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सपिण्डीकरण श्राद्ध विधि एवं पूर्व तैयारी (सविस्तार मन्त्र व क्रिया सहित) | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 30 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ सपिण्डी श्राद्ध, Sapindi Shradh Vidhi, सपिण्डीकरण प्रयोग, Sapindikarana Paddhati, श्राद्ध पूर्व तैयारी, Shradh Preparation Material, प्रेत विमुक्ति, Pitru Shradh Karmakand, पिण्डदान विधि, Pinda Daan, पिण्ड सम्मेलन, Pinda Sammelan Mantra, वैदिक श्राद्ध पद्

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सपिण्डीकरण श्राद्ध विधि एवं पूर्व तैयारी (सविस्तार मन्त्र व क्रिया सहित) | cdsharma.in

सपिण्डीकरण श्राद्ध विधि एवं पूर्व तैयारी

सपिण्डीकरण श्राद्ध सनातन कर्मकाण्ड का अत्यंत महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील संस्कार है। इसके द्वारा जीवात्मा की 'प्रेत' संज्ञा समाप्त होकर वह 'पितृ' रूप में प्रतिष्ठित होती है और अपने पितामह, प्रपितामह एवं वृद्धप्रपितामह के साथ संयुक्त होती है। यह विधि द्वादशाह (12वें दिन) अथवा वर्षान्त में संपन्न की जाती है।

१. श्राद्ध-पूर्व आवश्यक तैयारी एवं सामग्री व्यवस्था

श्राद्ध कर्म की सफलता उसकी बाह्य एवं आभ्यन्तर शुद्धि तथा शास्त्रीय व्यवस्था पर निर्भर करती है। श्राद्ध आरम्भ करने से पूर्व निम्नलिखित व्यवस्थाएं सुनिश्चित कर लें:

क. कर्त्ता एवं पाककर्त्ता की तैयारी

  1. शुद्धता व नियम: श्राद्धकर्त्ता (यजमान) को क्षौरकर्म (दाढ़ी-बाल-नख कर्तन) एक दिन पूर्व ही करा लेना चाहिए। श्राद्ध के दिन प्रातःकाल स्नानोपरांत शुद्ध धौत (बिना सिला या शास्त्रीय) श्वेत वस्त्र धारण करें।
  2. पाककर्त्ता (रसोइया): यदि ब्राह्मण या कुल की शुचिष्मती महिला द्वारा भोजन बनाया जा रहा हो, तो वह स्नान करके मौन या भगवत्स्मरण करते हुए पूर्ण पवित्रता से भोजन बनाए।
  3. पाक विचार (दो पृथक पाक): सपिण्डीकरण में दो पाक तैयार किए जाते हैं—
  • प्रथम पाक: जो पूर्व के मासिक श्राद्धों आदि हेतु उपयोग होता है।
  • द्वितीय पाक: जिससे सपिण्डीकरण श्राद्ध, प्रेत-पितृ भोजन, पिण्ड निर्माण तथा (यदि परकीय भूमि हो तो) भूस्वामी का भाग निकलता है।
  1. भोजन सामग्री: शुद्ध देशी गाय का घी, गाय का दूध, दही, मधु (शहद), तिल, उड़द की दाल, साठी/बासमती चावल, जौ (यव), ऋतुफल, मखाना, शर्करा (खांड/गुड़)। (श्राद्ध में हींग, प्याज, लहसुन, मसूर, चना, बैंगन, तीखे-चरपरे मसाले पूर्णतः वर्जित हैं)।

ख. वेदी एवं श्राद्ध-स्थल की तैयारी

  1. स्थान शुद्धि: श्राद्ध-स्थल को गोमय (गाय के गोबर) और गंगाजल से लीपकर स्वच्छ करें।
  2. दो पृथक पिण्डवेदी: सपिण्डीकरण में शास्त्रानुसार प्रेतपिण्ड और पितृपिण्डों के लिए दो अलग-अलग वेदियां बनाई जाती हैं:
  • प्रेत पिण्डवेदी: दक्षिणप्लव (दक्षिण की ओर ढालू) बालू अथवा शुद्ध मिट्टी से एक हाथ लम्बी-चौड़ी और ४ अंगुल ऊँची बनाई जाती है।
  • पितृ पिण्डवेदी: प्रेतवेदी के समीप ही तीन पितरों (पितामह, प्रपितामह, वृद्धप्रपितामह) हेतु समान माप की दूसरी वेदी तैयार की जाती है।
  1. दिशा विचार: विश्वेदेव का स्थान पूर्व/उत्तर दिशा में तथा पितरों एवं प्रेत का स्थान दक्षिण दिशा की ओर कल्पित किया जाता है।

ग. कुशा (दर्भ) के विशेष उपकरण

श्राद्ध कर्म बिना कुशा के निष्फल माना गया है। कर्म आरम्भ से पूर्व निम्न स्वरूप बनाकर रखें:

  • पवित्री: अनामिका अंगुली में धारण करने हेतु कुश की गाँठ वाली पवित्री।
  • त्रिकुशा: तीन कुशाओं को एक साथ बाँधकर या सीधा रखा गया रूप।
  • मोड़क / मोड़ा (मोटक): कुशा को दोहरा करके बनाई गई गाँठ (पितृकर्म में प्रयुक्त)।
  • दर्भपिञ्जुलि: वेदी पर उल्लेखन (रेखा खींचने) हेतु कुशा का अग्रभाग।

छिन्नमूल कुशा: वेदी पर पिण्ड रखने हेतु ऐसी कुशाएं जिनकी जड़ काट दी गई हो।घ. आवश्यक पूजन व कर्मकाण्ड सामग्री सूची

