धृतराष्ट्र बोले — हे सञ्जय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
भावार्थ
गीता का आरम्भ नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र के प्रश्न से होता है। वे कुरुक्षेत्र को 'धर्मक्षेत्र' कहते हैं — यह वह पवित्र भूमि है जहाँ देवताओं ने यज्ञ किए और राजा कुरु ने तप किया। धृतराष्ट्र के मन में भय है कि कहीं इस धर्मभूमि का प्रभाव उनके पुत्रों के निर्णय को न बदल दे। 'मामकाः' (मेरे) और 'पाण्डवाः' — यह भेद ही उनके मोह को प्रकट करता है; वे पाण्डवों को अपना नहीं मानते। यही ममता और पक्षपात सम्पूर्ण महाभारत के युद्ध का मूल कारण है। साधक के लिये संकेत यह है कि हमारा शरीर भी एक क्षेत्र है, जिसमें धर्म (सद्वृत्तियाँ) और अधर्म (दुर्वृत्तियाँ) का संघर्ष निरन्तर चलता है।
सञ्जय बोले — उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूह-रचना से खड़ी पाण्डवों की सेना को देखकर आचार्य द्रोण के पास जाकर यह वचन कहा।
भावार्थ
सञ्जय को व्यासजी से दिव्य दृष्टि प्राप्त थी, जिससे वे युद्धभूमि का सब दृश्य हस्तिनापुर में बैठे-बैठे देख रहे थे। धृतराष्ट्र ने पहले अपने पुत्रों के विषय में पूछा था, इसलिये सञ्जय दुर्योधन से ही वर्णन आरम्भ करते हैं। पाण्डवों की सुव्यवस्थित सेना को देखकर दुर्योधन के मन में चिन्ता हुई, इसीलिये वह सेनापति भीष्म के पास न जाकर पहले अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास गया। 'राजा' शब्द से संकेत है कि वह राजसी अभिमान और कूटनीति के साथ बोल रहा है। भीतर का भय मनुष्य को बाहर से अधिक सक्रिय और वाचाल बना देता है।
हे आचार्य! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूह-रचना से खड़ी की गई पाण्डवों की इस विशाल सेना को देखिये।
भावार्थ
दुर्योधन के शब्दों में गहरा व्यंग्य छिपा है। धृष्टद्युम्न का जन्म ही द्रोणाचार्य के वध के लिये यज्ञ से हुआ था, फिर भी द्रोणाचार्य ने उसे शस्त्रविद्या सिखाई। दुर्योधन मानो कह रहा है — 'आपने जिस शत्रु को विद्या दी, वही आज आपके सामने व्यूह रचकर खड़ा है; अब सावधान होकर युद्ध कीजिये।' वह 'पाण्डुपुत्राणाम्' कहकर गुरु के मन में पाण्डवों के प्रति स्नेह को भी हल्का करना चाहता है। यह मनुष्य की उस प्रवृत्ति को दिखाता है जिसमें वह दूसरों को उकसाकर अपना कार्य सिद्ध करना चाहता है।
इस सेना में भीम और अर्जुन के समान युद्ध करने वाले बड़े-बड़े धनुर्धर शूरवीर हैं — जैसे सात्यकि, राजा विराट और महारथी द्रुपद।
भावार्थ
दुर्योधन पाण्डव-सेना के प्रमुख योद्धाओं की गणना करता है। वह भीम और अर्जुन को मापदण्ड बनाता है, क्योंकि उसके मन में सबसे अधिक भय इन्हीं दोनों का था। युयुधान (सात्यकि) श्रीकृष्ण के शिष्य और यादव वीर थे; विराट वह राजा थे जिनके यहाँ पाण्डवों ने अज्ञातवास किया; द्रुपद द्रोणाचार्य के पुराने शत्रु थे। 'महारथ' वह योद्धा कहलाता है जो अकेला दस हज़ार धनुर्धारियों से युद्ध कर सके और शस्त्र-शास्त्र में निपुण हो। शत्रु की शक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर देखना भी भयभीत मन का लक्षण है।
धृष्टकेतु, चेकितान, पराक्रमी काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य —
भावार्थ
गणना आगे बढ़ती है। धृष्टकेतु चेदिराज शिशुपाल का पुत्र था; चेकितान यादव वंश का प्रसिद्ध योद्धा था; काशिराज काशी के वीर राजा थे। पुरुजित् और कुन्तिभोज भाई थे और कुन्ती के पिता के कुल से सम्बन्धित होने से पाण्डवों के मामा पक्ष के थे। शैब्य (गोवासन) अपनी वीरता के लिये 'नरपुङ्गव' अर्थात् मनुष्यों में बैल के समान बलवान् कहे गये हैं। दुर्योधन एक-एक नाम के साथ विशेषण जोड़कर जताना चाहता है कि शत्रु-पक्ष के पास अनेक बलवान् सहायक हैं।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥
अन्वय
विक्रान्तः युधामन्युः च वीर्यवान् उत्तमौजाः च, सौभद्रः द्रौपदेयाः च — सर्वे एव महारथाः (सन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
पराक्रमी युधामन्यु, बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र — ये सभी महारथी हैं।
भावार्थ
युधामन्यु और उत्तमौजा पाञ्चाल देश के वीर थे, जो अर्जुन के रथ-चक्रों की रक्षा करते थे। सौभद्र अभिमन्यु अर्जुन और सुभद्रा का पुत्र था, जिसकी वीरता चक्रव्यूह-प्रसंग में प्रसिद्ध हुई। द्रौपदी के पाँचों पुत्र (प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक, श्रुतसेन) भी युद्ध में उपस्थित थे। दुर्योधन इन सबको 'महारथ' कहकर अपनी चिन्ता को आचार्य पर प्रकट कर देता है। जिसके मन में भय होता है, उसे शत्रु के युवा योद्धा भी बड़े संकट के समान दिखाई देते हैं।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
