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🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय २ — सांख्ययोग

७२ श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 आत्मा की अमरता, स्वधर्म, निष्काम कर्मयोग का सूत्र (कर्मण्येवाधिकारस्ते) और स्थितप्रज्ञ के लक्षण।
२.१ सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
अन्वय
सञ्जयः उवाच — तथा कृपया आविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणं विषीदन्तं तं (अर्जुनं) मधुसूदनः इदं वाक्यम् उवाच।
हिन्दी अनुवाद
सञ्जय बोले — इस प्रकार करुणा से भरे, आँसुओं से भरे व्याकुल नेत्रों वाले, शोक करते हुए अर्जुन से भगवान् मधुसूदन ने यह वचन कहा।
भावार्थ
दूसरा अध्याय गीता का हृदय माना जाता है, क्योंकि यहीं से भगवान् का उपदेश आरम्भ होता है। सञ्जय अर्जुन की दशा का चित्र खींचते हैं — आँखें आँसुओं से भरी और व्याकुल, मन करुणा और शोक से दबा हुआ। यह 'कृपा' वास्तव में मोह-जनित है, इसलिये उसे दूर करना आवश्यक है। भगवान् को 'मधुसूदन' कहा गया है — जैसे उन्होंने मधु दैत्य का नाश किया, वैसे ही अब वे अर्जुन के मोह रूपी दैत्य का नाश करेंगे। जब शिष्य की आँखों में आँसू और मन में प्रश्न हों, तब गुरु का वचन सबसे अधिक प्रभावी होता है।
२.२ श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (हे) अर्जुन! विषमे (काले) अनार्यजुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरम् इदं कश्मलं त्वा कुतः समुपस्थितम्?
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे अर्जुन! इस संकट के समय तुम्हें यह मोह कहाँ से प्राप्त हो गया, जो श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित नहीं है, न स्वर्ग देने वाला है और न कीर्ति देने वाला?
भावार्थ
भगवान् का पहला वचन ही कठोर और जगाने वाला है। वे अर्जुन के भाव को 'कश्मल' अर्थात् मैल या मोह कहते हैं। यह आचरण 'अनार्यजुष्ट' है — आर्य अर्थात् श्रेष्ठ, विवेकी पुरुष ऐसे समय में कर्तव्य से नहीं हटते। यह 'अस्वर्ग्य' है — परलोक में भी कल्याण नहीं देगा, और 'अकीर्तिकर' — इस लोक में भी अपयश देगा। इस प्रकार भगवान् तीनों दृष्टियों से — धर्म, परलोक और लोक-प्रतिष्ठा से — अर्जुन के भाव को अनुचित ठहराते हैं। सच्चा गुरु पहले भ्रम को झकझोरता है, फिर ज्ञान देता है।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! क्लैब्यं मा स्म गमः; एतत् त्वयि न उपपद्यते। (हे) परन्तप! क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वा उत्तिष्ठ।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! नपुंसकता को प्राप्त मत हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे शत्रुओं को तपाने वाले! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिये खड़े हो जाओ।
भावार्थ
भगवान् अर्जुन की स्थिति को 'क्लैब्य' — कायरता या पौरुषहीनता — कहते हैं। यह शब्द सुनकर किसी भी वीर का स्वाभिमान जाग उठता है। 'त्वयि न उपपद्यते' — तुम जैसे वीर को यह शोभा नहीं देता; अर्थात् भगवान् अर्जुन की वास्तविक शक्ति की याद दिलाते हैं। 'क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यम्' — यह कोई महान् करुणा नहीं, केवल हृदय की छोटी-सी दुर्बलता है। 'परन्तप' सम्बोधन से उनका पराक्रम स्मरण कराया गया है। जीवन में भी जब हम कर्तव्य से भागते हैं, तब एक प्रेरक वचन हमें फिर से खड़ा कर सकता है — 'उत्तिष्ठ', उठो!
२.४ अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥ ४ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) मधुसूदन! अहं संख्ये भीष्मं द्रोणं च इषुभिः कथं प्रतियोत्स्यामि? (हे) अरिसूदन! (तौ) पूजार्हौ (स्तः)।
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध बाणों से कैसे युद्ध करूँगा? हे शत्रुओं का नाश करने वाले! वे दोनों तो पूजनीय हैं।
भावार्थ
भगवान् की फटकार के बाद भी अर्जुन का मोह दूर नहीं हुआ; वे अब एक नया तर्क देते हैं। भीष्म और द्रोण पूजा के योग्य हैं — जिनके चरणों में पुष्प चढ़ाने चाहिये, उन पर बाण कैसे चलाऊँ? यह तर्क अत्यन्त भावुक और सम्मानजनक है। 'मधुसूदन' और 'अरिसूदन' — दोनों सम्बोधनों में शत्रु-नाशक का भाव है; अर्जुन मानो कहते हैं कि आप तो शत्रुओं को मारते हैं, पर ये मेरे शत्रु नहीं, पूज्य हैं। यहाँ अर्जुन यह भूल रहे हैं कि जब पूज्य व्यक्ति भी अधर्म का पक्ष लें, तो कर्तव्य का विचार व्यक्तिगत सम्बन्ध से ऊपर होता है।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥
अन्वय
महानुभावान् गुरून् अहत्वा इह लोके भैक्ष्यम् अपि भोक्तुं श्रेयः हि। गुरून् हत्वा तु इह एव रुधिरप्रदिग्धान् अर्थकामान् भोगान् भुञ्जीय।
हिन्दी अनुवाद
इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना भी कल्याणकारी है; क्योंकि गुरुजनों को मारकर तो मैं यहीं रक्त से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही भोगूँगा।
भावार्थ
अर्जुन कहते हैं कि क्षत्रिय के लिये भिक्षा माँगना निन्दनीय है, फिर भी गुरुओं की हत्या से वह अच्छा है। गुरुओं को मारकर जो राज्य मिलेगा, उसका हर सुख रक्त से सना होगा — यह चित्र बहुत मार्मिक है। अर्जुन के लिये भीष्म और द्रोण केवल योद्धा नहीं, बचपन के संरक्षक और शिक्षक हैं। 'महानुभावान्' शब्द उनके प्रति गहरी श्रद्धा दिखाता है। किन्तु यहाँ अर्जुन यह नहीं देख पा रहे कि भिक्षा माँगकर जीना उनके स्वधर्म का त्याग होगा, और अन्याय को फलने देना समाज के प्रति अपराध।
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥
अन्वय
नः कतरत् गरीयः — यत् वा (वयं) जयेम यदि वा (ते) नः जयेयुः — एतत् च न विद्मः। यान् एव हत्वा न जिजीविषामः, ते धार्तराष्ट्राः प्रमुखे अवस्थिताः।
हिन्दी अनुवाद
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिये क्या श्रेष्ठ है — हम उन्हें जीतें या वे हमें जीत लें। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़े हैं।
भावार्थ
अर्जुन की अनिश्चितता अब पूरी तरह प्रकट है। वे कहते हैं कि जीतना भी दुःखदायी है और हारना भी — निर्णय कैसे करें? यह वह स्थिति है जब मनुष्य के सामने दोनों विकल्प कष्टकारी लगते हैं। 'यान् एव हत्वा न जिजीविषामः' — जिन्हें मारकर जीने की इच्छा ही न रहे, ऐसी विजय का क्या अर्थ? यह श्लोक दिखाता है कि अर्जुन की बुद्धि भ्रमित है; वे अपने विवेक से निर्णय नहीं कर पा रहे। जब अपनी बुद्धि काम न करे, तब किसी समर्थ मार्गदर्शक के पास जाना ही बुद्धिमानी है — यही अर्जुन अगले श्लोक में करते हैं।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
अन्वय
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः धर्मसम्मूढचेताः (अहं) त्वां पृच्छामि — यत् निश्चितं श्रेयः स्यात् तत् मे ब्रूहि। अहं ते शिष्यः, त्वां प्रपन्नं मां शाधि।
हिन्दी अनुवाद
कायरता रूपी दोष से मेरा स्वभाव दब गया है और धर्म के विषय में मेरा चित्त मोहित है; इसलिये मैं आपसे पूछता हूँ — जो निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइये। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आये हुए मुझको शिक्षा दीजिये।
भावार्थ
यह श्लोक गीता का प्रवेशद्वार है। अर्जुन पहली बार अपनी स्थिति को स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं — 'कार्पण्य' अर्थात् दीनता या कृपणता ने उनके क्षत्रिय-स्वभाव को ढक दिया है, और धर्म-अधर्म का निर्णय करने में उनकी बुद्धि मोहित है। अब तक वे श्रीकृष्ण से मित्र की तरह बात कर रहे थे; अब कहते हैं — 'शिष्यस्तेऽहम्', मैं आपका शिष्य हूँ, 'त्वां प्रपन्नम्' — आपकी शरण में हूँ। ज्ञान का द्वार तभी खुलता है जब अहंकार झुकता है और जिज्ञासु पूर्ण समर्पण से पूछता है। वे 'निश्चितं श्रेयः' — निश्चित कल्याण — माँगते हैं, केवल सान्त्वना नहीं।
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥
अन्वय
भूमौ असपत्नम् ऋद्धं राज्यं सुराणाम् आधिपत्यम् अपि च अवाप्य, यत् मम इन्द्रियाणाम् उच्छोषणं शोकम् अपनुद्यात् (तत्) न हि प्रपश्यामि।
हिन्दी अनुवाद
पृथ्वी पर निष्कण्टक और समृद्ध राज्य तथा देवताओं का स्वामित्व पाकर भी मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखा देने वाले इस शोक को दूर कर सके।
भावार्थ
अर्जुन कहते हैं कि उनका शोक इतना गहरा है कि संसार का कोई भी वैभव उसे मिटा नहीं सकता — न पृथ्वी का निष्कण्टक राज्य, न स्वर्ग का अधिपत्य। यह शोक 'इन्द्रियों को सुखाने वाला' है, अर्थात् उनकी जीवन-शक्ति को ही क्षीण कर रहा है। यह एक गहरा आध्यात्मिक सत्य प्रकट करता है — बाहरी उपलब्धियाँ भीतर के दुःख को दूर नहीं कर सकतीं। शोक का उपचार ज्ञान से ही होता है, भोग से नहीं। इसी ज्ञान को देने के लिये भगवान् आगे आत्मा का स्वरूप समझायेंगे।