  • पात्र: ताम्बे, पीतल, कांसे या मिट्टी/पत्तों के पात्र। अर्घ्य, अत्रावन, प्रत्यवन एवं अक्षय्योदक हेतु पर्याप्त संख्या में पलाश/महुए के पत्तों के पूड़े (दोने)।
  • द्रव्य: काला तिल (प्रचुर मात्रा में), सफेद जौ (यव), गंगाजल, श्वेत पुष्प, श्वेत चन्दन, तुलसी दल, भृंगराज, धूप, गाय के घी का दीपक।
  • पिण्डच्छेदन उपकरण: प्रेतपिण्ड को तीन भागों में विभक्त करने के लिए स्वर्ण शलाका अथवा रजत (चांदी) की शलाका/तार/सिक्का।
  • वस्त्र एवं यज्ञोपवीत: विश्वेदेव, प्रेत तथा तीन पितरों के निमित्त नवीन यज्ञोपवीत, धोती/अंगवस्त्र तथा पिण्डों पर अर्पण हेतु कच्चा सूत (वस्त्र-सूत्र)।
  • दक्षिणा द्रव्य: विश्वेदेव हेतु सुवर्ण/ताम्र/रुपये तथा प्रेत व पितरों हेतु रजत (चांदी) अथवा द्रव्य।
  • अंगार (उल्मुक): वेदी पर अंगारभ्रमण कराने हेतु जलता हुआ कण्डा/अंगार।

२. पारिभाषिक निर्देश (संकेतार्थ)

कर्मकाण्ड की सुगमता के लिए आगे प्रयोग किए गए संक्षिप्त रूपों का अर्थ इस प्रकार है:

  • स.द.त्रि. : सव्य (यज्ञोपवीत बाएँ कंधे पर), दक्षिणाभिमुख (दक्षिण की ओर मुख), त्रिकुशहस्त (हाथ में त्रिकुशा)।
  • स.पू.त्रि. : सव्य, पूर्वाभिमुख (पूर्व की ओर मुख), त्रिकुशहस्त।
  • अ.द.त्रि. : अपसव्य (यज्ञोपवीत दाएँ कंधे पर), दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
  • अ.द.मो. : अपसव्य, दक्षिणाभिमुख, मोटकहस्त (हाथ में मोड़ा)।
विशेष: सव्य-अपसव्य क्रम और त्रिकुशा-मोड़ा आदि के सम्बन्ध में अन्य शाखा पद्धतियों में किञ्चित भेद संभव है। यदि पाककर्त्ता द्वारा पाककर्म हुआ हो तो श्राद्धकर्त्ता पाककर्त्ता से पूछे— "सिद्धम्" और पाककर्त्ता कहे— "ॐ सिद्धम्"। यदि स्वयं पाक किया हो तो पूछने की आवश्यकता नहीं है।

३. सपिण्डी श्राद्ध प्रयोग विधि

१. आत्मशुद्धि एवं पवित्रीकरण

सर्वप्रथम ऊर्ध्वपुण्ड्र, शिखाग्रंथि, पवित्रीकरण, कुशादि धारण कर शुद्धिकरण करे, तीन बार आचमन करते हुए आत्मशुद्धि करे :

पवित्रीकरण मंत्र (सव्य-पूर्वाभिमुख) :

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याऽभ्यन्तरः शुचिः। पुण्डरीकाक्षः पुनातु। ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु॥

तदनन्तर त्रिकुशहस्त तिल-जल से आसन, पाक, सामग्री आदि को सिक्त करे।

२. पुरोहित वरण

बांये हाथ में वरण सामग्री और दांये हाथ में त्रिकुशा-तिल-जल लेकर पढ़े :ॐ अद्य …….… गोत्रस्य …….. पितुः ……. प्रेतस्य प्रेतत्वविमुक्ति हेतु षोडश (सप्तदश) श्राद्धान्तर्गत अपात्रकसपिण्डीकरण श्राद्धे पुरोधा कर्मकर्तुं …….. गोत्रं ………. शर्माणं ब्राह्मणं एभिः वरणीय वस्त्रादिद्रव्यैः पुरोहितत्वेन त्वामहं वृणे॥

देव-पितृ संबंधी ब्राह्मण (पुरोहित आदि) का वरण : देव-पितृ ब्राह्मणों का वरण सपिंडीकरण श्राद्ध में ही किया जा सकता है, प्रेतश्राद्ध में नहीं। एकादशाह को यदि वृषोत्सर्ग किया जायेगा तो आचार्य-होता-ब्रह्मा आदि के रूप में देव-पितृ ब्राह्मण का वृषोत्सर्ग निमित्त मात्र वरण होगा क्योंकि वहां प्रेत ब्राह्मण का वरण नहीं हो सकता। अस्तु सपिण्डीकरण श्राद्ध के आरम्भ में ही देव-पितृ ब्राह्मणों का वरण होगा। इसी प्रकार अन्यान्य वेदादि पाठकर्त्ता ब्राह्मणों का वरण भी यहीं करे।

३. दिग्रक्षण एवं श्राद्ध संकल्प

दिग्रक्षण मंत्र :

ॐ नमो नमस्ते गोविन्द पुराण पुरूषोत्तम। इदं श्राद्धं हृषीकेश रक्ष त्वं सर्वतो दिशः॥

सपिंडीकरण श्राद्ध संकल्प (स.पू.त्रि.) : त्रिकुशा-तिल-जल आदि लेकर आद्यश्राद्ध का संकल्प करे :

ॐ अद्य …….… गोत्रस्य …….. पितुः ……. प्रेतस्य प्रेतत्वविमुक्ति हेतु षोडश (सप्तदश) श्राद्धान्तर्गत सपिण्डीकरण श्राद्धं अहं करिष्ये॥ (संकल्प कर तिल-जलादि भूमि पर त्रिकुशा सहित गिराए।)

४. भूस्वामी अन्नोत्सर्ग (विचार सहित)

भूस्वामी का भाग प्रदान करना श्राद्ध का अंग नहीं है ऐसा पूर्वाचार्यों का मत है और विचार करने पर विद्वानों को भी यही उचित प्रतीत होगा, किन्तु परवर्तियों ने इसे विकृत कर दिया। यदि स्वभूमि पर श्राद्ध करे तो यह अनावश्यक है; अर्थात परकीय भूमि (किराए या अन्य के स्थान) पर श्राद्ध कर रहे हों तभी आवश्यक है।