अन्वय
(हे) द्विजोत्तम! अस्माकं तु ये विशिष्टाः मम सैन्यस्य नायकाः (सन्ति) तान् निबोध; ते संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि।
हिन्दी अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अब हमारे पक्ष के जो प्रमुख योद्धा हैं और मेरी सेना के नायक हैं, उन्हें भी जान लीजिये; आपको स्मरण कराने के लिये मैं उनके नाम बताता हूँ।
भावार्थ
शत्रु-पक्ष की प्रशंसा के बाद दुर्योधन अपने पक्ष की ओर आता है, ताकि आचार्य हतोत्साहित न हों। वह द्रोणाचार्य को 'द्विजोत्तम' (ब्राह्मणों में श्रेष्ठ) कहता है — इसमें आदर भी है और सूक्ष्म व्यंग्य भी, मानो कह रहा हो कि ब्राह्मण होकर भी आप युद्ध में हैं, तो पूरी शक्ति से लड़िये। 'संज्ञार्थम्' अर्थात् आपकी जानकारी या स्मरण के लिये — यद्यपि आचार्य सब जानते थे, फिर भी दुर्योधन अपने मन की बेचैनी में बोलता जाता है। यह मन की उस दशा का चित्र है जब व्यक्ति स्वयं को आश्वस्त करने के लिये बार-बार गिनती करता है।
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥
अन्वय
भवान् भीष्मः च कर्णः च समितिञ्जयः कृपः च, अश्वत्थामा विकर्णः च तथा एव सौमदत्तिः च।
हिन्दी अनुवाद
स्वयं आप, भीष्म पितामह, कर्ण, युद्ध-विजयी कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा —
भावार्थ
दुर्योधन सबसे पहले 'भवान्' (आप) कहकर द्रोणाचार्य को मान देता है, फिर भीष्म का नाम लेता है। कर्ण उसका परम मित्र था, यद्यपि भीष्म के सेनापतित्व में कर्ण ने युद्ध न करने का निश्चय किया था। कृपाचार्य को 'समितिञ्जय' (संग्रामों को जीतने वाला) कहा गया है। अश्वत्थामा द्रोणपुत्र था, विकर्ण धृतराष्ट्र का धर्मनिष्ठ पुत्र था जिसने द्रौपदी-अपमान का विरोध किया था, और सौमदत्ति भूरिश्रवा था। नामों की यह सूची कौरव-पक्ष की वास्तविक शक्ति को प्रकट करती है।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥
अन्वय
अन्ये च बहवः शूराः मदर्थे त्यक्तजीविताः, नानाशस्त्रप्रहरणाः, सर्वे युद्धविशारदाः (सन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
और भी बहुत-से शूरवीर हैं जो मेरे लिये प्राण देने को तैयार हैं; वे अनेक प्रकार के शस्त्रों से प्रहार करने वाले और सभी युद्ध-कला में निपुण हैं।
भावार्थ
दुर्योधन कहता है कि ये योद्धा 'मदर्थे त्यक्तजीविताः' हैं — मेरे लिये जीवन का मोह छोड़ चुके हैं। इसमें उसका अहंकार झलकता है; वह मानता है कि सब उसी के लिये लड़ रहे हैं, धर्म या कर्तव्य के लिये नहीं। अनेक योद्धा सचमुच भीष्म और द्रोण जैसे लोग थे जो केवल अपने वचन और कर्तव्य के कारण उसके पक्ष में थे। शस्त्रों की विविधता और युद्ध-कौशल की चर्चा करके वह अपनी सेना की श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहता है। स्वार्थी व्यक्ति दूसरों के त्याग को भी अपने अधिकार की तरह देखता है।
भीष्म द्वारा रक्षित हमारी वह सेना अपर्याप्त (अपरिमित) है, और भीम द्वारा रक्षित इनकी यह सेना पर्याप्त (सीमित) है।
भावार्थ
इस श्लोक के दो अर्थ परम्परा में किये जाते हैं। एक अर्थ में 'अपर्याप्त' का भाव 'असीम, अपार' है — हमारी सेना भीष्म जैसे संरक्षक के कारण अपार शक्तिशाली है, जबकि भीम द्वारा रक्षित पाण्डव-सेना सीमित है। दूसरे अर्थ में 'अपर्याप्त' का अर्थ 'असमर्थ' है — दुर्योधन को भय है कि भीष्म पाण्डवों के प्रति स्नेह रखते हैं, इसलिये उनकी रक्षा वाली सेना पूरी तरह भरोसेमन्द नहीं, जबकि भीम पूरे मन से अपनी सेना की रक्षा कर रहा है। दोनों अर्थों से दुर्योधन के मन की दुविधा और अस्थिरता स्पष्ट होती है।
इसलिये आप सब लोग सभी मोर्चों पर अपने-अपने स्थान पर डटे रहते हुए भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें।
भावार्थ
दुर्योधन की रणनीति स्पष्ट है — सारी सेना का प्राण भीष्म हैं; यदि वे सुरक्षित रहे तो विजय निश्चित है। भीष्म ने प्रतिज्ञा की थी कि वे शिखण्डी पर शस्त्र नहीं उठायेंगे, इसलिये दुर्योधन को भय था कि शत्रु इसी दुर्बलता का लाभ उठायेगा। 'अयनेषु' का अर्थ है व्यूह के प्रवेश-मार्ग या मोर्चे। यह निर्देश सुनकर वृद्ध भीष्म समझ गये कि दुर्योधन चिन्तित है, और उन्होंने उसका उत्साह बढ़ाने का निश्चय किया। नेतृत्व का एक गुण यह भी है कि वह संगठन के आधार-स्तम्भ की रक्षा करे।
तब कौरवों में वृद्ध, प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए सिंह के समान ऊँची गर्जना करके शंख बजाया।