२.९ सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप। न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥
अन्वय
सञ्जयः उवाच — (हे) परन्तप! गुडाकेशः हृषीकेशम् एवम् उक्त्वा गोविन्दं 'न योत्स्ये' इति उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।
हिन्दी अनुवाद
सञ्जय बोले — हे राजन्! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन, अन्तर्यामी श्रीकृष्ण से इस प्रकार कहकर, फिर 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' — यह स्पष्ट कहकर चुप हो गये।
भावार्थ
अर्जुन ने अपना अन्तिम निर्णय सुना दिया — 'न योत्स्ये', मैं युद्ध नहीं करूँगा — और मौन हो गये। सञ्जय धृतराष्ट्र को 'परन्तप' कहते हैं, शायद यह संकेत करने के लिये कि अर्जुन का यह निर्णय सुनकर धृतराष्ट्र प्रसन्न होंगे, पर यह स्थिति स्थायी नहीं रहेगी। मौन यहाँ दो बातों का प्रतीक है — एक ओर निराशा, दूसरी ओर ग्रहणशीलता। जब मनुष्य अपनी सारी बातें कह चुकता है और चुप हो जाता है, तभी वह गुरु के वचन सुनने के लिये तैयार होता है।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥
अन्वय
(हे) भारत! हृषीकेशः उभयोः सेनयोः मध्ये विषीदन्तं तं प्रहसन् इव इदं वचः उवाच।
हिन्दी अनुवाद
हे भरतवंशी राजन्! दोनों सेनाओं के बीच शोक करते हुए अर्जुन से भगवान् श्रीकृष्ण ने मानो मुस्कराते हुए यह वचन कहा।
भावार्थ
'प्रहसन् इव' — मानो मुस्कराते हुए। यह मुस्कान उपहास की नहीं, बल्कि उस प्रेमपूर्ण गुरु की है जो जानता है कि शिष्य की समस्या का समाधान सरल है। दोनों सेनाओं के बीच, युद्ध के कोलाहल में, भगवान् शान्त और प्रसन्न हैं — यह ज्ञानी की स्थिति है जो किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता। यह दृश्य स्वयं में एक उपदेश है: बाहर कितना भी संघर्ष हो, भीतर शान्ति सम्भव है। यहीं से गीता का वास्तविक ज्ञान-प्रवाह आरम्भ होता है।
२.११ श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — त्वम् अशोच्यान् अन्वशोचः प्रज्ञावादान् च भाषसे; पण्डिताः गतासून् अगतासून् च न अनुशोचन्ति।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — तुम उनके लिये शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और साथ ही विद्वानों जैसी बातें भी करते हो; परन्तु ज्ञानी पुरुष न मरे हुओं के लिये शोक करते हैं, न जीवितों के लिये।
भावार्थ
भगवान् का उपदेश यहीं से आरम्भ होता है, और पहली बात ही मूल समस्या पर प्रहार करती है। अर्जुन धर्म और शास्त्र की बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे, पर उनका शोक अज्ञान से उत्पन्न था। भगवान् कहते हैं — जो वास्तव में ज्ञानी हैं, वे न मृत्यु के लिये शोक करते हैं, न जीवन के लिये, क्योंकि वे जानते हैं कि आत्मा अमर है और शरीर नश्वर। शोक तभी होता है जब हम स्वयं को और दूसरों को केवल शरीर मान लेते हैं। गीता का सम्पूर्ण ज्ञान इसी भ्रम को दूर करने के लिये है।
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥
अन्वय
न तु एव अहं जातु न आसं, न त्वं, न इमे जनाधिपाः; अतः परं च वयं सर्वे न भविष्यामः (इति) न च एव।
हिन्दी अनुवाद
ऐसा कभी नहीं था कि मैं न रहा हूँ, या तुम न रहे हो, या ये राजा लोग न रहे हों; और न ऐसा ही होगा कि इसके बाद हम सब नहीं रहेंगे।
भावार्थ
भगवान् आत्मा की नित्यता का पहला सिद्धान्त बताते हैं। हम सब — भगवान्, अर्जुन और ये सारे राजा — पहले भी थे, अभी हैं और आगे भी रहेंगे। शरीर का जन्म और मृत्यु होती है, किन्तु आत्मा का न आरम्भ है, न अन्त। यह कथन व्यक्तिगत आत्माओं की निरन्तरता भी बताता है — प्रत्येक जीव का अस्तित्व सनातन है। जब यह सत्य समझ में आ जाता है, तब मृत्यु का भय और वियोग का शोक बहुत कम हो जाता है। हम एक लम्बी यात्रा के यात्री हैं, जिसमें यह जीवन केवल एक पड़ाव है।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥
अन्वय
यथा देहिनः अस्मिन् देहे कौमारं यौवनं जरा (भवति), तथा देहान्तरप्राप्तिः (भवति); धीरः तत्र न मुह्यति।
हिन्दी अनुवाद
जैसे जीवात्मा को इस शरीर में बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था प्राप्त होती है, वैसे ही दूसरे शरीर की प्राप्ति होती है; धीर पुरुष इस विषय में मोहित नहीं होता।
भावार्थ
भगवान् एक अत्यन्त सरल और अनुभव-सिद्ध उदाहरण देते हैं। हमारा शरीर बचपन से जवानी और जवानी से बुढ़ापे में बदल जाता है, फिर भी 'मैं' वही रहता है। बचपन का शरीर 'मर' गया, पर हमें उसका शोक नहीं होता। ठीक इसी प्रकार मृत्यु भी एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने की एक अवस्था मात्र है। जो इस सत्य को समझता है, वह 'धीर' है — स्थिर बुद्धि वाला — और मृत्यु से मोहित या भयभीत नहीं होता। परिवर्तन शरीर का धर्म है, आत्मा का नहीं।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! मात्रास्पर्शाः तु शीतोष्णसुखदुःखदाः, आगमापायिनः अनित्याः (च सन्ति); (हे) भारत! तान् तितिक्षस्व।
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों और विषयों के संयोग ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाले हैं; ये आने-जाने वाले और अनित्य हैं, इसलिये हे भारत! इन्हें धैर्यपूर्वक सहन करो।
भावार्थ
'मात्रास्पर्श' का अर्थ है — इन्द्रियों का अपने विषयों से सम्पर्क। आँख का रूप से, कान का शब्द से, त्वचा का स्पर्श से संयोग होता है, और उससे सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी का अनुभव होता है। भगवान् कहते हैं कि ये अनुभव 'आगमापायिनः' हैं — आते हैं और चले जाते हैं; कोई भी सुख या दुःख स्थायी नहीं। इसलिये इन्हें 'तितिक्षस्व' — सहन करो। तितिक्षा का अर्थ है बिना विचलित हुए, बिना शिकायत के द्वन्द्वों को सहना। जीवन के उतार-चढ़ाव को ऋतुओं की तरह स्वाभाविक मानकर सहना ही आध्यात्मिक परिपक्वता है।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥
अन्वय
(हे) पुरुषर्षभ! समदुःखसुखं यं धीरं पुरुषम् एते न व्यथयन्ति, सः हि अमृतत्वाय कल्पते।
हिन्दी अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! सुख और दुःख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय-विषय व्याकुल नहीं करते, वही अमृतत्व (मोक्ष) के योग्य होता है।
भावार्थ
पिछले श्लोक में तितिक्षा का उपदेश था, अब उसका फल बताया जा रहा है। जो व्यक्ति सुख में फूलता नहीं और दुःख में टूटता नहीं — 'समदुःखसुख' — वही वास्तव में धीर है। ऐसा व्यक्ति 'अमृतत्व' अर्थात् मोक्ष या जन्म-मृत्यु से मुक्ति के योग्य बनता है। समता का अर्थ भावनाहीनता नहीं, बल्कि भावनाओं पर स्वामित्व है। जो बाहर की परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, वह अपने भीतर के अमर स्वरूप में स्थित रहता है। यही आध्यात्मिक जीवन का प्रथम सोपान है।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥
अन्वय
असतः भावः न विद्यते, सतः अभावः न विद्यते; तत्त्वदर्शिभिः तु अनयोः उभयोः अपि अन्तः दृष्टः।
हिन्दी अनुवाद
असत् (नाशवान्) वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् (अविनाशी) का अभाव नहीं है; तत्त्वदर्शी ज्ञानियों ने इन दोनों का ही निर्णय देखा है।
भावार्थ
यह गीता के सबसे गहन दार्शनिक श्लोकों में से एक है। 'असत्' वह है जो बदलता है और नष्ट होता है — जैसे शरीर, संसार की वस्तुएँ; इसकी कोई स्थायी सत्ता नहीं। 'सत्' वह है जो कभी नहीं बदलता — आत्मा, परमात्मा; इसका कभी अभाव नहीं होता। तत्त्वदर्शी अर्थात् सत्य को जानने वाले ऋषियों ने इन दोनों का अन्तर स्पष्ट रूप से देखा है। जो इस भेद को समझ लेता है, वह नश्वर वस्तुओं के जाने पर दुःखी नहीं होता और शाश्वत में आश्रय लेता है। यही विवेक है — नित्य और अनित्य का भेद जानना।
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥
अन्वय
येन इदं सर्वं ततम्, तत् तु अविनाशि विद्धि। अस्य अव्ययस्य विनाशं कर्तुं कश्चित् न अर्हति।
हिन्दी अनुवाद
जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उसे तुम अविनाशी जानो। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
भावार्थ
भगवान् 'सत्' का स्वरूप और स्पष्ट करते हैं — वह तत्त्व जो सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है, अविनाशी है। जैसे आकाश सब वस्तुओं में व्याप्त है और उन वस्तुओं के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता, वैसे ही चेतना सब शरीरों में व्याप्त है और शरीरों के नष्ट होने पर भी अक्षुण्ण रहती है। कोई भी शस्त्र, कोई भी शक्ति इस अव्यय तत्त्व का नाश नहीं कर सकती। यह ज्ञान अर्जुन के उस भय को दूर करता है कि वह किसी का 'वास्तविक' नाश करने जा रहा है।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥
अन्वय
नित्यस्य अनाशिनः अप्रमेयस्य शरीरिणः इमे देहाः अन्तवन्तः उक्ताः; तस्मात् (हे) भारत! युध्यस्व।
हिन्दी अनुवाद
