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🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय ३ — कर्मयोग

४३ श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 कर्म क्यों आवश्यक है; यज्ञ-चक्र, लोकसंग्रह, स्वधर्म और काम रूपी शत्रु पर विजय।
३.१ अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) जनार्दन! चेत् ते कर्मणः बुद्धिः ज्यायसी मता, तत् (हे) केशव! मां घोरे कर्मणि किं नियोजयसि?
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान (समबुद्धि) श्रेष्ठ मान्य है, तो फिर हे केशव! मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
भावार्थ
दूसरे अध्याय में भगवान् ने बुद्धियोग को सकाम कर्म से श्रेष्ठ बताया था (२.४९)। अर्जुन ने इसका अर्थ यह समझ लिया कि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो फिर कर्म — विशेषकर युद्ध जैसा घोर कर्म — क्यों करें? यह प्रश्न स्वाभाविक है और आज भी अनेक साधकों के मन में उठता है: यदि आत्मज्ञान ही लक्ष्य है, तो सांसारिक कर्म क्यों? तीसरा अध्याय 'कर्मयोग' इसी प्रश्न का उत्तर है। भगवान् बतायेंगे कि ज्ञान और कर्म विरोधी नहीं, बल्कि सही भाव से किया गया कर्म ही ज्ञान का साधन बनता है।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥
अन्वय
व्यामिश्रेण इव वाक्येन मे बुद्धिं मोहयसि इव; तत् निश्चित्य एकं वद, येन अहं श्रेयः आप्नुयाम्।
हिन्दी अनुवाद
आप मिले-जुले से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं; इसलिये निश्चय करके वह एक बात कहिये जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ।
भावार्थ
अर्जुन को भगवान् के वचन 'व्यामिश्र' — मिश्रित या परस्पर विरोधी — लग रहे हैं; कभी ज्ञान की प्रशंसा, कभी कर्म का आदेश। 'इव' (मानो) शब्द का दो बार प्रयोग बताता है कि अर्जुन जानते हैं कि भगवान् जानबूझकर भ्रमित नहीं कर रहे, पर उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है। वे एक निश्चित मार्ग चाहते हैं। यह उस साधक की स्वाभाविक इच्छा है जो उलझनों से थक गया है और स्पष्ट दिशा चाहता है। सच्चा गुरु शिष्य की योग्यता के अनुसार मार्ग दिखाता है, और भगवान् अब यही करेंगे।
३.३ श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (हे) अनघ! अस्मिन् लोके द्विविधा निष्ठा मया पुरा प्रोक्ता — सांख्यानां ज्ञानयोगेन, योगिनां कर्मयोगेन।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गई है — ज्ञानियों की निष्ठा ज्ञानयोग से और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से।
भावार्थ
भगवान् स्पष्ट करते हैं कि आध्यात्मिक जीवन के दो मार्ग हैं, जो उन्होंने सृष्टि के आरम्भ से ही बताये हैं। 'सांख्य' अर्थात् ज्ञानमार्ग — उन लोगों के लिये जो स्वभाव से चिन्तनशील और संसार से विरक्त हैं; वे आत्मा-अनात्मा के विवेक द्वारा मुक्ति पाते हैं। 'योग' अर्थात् कर्ममार्ग — उन लोगों के लिये जो सक्रिय हैं; वे निष्काम कर्म द्वारा चित्त-शुद्धि और फिर मुक्ति पाते हैं। दोनों मार्ग अलग-अलग स्वभाव के लोगों के लिये हैं, किन्तु लक्ष्य एक ही है। अर्जुन को 'अनघ' (निष्पाप) कहकर भगवान् उनकी पात्रता को स्वीकार करते हैं।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
अन्वय
पुरुषः कर्मणाम् अनारम्भात् नैष्कर्म्यं न अश्नुते, च संन्यसनात् एव सिद्धिं न समधिगच्छति।