भावार्थ
भीष्म ने दुर्योधन की बातों का कोई उत्तर नहीं दिया, बल्कि सिंहनाद और शंखनाद से उसका भय दूर करने का प्रयत्न किया। वे 'कुरुवृद्ध' हैं — कुरुवंश के सबसे वरिष्ठ, और 'प्रतापवान्' — जिनके तेज से शत्रु काँपते थे। उनका शंख बजाना युद्ध के आरम्भ का संकेत भी था और अपनी निष्ठा का प्रमाण भी। यद्यपि उनका हृदय पाण्डवों के प्रति स्नेह रखता था, फिर भी वे अपने कर्तव्य से नहीं डिगे। यह उस धर्मसंकट का चित्र है जिसमें व्यक्ति प्रेम और कर्तव्य के बीच खड़ा होता है।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥
अन्वय
ततः शङ्खाः च भेर्यः च पणवानकगोमुखाः सहसा एव अभ्यहन्यन्त; सः शब्दः तुमुलः अभवत्।
हिन्दी अनुवाद
इसके बाद शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ बज उठे; उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ।
भावार्थ
भीष्म के शंखनाद के बाद कौरव-सेना में सब प्रकार के युद्ध-वाद्य एक साथ बज उठे। भेरी (नगाड़ा), पणव (छोटा ढोल), आनक (मृदंग) और गोमुख (गाय के मुख जैसा फूँकने वाला वाद्य) — इन सबका सम्मिलित स्वर 'तुमुल' अर्थात् भयंकर कोलाहल बन गया। यह कोलाहल सेना के उत्साह को बढ़ाने के लिये था। किन्तु यहाँ केवल शोर है, कोई निश्चित स्वर या दिव्यता नहीं — आगे पाण्डवों के शंखनाद के वर्णन से इसका अन्तर स्पष्ट होगा। बाहरी आडम्बर से भीतर की अशान्ति नहीं मिटती।
तदनन्तर सफेद घोड़ों से जुते हुए विशाल रथ पर बैठे श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाये।
भावार्थ
अब सञ्जय पाण्डव-पक्ष का वर्णन करते हैं। अर्जुन का रथ अग्निदेव का दिया हुआ दिव्य रथ था, जिसमें श्वेत घोड़े जुते थे — श्वेत रंग पवित्रता और सात्त्विकता का प्रतीक है। रथ पर 'माधव' (लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण) सारथि हैं और 'पाण्डव' अर्जुन रथी। इनके शंख 'दिव्य' कहे गये हैं — कौरव-पक्ष के कोलाहल के विपरीत यहाँ दिव्यता है। जहाँ भगवान् स्वयं सारथि बनकर जीवन-रथ की बागडोर सँभालते हैं, वहाँ विजय सुनिश्चित होती है; यही गीता का गूढ़ संकेत है।
श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य, अर्जुन ने देवदत्त और भयानक कर्म करने वाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।
भावार्थ
प्रत्येक वीर के शंख का अपना नाम और इतिहास है। पाञ्चजन्य शंख श्रीकृष्ण ने पञ्चजन नामक दैत्य को मारकर प्राप्त किया था; देवदत्त अर्जुन को इन्द्र से मिला था; भीम का 'पौण्ड्र' अत्यन्त विशाल था। श्रीकृष्ण को 'हृषीकेश' (इन्द्रियों के स्वामी) कहा गया है — जो सबकी इन्द्रियों और मन के नियन्ता हैं। अर्जुन को 'धनञ्जय' कहा गया, क्योंकि राजसूय यज्ञ के समय उन्होंने अनेक राजाओं को जीतकर धन एकत्र किया था। भीम को 'वृकोदर' (भेड़िये जैसे पेट वाला) कहा गया, जो उनकी अपार शक्ति और भूख का संकेत है।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥
अन्वय
कुन्तीपुत्रः राजा युधिष्ठिरः अनन्तविजयं, नकुलः सहदेवः च सुघोषमणिपुष्पकौ (दध्मतुः)।
हिन्दी अनुवाद
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख, तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये।
भावार्थ
युधिष्ठिर को 'राजा' कहा गया है — यद्यपि वे राज्य से वञ्चित थे, फिर भी धर्म के कारण वे वास्तविक राजा थे। उनका शंख 'अनन्तविजय' (अनन्त विजय देने वाला) उनके धर्मबल का प्रतीक है। नकुल का शंख 'सुघोष' और सहदेव का 'मणिपुष्पक' था। 'कुन्तीपुत्र' शब्द कुन्ती के तप और धर्मपरायणता की याद दिलाता है, जिसका पुण्य पाण्डवों के साथ था। पाँचों पाण्डवों का एक साथ शंखनाद उनकी एकता का द्योतक है — एकता ही परिवार और समाज की वास्तविक शक्ति है।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥
अन्वय
परमेष्वासः काश्यः च महारथः शिखण्डी च धृष्टद्युम्नः विराटः च अपराजितः सात्यकिः च —
हिन्दी अनुवाद
श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट और कभी पराजित न होने वाले सात्यकि —
भावार्थ
पाण्डव-पक्ष के अन्य प्रमुख योद्धा भी शंख बजाते हैं। शिखण्डी वही योद्धा था जिसे सामने रखकर अर्जुन ने भीष्म को परास्त किया, क्योंकि भीष्म ने उस पर शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी। धृष्टद्युम्न पाण्डव-सेना के सेनापति थे। सात्यकि को 'अपराजित' कहा गया है — जो कभी हारा नहीं। यह सूची बताती है कि धर्म के पक्ष में भी अनेक महान् वीर एकत्र थे। धर्म का पक्ष कभी अकेला नहीं होता, सत्य के साथ अनेक सहायक स्वयं जुट जाते हैं।