इस नित्य, अविनाशी और अप्रमेय (जिसे प्रमाणों से जाना न जा सके) देहधारी आत्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं; इसलिये हे भारत! तुम युद्ध करो।
भावार्थ
भगवान् आत्मा और शरीर का भेद स्पष्ट करके निष्कर्ष देते हैं — 'युध्यस्व', युद्ध करो। आत्मा नित्य (सदा रहने वाला), अनाशी (कभी न मिटने वाला) और अप्रमेय (इन्द्रियों और तर्क की पकड़ से परे) है, जबकि शरीर अन्तवान् है — उसका अन्त निश्चित है। जब शरीर का नाश तो होना ही है और आत्मा का कभी होता नहीं, तब शोक किसलिये? यहाँ 'युद्ध करो' का अर्थ हिंसा को प्रोत्साहन नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य से न भागने का आदेश है। ज्ञान का उद्देश्य निष्क्रियता नहीं, सही कर्म करने की शक्ति देना है।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
अन्वय
यः एनं हन्तारं वेत्ति, यः च एनं हतं मन्यते, तौ उभौ न विजानीतः; अयं न हन्ति, न हन्यते।
हिन्दी अनुवाद
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा न किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है।
भावार्थ
अर्जुन सोच रहे थे कि वे भीष्म और द्रोण को मारेंगे। भगवान् कहते हैं कि यह सोच ही अज्ञान है। आत्मा न कर्ता के रूप में हत्या करता है, न कर्म के रूप में मारा जाता है; हत्या केवल शरीर की होती है। जो 'मैं मारूँगा' या 'वह मरेगा' सोचता है, वह आत्मा को शरीर समझने की भूल कर रहा है। यह श्लोक कठोपनिषद् के मन्त्र से मिलता-जुलता है। यह ज्ञान अपराध-भावना से मुक्त करता है, परन्तु यह अधर्म का बहाना नहीं — यह केवल धर्मयुक्त कर्तव्य-पालन में मोह को दूर करने के लिये है।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥
अन्वय
अयं कदाचित् न जायते, न वा म्रियते; अयं भूत्वा भूयः न भविता (इति) वा न। अयम् अजः नित्यः शाश्वतः पुराणः; शरीरे हन्यमाने (अपि) न हन्यते।
हिन्दी अनुवाद
यह आत्मा किसी भी काल में न जन्म लेता है और न मरता है; न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
भावार्थ
यह श्लोक आत्मा के स्वरूप का अत्यन्त सुन्दर वर्णन है। शरीर के छह विकार माने गये हैं — जन्म, अस्तित्व, वृद्धि, परिवर्तन, क्षय और नाश; आत्मा इनमें से किसी से प्रभावित नहीं। वह 'अज' है — कभी पैदा नहीं हुआ; 'नित्य' — सदा रहने वाला; 'शाश्वत' — कभी क्षीण न होने वाला; 'पुराण' — अति प्राचीन होकर भी सदा नया। शरीर पर चोट होती है, शरीर मरता है, पर आत्मा अछूता रहता है। जो अपने को इस आत्म-स्वरूप में पहचान लेता है, वह मृत्यु के भय से सदा के लिये मुक्त हो जाता है।
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्। कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! यः एनम् अविनाशिनं नित्यम् अजम् अव्ययं वेद, सः पुरुषः कथं कं घातयति, कं हन्ति?
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
भावार्थ
भगवान् प्रश्न के रूप में निष्कर्ष देते हैं — जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानता है, उसके लिये 'मारना' और 'मरवाना' दोनों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। ज्ञानी व्यक्ति स्वयं को केवल निमित्त समझता है और कर्तापन के अहंकार से मुक्त रहता है। अर्जुन के मन में जो अपराध-बोध था कि 'मैं गुरुओं को मारूँगा', उसका यहाँ समाधान है। जब कर्ता-भाव समाप्त हो जाता है, तब कर्म बन्धन नहीं बनता। यही आगे के अध्यायों में कर्मयोग का आधार बनेगा।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥
अन्वय
यथा नरः जीर्णानि वासांसि विहाय अपराणि नवानि गृह्णाति, तथा देही जीर्णानि शरीराणि विहाय अन्यानि नवानि संयाति।
हिन्दी अनुवाद
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है।
भावार्थ
यह गीता का सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय दृष्टान्त है। पुराने कपड़े फट जाने पर हम उन्हें बदल देते हैं और इसमें कोई दुःख नहीं मानते, बल्कि नये वस्त्र पाकर प्रसन्न होते हैं। आत्मा के लिये शरीर भी वस्त्र के समान है — जब वह जीर्ण हो जाता है, आत्मा उसे छोड़कर नया शरीर धारण कर लेता है। इस दृष्टि से मृत्यु दुःख का नहीं, केवल परिवर्तन का नाम है। यह उपमा पुनर्जन्म के सिद्धान्त को सरलता से समझाती है और मृत्यु के प्रति हमारे दृष्टिकोण को बदल देती है।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥
अन्वय
एनं शस्त्राणि न छिन्दन्ति, एनं पावकः न दहति, एनम् आपः च न क्लेदयन्ति, मारुतः न शोषयति।
हिन्दी अनुवाद
इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
भावार्थ
भगवान् पाँच महाभूतों में से चार — पृथ्वी (शस्त्र), अग्नि, जल और वायु — का उल्लेख करके बताते हैं कि भौतिक जगत् की कोई भी शक्ति आत्मा को प्रभावित नहीं कर सकती। शस्त्र केवल भौतिक वस्तु को काट सकता है, अग्नि भौतिक को जला सकती है — आत्मा तो अभौतिक, चेतन तत्त्व है। जैसे सूर्य का प्रकाश गंदे पानी पर पड़ने पर भी गंदा नहीं होता, वैसे ही आत्मा शरीर में रहकर भी उसके विकारों से अछूता रहता है। यह श्लोक साधक को निर्भयता प्रदान करता है।
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥
अन्वय
अयम् अच्छेद्यः, अयम् अदाह्यः, अक्लेद्यः अशोष्यः एव च; अयं नित्यः सर्वगतः स्थाणुः अचलः सनातनः।
हिन्दी अनुवाद
यह आत्मा काटा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, गीला नहीं किया जा सकता और सुखाया भी नहीं जा सकता; यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
भावार्थ
पिछले श्लोक की बात को भगवान् और दृढ़ करते हैं, और आत्मा के और गुण बताते हैं। 'सर्वगत' — सब जगह व्याप्त; 'स्थाणु' — स्तम्भ की तरह स्थिर; 'अचल' — कभी न हिलने वाला; 'सनातन' — सदा से चला आ रहा। शरीर एक स्थान से दूसरे स्थान जाता है, बदलता है, पर आत्मा का स्वभाव अपरिवर्तनशील है। बार-बार एक ही सत्य को अलग-अलग शब्दों में कहना गुरु की करुणा है, ताकि शिष्य के मन में वह गहराई से बैठ जाये।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥
अन्वय
अयम् अव्यक्तः, अयम् अचिन्त्यः, अयम् अविकार्यः उच्यते; तस्मात् एनम् एवं विदित्वा (त्वम्) अनुशोचितुं न अर्हसि।
हिन्दी अनुवाद
यह आत्मा अव्यक्त (इन्द्रियों से न दिखने वाला), अचिन्त्य (मन से न सोचा जा सकने वाला) और विकाररहित कहा जाता है; इसलिये इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।
भावार्थ
आत्मा 'अव्यक्त' है — आँखों से दिखाई नहीं देता; 'अचिन्त्य' है — मन और बुद्धि की सीमा से परे है; 'अविकार्य' है — इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। जो वस्तु इन्द्रियों और मन से परे है, उसका अनुभव केवल आत्मज्ञान से होता है। भगवान् अर्जुन से कहते हैं — जब तुम आत्मा को ऐसा जान गये, तो अब शोक का कोई कारण नहीं बचा। ज्ञान का फल शोक-निवृत्ति है; यदि ज्ञान के बाद भी शोक बना रहे, तो वह ज्ञान अभी केवल शब्दों तक सीमित है।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥
अन्वय
अथ च (त्वम्) एनं नित्यजातं नित्यं वा मृतं मन्यसे, तथा अपि (हे) महाबाहो! त्वम् एवं शोचितुं न अर्हसि।
हिन्दी अनुवाद
और यदि तुम इस आत्मा को सदा जन्मने वाला और सदा मरने वाला ही मानो, तो भी हे महाबाहो! तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये।
भावार्थ
अब भगवान् एक दूसरे दृष्टिकोण से तर्क देते हैं। मान लो, कोई आत्मा की नित्यता को नहीं मानता और समझता है कि जीव शरीर के साथ जन्मता और मरता है — तब भी शोक का कोई कारण नहीं है। यह तर्क उन लोगों के लिये है जो आध्यात्मिक सिद्धान्तों में विश्वास नहीं रखते। भगवान् दिखाना चाहते हैं कि चाहे आप किसी भी दर्शन को मानें, अनिवार्य घटना पर शोक करना व्यर्थ है। यह गुरु की उदारता है कि वह शिष्य की हर सम्भावित शंका का समाधान करता है।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥
अन्वय
जातस्य हि मृत्युः ध्रुवः, मृतस्य च जन्म ध्रुवम्; तस्मात् अपरिहार्ये अर्थे त्वं शोचितुं न अर्हसि।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है; इसलिये जिसका कोई उपाय नहीं, उस विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।
भावार्थ
यह जीवन का अटल नियम है — जो जन्मा है, वह मरेगा; और जो मरा है, वह फिर जन्म लेगा। यह चक्र प्रकृति का स्वभाव है। जिस बात को टाला नहीं जा सकता, उस पर शोक करना केवल अपनी शक्ति और समय को नष्ट करना है। बुद्धिमानी यह है कि अनिवार्य को स्वीकार करें और अपने वर्तमान कर्तव्य पर ध्यान दें। यह श्लोक जीवन में आने वाले हर वियोग और हानि के समय सान्त्वना देता है — जो बदला नहीं जा सकता, उसे स्वीकार करना ही शान्ति का मार्ग है।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥
अन्वय
(हे) भारत! भूतानि अव्यक्तादीनि, व्यक्तमध्यानि, अव्यक्तनिधनानि एव; तत्र का परिदेवना?
