महामंत्र का जप करते हैं, जिससे वर्षभर के लिए आत्मबल और आध्यात्मिक तेज की प्राप्ति होती है।
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