(हे) पृथिवीपते! द्रुपदः द्रौपदेयाः च महाबाहुः सौभद्रः च सर्वशः पृथक् पृथक् शङ्खान् दध्मुः।
हिन्दी अनुवाद
हे राजन्! राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्र और महाबाहु अभिमन्यु — इन सबने सब ओर से अलग-अलग अपने-अपने शंख बजाये।
भावार्थ
सञ्जय धृतराष्ट्र को 'पृथिवीपते' (हे पृथ्वी के स्वामी) कहकर सम्बोधित करते हैं — इसमें एक सूक्ष्म संकेत है कि आप राजा हैं, अब भी चाहें तो इस विनाश को रोक सकते हैं। पाण्डव-पक्ष के सभी योद्धाओं ने अलग-अलग शंख बजाये, जिससे प्रत्येक की वीरता और उत्साह प्रकट हुआ। कौरव-सेना में बाजे भीष्म के बाद 'सहसा' (एकाएक) बजे थे, जबकि यहाँ क्रम और व्यवस्था है। यह अनुशासन और आत्मविश्वास का अन्तर है।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १९ ॥
अन्वय
सः तुमुलः घोषः नभः च पृथिवीं च एव व्यनुनादयन् धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
हिन्दी अनुवाद
उस भयानक शंखध्वनि ने आकाश और पृथ्वी को गुँजाते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिये।
भावार्थ
कौरवों का कोलाहल पाण्डवों पर कोई प्रभाव न डाल सका, किन्तु पाण्डवों का शंखनाद कौरवों के हृदय चीर गया। कारण यह है कि अधर्म के पक्ष में खड़े व्यक्ति के भीतर अपराध-बोध और भय रहता है, जबकि धर्म के पक्ष का व्यक्ति निर्भय होता है। सञ्जय 'धार्तराष्ट्राणाम्' कहकर धृतराष्ट्र को उनके पुत्रों की दशा बताते हैं। आकाश और पृथ्वी तक गूँजने वाली ध्वनि यह संकेत है कि सत्य का स्वर सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, उसका आत्मबल दूसरों को स्वतः प्रभावित करता है।
हे राजन्! तब कपिध्वज अर्जुन ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को युद्ध के लिये डटे हुए देखकर, जब शस्त्र चलने की तैयारी हो रही थी, अपना धनुष उठाकर —
भावार्थ
अर्जुन को 'कपिध्वज' कहा गया है, क्योंकि उनके रथ की ध्वजा पर हनुमान् जी विराजमान थे। यह प्रसंग वनवास के समय का है जब हनुमान् जी ने भीम को वचन दिया था कि युद्ध में वे अर्जुन के ध्वज पर रहकर पाण्डवों की सहायता करेंगे। जब दोनों सेनाएँ शस्त्र चलाने को तैयार थीं, उसी क्षण अर्जुन ने गाण्डीव उठाया। यह क्षण गीता का द्वार है — कर्म के ठीक पहले का वह पल जब मनुष्य के भीतर प्रश्न उठते हैं। जीवन में भी प्रायः निर्णायक कार्य से ठीक पहले ही मन का द्वन्द्व सबसे तीव्र होता है।
(सः) हृषीकेशं तदा इदं वाक्यम् आह — अर्जुनः उवाच — (हे) अच्युत! उभयोः सेनयोः मध्ये मे रथं स्थापय।
हिन्दी अनुवाद
हे राजन्! उस समय अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यह वचन कहा — अर्जुन बोले: हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कीजिये।
भावार्थ
अर्जुन भगवान् को 'अच्युत' (जो कभी अपनी स्थिति से च्युत नहीं होते) कहकर सम्बोधित करते हैं। विचित्र बात यह है कि सम्पूर्ण जगत् के स्वामी अर्जुन के आदेश पर उनका रथ चलाने को तैयार हैं — यह भगवान् की भक्त-वत्सलता है। अर्जुन दोनों सेनाओं के बीच जाकर देखना चाहते हैं कि उन्हें किन-किन से लड़ना है। यह इच्छा सामान्य युद्ध-नीति जैसी लगती है, पर इसी से आगे उनका मोह जागता है। ईश्वर अपने भक्त को स्वतन्त्रता देते हैं, और फिर उसी स्वतन्त्रता से उत्पन्न उलझन में मार्गदर्शन भी करते हैं।
जब तक मैं युद्ध की इच्छा से खड़े इन योद्धाओं को भली-भाँति देख न लूँ कि इस युद्ध-उद्योग में मुझे किन-किन के साथ लड़ना है, तब तक रथ को वहीं खड़ा रखिये।
भावार्थ
अर्जुन का उद्देश्य अभी वीरोचित है — वे शत्रु-पक्ष के योद्धाओं को परखना चाहते हैं। 'योद्धुकामान्' शब्द से वे कौरव-पक्ष को आक्रामक बताते हैं; अर्थात् युद्ध की इच्छा उनकी है, हमारी नहीं। 'रणसमुद्यमे' — यह युद्ध एक बड़ा उद्योग है, जिसमें सब कुछ दाँव पर लगा है। कोई भी कार्य आरम्भ करने से पहले परिस्थिति को भली-भाँति देख लेना बुद्धिमानी है। किन्तु देखने और आसक्त होकर देखने में अन्तर है — यही अन्तर आगे अर्जुन के विषाद का कारण बनेगा।
दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा से जो-जो राजा यहाँ आये हैं, उन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा।
भावार्थ
अर्जुन दुर्योधन को 'दुर्बुद्धि' कहते हैं — जिसकी बुद्धि दूषित हो गई है, जो अन्याय को न्याय समझता है। जो राजा उसका 'प्रिय' करने आये हैं, वे वास्तव में उसका हित नहीं कर रहे, क्योंकि अधर्म का साथ देना किसी का भी हित नहीं करता। सच्चा मित्र वही है जो प्रिय नहीं, हित की बात करे। अर्जुन का स्वर अब भी दृढ़ है; अभी तक मोह ने उन्हें स्पर्श नहीं किया। परन्तु अगले ही क्षणों में जब वे सामने अपने ही सगे-सम्बन्धियों को देखेंगे, तो उनका यह स्वर बदल जायेगा।
