॥ श्लोकानां विश्लेषिका ॥ — पदच्छेद, पदपरिचय, पदार्थ, अन्वय, भावार्थ व व्याकरण
"+" = एक ही लिखित शब्द के भीतर सन्धि-विच्छेद · डैश (-) वाले = समास का पूर्वपद
| पदम् | विवरणम् |
|---|---|
| कर्मणि | कर्मन् (नपुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन |
| एव | अव्ययम् |
| अधिकारः | अधिकार (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन |
| ते | युष्मद् (त्रि.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन अन्य सम्भावना: युष्मद् (त्रि.) — चतुर्थी विभक्ति, एकवचन | तद् (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन | तद् (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, द्विवचन |
| मा | अव्ययम् अन्य सम्भावना: अस्मद् (त्रि.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | मा (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन | मा (पुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: मे + अच् |
| फलेषु | फल (नपुं.) — सप्तमी विभक्ति, बहुवचन |
| कदाचन | अव्ययम् |
| मा | अव्ययम् अन्य सम्भावना: अस्मद् (त्रि.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | मा (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन | मा धातु (अदादिगण, परस्मैपद) — लङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (माङ्योग में अट्-आगम का अभाव — न माङ्योगे) |
| कर्मफल | समास-पूर्वपद (प्रातिपदिक कर्मफल) अन्य सम्भावना: कर्मफल (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन |
| हेतुः | हेतु (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन अन्य सम्भावना: हेतृ (पुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: हि + तृच् | हेतृ (नपुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: हि + तृच् | हेतृ (पुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: हि + तृच् |
| भूः | भू धातु (भ्वादिगण, परस्मैपद) — लुङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (माङ्योग में अट्-आगम का अभाव — न माङ्योगे) अन्य सम्भावना: भू धातु (चुरादिगण, परस्मैपद) — लुङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (माङ्योग में अट्-आगम का अभाव — न माङ्योगे) | अस् धातु (अदादिगण, परस्मैपद) — लुङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (माङ्योग में अट्-आगम का अभाव — न माङ्योगे) | भू (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन |
| मा | अव्ययम् अन्य सम्भावना: अस्मद् (त्रि.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | मा (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन | मा (पुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: मे + अच् |
| ते | युष्मद् (त्रि.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन अन्य सम्भावना: युष्मद् (त्रि.) — चतुर्थी विभक्ति, एकवचन | तद् (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन | तद् (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, द्विवचन |
| सङ्गः | सङ्ग (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन (व्युत्पत्ति: सञ्ज् + घञ्) अन्य सम्भावना: गा (पुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: सम् + गै + अच् | गा (पुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: सम् + गै + अच् | गा (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, बहुवचन · कृदन्त: सम् + गै + अच् |
| अस्तु | अस् धातु (अदादिगण, परस्मैपद) — लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन अन्य सम्भावना: अव्ययम् |
| अकर्मणि | अकर्मन् (पुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन अन्य सम्भावना: अकर्मन् (नपुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन |
कर्मणि ➤ कृत्य, कार्य, कर्म
संस्कृत: क्रिया · पर्याय: क्रिया, कृत्या, लीला
एव ➤ ठीक, बिल्कुल, सही तौर पर
अधिकारः ➤ अधीक्षण, देखभाल करना
संस्कृत: राज्ञां छत्रचामरादिव्यापारः · पर्याय: प्रक्रिया
ते ➤ तुम
संस्कृत: त्वम्
मा ➤ प्रतिषेधबोधक अव्यय, (नकारात्मक विरलतः) प्रायः लोट् लकार की क्रिया के साथ जुड़ा हुआ
फलेषु ➤ फल जैसे वृक्ष का
संस्कृत: वृक्षफलम्, वस्त्रयोनिः, फलकः, लाङ्गलस्याधस्थलोहकाष्ठम्, अधिकफलम्, सस्यहेतुकृतम् · पर्याय: सस्य
कदाचन ➤ किसी समय, एकदिन, एकबार, एकदफ़ा
मा ➤ प्रतिषेधबोधक अव्यय, (नकारात्मक विरलतः) प्रायः लोट् लकार की क्रिया के साथ जुड़ा हुआ
कर्मफल ➤ में किये हुए कर्मों का फल या पारितोषिक
हेतुः ➤ निमित्त, कारण, उद्देश्य, प्रयोजन
संस्कृत: कारणम् · पर्याय: कारण, बीज, प्रमाण, निमित्त, प्रत्यय
भूः ➤ होना
संस्कृत: सत्तायाम्
मा ➤ प्रतिषेधबोधक अव्यय, (नकारात्मक विरलतः) प्रायः लोट् लकार की क्रिया के साथ जुड़ा हुआ
ते ➤ तुम
संस्कृत: त्वम्
सङ्गः ➤ साथ मिलना, सम्मिलन
संस्कृत: सङ्गमम् · पर्याय: मेलक, सङ्गम
अस्तु ➤ होना, रहना
संस्कृत: भुवि
अकर्मणि ➤ आलसी, निकम्मा "
ⓘ यह अन्वय विभक्ति, पुरुष-वचन व वाक्य-क्रम के नियमों से स्वतः बना है — काव्यार्थ के लिए गुरु/टीका से अवश्य मिलाएँ।
कर्मणि = कृत्य · एव = ठीक · अधिकारः = अधीक्षण · ते = तुम · मा = प्रतिषेधबोधक अव्यय · फलेषु = फल जैसे वृक्ष का · कदाचन = किसी समय · मा = प्रतिषेधबोधक अव्यय · हेतुः = निमित्त · भूः = होना · मा = प्रतिषेधबोधक अव्यय · ते = तुम · सङ्गः = साथ मिलना · अस्तु = होना · अकर्मणि = आलसी
| पदम् | विच्छेदः | सन्धि | सूत्रम् |
|---|---|---|---|
| कर्मण्येवाधिकारस्ते | कर्मणि + एव | यण् | इको यणचि (६.१.७७) |
| कर्मण्येवाधिकारस्ते | एव + अधिकारः | दीर्घ | अकः सवर्णे दीर्घः (६.१.१०१) |
| कर्मण्येवाधिकारस्ते | अधिकारः + ते | विसर्ग → स् | विसर्जनीयस्य सः (८.३.३४) |
| कर्मफलहेतुर्भूर्मा | हेतुः + भूः | विसर्ग → र् | ससजुषो रुः (८.२.६६) |
| कर्मफलहेतुर्भूर्मा | भूः + मा | विसर्ग → र् | ससजुषो रुः (८.२.६६) |
| सङ्गोऽस्त्वकर्मणि | सङ्गः + अस्तु | पूर्वरूप (ऽ = लुप्त अ) | एङः पदान्तादति (६.१.१०९) |
| सङ्गोऽस्त्वकर्मणि | अस्तु + अकर्मणि | यण् | इको यणचि (६.१.७७) |
ⓘ समास के खण्ड कोश से पहचाने गए हैं; विग्रह-वाक्य व समास-प्रकार (तत्पुरुष/बहुव्रीहि आदि) अर्थ पर निर्भर करता है।
कोई तद्धितान्त पद नहीं पहचाना गया।
विश्लेषण-समय: १.६ सेकण्ड