हिन्दी अनुवाद
हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे, मृत्यु के बाद भी अप्रकट हो जाते हैं, केवल बीच में ही प्रकट दिखाई देते हैं; फिर इस विषय में शोक कैसा?
भावार्थ
भगवान् एक सुन्दर दार्शनिक दृष्टि देते हैं। हर प्राणी जन्म से पहले हमारे लिये अदृश्य (अव्यक्त) था, कुछ समय के लिये दिखाई देता है (व्यक्त), और मृत्यु के बाद फिर अदृश्य हो जाता है। जैसे स्वप्न में दिखने वाले लोग स्वप्न से पहले और बाद में नहीं होते, या जैसे लहर समुद्र से उठकर फिर समुद्र में मिल जाती है। जो केवल बीच की अवस्था में दिखाई देता है, उसके दिखना बन्द होने पर इतना विलाप क्यों? यह दृष्टि जीवन को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना सिखाती है।
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः। आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥
अन्वय
कश्चित् एनम् आश्चर्यवत् पश्यति, तथा एव च अन्यः आश्चर्यवत् वदति, अन्यः च एनम् आश्चर्यवत् शृणोति; श्रुत्वा अपि एनं कश्चित् च एव न वेद।
हिन्दी अनुवाद
कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई दूसरा इसका आश्चर्य की तरह वर्णन करता है, और कोई अन्य इसे आश्चर्य की तरह सुनता है; परन्तु सुनकर भी कोई इसे भली-भाँति नहीं जान पाता।
भावार्थ
आत्मा का स्वरूप इतना अद्भुत है कि जो इसका अनुभव करते हैं, वे विस्मय से भर जाते हैं। कोई महात्मा इसे साक्षात् देखता है — यह दुर्लभ है; कोई ज्ञानी इसका वर्णन करता है — यह भी अद्भुत है; कोई जिज्ञासु इसे सुनता है — यह भी सौभाग्य है। परन्तु केवल सुनने से ही इसका ज्ञान नहीं हो जाता; इसके लिये साधना, मनन और अनुभव चाहिये। यह श्लोक बताता है कि आत्मज्ञान बौद्धिक जानकारी नहीं, बल्कि जीवन्त अनुभूति है।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥
अन्वय
(हे) भारत! अयं देही सर्वस्य देहे नित्यम् अवध्यः; तस्मात् त्वं सर्वाणि भूतानि शोचितुं न अर्हसि।
हिन्दी अनुवाद
हे भारत! सबके शरीर में स्थित यह आत्मा सदा अवध्य है; इसलिये तुम्हें किसी भी प्राणी के लिये शोक नहीं करना चाहिये।
भावार्थ
आत्मा-विषयक उपदेश का यह सारांश है। हर प्राणी के शरीर में वही अविनाशी आत्मा है, जिसे कोई मार नहीं सकता। इसलिये भीष्म हों या द्रोण, या कोई भी — किसी के लिये शोक का कारण नहीं है। यहाँ 'सर्वाणि भूतानि' कहकर भगवान् इस ज्ञान को सार्वभौमिक बना देते हैं — यह केवल अर्जुन के सम्बन्धियों के लिये नहीं, सब प्राणियों के लिये सत्य है। इस प्रकार श्लोक ११ से ३० तक आत्मा के स्वरूप का ज्ञान (सांख्य) दिया गया; आगे भगवान् स्वधर्म की दृष्टि से समझाते हैं।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥
अन्वय
स्वधर्मम् अपि च अवेक्ष्य (त्वं) विकम्पितुं न अर्हसि; हि क्षत्रियस्य धर्म्यात् युद्धात् अन्यत् श्रेयः न विद्यते।
हिन्दी अनुवाद
अपने धर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिये, क्योंकि क्षत्रिय के लिये धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी कोई दूसरा कर्तव्य नहीं है।
भावार्थ
आत्मज्ञान के बाद भगवान् अब व्यावहारिक धर्म की दृष्टि से समझाते हैं। हर व्यक्ति का अपना 'स्वधर्म' होता है — उसके स्वभाव, स्थिति और उत्तरदायित्व के अनुसार कर्तव्य। अर्जुन क्षत्रिय हैं, और क्षत्रिय का धर्म अन्याय से समाज की रक्षा करना है। यह युद्ध 'धर्म्य' है — न्याय के लिये है, लोभ या प्रतिशोध के लिये नहीं। जब कर्तव्य धर्म के अनुकूल हो, तब उससे पीछे हटना विचलन है। आधुनिक जीवन में भी हर व्यक्ति को अपने पद, भूमिका और उत्तरदायित्व के अनुसार कर्तव्य निष्ठा से निभाना चाहिये।
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! यदृच्छया च उपपन्नम् अपावृतं स्वर्गद्वारम् ईदृशं युद्धं सुखिनः क्षत्रियाः लभन्ते।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुआ और खुले हुए स्वर्ग के द्वार के समान ऐसा युद्ध भाग्यशाली क्षत्रियों को ही मिलता है।
भावार्थ
भगवान् कहते हैं कि यह युद्ध अर्जुन ने स्वयं नहीं माँगा; यह 'यदृच्छया' — परिस्थितियों से स्वतः प्राप्त हुआ है। पाण्डवों ने शान्ति के सब प्रयास किये, श्रीकृष्ण स्वयं दूत बनकर गये, फिर भी युद्ध टल नहीं सका। ऐसे धर्मयुद्ध को स्वर्ग का खुला द्वार कहा गया है, क्योंकि इसमें वीरगति प्राप्त करने वाला स्वर्ग को पाता है। 'सुखिनः' — सौभाग्यशाली योद्धाओं को ही ऐसा अवसर मिलता है। जीवन में जो कर्तव्य स्वाभाविक रूप से सामने आते हैं, उन्हें भगवान् का दिया अवसर मानकर स्वीकार करना चाहिये।
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि। ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥
अन्वय
अथ चेत् त्वम् इमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि, ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि।
हिन्दी अनुवाद
किन्तु यदि तुम इस धर्मयुक्त संग्राम को नहीं करोगे, तो अपने धर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगे।
भावार्थ
अर्जुन सोचते थे कि युद्ध करने से पाप लगेगा; भगवान् कहते हैं कि युद्ध न करने से पाप लगेगा। यह दृष्टिकोण का पूर्ण परिवर्तन है। पाप वह नहीं जो बाहर से हिंसा लगे, बल्कि वह है जो अपने कर्तव्य का त्याग करे। अधर्म को रोकने की शक्ति होते हुए भी उसे न रोकना अधर्म में भागीदारी है। साथ ही अर्जुन की वह कीर्ति भी नष्ट होगी जो उन्होंने वर्षों की तपस्या और वीरता से अर्जित की थी। कर्तव्य से भागना, चाहे कितने ही सुन्दर तर्क के साथ हो, अन्ततः पतन की ओर ले जाता है।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्। संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥
अन्वय
भूतानि च अपि ते अव्ययाम् अकीर्तिं कथयिष्यन्ति; सम्भावितस्य च अकीर्तिः मरणात् अतिरिच्यते।
हिन्दी अनुवाद
और सब लोग बहुत समय तक तुम्हारी अपकीर्ति का भी कथन करेंगे; और सम्मानित पुरुष के लिये अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर है।
भावार्थ
भगवान् अब लोक-मर्यादा की दृष्टि से समझाते हैं। अर्जुन एक प्रतिष्ठित वीर हैं, उनकी ख्याति सर्वत्र है। यदि वे युद्ध से भागेंगे, तो लोग युगों तक उनकी निन्दा करेंगे — 'अव्ययाम् अकीर्तिम्', अमिट अपयश। सम्मानित व्यक्ति के लिये अपमान मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक होता है। यह तर्क आध्यात्मिक नहीं, लौकिक है; पर भगवान् जानते हैं कि हर स्तर पर समझाना आवश्यक है। जो व्यक्ति ऊँचे स्थान पर होता है, उसके आचरण का प्रभाव समाज पर पड़ता है; इसलिये उसका उत्तरदायित्व भी अधिक होता है।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः। येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥
अन्वय
महारथाः त्वां भयात् रणात् उपरतं मंस्यन्ते; येषां च त्वं बहुमतः भूत्वा लाघवं यास्यसि।
हिन्दी अनुवाद
महारथी योद्धा तुम्हें भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे; और जिनकी दृष्टि में तुम बहुत सम्मानित रहे हो, उन्हीं के सामने तुम तुच्छता को प्राप्त हो जाओगे।
भावार्थ
अर्जुन करुणा के कारण युद्ध छोड़ना चाहते हैं, पर संसार इसे करुणा नहीं, कायरता समझेगा। भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसे महारथी, जो अर्जुन की वीरता का लोहा मानते हैं, सोचेंगे कि अर्जुन डरकर भाग गये। लोग हमारे भीतर के भाव को नहीं, हमारे बाहरी आचरण को देखते हैं। भगवान् यहाँ अर्जुन को यह दिखाते हैं कि उनका निर्णय न केवल उन्हें, बल्कि उनकी छवि और प्रेरणा-शक्ति को भी नष्ट कर देगा। जो दूसरों के लिये आदर्श हो, उसे अपने आचरण में विशेष सावधान रहना चाहिये।
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः। निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३६ ॥
अन्वय
तव अहिताः च तव सामर्थ्यं निन्दन्तः बहून् अवाच्यवादान् वदिष्यन्ति; ततः दुःखतरं नु किम्?
हिन्दी अनुवाद
तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए बहुत-सी न कहने योग्य बातें कहेंगे; उससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?