अपने बांये भाग में अर्थात पिंडवेदी के पूर्वभाग में अथवा श्राद्धभूमि के अग्निकोण में भूस्वामी के अन्न का उत्सर्ग करे। यहां पाकपात्र का भी विचार किया जायेगा और द्वितीय पाक से भूस्वामी का अग्रभाग प्रदान किया जायेगा क्योंकि प्रथम पाक (मासिक श्राद्ध वाले) से पूर्व में ही अग्रभाग प्रदत्त होता है।

भूस्वामी अन्नोत्सर्ग मंत्र (अ.द.मो.) :

ॐ इदमन्नं एतद् भूस्वामि पितृभ्यो नमः॥

यदि परकीयभूमि पर श्राद्ध कर रहे हों तो द्वितीय पाक से भूस्वामी का अन्न उत्सर्ग करके सव्य-पूर्वाभिमुख-त्रिकुशहस्त होकर दो बार आचमन करके त्रिकुशा लेकर तीन बार गायत्री मंत्र जप करे। तदनन्तर तीन बार पितृगायत्री का जप करे :

पितृगायत्री (स.पू.त्रि.) :

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥ (३ बार)

४. विश्वेदेव श्राद्ध

  • आसन : कल्पित विश्वेदेव श्राद्ध स्थान पर सव्य-पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठकर, कल्पित त्रिकुशात्मक विश्वेदेवासन को सिक्त करके त्रिकुशा-जौ-जल से विश्वेदेव आसन उत्सर्ग करे :
ॐ अद्य …….… गोत्रस्य …….. पितुः ……. प्रेतस्य सपिण्डीकरण निमित्तक श्राद्धे …….. गोत्र पितामह …….. शर्म सम्बन्धिनः, …….. गोत्र प्रपितामह …….. शर्म सम्बन्धिनः, …….. गोत्र वृद्धप्रपितामह …….. शर्म सम्बन्धिनश्च विश्वेदेवा इदं आसनं वो नमः॥ (सीधे हाथ से विश्वेदेवासन का उत्सर्ग करे।)
  • आवाहन : करबद्ध विश्वेदेवों का आवाहन करे :
ॐ विश्वान् देवानहं आवाहयिष्ये, विश्वेदेवा स आगत शृणुताम् इम ᳪ हवं एनं बर्हिनिषीदत॥ ॐ यवोऽसि यवयास्मद्वेषो यवयारातीः॥ (विश्वदेवा के भोजनपात्र पर जौ छिड़के) ॐ विश्वेदेवाः शृणुतेम ᳪ हवं मे येऽअन्तरिक्षे य उपपद्यविष्ट येऽअग्निजिह्वा उतवा यजत्रा आसद्याऽस्मिन् बर्हिषि मादयध्वम्॥ ॐ आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः। ये यत्र योजिताः श्राद्धे सावधाना भवन्तु ते॥
  • अर्घ्यस्थापन : अर्घ्य पूड़ा में पवित्री (कुश की बनी) देकर इन मंत्रों से क्रमशः जल व जौ दें :
ॐ शन्नो देवीरभिष्टय ऽआपो भवन्तु पीतये। शंय्योरभिस्रवन्तु नः॥ – (जल) ॐ यवोऽसि यवयास्मद्वेषो यवयारातीः॥ – (जौ) (फूल एवं चन्दन भी बिना मंत्र के अर्पित करें। फिर अर्घ्यपात्र को बांये हाथ में ले पूड़ा का पवित्री निकालकर विश्वेदेवा के भोजन पात्र पर पूर्वाग्र रखकर अन्य जल से सिक्त कर दे।)
  • अर्ध्याभिमन्त्रण : उत्तान दाहिने हाथ से अर्घ्यपूड़ा को ढंक कर यह मंत्र पढ़े :
ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूबुर्या आंतरिक्षा उत पार्थीवीर्या:। हिरण्यवर्णा याज्ञियास्ता न आपः शिवा: स ᳪ स्योना: सुहवा भवन्तु॥
  • अर्घ्योत्सर्ग : त्रिकुशा, जौ, जल, पुष्प, चन्दन लेकर अर्घ्योत्सर्ग करे :
ॐ अद्य …….… गोत्रस्य …….. पितुः ……. प्रेतस्य सपिण्डीकरण निमित्तक श्राद्धे …….. गोत्र पितामह …….. शर्म सम्बन्धिनः, …….. गोत्र प्रपितामह …….. शर्म सम्बन्धिनः, …….. गोत्र वृद्धप्रपितामह …….. शर्म सम्बन्धिनश्च विश्वेदेवा एषोऽर्घः वो नमः॥ (जौ, जल पूड़ा पर छिड़क कर भोजन पात्रस्थ पूर्वाग्र पवित्री पर अर्घ दे। पवित्री को पुनः पूड़ा में रखकर पूड़ा को आसन के दक्षिण भाग में मंत्र पढ़कर उत्तान रखे और दक्षिणापर्यंत न हिलावे :) ॐ विश्वेभ्यः देवेभ्यः स्थानमसि॥
  • गन्धादि : त्रिकुशा, जौ, जल लेकर गन्धादि का उत्सर्ग करे :
ॐ अद्य …….… गोत्रस्य …….. पितुः ……. प्रेतस्य सपिण्डीकरण निमित्तक श्राद्धे …….. गोत्र पितामह …….. शर्म सम्बन्धिनः, …….. गोत्र प्रपितामह …….. शर्म सम्बन्धिनः, …….. गोत्र वृद्धप्रपितामह …….. शर्म सम्बन्धिनश्च विश्वेदेवा एतानि गंध पुष्पधूपदीपताम्बूल वस्त्र-यज्ञोपवीतादिऽआच्छादनानि वो नमः॥
  • मण्डल : आसन सहित विश्वेदेवा के भोजन पात्र का जल से प्रदक्षिणक्रमानुसार मण्डल करे।
  • परिवेषण : पूर्वाभिमुख-सव्य होकर त्रिकुशहस्त विश्वेदेवा के भोजनपात्र में सव्यंजन अन्नादि, घी, मधु, फल आदि देकर जलपात्र और घृतपात्र (पूड़ा) में जल व घी देकर यथास्थान रख दे।
  • मधुप्रक्षेप (व्यवहारात् अन्नस्पर्श) : त्रिकुश लेकर भोजनपात्र के अन्न में उत्तान दाहिना हाथ लगावे :
ॐ मधुव्वाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्न: सन्त्वोषधिः। मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव ᳪ रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमां२ अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तुनः॥ ॐ मधु मधु मधु॥
  • पात्रालम्भन : दाहिने हाथ के नीचे उन्मुख बायें हाथ से विश्वेदेवान्न पात्र का स्पर्श करे :
ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे अमृते ऽअमृतं जुहोमि स्वाहा॥ ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढ़मस्य पा ᳪ सुरे॥ ॐ कृष्ण हव्यमिदं रक्षमदियं॥
  • अवगाहन : बांये हाथ को पूर्ववत रखे हुए दाहिने हाथ के अँगूठा से विश्वेदेवान्न, पूड़ा का जल, घी और फिर अन्न में अंगुष्ठ निवेषण करे :
ॐ इदमन्नम्॥ (अन्न) । ॐ इमा आपः॥ (जल) । ॐ इदमाज्यम्॥ (घी) । ॐ इदं हविः॥ (अन्न)
  • यवविकिरण : बाएं हाथ को भोजन में लगाकर रखते हुए दाहिने हाथ में जौ लेकर विश्वेदेवान्न पर छिड़के :
ॐ यवोऽसि यवयास्मद्वेषो यवयारातीः॥
  • अन्नोत्सर्ग : त्रिकुशा–जौ–जल लेकर विश्वेदेवान्न का उत्सर्ग करे :
ॐ अद्य …….… गोत्रस्य …….. पितुः ……. प्रेतस्य सपिण्डीकरण निमित्तक श्राद्धे …….. गोत्र पितामह …….. शर्म सम्बन्धिनः, …….. गोत्र प्रपितामह …….. शर्म सम्बन्धिनः, …….. गोत्र वृद्धप्रपितामह …….. शर्म सम्बन्धिनश्च विश्वेदेवा इदमन्नं सोपकरणं वो नमः॥