सञ्जय बोले — हे भरतवंशी राजन्! अर्जुन के इस प्रकार कहने पर श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच उस उत्तम रथ को खड़ा करके —
भावार्थ
अर्जुन को 'गुडाकेश' कहा गया है — जिसने 'गुडाका' अर्थात् निद्रा (आलस्य) को जीत लिया हो। विडम्बना यह है कि निद्रा को जीतने वाला अर्जुन अभी मोह की निद्रा में डूबने वाला है, और 'हृषीकेश' — इन्द्रियों के स्वामी — उसे जगाने वाले हैं। श्रीकृष्ण ने बिना प्रश्न किये अर्जुन की आज्ञा मानी। भगवान् भक्त के कहने पर सेवक बन जाते हैं; यह प्रेम की पराकाष्ठा है। सञ्जय धृतराष्ट्र को 'भारत' कहकर उनके महान् वंश की याद दिलाते हैं।
भीष्म, द्रोण और सभी राजाओं के सामने रथ खड़ा करके कहा — हे पार्थ! यहाँ एकत्र हुए इन कुरुवंशियों को देखो।
भावार्थ
श्रीकृष्ण ने रथ ठीक भीष्म और द्रोण के सामने रोका — उन दो व्यक्तियों के सामने जिनके प्रति अर्जुन के मन में सबसे अधिक आदर और प्रेम था। यह भगवान् की लीला थी, ताकि अर्जुन के भीतर छिपा मोह प्रकट हो जाये और फिर उसका उपचार हो सके। वे अर्जुन को 'पार्थ' (पृथा अर्थात् कुन्ती के पुत्र) कहते हैं, जिससे उसके मन में अपने परिवार का भाव और गहरा हो। 'कुरून्' शब्द भी ध्यान देने योग्य है — कौरव और पाण्डव दोनों कुरुवंशी हैं। रोग का उपचार तभी सम्भव है जब पहले वह प्रकट हो।
वहाँ अर्जुन ने खड़े हुए ताऊ-चाचाओं, दादाओं-परदादाओं, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों तथा मित्रों को देखा।
भावार्थ
अब अर्जुन की दृष्टि शत्रु-योद्धाओं पर नहीं, अपने सम्बन्धियों पर पड़ती है। जो सेना कुछ क्षण पहले 'दुर्योधन के प्रिय करने वाले' थी, वही अब पिता, पितामह, गुरु, मामा, भाई, पुत्र और मित्र के रूप में दिखने लगी। दृष्टि बदलते ही अनुभव बदल जाता है। यहाँ 'पुत्र' और 'पौत्र' से दुर्योधन आदि के पुत्र-पौत्र अभिप्रेत हैं, जो अर्जुन के लिये पुत्रवत् थे। मोह का आरम्भ 'मेरा' भाव से होता है — जब कर्तव्य का क्षेत्र सम्बन्धों के जाल से ढक जाता है।
दोनों ही सेनाओं में ससुरों और हितैषी मित्रों को भी देखा। उन सब बन्धु-बान्धवों को युद्ध के लिये खड़ा देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुन —
भावार्थ
दोनों सेनाओं में अर्जुन को अपने ही लोग दिखाई देते हैं — एक ओर भीष्म, द्रोण, कृप, दूसरी ओर द्रुपद (ससुर), विराट आदि। युद्ध में चाहे कोई भी पक्ष जीते, मरने वाले सब अपने ही होंगे — यह विचार अर्जुन को व्याकुल कर देता है। 'कौन्तेय' (कुन्तीपुत्र) शब्द माता के कोमल हृदय का स्मरण कराता है, जो अर्जुन में भी करुणा बनकर प्रकट हो रहा है। 'बन्धून्' शब्द से स्पष्ट है कि अब वे सबको केवल सम्बन्धी के रूप में देख रहे हैं। जहाँ सम्बन्ध-बुद्धि प्रबल हो जाती है, वहाँ विवेक धुँधला होने लगता है।
अत्यन्त करुणा से भरकर शोक करते हुए यह बोले — अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से सामने खड़े इन अपने ही लोगों को देखकर —
भावार्थ
अर्जुन 'परया कृपया आविष्टः' हैं — गहरी करुणा उन पर छा गई है। किन्तु यह वास्तविक करुणा नहीं, मोह-जनित दया है, क्योंकि इसमें 'स्वजन' का भाव मुख्य है। सच्ची करुणा सब प्राणियों के लिये होती है, केवल अपनों के लिये नहीं। 'आविष्टः' शब्द बताता है कि यह भावना उनके वश में नहीं, बल्कि वे इसके वश में हैं — जैसे कोई आवेश में आ गया हो। 'विषीदन्' — यहीं से प्रथम अध्याय का नाम 'विषादयोग' सार्थक होता है। विषाद जब ईश्वर के सामने प्रकट होता है, तो वही योग का द्वार बन जाता है।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥
अन्वय
मम गात्राणि सीदन्ति, मुखं च परिशुष्यति, मे शरीरे वेपथुः च रोमहर्षः च जायते।
हिन्दी अनुवाद
मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुँह सूखा जा रहा है, मेरे शरीर में कम्पन हो रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
भावार्थ
अर्जुन के मन का शोक अब शरीर पर भी प्रकट होने लगा है। अंगों का ढीला पड़ना, मुँह सूखना, कम्पन और रोमाञ्च — ये सब तीव्र भय और शोक के शारीरिक लक्षण हैं। मनोविज्ञान भी मानता है कि गहरी भावनात्मक उथल-पुथल शरीर को सीधे प्रभावित करती है। जो अर्जुन अनेक युद्धों में निर्भय रहे, वही आज काँप रहे हैं — कारण शत्रु का बल नहीं, अपने भीतर का मोह है। मनुष्य बाहर के शत्रु से उतना नहीं हारता जितना भीतर की दुर्बलता से।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥
अन्वय
गाण्डीवं हस्तात् स्रंसते, त्वक् च एव परिदह्यते, अवस्थातुं च न शक्नोमि, मे मनः च भ्रमति इव।
हिन्दी अनुवाद
हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है, त्वचा भी जल रही है; मैं खड़ा रहने में भी समर्थ नहीं हूँ और मेरा मन मानो चक्कर खा रहा है।
भावार्थ
गाण्डीव — वह दिव्य धनुष जो अर्जुन की पहचान था — आज उनके हाथ से फिसल रहा है। यह केवल शारीरिक दुर्बलता नहीं, बल्कि कर्तव्य से हटने का प्रतीक है। त्वचा में जलन और खड़े न रह पाना शोक की चरम अवस्था है। 'मन भ्रमता-सा है' — जब मन भ्रमित होता है, तब निर्णय-शक्ति काम नहीं करती। यही वह स्थिति है जिसमें मनुष्य को किसी सच्चे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। अर्जुन का यह संकट ही गीता के अमृत-उपदेश का कारण बना।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥
अन्वय
(हे) केशव! (अहं) निमित्तानि च विपरीतानि पश्यामि, आहवे स्वजनं हत्वा श्रेयः च न अनुपश्यामि।
हिन्दी अनुवाद
हे केशव! मैं लक्षण भी विपरीत ही देख रहा हूँ, और युद्ध में अपने ही लोगों को मारकर कोई कल्याण भी नहीं देखता।
भावार्थ
मोहग्रस्त मन को बाहर भी सब कुछ अशुभ दिखाई देने लगता है — अर्जुन को शकुन भी उलटे लग रहे हैं। वे कहते हैं कि स्वजनों को मारकर कोई 'श्रेय' (कल्याण) नहीं होगा। अर्जुन यहाँ भौतिक लाभ और कल्याण को एक मान रहे हैं, जबकि आगे भगवान् बतायेंगे कि वास्तविक श्रेय धर्म-पालन में है, परिणाम में नहीं। श्रीकृष्ण को 'केशव' कहा गया — जिन्होंने केशी दैत्य को मारा, अर्थात् जो बाधाओं का नाश करने वाले हैं। जब मन उदास हो, तब भविष्य अन्धकारमय दिखता है; यह दृष्टि का दोष है, सत्य का नहीं।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥
अन्वय
(हे) कृष्ण! (अहं) विजयं न काङ्क्षे, राज्यं च सुखानि च न (काङ्क्षे)। (हे) गोविन्द! नः राज्येन किम्, भोगैः जीवितेन वा किम्?
हिन्दी अनुवाद
हे कृष्ण! मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य और न सुख। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से, भोगों से या जीवन से भी क्या प्रयोजन?
भावार्थ
अर्जुन के शब्द वैराग्य जैसे लगते हैं — 'न विजय चाहिये, न राज्य, न सुख'। परन्तु यह सच्चा वैराग्य नहीं, बल्कि मोह से उत्पन्न निराशा है। सच्चा वैराग्य विवेक से आता है और शान्ति देता है, जबकि यह भाव शोक और भय से आया है। भगवान् को 'गोविन्द' कहा गया — जो इन्द्रियों और गौओं के पालक हैं, जो इन्द्रियों को आनन्द देते हैं। निराशा में मनुष्य अपने कर्तव्य को भी व्यर्थ समझने लगता है; गीता इसी भ्रम को दूर करती है।
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥
अन्वय
येषाम् अर्थे नः राज्यं भोगाः सुखानि च काङ्क्षितम्, ते इमे प्राणान् धनानि च त्यक्त्वा युद्धे अवस्थिताः।
हिन्दी अनुवाद
जिनके लिये हम राज्य, भोग और सुख चाहते थे, वे ही ये सब अपने प्राणों और धन की आशा छोड़कर युद्ध में खड़े हैं।
भावार्थ
अर्जुन का तर्क है कि राज्य और सुख का मूल्य तभी है जब उसे भोगने के लिये अपने लोग साथ हों। जिनके साथ सुख बाँटना था, यदि वही नष्ट हो जायें तो राज्य किस काम का? यह तर्क मानवीय और भावुक है। किन्तु इसमें यह भूल है कि अर्जुन युद्ध को व्यक्तिगत लाभ का साधन मान रहे हैं, धर्म-रक्षा का कर्तव्य नहीं। जब कर्म का उद्देश्य निजी सुख होता है, तब परिस्थिति बदलते ही कर्म का अर्थ भी खो जाता है। निष्काम कर्म ही हर परिस्थिति में स्थिर रहता है।
आचार्याः पितरः पुत्राः तथा एव च पितामहाः, मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः तथा सम्बन्धिनः (युद्धे अवस्थिताः)।
हिन्दी अनुवाद
गुरुजन, ताऊ-चाचा, पुत्र, दादा, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य सम्बन्धी — सब यहाँ खड़े हैं।
भावार्थ
अर्जुन फिर से सम्बन्धों की लम्बी सूची गिनाते हैं। बार-बार गिनती करना इस बात का संकेत है कि उनका मन इन्हीं सम्बन्धों में उलझ गया है। जब मन किसी विचार में अटकता है, तो वह उसे बार-बार दोहराता है। आचार्य से लेकर सामान्य सम्बन्धी तक — हर व्यक्ति के साथ कोई स्मृति, कोई भावनात्मक बन्धन जुड़ा है। यह श्लोक मानवीय सम्बन्धों की उस कोमल शक्ति को दिखाता है जो सबसे बड़े वीर को भी असहाय बना सकती है।
हे मधुसूदन! ये मुझे मारें तब भी, तीनों लोकों के राज्य के लिये भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता; फिर पृथ्वी के राज्य के लिये तो कहना ही क्या?