भावार्थ
शत्रु तो अवसर की ताक में रहते हैं। यदि अर्जुन युद्ध छोड़ेंगे, तो दुर्योधन और उसके साथी उनकी वीरता का उपहास करेंगे, ऐसे शब्द कहेंगे जो सुनने में भी असहनीय हों। जो अर्जुन अपने पराक्रम के लिये प्रसिद्ध हैं, उनके लिये अपने सामर्थ्य की निन्दा सुनना सबसे बड़ा दुःख होगा। भगवान् मनुष्य-स्वभाव के इस पक्ष को भी ध्यान में रखते हैं — आत्मसम्मान की रक्षा भी एक उचित प्रेरणा है। कर्तव्य से हटने का परिणाम केवल आध्यात्मिक नहीं, सामाजिक और भावनात्मक भी होता है।
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥
अन्वय
हतः वा स्वर्गं प्राप्स्यसि, जित्वा वा महीं भोक्ष्यसे; तस्मात् (हे) कौन्तेय! युद्धाय कृतनिश्चयः उत्तिष्ठ।
हिन्दी अनुवाद
यदि तुम युद्ध में मारे गये तो स्वर्ग प्राप्त करोगे, और यदि जीत गये तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे; इसलिये हे कुन्तीपुत्र! युद्ध के लिये निश्चय करके खड़े हो जाओ।
भावार्थ
भगवान् अर्जुन को दिखाते हैं कि धर्मयुद्ध में दोनों ही परिणाम कल्याणकारी हैं — मृत्यु हुई तो स्वर्ग, विजय हुई तो राज्य। हानि केवल युद्ध न करने में है। 'कृतनिश्चयः' — दृढ़ निश्चय के साथ उठो; दुविधा में किया गया कार्य कभी सफल नहीं होता। यह श्लोक जीवन के हर संघर्ष के लिये प्रेरणा है: यदि उद्देश्य धर्मयुक्त है, तो परिणाम चाहे जो हो, प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाता। श्लोक ३१ से ३७ तक भगवान् ने स्वधर्म, कीर्ति और लाभ की लौकिक दृष्टि से समझाया; आगे वे इससे भी ऊँचा निष्काम भाव सिखायेंगे।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥
अन्वय
सुखदुःखे लाभालाभौ जयाजयौ (च) समे कृत्वा ततः युद्धाय युज्यस्व; एवं पापं न अवाप्स्यसि।
हिन्दी अनुवाद
सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर फिर युद्ध के लिये तैयार हो जाओ; इस प्रकार युद्ध करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं होगे।
भावार्थ
यह श्लोक गीता के उपदेश का एक महत्वपूर्ण मोड़ है। पिछले श्लोक में स्वर्ग और राज्य का प्रलोभन था, अब भगवान् उससे ऊपर उठने को कहते हैं — परिणाम की चिन्ता छोड़कर, समभाव से कर्तव्य करो। सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय — ये सब द्वन्द्व हैं; इनमें समान रहना ही 'समत्व' है। जब कर्म इस समभाव से किया जाता है, तो वह पाप-पुण्य के बन्धन से मुक्त रहता है, क्योंकि उसमें स्वार्थ नहीं होता। यही निष्काम कर्मयोग का बीज है, जो अगले श्लोकों में विस्तार से खिलेगा।
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! एषा बुद्धिः ते सांख्ये अभिहिता; योगे तु इमां शृणु, यया बुद्ध्या युक्तः (त्वं) कर्मबन्धं प्रहास्यसि।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! यह बुद्धि तुम्हें सांख्य (ज्ञान) के विषय में कही गई; अब इसी को कर्मयोग के विषय में सुनो, जिस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मों के बन्धन को भली-भाँति त्याग दोगे।
भावार्थ
भगवान् अब तक की बात का सारांश देते हैं और नये विषय की ओर बढ़ते हैं। 'सांख्य' का अर्थ यहाँ आत्मा और अनात्मा के विवेक का ज्ञान है, जो श्लोक ११ से ३० तक बताया गया। अब वे 'योग' अर्थात् कर्मयोग समझायेंगे — कर्म करने की वह कला जिससे कर्म बाँधते नहीं। साधारणतः हर कर्म अपना फल लाता है और जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र में बाँधता है। परन्तु यदि कर्म सही बुद्धि से किया जाये, तो वही कर्म मुक्ति का साधन बन जाता है। ज्ञान और कर्म — दोनों एक ही लक्ष्य के दो मार्ग हैं।
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥
अन्वय
इह अभिक्रमनाशः न अस्ति, प्रत्यवायः न विद्यते; अस्य धर्मस्य स्वल्पम् अपि महतः भयात् त्रायते।
हिन्दी अनुवाद
इस कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं होता और उलटा फल (दोष) भी नहीं होता; इस धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान् भय से रक्षा करता है।
भावार्थ
भगवान् कर्मयोग की विशेषता बताते हैं। सकाम कर्म में यदि अनुष्ठान अधूरा रह जाये, तो उसका फल नहीं मिलता, और यदि विधि में त्रुटि हो जाये तो उलटा फल भी मिल सकता है। परन्तु निष्काम कर्मयोग में ऐसा नहीं है — जितना भी प्रयास किया जाये, वह व्यर्थ नहीं जाता और कभी हानि नहीं करता। इसका थोड़ा-सा अभ्यास भी संसार-भय से रक्षा करता है। यह आशा का सन्देश है: आध्यात्मिक मार्ग पर उठाया गया हर छोटा कदम भी स्थायी लाभ देता है।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥
अन्वय
(हे) कुरुनन्दन! इह व्यवसायात्मिका बुद्धिः एका (भवति); अव्यवसायिनां बुद्धयः हि बहुशाखाः अनन्ताः च (भवन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
हे कुरुनन्दन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; परन्तु अस्थिर विचार वाले सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं।
भावार्थ
कर्मयोगी की बुद्धि 'व्यवसायात्मिका' होती है — एक लक्ष्य पर दृढ़ और निश्चित। उसका लक्ष्य एक है — परमात्मा की प्राप्ति या कर्तव्य-पालन। इसके विपरीत, जो लोग अनेक इच्छाओं के पीछे भागते हैं, उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं में बँट जाती है; हर इच्छा एक नई दिशा, एक नई चिन्ता उत्पन्न करती है। एकाग्र बुद्धि शक्तिशाली होती है, बिखरी हुई बुद्धि दुर्बल। जीवन में सफलता और शान्ति, दोनों के लिये लक्ष्य की स्पष्टता और मन की एकाग्रता आवश्यक है।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! वेदवादरताः, 'न अन्यत् अस्ति' इति वादिनः, अविपश्चितः यां इमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्ति —
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! जो वेदों के कर्मकाण्ड-वाक्यों में ही रमे रहते हैं और 'इसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं' — ऐसा कहने वाले अविवेकी लोग हैं, वे इस प्रकार की दिखावटी, शोभायुक्त वाणी कहा करते हैं —
भावार्थ
भगवान् उन लोगों की आलोचना करते हैं जो वेदों के केवल कर्मकाण्ड भाग को ही सब कुछ मानते हैं। वे स्वर्ग और भोगों का आकर्षक वर्णन करने वाले 'पुष्पित' वचनों में उलझे रहते हैं — फूल की तरह सुन्दर दिखने वाले, पर फल-रहित। 'न अन्यत् अस्ति' — उनके लिये स्वर्ग-सुख ही परम लक्ष्य है, मोक्ष का विचार ही नहीं। यहाँ वेदों की निन्दा नहीं, बल्कि उनके अधूरे और स्वार्थपूर्ण उपयोग की आलोचना है। वेदों का अन्तिम लक्ष्य आत्मज्ञान है, केवल भोग-प्राप्ति नहीं।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥
अन्वय
कामात्मानः स्वर्गपराः (ते) जन्मकर्मफलप्रदां भोगैश्वर्यगतिं प्रति क्रियाविशेषबहुलां (वाचं प्रवदन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
वे कामनाओं से भरे हुए, स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानने वाले, भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये अनेक प्रकार की क्रियाओं का वर्णन करने वाली और जन्म रूप कर्मफल देने वाली वाणी कहते हैं।
भावार्थ
ऐसे लोग 'कामात्मा' हैं — जिनका मन कामनाओं से भरा है, और 'स्वर्गपर' — जिनके लिये स्वर्ग ही अन्तिम लक्ष्य है। वे अनेक प्रकार के यज्ञों और अनुष्ठानों का विधान करते हैं, जिनका उद्देश्य भोग और ऐश्वर्य पाना है। परन्तु ऐसे कर्मों का फल 'जन्मकर्मफलप्रद' है — वह फिर से जन्म दिलाने वाला है, मुक्ति देने वाला नहीं। स्वर्ग भी अस्थायी है; पुण्य क्षीण होने पर फिर मृत्युलोक में आना पड़ता है। सकाम कर्म का यह चक्र अनन्त है, जब तक कामनाएँ बनी रहती हैं।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥
अन्वय
तया अपहृतचेतसां भोगैश्वर्यप्रसक्तानां व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।
हिन्दी अनुवाद
उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती।
भावार्थ
जिनका मन भोग और ऐश्वर्य की कामना में डूबा है, उनकी बुद्धि कभी स्थिर नहीं हो सकती। 'समाधि' यहाँ परमात्मा में चित्त की एकाग्रता के अर्थ में है। आकर्षक वचनों से जिनका चित्त 'अपहृत' — चुरा लिया गया — है, वे बाहर की चमक-दमक में खोये रहते हैं और भीतर की ओर नहीं देख पाते। यह श्लोक बताता है कि आध्यात्मिक प्रगति के लिये भोग-लालसा पर नियन्त्रण आवश्यक है। जहाँ इच्छाएँ अनियन्त्रित हैं, वहाँ ध्यान और एकाग्रता सम्भव नहीं।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥
अन्वय
(हे) अर्जुन! वेदाः त्रैगुण्यविषयाः (सन्ति); (त्वं) निस्त्रैगुण्यः निर्द्वन्द्वः नित्यसत्त्वस्थः निर्योगक्षेमः आत्मवान् भव।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! वेद (के कर्मकाण्ड भाग) तीनों गुणों के कार्यों का वर्णन करने वाले हैं; तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो, द्वन्द्वों से रहित हो, नित्य सत्त्व में स्थित रहो, योग-क्षेम की चिन्ता छोड़ दो और आत्मपरायण बनो।
