🕉️ 20 October 2026, Tuesday · 11:36:22 AM · CDSHARMA.IN

🕉️ श्लोकार्थ-बोधिनी

॥ श्लोकानां विश्लेषिका ॥ — पदच्छेद, पदपरिचय, पदार्थ, अन्वय, भावार्थ व व्याकरण

मार्जयतु

🔔 मूलश्लोकः

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

🌸 पदच्छेदः स्वचालित

कर्मणि+एव+अधिकारः+ते।मा।फलेषु।कदाचन।मा।कर्मफल-+हेतुः+भूः+मा।ते।सङ्गः+अस्तु+अकर्मणि

"+" = एक ही लिखित शब्द के भीतर सन्धि-विच्छेद · डैश (-) वाले = समास का पूर्वपद

🌹 पदपरिचयः स्वचालित

पदम्विवरणम्
कर्मणिकर्मन् (नपुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन
एवअव्ययम्
अधिकारःअधिकार (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
तेयुष्मद् (त्रि.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: युष्मद् (त्रि.) — चतुर्थी विभक्ति, एकवचन | तद् (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन | तद् (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, द्विवचन
माअव्ययम्
अन्य सम्भावना: अस्मद् (त्रि.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | मा (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन | मा (पुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: मे + अच्
फलेषुफल (नपुं.) — सप्तमी विभक्ति, बहुवचन
कदाचनअव्ययम्
माअव्ययम्
अन्य सम्भावना: अस्मद् (त्रि.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | मा (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन | मा धातु (अदादिगण, परस्मैपद) — लङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (माङ्योग में अट्-आगम का अभाव — न माङ्योगे)
कर्मफलसमास-पूर्वपद (प्रातिपदिक कर्मफल)
अन्य सम्भावना: कर्मफल (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन
हेतुःहेतु (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: हेतृ (पुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: हि + तृच् | हेतृ (नपुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: हि + तृच् | हेतृ (पुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: हि + तृच्
भूःभू धातु (भ्वादिगण, परस्मैपद) — लुङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (माङ्योग में अट्-आगम का अभाव — न माङ्योगे)
अन्य सम्भावना: भू धातु (चुरादिगण, परस्मैपद) — लुङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (माङ्योग में अट्-आगम का अभाव — न माङ्योगे) | अस् धातु (अदादिगण, परस्मैपद) — लुङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (माङ्योग में अट्-आगम का अभाव — न माङ्योगे) | भू (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन
माअव्ययम्
अन्य सम्भावना: अस्मद् (त्रि.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन | मा (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन | मा (पुं.) — तृतीया विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: मे + अच्
तेयुष्मद् (त्रि.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: युष्मद् (त्रि.) — चतुर्थी विभक्ति, एकवचन | तद् (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन | तद् (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, द्विवचन
सङ्गःसङ्ग (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन (व्युत्पत्ति: सञ्ज् + घञ्)
अन्य सम्भावना: गा (पुं.) — पञ्चमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: सम् + गै + अच् | गा (पुं.) — षष्ठी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: सम् + गै + अच् | गा (पुं.) — द्वितीया विभक्ति, बहुवचन · कृदन्त: सम् + गै + अच्
अस्तुअस् धातु (अदादिगण, परस्मैपद) — लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन
अन्य सम्भावना: अव्ययम्
अकर्मणिअकर्मन् (पुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन
अन्य सम्भावना: अकर्मन् (नपुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन

🌷 पदार्थः कोश-आधारित

कर्मणि ➤ कृत्य, कार्य, कर्म
संस्कृत: क्रिया · पर्याय: क्रिया, कृत्या, लीला

एव ➤ ठीक, बिल्कुल, सही तौर पर

अधिकारः ➤ अधीक्षण, देखभाल करना
संस्कृत: राज्ञां छत्रचामरादिव्यापारः · पर्याय: प्रक्रिया

ते ➤ तुम
संस्कृत: त्वम्

मा ➤ प्रतिषेधबोधक अव्यय, (नकारात्मक विरलतः) प्रायः लोट् लकार की क्रिया के साथ जुड़ा हुआ

फलेषु ➤ फल जैसे वृक्ष का
संस्कृत: वृक्षफलम्, वस्त्रयोनिः, फलकः, लाङ्गलस्याधस्थलोहकाष्ठम्, अधिकफलम्, सस्यहेतुकृतम् · पर्याय: सस्य

कदाचन ➤ किसी समय, एकदिन, एकबार, एकदफ़ा

मा ➤ प्रतिषेधबोधक अव्यय, (नकारात्मक विरलतः) प्रायः लोट् लकार की क्रिया के साथ जुड़ा हुआ

कर्मफल ➤ में किये हुए कर्मों का फल या पारितोषिक

हेतुः ➤ निमित्त, कारण, उद्देश्य, प्रयोजन
संस्कृत: कारणम् · पर्याय: कारण, बीज, प्रमाण, निमित्त, प्रत्यय