५. सपिण्डी श्राद्ध – प्रेत सहित पितृ श्राद्ध

(द्वादशाह के दिन मासिक श्राद्ध होने के कारण सपिण्डीकरण श्राद्ध हेतु समयाभाव होता है और पद्धतियों में पितृ श्राद्ध अलग–अलग रहने पर भी तंत्र प्रयोग ही किया जाता है, इस कारण यहां तंत्र विधि से ही पितृ श्राद्ध विधि दी गयी है; किन्तु शास्त्रानुसार जहां तन्त्रनिषेध है वहां निषेध का भी पालन किया गया है।)

क. आसन एवं आवाहन

प्रेत-आसन (अ.द.मो.) : अपसव्य–दक्षिणाभिमुख–पातितवामजानु होकर, प्रेतासन को जल से सिक्त करे फिर मोड़ा-तिल-जल लेकर प्रेतासन का उत्सर्ग करे :ॐ अद्य ……….. गोत्र पितः ……….. प्रेत सपिण्डीकरण श्राद्धे इदं आसनं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्॥ (पितृतीर्थ से पूर्वकल्पित आसन पर छिड़के।)
  • पितृ आसन (अ.द.मो.) : प्रेतासन उत्सर्ग करने के बाद पितृमोटक धारण करके पितामहादि पितरों के आसन को जल से सिक्त करे, तिल-जल लेकर पितामह, प्रपितामह एवं वृद्धप्रपितामहों के आसनों का उत्सर्ग करे :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्घे ……… गोत्राः पितामह-प्रपितामह-वृद्धप्रपितामहाः …….. शर्माणः इमानि आसनानि त्रिधा विभक्तानि तेभ्यः वः स्वधा॥ (तिल-जल पश्चिम-पूर्व क्रम से तीनों कल्पित पितृ आसनों पर क्रमिक रूप से छिड़कें।)
  • पितृ आवाहन (अ.द.त्रि.) :
ॐ पितृन् अहं आवाहयिष्ये। ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्तः समिधीमहि। उशन्नुशत आवह पितृन् हविषे अत्तवे॥
  • तिलविकिरण (अ.द.त्रि.) :
ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षा ᳪ सि वेदिषदः॥ (श्राद्धभूमि में तिल छिड़कें)
  • प्रेत आवाहन (अ.द.त्रि.) :
ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽ अग्निष्वाता: पथिभिर्देवयानै:। अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥ (करबद्ध पित्र्यावाहन करे)

ख. अर्घ्यस्थापन एवं अभिमंत्रण

चारों अर्घ्यपुटकों (प्रेत और ३ पितृ) में पवित्री देकर अगले दोनों मंत्रों से जल व तिल दें (मंत्रों की पुनरावृत्ति नहीं होगी, एक बार पाठ कर चारों में दिया जाएगा) :

  • जल (अ.द.त्रि.) :
ॐ शन्नो देवीरभिष्टय ऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभि स्रवन्तुनः॥
  • तिल (अ.द.त्रि.) :
ॐ तिलोऽसि सोम देवत्यो गोसवो देवनिर्मितः। प्रत्नद्भिः पृक्त: स्वधया पितृन् लोकान् प्रीणाहि नः स्वाहा॥ (क्रमशः चारों अर्घ्य पात्रों में पुष्प, चन्दन भी दें।)
  • अर्ध्याभिमंत्रण (अ.द.त्रि.) : प्रेतार्घपात्र और तीनों पित्र्यर्घपात्र से पैंता/पवित्री निकाल कर क्रमशः प्रेत भोजनपात्र और पितृभोजनपात्र पर उत्तराग्र रखकर जल से सिक्त करे। चारों अर्घपात्रों को दोनों हाथों से ढंककर पढ़े :
ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूबुर्या आंतरिक्षा उत पार्थीवीर्या:। हिरण्यवर्णा याज्ञियास्ता न आपः शिवा: स ᳪ स्योना: सुहवा भवन्तु॥