भावार्थ
प्रकृति के तीन गुण हैं — सत्त्व (ज्ञान और प्रकाश), रज (क्रिया और आसक्ति), तम (जड़ता और अज्ञान)। वेदों का कर्मकाण्ड इन्हीं गुणों के क्षेत्र में फल देता है। भगवान् अर्जुन को इन गुणों से ऊपर उठने का उपदेश देते हैं। 'निर्द्वन्द्व' — सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से मुक्त; 'नित्यसत्त्वस्थ' — सदा शुद्ध भाव में स्थित; 'निर्योगक्षेम' — अप्राप्त की प्राप्ति (योग) और प्राप्त की रक्षा (क्षेम) की चिन्ता से मुक्त; 'आत्मवान्' — अपने आत्म-स्वरूप में स्थित। यह आध्यात्मिक पूर्णता का एक संक्षिप्त सूत्र है।
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥
अन्वय
सर्वतः सम्प्लुतोदके (सति) उदपाने यावान् अर्थः, विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषु तावान् (अर्थः भवति)।
हिन्दी अनुवाद
सब ओर से परिपूर्ण विशाल जलाशय प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय से मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्त्व से जानने वाले ज्ञानी का सब वेदों से उतना ही प्रयोजन रह जाता है।
भावार्थ
भगवान् एक सुन्दर उपमा देते हैं। जब चारों ओर बाढ़ का अपार जल हो, तब छोटे कुएँ या तालाब की क्या आवश्यकता? छोटे जलाशय से जो काम होता है, वह बड़े जलाशय से स्वतः हो जाता है। इसी प्रकार जिसने परमात्मा को जान लिया, उसके लिये वेदों के विभिन्न कर्मकाण्डों से मिलने वाले सारे फल उस परम आनन्द में समा जाते हैं। यहाँ वेदों का अनादर नहीं, बल्कि यह बताया गया है कि वेदों का लक्ष्य ही ब्रह्मज्ञान है; लक्ष्य मिल जाने पर साधन का महत्व स्वतः कम हो जाता है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥
अन्वय
ते कर्मणि एव अधिकारः, फलेषु कदाचन मा; (त्वं) कर्मफलहेतुः मा भूः, ते अकर्मणि सङ्गः मा अस्तु।
हिन्दी अनुवाद
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिये तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
भावार्थ
यह गीता का सबसे प्रसिद्ध और सर्वाधिक उद्धृत श्लोक है, जिसमें निष्काम कर्मयोग के चार सूत्र हैं। (१) तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है — प्रयत्न तुम्हारे हाथ में है। (२) फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं — परिणाम अनेक कारणों पर निर्भर है। (३) फल की इच्छा को कर्म का प्रेरक मत बनाओ — वरना असफलता में निराशा और सफलता में अहंकार होगा। (४) फल का अधिकार न होने से कर्म छोड़ने की ओर भी मत झुको — निष्क्रियता भी बन्धन है। इस भाव से किया गया कर्म मन को शान्त रखता है, कार्य-कुशलता बढ़ाता है और आत्मा को बन्धन से मुक्त करता है।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥
अन्वय
(हे) धनञ्जय! सङ्गं त्यक्त्वा सिद्ध्यसिद्ध्योः समः भूत्वा योगस्थः (सन्) कर्माणि कुरु; समत्वं योगः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर, सफलता और असफलता में समान भाव रखकर, योग में स्थित होकर कर्म करो; यह समत्व ही योग कहलाता है।
भावार्थ
भगवान् 'योग' की पहली परिभाषा देते हैं — 'समत्वं योग उच्यते', समभाव ही योग है। योग का अर्थ केवल आसन-प्राणायाम नहीं, बल्कि मन की वह अवस्था है जिसमें सफलता और असफलता दोनों में व्यक्ति समान रहता है। 'योगस्थ' होकर कर्म करना — अर्थात् परमात्मा से जुड़े रहकर, आसक्ति छोड़कर कार्य करना। जब मन परिणाम के भय या लोभ से मुक्त होता है, तब वह पूरी एकाग्रता से कर्म कर पाता है। यह शिक्षा जीवन के हर क्षेत्र — अध्ययन, व्यवसाय, सेवा — में शान्ति और उत्कृष्टता लाती है।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय। बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥
अन्वय
(हे) धनञ्जय! बुद्धियोगात् कर्म दूरेण हि अवरम्; बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ; फलहेतवः कृपणाः (भवन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
हे धनञ्जय! बुद्धियोग (समबुद्धि) की तुलना में सकाम कर्म अत्यन्त निम्न श्रेणी का है; इसलिये तुम समबुद्धि की ही शरण लो, क्योंकि फल की इच्छा से कर्म करने वाले दीन (कृपण) हैं।
भावार्थ
भगवान् सकाम कर्म और बुद्धियोग की तुलना करते हैं। फल की इच्छा से किया गया कर्म बुद्धियोग — समबुद्धि से किये गये कर्म — से बहुत नीचे है। जो केवल फल के लिये काम करते हैं, उन्हें 'कृपण' कहा गया है — अर्थात् दीन या संकीर्ण हृदय वाले, जो अपनी महान् क्षमता को छोटे लाभों के लिये बेच देते हैं। 'बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ' — समबुद्धि की शरण लो। यह शरणागति ही वास्तविक सुरक्षा है, क्योंकि यह मन को परिणाम की अस्थिरता से मुक्त कर देती है।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥
अन्वय
बुद्धियुक्तः इह उभे सुकृतदुष्कृते जहाति; तस्मात् योगाय युज्यस्व; योगः कर्मसु कौशलम्।
हिन्दी अनुवाद
समबुद्धि से युक्त पुरुष इसी लोक में पुण्य और पाप — दोनों को त्याग देता है; इसलिये तुम योग में लग जाओ, क्योंकि कर्मों में कुशलता ही योग है।
भावार्थ
भगवान् योग की दूसरी प्रसिद्ध परिभाषा देते हैं — 'योगः कर्मसु कौशलम्', कर्मों में कुशलता ही योग है। यहाँ कुशलता का अर्थ केवल कार्य-दक्षता नहीं, बल्कि कर्म करने की वह कला है जिससे कर्म बन्धन न बने। समबुद्धि वाला व्यक्ति पुण्य और पाप दोनों के बन्धन से मुक्त हो जाता है, क्योंकि उसके कर्म में व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होता। पुण्य भी सोने की बेड़ी है जो जन्म-मरण में बाँधती है; निष्काम कर्मयोगी इससे भी ऊपर उठ जाता है। कुशलता यह है कि कर्म पूरा करें, पर उसमें फँसें नहीं।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥
अन्वय
बुद्धियुक्ताः मनीषिणः हि कर्मजं फलं त्यक्त्वा जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः (सन्तः) अनामयं पदं गच्छन्ति।
हिन्दी अनुवाद
समबुद्धि से युक्त ज्ञानी पुरुष कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्म रूपी बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और निर्विकार परम पद को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
यह कर्मयोग का अन्तिम फल है — 'अनामय पद', वह परम स्थिति जहाँ कोई दुःख, रोग या विकार नहीं। मनीषी अर्थात् विवेकी पुरुष कर्म तो करते हैं, पर उसके फल में आसक्त नहीं होते। फल की आसक्ति ही बार-बार जन्म लेने का कारण है; जब यह आसक्ति छूट जाती है, तो जन्म-मृत्यु का बन्धन भी छूट जाता है। इस प्रकार कर्मयोग केवल अच्छा जीवन जीने की विधि नहीं, बल्कि मोक्ष का साक्षात् मार्ग है। संसार में रहकर, कर्तव्य करते हुए भी मुक्ति सम्भव है — यही गीता की विशिष्टता है।
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥
अन्वय
यदा ते बुद्धिः मोहकलिलं व्यतितरिष्यति, तदा (त्वं) श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च निर्वेदं गन्तासि।
हिन्दी अनुवाद
जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को भली-भाँति पार कर जायेगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाओगे।
भावार्थ
मोह को 'कलिल' — दलदल — कहा गया है, जिसमें फँसकर व्यक्ति आगे नहीं बढ़ पाता। जब बुद्धि इस दलदल से बाहर निकल आती है, तब व्यक्ति को उन सभी सुखों से वैराग्य हो जाता है जिनके बारे में उसने सुना है (श्रुत) या सुनेगा (श्रोतव्य) — चाहे वे इस लोक के हों या स्वर्ग के। यह वैराग्य दबाव से नहीं, समझ से आता है; जैसे बड़ा होने पर बच्चे के खिलौनों का आकर्षण स्वतः छूट जाता है। सच्चा वैराग्य त्याग नहीं, बल्कि ऊँचे आनन्द को पाकर नीचे के सुखों का स्वाभाविक रूप से फीका पड़ जाना है।
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥
अन्वय
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते बुद्धिः यदा समाधौ निश्चला अचला स्थास्यति, तदा (त्वं) योगम् अवाप्स्यसि।
हिन्दी अनुवाद
अनेक प्रकार के वचनों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर हो जायेगी, तब तुम योग को प्राप्त हो जाओगे।
भावार्थ
अर्जुन की बुद्धि अनेक प्रकार के धर्म-शास्त्रीय विचारों को सुनकर उलझ गई थी — कुल-धर्म, क्षत्रिय-धर्म, अहिंसा, गुरु-भक्ति आदि। भगवान् कहते हैं कि जब यह बुद्धि सब विरोधी विचारों से ऊपर उठकर परमात्मा में स्थिर हो जायेगी, तभी योग की प्राप्ति होगी। 'निश्चला' — जो हिले नहीं, 'अचला' — जो डिगे नहीं। आज के युग में भी हम अनेक प्रकार की सूचनाओं और मतों से घिरे रहते हैं; ऐसे में एक स्थिर आन्तरिक केन्द्र होना अत्यन्त आवश्यक है। यही केन्द्र योग है।
२.५४ अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) केशव! समाधिस्थस्य स्थितप्रज्ञस्य का भाषा? स्थितधीः किं प्रभाषेत, किम् आसीत, किं व्रजेत?