हिन्दी अनुवाद
मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ न करने से निष्कर्मता (कर्म-बन्धन से मुक्ति) को प्राप्त होता है, और न केवल कर्मों के त्याग मात्र से सिद्धि को प्राप्त होता है।
भावार्थ
भगवान् एक महत्वपूर्ण भ्रम दूर करते हैं — कर्म छोड़ देने से कोई कर्म-बन्धन से मुक्त नहीं हो जाता। 'नैष्कर्म्य' का अर्थ कर्म न करना नहीं, बल्कि कर्म करते हुए भी उसके बन्धन से मुक्त रहना है। जैसे कोई बिना पढ़े विद्वान् नहीं बन सकता, वैसे ही बिना कर्म के चित्त-शुद्धि नहीं हो सकती। केवल बाहरी संन्यास — गृहस्थी छोड़कर वन चले जाना — सिद्धि नहीं देता, यदि मन में कामनाएँ बनी हुई हैं। सच्चा त्याग बाहर का नहीं, भीतर का है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥
अन्वय
कश्चित् जातु क्षणम् अपि अकर्मकृत् न हि तिष्ठति; हि सर्वः प्रकृतिजैः गुणैः अवशः (सन्) कर्म कार्यते।
हिन्दी अनुवाद
कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणभर भी बिना कर्म किये नहीं रहता, क्योंकि सभी प्राणी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के द्वारा विवश होकर कर्म करने को बाध्य होते हैं।
भावार्थ
यह एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक सत्य है — जीवित रहते हुए पूर्ण निष्क्रियता असम्भव है। साँस लेना, सोचना, देखना, सुनना, यहाँ तक कि सोते हुए भी शरीर कार्य करता रहता है। प्रकृति के तीन गुण — सत्त्व, रज, तम — निरन्तर हमें किसी न किसी कर्म में लगाये रखते हैं। जब कर्म से बचना सम्भव ही नहीं, तो प्रश्न यह नहीं कि कर्म करें या न करें, बल्कि यह है कि कर्म किस भाव से करें। यही गीता का केन्द्रीय विचार है — कर्म अनिवार्य है, बन्धन नहीं।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥
अन्वय
यः विमूढात्मा कर्मेन्द्रियाणि संयम्य मनसा इन्द्रियार्थान् स्मरन् आस्ते, सः मिथ्याचारः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
जो मूढ़बुद्धि मनुष्य कर्मेन्द्रियों को हठपूर्वक रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहलाता है।
भावार्थ
भगवान् पाखण्ड की पहचान बताते हैं। कोई व्यक्ति बाहर से त्यागी दिखे — हाथ-पैर रोककर बैठा रहे, ध्यान की मुद्रा बनाये — पर मन में भोगों का चिन्तन करता रहे, तो वह 'मिथ्याचारी' है, अर्थात् झूठा आचरण करने वाला। बाहरी संयम और भीतरी असंयम का यह मेल सबसे बड़ा धोखा है — दूसरों से भी और स्वयं से भी। आध्यात्मिकता का सम्बन्ध मन से है, केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं। ईमानदारी से कर्म करने वाला गृहस्थ ऐसे दिखावटी त्यागी से कहीं श्रेष्ठ है।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥
अन्वय
(हे) अर्जुन! यः तु मनसा इन्द्रियाणि नियम्य असक्तः (सन्) कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् आरभते, सः विशिष्यते।
हिन्दी अनुवाद
किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति-रहित होकर कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।
भावार्थ
पिछले श्लोक के मिथ्याचारी के विपरीत, भगवान् सच्चे कर्मयोगी का स्वरूप बताते हैं। वह मन से इन्द्रियों को नियन्त्रित रखता है — अर्थात् भीतर संयम है — और कर्मेन्द्रियों से अपना कर्तव्य करता है, पर आसक्ति के बिना। यहाँ बाहर कर्म है और भीतर त्याग; यही सही सन्तुलन है। ऐसा व्यक्ति 'विशिष्यते' — विशेष, श्रेष्ठ है। इससे स्पष्ट है कि गीता संसार से भागने की नहीं, संसार में रहकर कर्म करते हुए आन्तरिक रूप से मुक्त रहने की शिक्षा देती है।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥ ८ ॥