ग. अर्घ्योत्सर्ग

  • प्रेतार्घ्योत्सर्ग (अ.द.मो.) : प्रेतार्घपात्र बांये हाथ में, दांये हाथ में मोटक-तिल-जल लेकर :
ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत सपिण्डीकरण श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्॥ (दाहिने हाथ से पवित्री पर पितृतीर्थ से चतुर्थांश मात्र जल दे। पुनः अर्घपात्र यथास्थान रखकर पवित्री दक्षिणाग्र रखे।)
  • पितामह अर्घ्य (अ.द.मो.) :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र पितामह …….. शर्मन् एषोर्घः ते स्वधा॥ (पितामह भोजनपात्रस्थ उत्तराग्र पवित्री पर पितृतीर्थ से चतुर्थांश जल देकर पवित्री को पुनः पूड़ा में रखे।)
  • प्रपितामह अर्घ्य (अ.द.मो.) :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र प्रपितामह …….. शर्मन् एषोर्घः ते स्वधा॥
  • वृद्धप्रपितामह अर्घ्य (अ.द.मो.) :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र वृद्धप्रपितामह …….. शर्मन् एषोर्घः ते स्वधा॥

(पूर्वाभिमुख सव्य हो आचमन करके “हरिस्मरण” करे।)

घ. अर्घ्यसंयोजन एवं न्युब्जीकरण

  • अर्घ्यसंयोजन : दक्षिणाभिमुख अपसव्य-मोटकहस्त होकर प्रेतार्घपात्र लेकर प्रेतार्घपात्र का जल पृथक रूप से पूर्वाग्र रखे हुए तीन खाली पूड़ों में अपसव्यक्रम (दक्षिण से उत्तर) से दो पूड़ों में समंत्र व एक में बिना मंत्र के एक-एक तिहाई जल दे :
ॐ ये समानाः समनसः पितरो यमराज्ये। तेषां लोकः स्वधा नमो यज्ञो देवेषु कल्पताम्॥ ॐ ये समानाः समनसो जीवा जीवेषु मामकाः। तेषा ᳪ श्रीर्मयि कल्पतामस्मिंल्लोके शत ᳪ समाः॥
  • तदुपरांत पितामह सम्बन्धी पूड़े का समस्त जल प्रेतपूड़ा में लेकर “ॐ ये समानाः…” मंत्र पढ़कर पितामह के पूड़ा में गिरा दे; पुनः प्रपितामह संबंधी पूड़ा का जल प्रेतपूड़ा में लेकर प्रपितामह के अर्घ्यपूड़ा में समंत्र दे। इसी विधि से समंत्र वृद्धप्रपितामह के अर्घ्यपूड़ा में भी जल दे।
  • न्युब्जीकरण : पवित्री सहित प्रेतार्घपूड़ा को अधोमुख (उलटा) करे :
ॐ पित्रे स्थानमसि॥ (दक्षिणा देने तक इस पूड़े को हिलाएं नहीं।)

  • वृद्धप्रपितामह के अर्घ्यपूड़ा का जल और पवित्री प्रपितामह के पूड़े में दें, प्रपितामह का जल पितामह के पूड़े में दें, पुनः जल सहित पितामहार्घपात्र को उठाकर क्रमशः तीनों पूड़ों को एक-दूसरे में रखकर पितामहादिकों के आसन से पश्चिम भाग में अधोमुख कर दे :
ॐ पितृभ्यः स्थानमसि॥ (दक्षिणा पर्यंत न हिलाएं।)

ङ. अर्चन एवं अग्नौकरण

  • प्रेत अर्चन (अ.द.मो.) :
ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत सपिण्डीकरण श्राद्धे एतानि गन्धपुष्पधूपदीपताम्बूल यज्ञोपवीता ऽऽच्छादनानि / विद्यमानोपकरणानि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम्॥
  • पितृ अर्चन (अ.द.मो.) :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्घे ……… गोत्राः पितामह-प्रपितामह-वृद्धप्रपितामहाः …….. शर्माणः एतानि गन्ध पुष्प धूप दीप ताम्बूल यज्ञोपवीत ऽऽच्छादनानि/विद्यमानोपकरणानि तेभ्यः वः स्वधा॥ (जल से प्रेत व पितृ भोजनपात्रों के चारों ओर अप्रदक्षिण/अपसव्य मण्डल करें।)
  • अग्नौकरण : पूर्वाभिमुख सव्य होकर त्रिकुशा ले। एक पूड़े में जल-जौ, दूसरे में सिद्धान्न-घी रखें। पातित-दक्षिणजानु होकर अनामिका और अंगूठे से अन्नादि लेकर जल वाले पूड़े में दो आहुति दें :
ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा॥ (प्रथम आहुति) ॐ सोमाय पितृमते स्वाहा॥ (द्वितीय आहुति)
  • अपसव्य दक्षिणाभिमुख होकर पितामहादि के भोजनपात्र पर थोड़ा-थोड़ा हुतशेषान्न दें। प्रेत भोजनपात्र पर पुरुषाहार-परिमित भोजन, दूध, दही, घी, मधु, व्यञ्जन परोसें। उत्तर में घी-तिलयुक्त जलपात्र रखें। पुनः पितामहादि तीनों के लिए भी भोजन परोसें (हुतशेषान्न पितृपाक में मिला दें)।