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे केशव! समाधि में स्थित स्थिरबुद्धि पुरुष के क्या लक्षण हैं? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
भावार्थ
भगवान् के उपदेश से अर्जुन के मन में एक स्वाभाविक जिज्ञासा जागती है — जिस स्थिर बुद्धि की बात की जा रही है, वह व्यक्ति वास्तव में कैसा होता है? 'स्थितप्रज्ञ' — जिसकी प्रज्ञा (बुद्धि) स्थिर हो गई हो। अर्जुन चार प्रश्न पूछते हैं — उसकी पहचान क्या है, वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है। यह व्यावहारिक जिज्ञासा है; अर्जुन जानना चाहते हैं कि यह आदर्श जीवन में कैसे दिखता है। इसके उत्तर में भगवान् जो श्लोक (५५-७२) कहते हैं, वे 'स्थितप्रज्ञ के लक्षण' के नाम से प्रसिद्ध हैं और साधकों के लिये दैनिक पाठ के योग्य हैं।
२.५५ श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (हे) पार्थ! यदा (मनुष्यः) मनोगतान् सर्वान् कामान् प्रजहाति, आत्मना आत्मनि एव तुष्टः (भवति), तदा स्थितप्रज्ञः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सभी कामनाओं को भली-भाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
भावार्थ
स्थितप्रज्ञ का पहला और मूल लक्षण है — कामनाओं का पूर्ण त्याग और आत्म-सन्तोष। साधारण मनुष्य का सुख बाहरी वस्तुओं पर निर्भर होता है; जब वस्तु मिलती है तो सुखी, नहीं मिलती तो दुःखी। स्थितप्रज्ञ का सुख भीतर से आता है — वह 'आत्मनि एव तुष्टः' है, अपने आप में ही पूर्ण सन्तुष्ट। कामनाएँ 'मनोगत' हैं — मन में उठती हैं, आत्मा का स्वभाव नहीं। जब मनुष्य अपने आनन्दमय स्वरूप को पहचान लेता है, तो बाहर की वस्तुओं की लालसा स्वतः समाप्त हो जाती है।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥
अन्वय
दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः, सुखेषु विगतस्पृहः, वीतरागभयक्रोधः मुनिः स्थितधीः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी स्पृहा (लालसा) नहीं रहती, तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह मुनि स्थिरबुद्धि कहलाता है।
भावार्थ
भगवान् अर्जुन के दूसरे प्रश्न — 'वह कैसे बोलता है' — का उत्तर उसके आन्तरिक व्यवहार से देते हैं। दुःख आने पर वह घबराता नहीं, सुख आने पर उसकी लालसा नहीं बढ़ती। राग (आसक्ति), भय और क्रोध — ये तीनों मन के प्रमुख शत्रु हैं; स्थितप्रज्ञ इनसे मुक्त होता है। राग से भय उत्पन्न होता है कि प्रिय वस्तु छिन न जाये, और भय से क्रोध, जब कोई उस वस्तु में बाधा डाले। जब राग ही नहीं, तो भय और क्रोध भी नहीं रहते। ऐसा व्यक्ति 'मुनि' — मननशील, शान्त — कहलाता है।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥
अन्वय
यः सर्वत्र अनभिस्नेहः, तत् तत् शुभाशुभं प्राप्य न अभिनन्दति न द्वेष्टि, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष सर्वत्र स्नेह (आसक्ति) से रहित है और जो उस-उस शुभ या अशुभ को प्राप्त करके न प्रसन्न होता है, न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।
भावार्थ
स्थितप्रज्ञ 'अनभिस्नेह' होता है — किसी व्यक्ति या वस्तु में ममतापूर्ण आसक्ति नहीं रखता। इसका अर्थ प्रेमहीनता नहीं, बल्कि बन्धनरहित प्रेम है। जीवन में शुभ और अशुभ दोनों आते हैं — प्रशंसा और निन्दा, लाभ और हानि। स्थितप्रज्ञ शुभ पाकर उछलता नहीं (अभिनन्दन नहीं करता) और अशुभ पाकर घृणा नहीं करता। वह दोनों को प्रारब्ध का खेल मानकर समभाव से स्वीकार करता है। यह आन्तरिक स्वतन्त्रता की अवस्था है, जहाँ बाहर की घटनाएँ भीतर की शान्ति को भंग नहीं कर पातीं।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥
अन्वय
यदा च अयं कूर्मः अङ्गानि इव इन्द्रियार्थेभ्यः इन्द्रियाणि सर्वशः संहरते, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।
हिन्दी अनुवाद
और जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से अपनी इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
भावार्थ
भगवान् कछुए का सुन्दर दृष्टान्त देते हैं। संकट आने पर कछुआ अपने सिर और पैर अपनी कठोर खोल के भीतर समेट लेता है और सुरक्षित रहता है; संकट टलने पर फिर उन्हें बाहर निकालता है। इसी प्रकार स्थितप्रज्ञ अपनी इन्द्रियों को अपनी इच्छा से विषयों से हटा सकता है। इसका अर्थ इन्द्रियों को नष्ट करना नहीं, बल्कि उन पर स्वामित्व रखना है — जब चाहे उपयोग करे, जब चाहे समेट ले। इन्द्रियाँ स्वामी की सेवक हों, स्वामी इन्द्रियों का दास नहीं — यही इन्द्रिय-निग्रह है।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥
अन्वय
निराहारस्य देहिनः विषयाः रसवर्जं विनिवर्तन्ते; अस्य रसः अपि परं दृष्ट्वा निवर्तते।
हिन्दी अनुवाद
इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति (रस) निवृत्त नहीं होती; इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है।
भावार्थ
यह श्लोक एक गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य बताता है। उपवास, संयम या रोग के कारण कोई व्यक्ति विषयों का सेवन बन्द कर सकता है, परन्तु मन में उनकी चाह (रस) बनी रहती है। जैसे बीमार व्यक्ति मिठाई नहीं खा सकता, पर उसकी इच्छा रहती है। बाहरी त्याग से इच्छा का बीज नष्ट नहीं होता। यह बीज तभी नष्ट होता है जब व्यक्ति 'परम' — परमात्मा के आनन्द — का अनुभव कर लेता है। बड़ा सुख मिलने पर छोटा सुख स्वतः छूट जाता है; इसलिये साधना का लक्ष्य केवल दमन नहीं, बल्कि उच्च आनन्द की प्राप्ति है।
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! यततः विपश्चितः अपि पुरुषस्य प्रमाथीनि इन्द्रियाणि हि मनः प्रसभं हरन्ति।
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान् पुरुष के मन को भी ये प्रमथन (मथ डालने) स्वभाव वाली इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं।
भावार्थ
भगवान् साधक को सावधान करते हैं — इन्द्रियाँ इतनी शक्तिशाली हैं कि ज्ञानी और प्रयत्नशील व्यक्ति के मन को भी बलपूर्वक खींच ले जाती हैं। उन्हें 'प्रमाथीनि' कहा गया है — जो मन को मथ डालती हैं, उसे उद्विग्न कर देती हैं। विश्वामित्र जैसे महान् तपस्वी भी इन्द्रियों के प्रलोभन में पड़ गये थे। यह श्लोक अहंकार से बचने की चेतावनी है; कोई यह न समझे कि वह इन्द्रियों पर पूर्ण विजय पा चुका है। निरन्तर सावधानी और भगवान् का आश्रय ही इन्द्रियों पर विजय का उपाय है, जो अगले श्लोक में बताया गया है।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥
अन्वय
तानि सर्वाणि संयम्य युक्तः मत्परः आसीत; हि यस्य इन्द्रियाणि वशे (सन्ति), तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।
हिन्दी अनुवाद
उन सब इन्द्रियों को वश में करके, समाहितचित्त होकर, मेरे परायण होकर बैठे; क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है।
भावार्थ
इन्द्रियों पर विजय का उपाय बताया गया है — 'मत्परः', मुझे (भगवान् को) परम लक्ष्य मानकर। केवल इच्छाशक्ति से इन्द्रियों को रोकना कठिन है, परन्तु जब मन किसी ऊँचे लक्ष्य से जुड़ जाता है, तो इन्द्रियाँ स्वतः शान्त होने लगती हैं। यहाँ भगवान् पहली बार स्वयं को साधना का केन्द्र बताते हैं — भक्ति का संकेत। 'युक्त' — योग में लगा हुआ; 'आसीत' — स्थिर होकर रहे। इन्द्रिय-संयम, ईश्वर-परायणता और स्थिर बुद्धि — ये तीनों एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥
अन्वय
विषयान् ध्यायतः पुंसः तेषु सङ्गः उपजायते; सङ्गात् कामः सञ्जायते, कामात् क्रोधः अभिजायते।
हिन्दी अनुवाद
विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति उत्पन्न हो जाती है, आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना में बाधा पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।
भावार्थ
श्लोक ६२-६३ में भगवान् मनुष्य के पतन की पूरी सीढ़ी बताते हैं — यह मनोविज्ञान का अद्भुत विश्लेषण है। पतन का आरम्भ बहुत छोटी बात से होता है — विषयों का चिन्तन, अर्थात् बार-बार किसी वस्तु के बारे में सोचना। सोचते-सोचते उसमें 'सङ्ग' (लगाव) हो जाता है। लगाव से 'काम' (उसे पाने की तीव्र इच्छा) उत्पन्न होता है। जब इस इच्छा की पूर्ति में बाधा आती है, तो 'क्रोध' उत्पन्न होता है। इसलिये साधक को विचार के स्तर पर ही सावधान रहना चाहिये — जो विचार बीज है, वही आगे वृक्ष बनता है।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥
अन्वय
क्रोधात् सम्मोहः भवति, सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः, स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।
हिन्दी अनुवाद
क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव (अविवेक) उत्पन्न होता है, मूढ़भाव से स्मृति भ्रमित हो जाती है, स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से मनुष्य अपनी स्थिति से गिर जाता है।
भावार्थ
पतन की सीढ़ी आगे बढ़ती है। क्रोध आने पर 'सम्मोह' होता है — उचित-अनुचित का विवेक चला जाता है। विवेक जाने पर 'स्मृतिविभ्रम' होता है — व्यक्ति अपने संस्कार, शिक्षा, सम्बन्ध, सब भूल जाता है। स्मृति नष्ट होने पर 'बुद्धिनाश' — निर्णय-शक्ति समाप्त हो जाती है। और बुद्धि के नाश से व्यक्ति 'प्रणश्यति' — पूर्ण रूप से गिर जाता है। एक छोटे-से विचार से शुरू होकर सर्वनाश तक की यह यात्रा हर व्यक्ति के जीवन में देखी जा सकती है। इसीलिये ध्यान और विचार-शुद्धि को आध्यात्मिक जीवन का आधार कहा गया है।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥
अन्वय
विधेयात्मा तु रागद्वेषवियुक्तैः आत्मवश्यैः इन्द्रियैः विषयान् चरन् प्रसादम् अधिगच्छति।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु अपने अन्तःकरण को वश में रखने वाला पुरुष राग-द्वेष से रहित और अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों का सेवन करता हुआ भी अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है।
भावार्थ
पतन की सीढ़ी के बाद भगवान् उत्थान का मार्ग दिखाते हैं। स्थितप्रज्ञ संसार से भागता नहीं; वह विषयों का सेवन भी करता है, पर राग-द्वेष से रहित होकर और इन्द्रियों को अपने वश में रखकर। भोजन करता है, पर स्वाद का दास नहीं; सम्बन्ध रखता है, पर मोह में नहीं। ऐसा व्यक्ति 'प्रसाद' प्राप्त करता है — मन की निर्मलता, शान्ति और प्रसन्नता। यह श्लोक बताता है कि आध्यात्मिकता संसार-त्याग नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए आन्तरिक स्वतन्त्रता है।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥
अन्वय
प्रसादे (सति) अस्य सर्वदुःखानां हानिः उपजायते; प्रसन्नचेतसः बुद्धिः हि आशु पर्यवतिष्ठते।
हिन्दी अनुवाद
अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सभी दुःखों का नाश हो जाता है, और प्रसन्न चित्त वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर परमात्मा में स्थिर हो जाती है।
भावार्थ
'प्रसाद' अर्थात् मन की प्रसन्नता और निर्मलता का फल बताया गया है — सब दुःखों का नाश। दुःख वास्तव में बाहरी परिस्थितियों से नहीं, मन की अशान्ति से उत्पन्न होता है; जब मन शान्त और प्रसन्न होता है, तो कठिन परिस्थितियाँ भी दुःख नहीं देतीं। प्रसन्न मन में बुद्धि शीघ्र स्थिर हो जाती है, जैसे शान्त जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखता है। मन की प्रसन्नता, बुद्धि की स्थिरता और दुःख की निवृत्ति — ये तीनों साथ-साथ चलते हैं।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ ६६ ॥
अन्वय
अयुक्तस्य बुद्धिः न अस्ति, अयुक्तस्य भावना च न (अस्ति); अभावयतः च शान्तिः न (अस्ति); अशान्तस्य सुखं कुतः?