अन्वय
त्वं नियतं कर्म कुरु; हि अकर्मणः कर्म ज्यायः; अकर्मणः च ते शरीरयात्रा अपि न प्रसिद्ध्येत्।
हिन्दी अनुवाद
तुम शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है; कर्म न करने से तो तुम्हारी शरीर-यात्रा (जीवन-निर्वाह) भी सिद्ध नहीं होगी।
भावार्थ
भगवान् अर्जुन को स्पष्ट आदेश देते हैं — 'नियतं कुरु कर्म त्वम्', अपना निर्धारित कर्तव्य करो। 'नियत' कर्म वह है जो व्यक्ति के स्वभाव, स्थिति और शास्त्र के अनुसार उसके लिये निश्चित है। कर्म न करना कोई श्रेष्ठता नहीं; यह तो जीवन के मूलभूत नियम के विरुद्ध है। भोजन, वस्त्र, आवास — शरीर का निर्वाह भी कर्म के बिना सम्भव नहीं। आलस्य और निष्क्रियता को कभी आध्यात्मिकता न समझा जाये; परिश्रम और कर्तव्य-पालन स्वयं में एक साधना है।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥ ९ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! यज्ञार्थात् कर्मणः अन्यत्र अयं लोकः कर्मबन्धनः (भवति); (अतः) मुक्तसङ्गः (सन्) तदर्थं कर्म समाचर।
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! यज्ञ (परमात्मा या लोक-कल्याण) के लिये किये जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ यह मनुष्य-समुदाय कर्मों से बँधता है; इसलिये तुम आसक्ति-रहित होकर उस यज्ञ के लिये ही भली-भाँति कर्म करो।
भावार्थ
भगवान् कर्म को बन्धन से मुक्त करने की कुंजी देते हैं — 'यज्ञार्थ कर्म'। यहाँ 'यज्ञ' का अर्थ केवल अग्नि में आहुति नहीं, बल्कि हर वह कर्म है जो स्वार्थ के लिये नहीं, बल्कि परमात्मा की प्रसन्नता, समाज के कल्याण या कर्तव्य-भाव से किया जाये। जब कर्म अपने लिये होता है, तब वह बाँधता है; जब दूसरों के लिये या ईश्वर के लिये होता है, तब वह मुक्त करता है। इस दृष्टि से माता का बच्चे की सेवा, किसान का अन्न उगाना, शिक्षक का पढ़ाना — सब यज्ञ बन सकते हैं, यदि भाव निःस्वार्थ हो।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
अन्वय
पुरा प्रजापतिः सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा उवाच — अनेन (यज्ञेन) (यूयं) प्रसविष्यध्वम्; एषः वः इष्टकामधुक् अस्तु।
हिन्दी अनुवाद
सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ब्रह्माजी ने यज्ञ सहित प्रजा को रचकर कहा — तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो, यह यज्ञ तुम्हारी इच्छित कामनाओं को देने वाला (कामधेनु) हो।
भावार्थ
भगवान् यज्ञ की प्राचीनता और महत्त्व बताते हैं। सृष्टि के आरम्भ में ही ब्रह्माजी ने मनुष्यों के साथ यज्ञ — अर्थात् पारस्परिक सहयोग और त्याग का सिद्धान्त — भी रचा। यज्ञ को 'कामधुक्' — कामधेनु के समान इच्छाएँ पूरी करने वाला — कहा गया। इसका गहरा अर्थ यह है कि जब मनुष्य त्याग और सेवा के भाव से जीता है, तो उसकी सारी आवश्यकताएँ स्वतः पूरी होती हैं। सृष्टि का पूरा तन्त्र देने और लेने के सन्तुलन पर चलता है — सूर्य प्रकाश देता है, वृक्ष फल देते हैं; मनुष्य को भी देना सीखना चाहिये।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
अन्वय