भावार्थ
अर्जुन यहाँ तक कह देते हैं कि यदि ये मुझे मारने लगें, तब भी मैं इन पर प्रहार नहीं करूँगा। त्रिलोकी का राज्य भी उन्हें इस हत्या के बदले स्वीकार नहीं। यह भाव ऊपर से महान् लगता है, पर यह कर्तव्य से पलायन है। श्रीकृष्ण को 'मधुसूदन' कहा गया — मधु नामक दैत्य का वध करने वाले। इसमें व्यंग्य छिपा है: जिन्होंने स्वयं दुष्टों का वध किया, उनसे अर्जुन दुष्टों को न मारने की बात कह रहे हैं। मोह व्यक्ति के तर्कों को भी उलट देता है।
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर हमें पाप ही लगेगा।
भावार्थ
शास्त्रों में 'आततायी' छह प्रकार के बताये गये हैं — आग लगाने वाला, विष देने वाला, शस्त्र लेकर मारने आने वाला, धन छीनने वाला, भूमि हरने वाला और स्त्री का अपहरण करने वाला। कौरवों ने ये सभी अपराध पाण्डवों के साथ किये थे, और शास्त्र आततायी को मारने में दोष नहीं मानते। फिर भी अर्जुन कहते हैं कि इन्हें मारकर पाप लगेगा — क्योंकि वे सम्बन्धी हैं। यहाँ अर्जुन धर्मशास्त्र के सामान्य नियम पर सम्बन्ध-मोह को प्राथमिकता दे रहे हैं। 'जनार्दन' — जो लोगों के कष्ट हरते हैं — उनसे अर्जुन अपने कष्ट का समाधान चाहते हैं।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ ३७ ॥
अन्वय
तस्मात् वयं स्वबान्धवान् धार्तराष्ट्रान् हन्तुं न अर्हाः। (हे) माधव! स्वजनं हत्वा हि कथं सुखिनः स्याम?
हिन्दी अनुवाद
इसलिये हमें अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारना उचित नहीं है। हे माधव! अपने ही लोगों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
भावार्थ
अर्जुन अपने तर्कों से एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं — युद्ध नहीं करना चाहिये। उनका मुख्य आधार 'सुख' है — स्वजनों को मारकर सुख नहीं मिलेगा। यहाँ ध्यान देने योग्य है कि अर्जुन के निर्णय का मापदण्ड धर्म नहीं, बल्कि अपना सुख-दुःख है। भगवान् आगे सिखायेंगे कि कर्तव्य का निर्णय सुख-दुःख से नहीं, धर्म से करना चाहिये। 'माधव' — लक्ष्मीपति — से अर्जुन कहते हैं कि ऐसी लक्ष्मी (राज्य) किस काम की, जो अपनों के रक्त से मिले।
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥
अन्वय
यद्यपि लोभोपहतचेतसः एते कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकं न पश्यन्ति —
हिन्दी अनुवाद
यद्यपि लोभ से भ्रष्ट-चित्त हुए ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष को और मित्रों से द्रोह करने के पाप को नहीं देखते —
भावार्थ
अर्जुन स्वीकार करते हैं कि कौरव लोभ से अन्धे हो गये हैं — 'लोभोपहतचेतसः', जिनका चित्त लोभ ने नष्ट कर दिया है। उन्हें न कुल-नाश का दोष दिखता है, न मित्रद्रोह का पाप। यह मनुष्य-स्वभाव का एक गहरा सत्य है कि लोभ विवेक को ढक देता है; लोभी व्यक्ति को अपने कर्मों के दुष्परिणाम दिखाई नहीं देते। अर्जुन आगे तर्क देंगे कि वे तो यह सब देख सकते हैं, इसलिये उन्हें यह पाप नहीं करना चाहिये। यहाँ अर्जुन धर्म की बात कर रहे हैं, पर उसके पीछे मोह छिपा है।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥
अन्वय
(हे) जनार्दन! कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिः अस्माभिः अस्मात् पापात् निवर्तितुं कथं न ज्ञेयम्?
हिन्दी अनुवाद
हे जनार्दन! कुल के नाश से होने वाले दोष को भली-भाँति देखने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने का विचार क्यों नहीं करना चाहिये?
भावार्थ
अर्जुन का तर्क है — यदि कौरव अज्ञानी हैं तो हम भी अज्ञानी क्यों बनें? जो दोष को जानता है, उसे उससे बचना चाहिये। यह तर्क अपने आप में उचित लगता है, और इसी कारण अर्जुन का मोह और भी सूक्ष्म और खतरनाक है — वह धर्म के वेश में प्रकट हो रहा है। सबसे कठिन भ्रम वही होता है जो सत्य जैसा दिखे। आगे भगवान् स्पष्ट करेंगे कि धर्म-युद्ध से हटना ही वास्तविक पाप है। सत्य-असत्य का निर्णय भावना से नहीं, शास्त्र और विवेक से होता है।
कुल का नाश होने पर सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, और धर्म के नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता है।
भावार्थ
अर्जुन अब सामाजिक परिणामों की चर्चा करते हैं। प्रत्येक कुल की अपनी परम्पराएँ, संस्कार और धर्म होते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं। युद्ध में कुल के वरिष्ठ और वीर पुरुष मारे जायेंगे, तो इन परम्पराओं को आगे बढ़ाने वाला कोई न रहेगा। परम्परा टूटने पर अनुशासन ढीला होगा और अधर्म फैलेगा। यह चिन्ता गम्भीर है और भारतीय समाज-व्यवस्था की समझ को दर्शाती है। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या अधर्मी पक्ष को छोड़ देने से धर्म की रक्षा होगी? — इसका उत्तर भगवान् देंगे।
हे कृष्ण! अधर्म के बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
भावार्थ
अर्जुन की चिन्ता समाज की नैतिक व्यवस्था के प्रति है। युद्ध में पुरुषों के मारे जाने पर परिवार की रक्षा और संस्कारों का संरक्षण कठिन हो जाता है, जिससे सामाजिक मर्यादा टूटती है। 'वर्णसंकर' का व्यापक अर्थ है — गुण, कर्म और संस्कारों की अव्यवस्था, जिससे सन्तान अपनी परम्परा और कर्तव्य से अनभिज्ञ रहती है। श्रीकृष्ण को 'वार्ष्णेय' (वृष्णिवंशी) कहकर अर्जुन मानो याद दिला रहे हैं कि आप भी एक कुल के सदस्य हैं, कुल-धर्म का महत्व समझते हैं। यह श्लोक परिवार को समाज की नींव मानने वाली दृष्टि को दिखाता है।