हिन्दी अनुवाद
जिसका मन और इन्द्रियाँ जीती हुई नहीं हैं, उस पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती, और उसके अन्तःकरण में भावना (ईश्वर-चिन्तन) भी नहीं होती; भावना-रहित पुरुष को शान्ति नहीं मिलती, और अशान्त मनुष्य को सुख कहाँ?
भावार्थ
यह श्लोक सुख की प्राप्ति का क्रम उलटी दिशा से बताता है। जो 'अयुक्त' है — जिसने मन और इन्द्रियों को योग से नहीं जोड़ा — उसकी बुद्धि स्थिर नहीं होती। स्थिर बुद्धि के बिना 'भावना' — परमात्मा का चिन्तन या आत्म-भाव — सम्भव नहीं। भावना के बिना 'शान्ति' नहीं, और शान्ति के बिना 'सुख' नहीं। 'अशान्तस्य कुतः सुखम्' — यह गीता का एक अमर वाक्य है। संसार के सारे साधन जुटा लेने पर भी, यदि मन अशान्त है, तो सुख नहीं मिल सकता। सुख का स्रोत शान्ति है, और शान्ति का स्रोत संयमित मन।
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥
अन्वय
हि चरताम् इन्द्रियाणां यत् मनः अनुविधीयते, तत् अस्य प्रज्ञां हरति, अम्भसि वायुः नावम् इव।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस इन्द्रिय के साथ मन लग जाता है, वह एक इन्द्रिय ही उस पुरुष की बुद्धि को वैसे ही हर लेती है जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है।
भावार्थ
भगवान् एक सजीव उपमा देते हैं — समुद्र में नाव और तेज़ हवा। यदि नाविक सावधान न हो, तो हवा नाव को अपनी दिशा से भटकाकर कहीं भी ले जा सकती है, यहाँ तक कि डुबो भी सकती है। इसी प्रकार यदि मन किसी एक इन्द्रिय के पीछे भी चल पड़ता है, तो वह बुद्धि को उसके लक्ष्य से भटका देता है। ध्यान दें — सभी इन्द्रियाँ नहीं, केवल एक इन्द्रिय भी पर्याप्त है। इसलिये साधक को हर इन्द्रिय पर सावधानी रखनी चाहिये; एक छोटा-सा छेद भी नाव को डुबो सकता है।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥
अन्वय
तस्मात् (हे) महाबाहो! यस्य इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः सर्वशः निगृहीतानि, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।
हिन्दी अनुवाद
इसलिये हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार से निगृहीत (वश में) की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है।
भावार्थ
भगवान् निष्कर्ष के रूप में फिर से वही बात कहते हैं — इन्द्रिय-निग्रह ही स्थिर बुद्धि का आधार है। अर्जुन को 'महाबाहो' (बड़ी भुजाओं वाले) कहा गया — मानो कह रहे हों कि जैसे तुमने बाहरी शत्रुओं को अपनी भुजाओं से जीता है, वैसे ही भीतर के शत्रुओं — इन्द्रियों — को भी जीतो। बाहरी विजय से भीतरी विजय कठिन है, पर वही अधिक मूल्यवान् है। 'सर्वशः' — सब प्रकार से, किसी एक इन्द्रिय को छूट दिये बिना। यह पुनरावृत्ति इस बात पर बल देती है कि इन्द्रिय-संयम के बिना कोई आध्यात्मिक प्रगति सम्भव नहीं।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥
अन्वय
या सर्वभूतानां निशा, तस्यां संयमी जागर्ति; यस्यां भूतानि जाग्रति, सा पश्यतः मुनेः निशा।
हिन्दी अनुवाद
सम्पूर्ण प्राणियों के लिये जो रात्रि के समान है (परमात्मा का ज्ञान), उसमें संयमी पुरुष जागता है; और जिस नाशवान् सांसारिक सुख में सब प्राणी जागते हैं, वह तत्त्व को जानने वाले मुनि के लिये रात्रि के समान है।
भावार्थ
यह गीता के सबसे काव्यात्मक और गूढ़ श्लोकों में है। साधारण लोग परमात्मा और आत्मा के विषय में 'सोये' रहते हैं — उनके लिये यह अन्धकार (रात्रि) है, वे इसमें कोई रुचि नहीं लेते। संयमी पुरुष इसी विषय में 'जागता' है — पूर्ण सचेत रहता है। इसके विपरीत, जिन भोगों, धन, पद और प्रतिष्ठा के लिये संसार दिन-रात 'जागता' है — दौड़ता-भागता है — ज्ञानी के लिये वे रात्रि के समान हैं, उनमें उसकी कोई रुचि नहीं। ज्ञानी और अज्ञानी की प्राथमिकताएँ ठीक उलटी होती हैं।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥
अन्वय
यद्वत् आपः आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रं प्रविशन्ति, तद्वत् सर्वे कामाः यं प्रविशन्ति, सः शान्तिम् आप्नोति, न कामकामी।
हिन्दी अनुवाद
जैसे सब ओर से परिपूर्ण और अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में अनेक नदियों के जल उसे विचलित किये बिना समा जाते हैं, वैसे ही जिस पुरुष में सब भोग बिना कोई विकार उत्पन्न किये समा जाते हैं, वही शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों की कामना करने वाला नहीं।
भावार्थ
भगवान् स्थितप्रज्ञ की तुलना समुद्र से करते हैं। सैकड़ों नदियाँ लगातार समुद्र में गिरती हैं, फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, न उफनता है; और गर्मी में नदियाँ सूख जायें तो भी समुद्र घटता नहीं। स्थितप्रज्ञ भी ऐसा ही है — जीवन में भोग आयें या न आयें, वह भीतर से पूर्ण और अचल रहता है। जो व्यक्ति 'कामकामी' है — कामनाओं की कामना करता है — वह छोटे गड्ढे की तरह है, जो थोड़े पानी से भर जाता है और थोड़ी कमी से सूख जाता है। शान्ति पूर्णता में है, लालसा में नहीं।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥
अन्वय
यः पुमान् सर्वान् कामान् विहाय निःस्पृहः निर्ममः निरहङ्कारः (सन्) चरति, सः शान्तिम् अधिगच्छति।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहा-रहित, ममता-रहित और अहंकार-रहित होकर विचरता है, वही शान्ति को प्राप्त होता है।
भावार्थ
शान्ति के चार सूत्र इस श्लोक में हैं — कामनाओं का त्याग, निःस्पृहता (किसी वस्तु की लालसा न होना), निर्ममता ('यह मेरा है' का भाव न होना) और निरहंकारता ('मैं कर्ता हूँ' का अभिमान न होना)। 'मैं' और 'मेरा' — ये दो भाव ही सारे दुःखों की जड़ हैं। ऐसा व्यक्ति 'चरति' — संसार में विचरता है, कर्म करता है, पर बँधता नहीं। वह संसार में रहता है, संसार उसमें नहीं रहता। यही वास्तविक संन्यास है, जो गेरुए वस्त्रों से नहीं, भीतर के त्याग से होता है।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! एषा ब्राह्मी स्थितिः; एनां प्राप्य (कश्चित्) न विमुह्यति; अन्तकाले अपि अस्यां स्थित्वा ब्रह्मनिर्वाणम् ऋच्छति।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है; इसको प्राप्त होकर मनुष्य कभी मोहित नहीं होता, और अन्तकाल में भी इस स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द रूप परम शान्ति (निर्वाण) को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ
दूसरे अध्याय का यह समापन-श्लोक स्थितप्रज्ञ की अवस्था को 'ब्राह्मी स्थिति' कहता है — ब्रह्म में स्थित होने की अवस्था। इसे प्राप्त करने के बाद फिर कभी मोह नहीं होता, जैसा अर्जुन को अभी हुआ है। सबसे आशाजनक बात यह है कि यदि जीवन के अन्तिम क्षणों में भी कोई इस अवस्था को प्राप्त कर ले, तो वह 'ब्रह्मनिर्वाण' — परम शान्ति और मुक्ति — पा लेता है। परन्तु अन्तकाल में यह स्थिति तभी आती है जब जीवन-भर उसका अभ्यास किया गया हो। यह अध्याय 'सांख्ययोग' कहलाता है, जिसमें आत्मज्ञान, कर्मयोग और स्थितप्रज्ञ — तीनों का सार समाहित है; इसे सम्पूर्ण गीता का सार भी माना जाता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥

ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।
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