अनेन (यूयं) देवान् भावयत, ते देवाः वः भावयन्तु; परस्परं भावयन्तः (यूयं) परं श्रेयः अवाप्स्यथ।
हिन्दी अनुवाद
तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें; इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त होगे।
भावार्थ
यह श्लोक सहयोग और पारस्परिकता का सुन्दर सिद्धान्त प्रस्तुत करता है। 'देवता' प्रकृति की शक्तियों के अधिष्ठाता हैं — सूर्य, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी। मनुष्य जब यज्ञ द्वारा — अर्थात् प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संरक्षण के भाव से — उन्हें पुष्ट करता है, तो वे वर्षा, अन्न और जीवन के साधन देकर मनुष्य को पुष्ट करते हैं। आज के पर्यावरण-संकट के सन्दर्भ में यह श्लोक और भी प्रासंगिक है: प्रकृति का केवल दोहन नहीं, उसका पोषण भी आवश्यक है। 'परस्परं भावयन्तः' — परस्पर पोषण ही परम कल्याण का मार्ग है।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥
अन्वय
यज्ञभाविताः देवाः वः इष्टान् भोगान् दास्यन्ते हि; तैः दत्तान् (भोगान्) एभ्यः अप्रदाय यः भुङ्क्ते, सः स्तेनः एव।
हिन्दी अनुवाद
यज्ञ द्वारा पुष्ट हुए देवता तुम्हें बिना माँगे ही इच्छित भोग देते रहेंगे; उनके द्वारा दिये हुए भोगों को जो पुरुष उन्हें बिना अर्पण किये स्वयं भोगता है, वह चोर ही है।
भावार्थ
भगवान् कृतघ्नता को 'चोरी' कहते हैं — यह कठोर पर सत्य वचन है। हमें जो कुछ भी मिला है — वायु, जल, अन्न, प्रकाश — वह प्रकृति और ईश्वर का दिया हुआ है। यदि हम उसे केवल अपने लिये उपयोग करें, बिना कृतज्ञता या बदले में कुछ दिये, तो हम दूसरे के धन का उपभोग करने वाले चोर के समान हैं। भारतीय परम्परा में भोजन से पहले भगवान् को भोग लगाने, अतिथि को खिलाने और पक्षियों-पशुओं के लिये अंश निकालने का विधान इसी भाव से है। कृतज्ञता ही सच्चे उपभोग की शर्त है।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥
अन्वय
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तः सर्वकिल्बिषैः मुच्यन्ते; ये तु आत्मकारणात् पचन्ति, ते पापाः अघं भुञ्जते।
हिन्दी अनुवाद
यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं; और जो पापी लोग केवल अपने शरीर-पोषण के लिये ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं।
भावार्थ
भोजन का आध्यात्मिक नियम बताया गया है। जो व्यक्ति पहले भगवान् को अर्पण करके, दूसरों को देकर, फिर बचा हुआ (यज्ञशिष्ट) स्वयं ग्रहण करता है, वह सब पापों से मुक्त होता है — क्योंकि उसका भोजन प्रसाद बन जाता है। इसके विपरीत, जो केवल अपने लिये पकाता और खाता है, वह 'पाप खाता है'। भोजन बनाने में अनेक सूक्ष्म जीवों की हिंसा होती है; अर्पण का भाव उस दोष को धो देता है। यह सिद्धान्त केवल भोजन तक सीमित नहीं — जीवन की हर उपलब्धि को पहले बाँटना और फिर भोगना, यही यज्ञमय जीवन है।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥
अन्वय
भूतानि अन्नात् भवन्ति, अन्नसम्भवः पर्जन्यात् (भवति), पर्जन्यः यज्ञात् भवति, यज्ञः कर्मसमुद्भवः (अस्ति)।
हिन्दी अनुवाद
सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है।
भावार्थ