सङ्करः कुलघ्नानां कुलस्य च नरकाय एव (भवति)। हि एषां पितरः लुप्तपिण्डोदकक्रियाः (सन्तः) पतन्ति।
हिन्दी अनुवाद
वर्णसंकर कुल का नाश करने वालों और कुल को भी नरक में ले जाने वाला होता है; पिण्ड और जल-तर्पण की क्रिया लुप्त हो जाने से इनके पितर भी अधोगति को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
भारतीय परम्परा में श्राद्ध और तर्पण द्वारा पितरों का स्मरण और तृप्ति की जाती है। अर्जुन कहते हैं कि कुल-परम्परा नष्ट होने पर यह क्रिया बन्द हो जायेगी और पितर भी पतित होंगे। इस श्लोक में पीढ़ियों के बीच के आध्यात्मिक सम्बन्ध की धारणा है — हमारे कर्म केवल हमें नहीं, हमारे पूर्वजों और वंशजों को भी प्रभावित करते हैं। अर्जुन का तर्क है कि युद्ध केवल वर्तमान पीढ़ी को नहीं, बीती और आने वाली पीढ़ियों को भी नष्ट करेगा। कृतज्ञता और परम्परा का सम्मान भारतीय संस्कृति का मूल है।
कुलघ्नानाम् एतैः वर्णसङ्करकारकैः दोषैः शाश्वताः जातिधर्माः कुलधर्माः च उत्साद्यन्ते।
हिन्दी अनुवाद
कुल का नाश करने वालों के इन वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले दोषों से सनातन जाति-धर्म और कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं।
भावार्थ
अर्जुन अपने तर्क को और आगे बढ़ाते हैं — कुल-नाश केवल एक परिवार का नहीं, पूरे समाज के धर्म का नाश करता है। 'जातिधर्म' से अभिप्राय समाज के विभिन्न वर्गों के कर्तव्यों से है और 'कुलधर्म' से परिवार की परम्पराओं से। ये 'शाश्वत' कहे गये हैं, क्योंकि ये पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। अर्जुन यहाँ समाज-शास्त्री की तरह बोल रहे हैं। उनकी चिन्ता सच्ची है, किन्तु उनका निष्कर्ष — युद्ध न करना — परिस्थिति के अनुकूल नहीं है, क्योंकि अधर्म को अनियन्त्रित छोड़ना भी धर्म का नाश ही है।
हे जनार्दन! जिनके कुल-धर्म नष्ट हो गये हैं, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है — ऐसा हमने परम्परा से सुना है।
भावार्थ
अर्जुन अपने तर्क के समर्थन में शास्त्र-परम्परा का प्रमाण देते हैं — 'अनुशुश्रुम' अर्थात् हमने गुरुजनों से ऐसा सुना है। वे मानते हैं कि धर्म-विहीन जीवन का परिणाम दुःख और अधोगति है। यह श्लोक दिखाता है कि अर्जुन अज्ञानी नहीं, शास्त्रज्ञ हैं; पर शास्त्र के अंशों को अपने मोह के समर्थन में प्रयोग कर रहे हैं। यह एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति है — हम अपने भावों को उचित ठहराने के लिये ज्ञान का सहारा लेते हैं। वास्तविक विवेक तब है जब शास्त्र को समग्रता में समझा जाये।
अहो! कितने खेद की बात है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने को तैयार हो गये हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने ही स्वजनों को मारने के लिये उद्यत हैं।
भावार्थ
'अहो बत' — इन शब्दों में अर्जुन का गहरा पश्चात्ताप और विस्मय है। वे स्वयं को दोषी मानने लगे हैं कि राज्य-सुख के लोभ में हम कैसा पाप करने चले थे। कुछ क्षण पहले उन्होंने कौरवों को 'लोभोपहतचेतसः' कहा था, अब वही आरोप अपने ऊपर भी लगा रहे हैं। यह आत्म-निरीक्षण सराहनीय है, परन्तु यह भी मोह की ही एक अवस्था है, क्योंकि पाण्डव राज्य के लोभ से नहीं, अपने न्यायोचित अधिकार और धर्म की स्थापना के लिये लड़ रहे थे। भावुकता में मनुष्य कभी-कभी अपने उचित कर्तव्य को भी पाप समझ बैठता है।
यदि शस्त्रपाणयः धार्तराष्ट्राः अप्रतीकारम् अशस्त्रं मां रणे हन्युः, तत् मे क्षेमतरं भवेत्।
हिन्दी अनुवाद
यदि मुझ शस्त्ररहित और सामना न करने वाले को शस्त्रधारी धृतराष्ट्र-पुत्र रण में मार डालें, तो वह मेरे लिये अधिक कल्याणकारी होगा।
भावार्थ
अर्जुन के विषाद की यह चरम सीमा है — वे बिना प्रतिकार किये मर जाने को तैयार हैं। यह आत्मबलिदान जैसा दिखता है, पर वास्तव में यह कर्तव्य से पूर्ण पलायन है। एक क्षत्रिय का धर्म अन्याय का प्रतिकार करना है; शस्त्र त्यागकर मर जाना उस धर्म का त्याग है। अर्जुन सोचते हैं कि इससे वे पाप से बच जायेंगे, परन्तु अधर्म को विजयी होने देना भी पाप में भागीदारी है। जब मनुष्य का मन टूट जाता है, तो उसे पराजय ही शान्ति जैसी लगने लगती है।
सञ्जय बोले — युद्धभूमि में शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गये।
भावार्थ
प्रथम अध्याय का समापन अर्जुन के पूर्ण विषाद से होता है। जिस धनुष को उठाकर वे युद्ध के लिये तैयार हुए थे (श्लोक २०), वही अब उन्होंने रख दिया। वे रथ के पिछले भाग में बैठ गये — यह कर्म से विमुख होने का प्रतीक है। 'शोकसंविग्नमानसः' — उनका मन शोक से उद्विग्न है। यह स्थिति निराशाजनक लगती है, किन्तु यही अध्यात्म का आरम्भ है; क्योंकि जब मनुष्य के सारे तर्क और साधन चुक जाते हैं, तभी वह सच्चे मार्गदर्शन के लिये प्रस्तुत होता है। अर्जुन का विषाद ही 'विषादयोग' बनकर भगवान् के उपदेश का पात्र बना।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥
ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।