च. प्रेत एवं पितृ भोजनोत्सर्ग

  • मधुप्रक्षेप (अ.द.त्रि.) :
ॐ मधुव्वाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्न: सन्त्वोषधिः। मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव ᳪ रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमां२ अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तुनः॥ ॐ मधु मधु मधु॥
  • पात्रालम्भन (अ.द.त्रि.) :
ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे अमृते ऽअमृतं जुहोमि स्वाहा॥ ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढ़मस्य पा ᳪ सुरे॥ ॐ कृष्ण कव्यमिदं रक्षमदियं॥
  • अवगाहन (अ.द.त्रि.) : दाहिने अंगूठे से स्पर्श करे :
ॐ इदमन्नं॥ इमा आपः॥ इदं आज्यं॥ इदं हविः॥
  • तिलविकिरण :
ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षा ᳪ सि वेदिषदः॥
  • प्रेत भोजनोत्सर्ग (अ.द.मो.) :
ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत सपिण्डीकरण श्राद्धे इदमन्नं सोपकरणं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्॥ (तिल-जल भोजन पात्र के निकट पश्चिम में दें।)
  • पितामहादिक भोजनोत्सर्ग : पूर्ववत् पितामहादि भोजन का त्रिकुशा से स्पर्श कर “ॐ मधुव्वाता…” व “ॐ पृथिवी ते…” पाठ करे। तदुपरांत अवगाहन करे :
ॐ इमानि अन्नानि॥ ॐ इमा आपः॥ ॐ इमानि आज्यानि॥ ॐ इमानि हवींषि॥ (तिलविकिरण कर अन्नोत्सर्ग करे (अ.द.मो.) :) ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्राः पितामह-प्रपितामह-वृद्धप्रपितामहाः …….. शर्माणः इमानि अन्नानि सोपकरणानि त्रिधाविभक्तानि वः स्वधा॥

छ. जप एवं सूक्त पाठ

उपवीति-पूर्वाभिमुख-त्रिकुशहस्त होकर ३ बार गायत्री जप करे। अपसव्य दक्षिणाभिमुख होकर सम्पूर्ण मधुमती ऋचा पाठ करे। तदनन्तर अछिद्रकामना करे :

ॐ अन्नहीनं क्रियाहीनं विधिहीनं च यद्भवेत्। तत्सर्वमच्छिद्रमस्तु॥

संकल्प वाली त्रिकुशा को आसन के नीचे रखकर अन्य त्रिकुशा धारण करे। पुनः अपसव्य दक्षिणाभिमुख मधुमती ऋचा पाठ करे। फिर सव्य होकर रक्षोघ्नसूक्त, पितृसूक्त, पुरुषसूक्त आदि का पाठ या श्रवण करे :

ॐ कृणुष्वपाजः प्रसितिन्न पृथिवीं याहि राजे वामवां इभेन। तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूनाणोऽस्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः। तवभ्रमास आसुया पतन्त्यनुस्पृस धृषता शोसुचानः। तपू ᳪ ष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसन्दितो विसृज विश्वगुल्काः। प्रतिष्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्याऽअदब्धः। यो नो दूरे अघश ᳪ सो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत। उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्वन्य मित्रां ओषता तिग्महेते। यो नो ऽअराति ᳪ समिधानचक्रे नीचा तं धक्ष्यत सन्न शुष्कम्। उर्ध्वो भव प्रतिविध्या ध्यस्मदा विष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने अवस्थिरा तनुहि यातु यूनाम् जामिमजामिं प्रमृणीहि शत्रून्॥ (पाठ कर तिल बिखेरे)
ॐ उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सौम्यासः। असूंऽयईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु अङ्गिरसो नः पितरः सौम्यासः। तेषा ᳪ वय ᳪ सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽअनुहिरे सोमपीथं वशिष्ठाः तेभिर्यमः स ᳪ रराणो हवी ᳪ स्युसन्नुसद्भिः प्रतिकाममत्तु॥
ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। भूमि ᳪ सर्वतस्पृत्त्वात्त्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ (सम्पूर्ण पुरुषसूक्त)
ॐ आशुः शिषाणो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभनश्चर्षणीनां। संक्रदनो निमिष एकवीरः शत ᳪ सेना अजयत्साकमिन्द्रः॥ ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्तेनेक चक्षुषे। नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः॥ ॐ सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ। चक्रवाकाः शरद्वीपे हन्साः सरसि मानसे॥ तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः। प्रस्थिता दूरमध्यानौ यूयं तेभ्योवसीदथ॥ ॐ रुची रुची रुचिः॥

ज. विकिरदान (अ.द.मो.)

वेदी के पश्चिम त्रिकुश रखकर जल से सिक्त करे। एक पूड़ा में अन्नादि लेकर जल से आप्लावित करे, फिर मोड़ा के मूल से सहारा देकर त्रिकुश पर बांए हाथ के पितृतीर्थ से दे :

ॐ अनग्निदग्धाश्च ये जीवा ये प्रदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु पराङ्गतिम्॥

(प्रार्थना : येषां न माता न पिता न बन्धुर्नगोत्रशुद्धिर्न तथान्नमस्ति। तत्तृप्तयेऽन्नं भुवि दत्तमेतत् प्रयातु लोकेषु सुखाय तद्वत्॥) पूर्वाभिमुख सव्य हो दो बार आचमन कर हरिस्मरण करे, ३ बार गायत्री जप करे। दक्षिणाभिमुख अपसव्य होकर मधुमती ऋचा पढ़े।

६. पिण्डदान, पिण्डच्छेदन एवं पिण्ड सम्मेलन

क. वेदी संस्कार (उल्लेखन एवं अंगारभ्रमण)

  • उल्लेखन (अ.द.मो.) : बालुकामयी वेदी को जल से सींचकर दर्भपिञ्जुलि से मध्य में प्रादेशमात्र दक्षिणाग्र रेखा करे :
ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षा ᳪ सि वेदिषदः॥ (दर्भपिञ्जुलि उत्तर में त्यागे। इसी प्रकार पितृपिण्ड वेदी पर भी ३ रेखाएं खींचे।)
  • अंगारभ्रमण (अ.द.मो.) : उल्मुक (जलती लकड़ी/अंगार) लेकर प्रेतपिण्डवेदी पर घुमाकर दक्षिण में त्यागे :
ॐ ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। परापुरो निपुरो ये भरंत्यग्निष्टांलोकात् प्रणुदात्यस्मात्॥ (पुनः दूसरा उल्मुक लेकर पितृपिण्डवेदी पर भी भ्रमण कर दक्षिण में त्यागे। दोनों वेदियों पर ३-३ छिन्नमूल कुशा रखकर सींचे। सव्य-पूर्वाभिमुख ३ बार पितृगायत्री पढ़े।)