भगवान् सृष्टि-चक्र का वर्णन करते हैं, जो एक पारिस्थितिक तन्त्र की तरह है। प्राणी अन्न से जीवित हैं, अन्न वर्षा से उगता है, वर्षा यज्ञ से होती है — अर्थात् प्रकृति के प्रति मनुष्य के सन्तुलित और त्यागमय व्यवहार से — और यज्ञ कर्म से सम्पन्न होता है। इस प्रकार मनुष्य का कर्म इस विशाल चक्र की एक आवश्यक कड़ी है। जब मनुष्य अपने कर्तव्य से हटता है, तो यह चक्र टूट जाता है। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि मनुष्य के कर्म जलवायु और प्रकृति को प्रभावित करते हैं।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥
अन्वय
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि, ब्रह्म अक्षरसमुद्भवम्; तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।
हिन्दी अनुवाद
कर्म को वेद से उत्पन्न जानो, और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जानो; इसलिये सर्वव्यापी परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
भावार्थ
सृष्टि-चक्र को और ऊपर तक ले जाया गया है। कर्म का विधान 'ब्रह्म' अर्थात् वेद से आया है, और वेद 'अक्षर' — अविनाशी परमात्मा — से प्रकट हुए हैं। इसलिये परमात्मा स्वयं यज्ञ में सदा उपस्थित हैं। इसका अर्थ है कि जब हम निःस्वार्थ भाव से कर्तव्य करते हैं, तो हम परमात्मा की उपस्थिति में कार्य कर रहे होते हैं। हर यज्ञमय कर्म एक पूजा है। इस प्रकार साधारण दैनिक कार्य भी दिव्य बन जाते हैं, यदि उन्हें सही भाव से किया जाये।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ १६ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! यः इह एवं प्रवर्तितं चक्रं न अनुवर्तयति, सः अघायुः इन्द्रियारामः मोघं जीवति।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार चलाये हुए सृष्टि-चक्र के अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापमय जीवन वाला पुरुष व्यर्थ ही जीता है।
भावार्थ
जो व्यक्ति इस सृष्टि-चक्र में अपना योगदान नहीं देता — केवल लेता है, देता नहीं — उसका जीवन 'मोघ' अर्थात् व्यर्थ है। उसे 'अघायु' (पापमय जीवन वाला) और 'इन्द्रियाराम' (इन्द्रिय-सुखों में ही रमने वाला) कहा गया है। जीवन का अर्थ केवल उपभोग नहीं, बल्कि सृजन, सेवा और योगदान है। जैसे शरीर का कोई अंग यदि केवल पोषण ले और कार्य न करे, तो वह रोग बन जाता है, वैसे ही समाज में केवल भोगने वाला व्यक्ति भार है। सार्थक जीवन वह है जो दूसरों के लिये भी कुछ करे।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥
अन्वय
यः तु मानवः आत्मरतिः एव, आत्मतृप्तः च, आत्मनि एव च सन्तुष्टः स्यात्, तस्य कार्यं न विद्यते।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला, आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।
भावार्थ
भगवान् एक अपवाद बताते हैं — आत्मज्ञानी महापुरुष। जिसने परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया, जो आत्मा में ही आनन्द पाता है (आत्मरति), आत्मा से ही तृप्त है (आत्मतृप्त) और आत्मा में ही सन्तुष्ट है — उसके लिये कोई कर्तव्य बाकी नहीं रहता। उसे कुछ पाना नहीं, कुछ सिद्ध नहीं करना। कर्म का उद्देश्य चित्त-शुद्धि और आत्मज्ञान है; जब लक्ष्य मिल गया, तो साधन की आवश्यकता नहीं। परन्तु यह अवस्था अत्यन्त उच्च है; साधारण साधक को यह न समझना चाहिये कि वह इस स्थिति में पहुँच गया है।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन। न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥
अन्वय
