✍️ CD Sharma · 📅 19 Aug 2026 · 🏷️ श्रावण पुत्रदा एकादशी, व्रत कथा, पूजा विधि, धार्मिक महत्व
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'श्रावण पुत्रदा एकादशी' कहा जाता है। सनातन धर्म में इस व्रत का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त इस पावन व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं और इसकी कथा का श्रवण करते हैं, उन्हें सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है तथा पूर्वजन्म के संचित पापों का नाश होता है।
द्वापर युग में माहिष्मती पुरी का राजा महीजित अत्यंत दयालु, प्रजाहितैषी और धर्मपरायण था। राज्य में किसी वस्तु की कोई कमी नहीं थी, किंतु राजा निःसंतान था। संतान न होने के कारण राजा अत्यंत दुखी रहता था। उसका मानना था कि जिस व्यक्ति का कोई पुत्र या संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही कल्याणकारी नहीं होते।
अपनी इस व्यथा के निवारण हेतु राजा ने राज्य के श्रेष्ठ ब्राह्मणों, विद्वानों और प्रजाजनों को एकत्रित किया। प्रजाजनों ने राजा के दुख को दूर करने के लिए वन में जाकर त्रिकालदर्शी महर्षि लोमश के आश्रम में शरण ली।
महर्षि लोमश ने अपने तपोबल और दिव्य दृष्टि से राजा महीजित के पूर्वजन्म का रहस्य देखकर बताया:
ऋषियों और प्रजाजनों द्वारा उपाय पूछने पर महर्षि लोमश ने कहा:
"श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'पुत्रदा एकादशी' कहा जाता है। यदि राजा, रानी और समस्त प्रजाजन पूर्ण विधि-विधान से इस व्रत का पालन करें और उसका संचित पुण्य राजा को समर्पित कर दें, तो राजा को निश्चित ही पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।"
प्रजा सहित राजा महीजित ने श्रावण शुक्ल एकादशी का नियमपूर्वक उपवास रखा, रात्रि में भगवान श्री हरि विष्णु का जागरण किया और द्वादशी के दिन विधिपूर्वक पारण करके अपने व्रत का पुण्य राजा को अर्पित किया।
व्रत के दिव्य प्रभाव से रानी ने गर्भधारण किया और समयानुसार एक अत्यंत तेजस्वी, पराक्रमी और गुणवान पुत्र को जन्म दिया।
पद्म पुराण के अनुसार, श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से वाजपेय यज्ञ के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है। यह व्रत न केवल संतान बाधाओं को दूर करता है, बल्कि साधक के चित्त को शुद्ध कर अंत समय में मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
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