ख. अत्रावन (अवनेजन)

  • प्रेत अत्रावन (अ.द.मो.) :
ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत सपिण्डीकरण श्राद्धपिण्डस्थाने अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्॥ (आधा जल प्रेतवेदी की कुशा पर दे, शेष जल पूड़े में रहने दे।)
  • पितामह अत्रावन :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र पितामह पिण्डस्थाने अत्रावने निक्ष्व ते स्वधा॥
  • प्रपितामह अत्रावन :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र प्रपितामह पिण्डस्थाने अत्रावने निक्ष्व ते स्वधा॥
  • वृद्धप्रपितामह अत्रावन :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र वृद्धप्रपितामह पिण्डस्थाने अत्रावने निक्ष्व ते स्वधा॥

ग. पिण्डदान

(नियम: पिण्ड बनाकर बांये हाथ में रखकर बिना हाथ धोये ही उत्सर्ग कर स्थापित करना है। स्थापित करने के बाद हाथ का लेप पिण्डतलस्थ कुशा में पोंछकर ही हाथ धोना है।)

  • प्रेत पिण्ड (अ.द.मो.) : प्रेतपाक से बिल्वप्रमाण/नारिकेलप्रमाण (बड़ा व लम्बा) पिण्ड बनाकर बांये हाथ में रखे। दाहिने हाथ में मोड़ा-तिल-जल लेकर :
ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत सपिण्डीकरण श्राद्धे एष पिण्डः ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्॥ (पितृतीर्थ से पिण्ड रखकर कुशा में हाथ पोंछ ले। हाथ धोकर सव्य-पूर्वाभिमुख दो बार आचमन करे।)
  • पितृ पिण्ड (अ.द.मो.) : पितृपाक से ३ पिण्ड बनाकर पश्चिम से पूर्व क्रम से लगातार स्थापित करे :
  • पितामह पिण्ड :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र पितामह …….. शर्मन् एष पिण्डः ते स्वधा॥
  • प्रपितामह पिण्ड :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र प्रपितामह …….. शर्मन् एष पिण्डः ते स्वधा॥
  • वृद्धप्रपितामह पिण्ड :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र वृद्धप्रपितामह …….. शर्मन् एष पिण्डः ते स्वधा॥
  • तीनों पिण्ड स्थापित कर एक साथ पिण्डतलस्थ कुशा में हाथ पोंछे :
ॐ लेपभागभुजस्तृप्यन्तु॥

घ. श्वास विसर्जन एवं प्रत्यवन

सव्य-पूर्वाभिमुख दो बार आचमन कर हरिस्मरण करे। उत्तर मुख कर श्वास रोके और पिता का ध्यान कर पश्चिमाभिमुख छोड़े :

ॐ अत्र पितरमादयस्व यथाभागमावृषादयस्व॥ (श्वास ले) ॐ अमीमदत् पिता यथाभाग मा वृषायिष्ट॥ (श्वास छोड़े) ॐ अत्र पितरोमादयध्वं यथाभाग मा वृषादयध्वम्॥ (श्वास ले) ॐ अमीमदन्त पितरो यथाभाग मा वृषायिषत॥ (श्वास छोड़े)

प्रत्यवन (अ.द.मो.) : पूर्व में रखे अत्रावन पात्रों का शेष जल पिण्डों पर दे :

  • प्रेत प्रत्यवन :
ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत सपिण्डीकरण श्राद्धपिण्डे अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्॥
  • पितामह प्रत्यवन :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र पितामह ……….. शर्मन् श्राद्धपिण्डे अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते स्वधा॥
  • प्रपितामह प्रत्यवन :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र प्रपितामह ………. शर्मन् श्राद्धपिण्डे अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते स्वधा॥
  • वृद्धप्रपितामह प्रत्यवन :
ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे ……… गोत्र वृद्धप्रपितामह ………. शर्मन् श्राद्धपिण्डे अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते स्वधा॥

ङ. वस्त्रदान एवं पिण्डपूजन

  • प्रेत पिण्ड पर सूत्र दे :
ॐ एतत्ते पितर्वासः॥
  • पितृपिण्डों पर ३ सूत्र दे :
ॐ नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरो शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो द्वेष्म॥ ॐ एतद्वः पितरो वासः॥
  • वस्त्रोत्सर्ग (अ.द.मो.) :
  • प्रेत वस्त्रोत्सर्ग: ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत सपिण्डीकरण श्राद्धपिण्डे एतद्वासस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्॥
  • पितृ वस्त्रोत्सर्ग: ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डिकरण निमित्तक श्राद्धे …… गोत्राः पितामह-प्रपितामह-वृद्धप्रपितामहाः ….. शर्माणः श्राद्ध पिण्डेषु इमानि वासांसि तेभ्यः वः स्वधा॥
  • पिण्डपूजन : बिना मंत्र के प्रेत एवं पितृ पिण्डों पर पान, सुपारी, पुष्प, चन्दन चढ़ाकर पिण्डशेषान्न बिखेरे।

च. पिण्डच्छेदन एवं पिण्डसम्मेलन (सपिण्डीकरण का मुख्य अंग)