इह तस्य कृतेन अर्थः न एव (अस्ति), अकृतेन कश्चन (अर्थः) न; अस्य च सर्वभूतेषु कश्चित् अर्थव्यपाश्रयः न (अस्ति)।
हिन्दी अनुवाद
उस महापुरुष का इस संसार में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्म न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है; तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी उसका किंचित् मात्र स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता।
भावार्थ
आत्मज्ञानी की स्थिति और स्पष्ट की गई है। उसके लिये कर्म करने से कोई लाभ नहीं और न करने से कोई हानि नहीं, क्योंकि वह पूर्णता को प्राप्त कर चुका है। उसे किसी प्राणी से कुछ लेना नहीं, किसी पर निर्भर नहीं। फिर भी, ऐसे महापुरुष प्रायः संसार के कल्याण के लिये कर्म करते रहते हैं — जैसा भगवान् आगे स्वयं अपने उदाहरण से बतायेंगे। उनके कर्म बन्धन नहीं, बल्कि करुणा की अभिव्यक्ति होते हैं। स्वतन्त्रता का अर्थ कर्म से मुक्ति नहीं, कर्म के बन्धन से मुक्ति है।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥
अन्वय
तस्मात् (त्वम्) असक्तः (सन्) सततं कार्यं कर्म समाचर; हि असक्तः कर्म आचरन् पूरुषः परम् आप्नोति।
हिन्दी अनुवाद
इसलिये तुम निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य-कर्म को भली-भाँति करते रहो, क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ
भगवान् निष्कर्ष देते हैं — क्योंकि तुम अभी उस आत्मज्ञानी की स्थिति में नहीं हो, इसलिये तुम्हें कर्म करना चाहिये, पर आसक्ति के बिना। 'सततम्' — निरन्तर, कभी-कभी नहीं; 'कार्यं कर्म' — जो करने योग्य कर्तव्य है। यह एक आश्वासन भी है — आसक्ति रहित कर्म से ही 'परम' अर्थात् परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। इसके लिये संसार छोड़ने की आवश्यकता नहीं; अपने कर्तव्य को निष्काम भाव से करते रहना ही साधना है। यह गीता का सबसे व्यावहारिक और सुलभ मार्ग है।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ २० ॥
अन्वय
जनकादयः कर्मणा एव हि संसिद्धिम् आस्थिताः; लोकसङ्ग्रहम् अपि सम्पश्यन् (त्वं) कर्तुम् एव अर्हसि।
हिन्दी अनुवाद
राजा जनक आदि ज्ञानीजन भी कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे; इसलिये लोक-संग्रह (लोक-कल्याण) को देखते हुए भी तुम्हें कर्म करना ही उचित है।
भावार्थ
भगवान् ऐतिहासिक उदाहरण देते हैं — राजा जनक, जो एक महान् ज्ञानी थे, फिर भी राज्य का कार्य करते रहे और कर्म के माध्यम से ही सिद्धि पायी। वे 'विदेह' कहलाते थे — देह में रहते हुए भी देहाभिमान से मुक्त। इसके साथ भगवान् एक नया कारण भी बताते हैं — 'लोकसंग्रह', अर्थात् समाज को सही मार्ग पर रखना। यदि श्रेष्ठ व्यक्ति कर्म छोड़ दें, तो समाज में अव्यवस्था फैलेगी। ज्ञानी का कर्म अपने लिये नहीं, दूसरों के मार्गदर्शन के लिये होता है।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥
अन्वय
श्रेष्ठः यत् यत् आचरति, इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति); सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते।
हिन्दी अनुवाद
श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं; वह जो कुछ प्रमाण (आदर्श) स्थापित कर देता है, सारा लोक उसी का अनुसरण करता है।
भावार्थ