भूः ➤ होना
संस्कृत: सत्तायाम्

मा ➤ प्रतिषेधबोधक अव्यय, (नकारात्मक विरलतः) प्रायः लोट् लकार की क्रिया के साथ जुड़ा हुआ

ते ➤ तुम
संस्कृत: त्वम्

सङ्गः ➤ साथ मिलना, सम्मिलन
संस्कृत: सङ्गमम् · पर्याय: मेलक, सङ्गम

अस्तु ➤ होना, रहना
संस्कृत: भुवि

अकर्मणि ➤ आलसी, निकम्मा "

🌻 अन्वयः स्वचालित — अनुमानित

ते अधिकारः कर्मफलहेतुः कर्मणि एव फलेषु कदाचन मा मा भूः; ते सङ्गः अकर्मणि मा अस्तु।

ⓘ यह अन्वय विभक्ति, पुरुष-वचन व वाक्य-क्रम के नियमों से स्वतः बना है — काव्यार्थ के लिए गुरु/टीका से अवश्य मिलाएँ।

📢 भावार्थः

शब्दशः अर्थ (पद-क्रम में, स्वचालित)

कर्मणि = कृत्य · एव = ठीक · अधिकारः = अधीक्षण · ते = तुम · मा = प्रतिषेधबोधक अव्यय · फलेषु = फल जैसे वृक्ष का · कदाचन = किसी समय · मा = प्रतिषेधबोधक अव्यय · हेतुः = निमित्त · भूः = होना · मा = प्रतिषेधबोधक अव्यय · ते = तुम · सङ्गः = साथ मिलना · अस्तु = होना · अकर्मणि = आलसी

ⓘ धाराप्रवाह भावार्थ (संस्कृत/हिन्दी/अंग्रेज़ी) लिखना केवल AI या विद्वान ही कर सकते हैं; यह साधन किसी बाहरी AI का प्रयोग नहीं करता। साइट के श्रीमद्भागवत के सभी १४,०९९ श्लोकों का पूर्ण भावार्थ उपलब्ध है — उनमें से कोई श्लोक लिखें तो भावार्थ स्वतः दिखेगा।

⚙️ व्याकरणम् स्वचालित

❖ सन्धिः

पदम्विच्छेदःसन्धिसूत्रम्
कर्मण्येवाधिकारस्तेकर्मणि + एवयण् इको यणचि (६.१.७७)
कर्मण्येवाधिकारस्तेएव + अधिकारःदीर्घ अकः सवर्णे दीर्घः (६.१.१०१)
कर्मण्येवाधिकारस्तेअधिकारः + तेविसर्ग → स् विसर्जनीयस्य सः (८.३.३४)
कर्मफलहेतुर्भूर्माहेतुः + भूःविसर्ग → र् ससजुषो रुः (८.२.६६)
कर्मफलहेतुर्भूर्माभूः + माविसर्ग → र् ससजुषो रुः (८.२.६६)
सङ्गोऽस्त्वकर्मणिसङ्गः + अस्तुपूर्वरूप (ऽ = लुप्त अ) एङः पदान्तादति (६.१.१०९)
सङ्गोऽस्त्वकर्मणिअस्तु + अकर्मणियण् इको यणचि (६.१.७७)

❖ समासः

  • कर्मफलहेतुः = कर्मफल + हेतुः तत्पुरुष/कर्मधारय/बहुव्रीहि — प्रकार अर्थ पर निर्भर

ⓘ समास के खण्ड कोश से पहचाने गए हैं; विग्रह-वाक्य व समास-प्रकार (तत्पुरुष/बहुव्रीहि आदि) अर्थ पर निर्भर करता है।

❖ कृदन्तः

  • कर्मणि: कृ-मनिन् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • अधिकारः: अधि+कृ+घञ् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • फलेषु: फल्+अच् (कोश-व्युत्पत्ति)
  • सङ्गः: सञ्ज् + घञ् — भाववाचक कृदन्त

❖ तद्धितान्तः

कोई तद्धितान्त पद नहीं पहचाना गया।

विश्लेषण-समय: १.६ सेकण्ड

यह साधन कैसे काम करता है: सब कुछ इसी वेबसाइट के सर्वर पर होता है — कोई बाहरी API/AI नहीं, आपका श्लोक कहीं भेजा या सहेजा नहीं जाता। पदच्छेद पाणिनीय सन्धि-नियमों के उल्टे प्रयोग से, पदपरिचय लगभग ७.५ लाख शब्द-रूपों व १.२ लाख प्रातिपदिकों के कोश से, अर्थ आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश व अमरकोश से, और अन्वय विभक्ति-क्रम के नियमों से बनता है। स्वचालित होने से कहीं-कहीं विकल्प गलत चुना जा सकता है (हर पद के "अन्य सम्भावना" देखें); श्रीमद्भागवत के श्लोकों पर साइट की जाँची हुई टीका दिखती है।
शब्द-डेटा साभार: ashtadhyayi.com (शब्दरूप, धातुरूप, आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश, अमरकोश) · सूत्र-लिंक: लघुसिद्धान्तकौमुदी।
💬 ज्योतिषीय प्रश्न पूछें