  1. पिण्डच्छेदन : त्रिकुशा के मूल से प्रेतपिण्डस्थ पानादि हटाकर, स्वर्ण या रजत शलाका को दोनों हाथों से पकड़कर “ॐ ये समानाः…” मंत्र से प्रेतपिण्ड को दो बार काटकर तीन बराबर भाग करे :
ॐ ये समानाः समनसः पितरो यमराज्ये। तेषां लोकः स्वधा नमो यज्ञो देवेषु कल्पताम्॥ ॐ ये समानाः समनसो जीवा जीवेषु मामकाः। तेषा ᳪ श्रीर्मयि कल्पतामस्मिंल्लोके शत ᳪ समाः॥
  1. पिण्डसम्मेलन : प्रेतपिण्ड के कटे हुए तीनों भागों को क्रमशः पितामह, प्रपितामह एवं वृद्धप्रपितामह के पिण्डों में “ॐ ये समानाः…” मंत्र पढ़ते हुए मिला दे। सबको मिलाकर गोल, सुडौल पिण्ड बनाए (पिण्ड को वेदी से उठाना नहीं है)। पिण्डों पर पितृतीर्थ से चार अंजलि जल दे।
  2. पिण्ड पुनः पूजन : चन्दन, पुष्प, माला, पान, मखाना आदि चढ़ाकर पूजा करे। पूर्वाभिमुख सव्य होकर विश्वेदेवान्न पर, फिर दक्षिणाभिमुख अपसव्य होकर चारों भोजनों पर अक्षत-पुष्प चढ़ावे :
ॐ शिवा आपः सन्तु॥ (जल) । ॐ सौमनस्यमस्तु॥ (फूल) । ॐ अक्षतंचारिष्टमस्तु॥ (अक्षत)

छ. अक्षय्योदक, जलधारा एवं आशीष

  • अक्षय्योदक (अ.द.मो.) : चार पूड़ों में जल, चन्दन, फूल, तिल, घी, मधु मिलाकर पिण्डों पर दे :
  • प्रेत: ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डीकरण श्राद्धपिण्डे दत्तैतदन्नपानादिकमुपतिष्ठताम्॥
  • पितामह: ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डीकरण श्राद्धे गोत्रस्य पितामह ……… शर्मणो दत्तैतदन्नपानादिकमक्षय्यमस्तु॥
  • प्रपितामह: ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डीकरण श्राद्धे गोत्रस्य प्रपितामह ……… शर्मणो दत्तैतदन्नपानादिकमक्षय्यमस्तु॥
  • वृद्धप्रपितामह: ॐ अद्य …….. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डीकरण श्राद्धे गोत्रस्य वृद्धप्रपितामह ……… शर्मणो दत्तैतदन्नपानादिकमक्षय्यमस्तु॥
  • जलधारा (सव्य-पूर्वाभिमुख) :
ॐ अघोराः पितरः सन्तु॥
  • आशीष प्रार्थना (करबद्ध प्रणाम कर दक्षिण दिशा देखते हुए) :
ॐ गोत्रन्नो वर्द्धतां दातरो नोऽभिवर्द्धन्तां वेदा: सन्ततिरेव च। श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयञ्च नो ऽअस्तु। अन्नं च नो बहु भवेत् अतिथींश्च लभेमहि। याचितारश्च नः सन्तु मा च याचिष्म कञ्चन। एताः सत्याशिषः सन्तु॥
  • वारिधारा (अ.द.मो.) : पिण्डस्थ त्रिकुशा पर धारा दे :
ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिश्रुतम्। स्वधास्थ तर्पयत् मे पितॄन्॥

विनम्रभाव से पिण्ड को सूंघकर थोड़ा उठाकर पुनः रख दे। पिण्डतलस्थ कुशा व उल्मुक को अग्नि में समर्पित करे। अधोमुखी पात्रों को सीधा (उत्तान) कर दे।

७. श्राद्ध दक्षिणा, विसर्जन एवं पूर्णाहुति

  • विश्वेदेव दक्षिणा (सव्य-पूर्वाभिमुख) :
ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ………. प्रेतस्य सपिण्डीकरण निमित्तक श्राद्धे ……….. गोत्राणां पितामह-प्रपितामह-वृद्धप्रपितामहानाम् ………. शर्मसम्बन्धिनां विश्वेषां देवानां कृतैतत् श्राद्धप्रतिष्ठार्थम् एतावत् द्रव्यमूल्यक हिरण्यं अग्निदैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय दक्षिणां दातुमहमुत्सृज्ये॥
  • प्रेतश्राद्ध दक्षिणा (अपसव्य-दक्षिणाभिमुख) :
ॐ अद्य ……. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य कृतैतत् सपिण्डीकरण श्राद्धप्रतिष्ठार्थम् एतावत् द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्र दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे॥
  • पितामहादित्रय दक्षिणा (अ.द.मो.) :
ॐ अद्य ……. गोत्रस्य पितुः …….. प्रेतस्य सपिण्डीकरणनिमित्तक श्राद्धे ………. गोत्रेभ्यः ………. पितामह-प्रपितामह-वृद्धप्रपितामहेभ्यः शर्मणांशर्मणेभ्यः कृतैतानि श्राद्धानि प्रतिष्ठार्थम् एतावत् द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे॥
  • विसर्जन (सव्य-पूर्वाभिमुख) :
ॐ विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्॥ ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥ (३ बार)

दीपक को किसी पत्ते आदि से ढक दें। हाथ-पैर धोकर सव्य-पूर्वाभिमुख दो बार आचमन कर प्रमादमंत्र का पाठ करे :

ॐ प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेत्ताध्वरेषुयत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥ ॥ ॐ विष्णुर्विष्णुर्हरिर्हरिः ॥

अंतिम कृत्य

पिण्डवेदी को कनिष्ठिका अंगुली से किञ्चित विचलित/तोड़ दें। भगवान सूर्यनारायण को अर्घ्य/प्रणाम करें। श्राद्ध की उपयोगी वस्तुएं ब्राह्मण को दान करें एवं पत्र-पुष्पादि को बहते जल में विसर्जित करें।

इसके पश्चात् ब्राह्मण भोजन कराएं, स्वयं स्नान कर शुद्ध नूतन वस्त्र व यज्ञोपवीत धारण करें। गृह के प्रांगण में कलश पूजन संपन्न कर देव-निमित्तक ब्राह्मणों को भोजन व दक्षिणा देकर स्वयं बंधु-बांधवों सहित भोजन ग्रहण करें।

॥ इति सपिण्डीकरणश्राद्धविधिः सम्पूर्णः ॥

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