यह नेतृत्व का शाश्वत सिद्धान्त है। समाज के लोग — बच्चे माता-पिता का, शिष्य गुरु का, नागरिक नेताओं का — अनुसरण करते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति के आचरण का प्रभाव शब्दों से कहीं अधिक होता है। यदि अर्जुन जैसा प्रतिष्ठित वीर युद्ध से भागेगा, तो दूसरे भी कर्तव्य से भागने का बहाना पा जायेंगे। इसलिये जो व्यक्ति जितने ऊँचे पद पर है, उसका उत्तरदायित्व उतना ही बड़ा है। उपदेश से अधिक प्रभावशाली आचरण होता है — यह शिक्षकों, माता-पिता और नेताओं के लिये एक महत्वपूर्ण शिक्षा है।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! त्रिषु लोकेषु मे किञ्चन कर्तव्यं न अस्ति, अनवाप्तम् अवाप्तव्यं (च) न (अस्ति); (तथापि) कर्मणि वर्ते एव च।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही लगा रहता हूँ।
भावार्थ
भगवान् अपना स्वयं का उदाहरण देते हैं, जो सबसे प्रभावशाली है। सर्वशक्तिमान् परमात्मा को किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं, कुछ पाना नहीं, कोई कर्तव्य नहीं — फिर भी वे निरन्तर कर्म करते हैं। श्रीकृष्ण के रूप में भी वे गायें चराते, मित्रों की सहायता करते, दूत बनते और अब सारथि का कार्य कर रहे हैं। यदि भगवान् भी कर्म करते हैं, तो मनुष्य के लिये कर्म-त्याग का क्या औचित्य? यह श्लोक बताता है कि कर्म अपूर्णता का लक्षण नहीं, बल्कि प्रेम और करुणा की अभिव्यक्ति हो सकता है।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २३ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! यदि हि अहं जातु अतन्द्रितः (सन्) कर्मणि न वर्तेयम्, (तर्हि) मनुष्याः सर्वशः मम वर्त्म अनुवर्तन्ते।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न लगूँ, तो मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करेंगे।
भावार्थ
भगवान् अपने कर्म का कारण बताते हैं — लोगों के लिये आदर्श स्थापित करना। यदि वे स्वयं निष्क्रिय हो जायें, तो लोग भी उन्हीं का अनुसरण करके कर्तव्य छोड़ देंगे। 'अतन्द्रितः' — बिना आलस्य के, पूरी सावधानी से। भगवान् कोई भी कार्य लापरवाही से नहीं करते। यह शिक्षा हर प्रभावशाली व्यक्ति के लिये है — आपका हर कार्य दूसरों के लिये एक संदेश है। इसलिये आलस्य और कर्तव्य-विमुखता न केवल अपने लिये, बल्कि दूसरों के लिये भी हानिकारक है।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४ ॥
अन्वय
चेत् अहं कर्म न कुर्याम्, इमे लोकाः उत्सीदेयुः; (अहं) सङ्करस्य च कर्ता स्याम्, इमाः प्रजाः उपहन्याम्।
हिन्दी अनुवाद
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब लोक नष्ट-भ्रष्ट हो जायें, और मैं वर्णसंकर (अव्यवस्था) का कर्ता होऊँ तथा इस सारी प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ।
भावार्थ
भगवान् कर्म-त्याग के गम्भीर परिणाम बताते हैं। यदि परमात्मा अपना कार्य — सृष्टि का संचालन — बन्द कर दें, तो सारा जगत् नष्ट हो जायेगा। सूर्य उदय न हो, ऋतुएँ न बदलें, तो जीवन असम्भव है। इसी प्रकार समाज में यदि श्रेष्ठ लोग अपना कर्तव्य छोड़ दें, तो सामाजिक व्यवस्था बिखर जायेगी — 'संकर' अर्थात् अव्यवस्था और भ्रम फैलेगा। इस प्रकार कर्म केवल व्यक्तिगत मोक्ष का साधन नहीं, बल्कि विश्व-व्यवस्था का आधार है।
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥ २५ ॥
अन्वय
(हे) भारत! यथा कर्मणि सक्ताः अविद्वांसः कुर्वन्ति, तथा विद्वान् असक्तः (सन्) लोकसङ्ग्रहं चिकीर्षुः कुर्यात्।
हिन्दी अनुवाद
हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानी जन जिस प्रकार कर्म करते हैं, उसी प्रकार आसक्ति-रहित विद्वान् भी लोक-संग्रह करने की इच्छा से कर्म करे।
भावार्थ
ज्ञानी और अज्ञानी दोनों कर्म करते हैं, पर अन्तर भाव में है। अज्ञानी फल की आसक्ति से उत्साहपूर्वक कर्म करता है; ज्ञानी को भी उतने ही उत्साह और लगन से कर्म करना चाहिये, पर आसक्ति के बिना, लोक-कल्याण के लिये। बाहर से दोनों का कार्य एक जैसा दिख सकता है, पर भीतर पूर्ण अन्तर है। ज्ञानी के लिये कर्म पूजा है, अज्ञानी के लिये व्यापार। ज्ञान का अर्थ कर्म में ढिलाई नहीं, बल्कि कर्म में शुद्धता है।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥ २६ ॥
अन्वय
विद्वान् कर्मसङ्गिनाम् अज्ञानां बुद्धिभेदं न जनयेत्; (स्वयं) युक्तः (सन्) सर्वकर्माणि समाचरन् (तान्) जोषयेत्।
हिन्दी अनुवाद
ज्ञानी पुरुष कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, बल्कि स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहकर सब कर्मों को भली-भाँति करता हुआ उनसे भी वैसा ही करवाये।
भावार्थ
यह शिक्षकों और मार्गदर्शकों के लिये एक बुद्धिमानी भरी सलाह है। जो लोग अभी कर्म में आसक्त हैं, उन्हें अचानक 'कर्म व्यर्थ है, सब माया है' कहना उचित नहीं — इससे वे भ्रमित होकर कर्म भी छोड़ देंगे और ज्ञान भी नहीं पा सकेंगे। ज्ञानी को चाहिये कि स्वयं निष्काम भाव से कर्म करते हुए दूसरों को धीरे-धीरे सही दिशा दे। हर व्यक्ति की अपनी योग्यता और अवस्था होती है; उसी के अनुसार उसे मार्ग दिखाना चाहिये। उपदेश देने से पहले आचरण से प्रेरणा देना श्रेष्ठ है।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥ २७ ॥
अन्वय
प्रकृतेः गुणैः कर्माणि सर्वशः क्रियमाणानि (सन्ति); अहङ्कारविमूढात्मा 'अहं कर्ता' इति मन्यते।
हिन्दी अनुवाद
वास्तव में सभी कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, परन्तु अहंकार से मोहित अन्तःकरण वाला अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' — ऐसा मान लेता है।
भावार्थ
भगवान् कर्म का दार्शनिक विश्लेषण करते हैं। शरीर, मन, इन्द्रियाँ — ये सब प्रकृति के अंग हैं, और प्रकृति के तीन गुण ही इनसे कर्म करवाते हैं। आत्मा तो केवल साक्षी है। परन्तु अहंकार के कारण मनुष्य सोचता है — 'मैंने किया'। यही कर्तापन का भाव कर्म को बन्धन बना देता है। जब व्यक्ति समझ लेता है कि कर्म प्रकृति के गुणों से हो रहे हैं और वह केवल द्रष्टा है, तो वह कर्म करते हुए भी मुक्त रहता है। अहंकार का त्याग ही कर्म-बन्धन से मुक्ति का द्वार है।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥
अन्वय
(हे) महाबाहो! गुणकर्मविभागयोः तत्त्ववित् तु 'गुणाः गुणेषु वर्तन्ते' इति मत्वा न सज्जते।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभाग के तत्त्व को जानने वाला ज्ञानी 'सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं' — ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
भावार्थ
तत्त्वज्ञानी व्यक्ति समझता है कि इन्द्रियाँ (जो गुणों से बनी हैं) अपने विषयों (जो भी गुणों से बने हैं) में प्रवृत्त हो रही हैं — 'गुण गुणों में बरत रहे हैं'। आँख रूप को देखती है, कान शब्द को सुनते हैं — यह प्रकृति का प्राकृतिक व्यापार है, आत्मा इसमें लिप्त नहीं। इस समझ से वह कर्मों में आसक्त नहीं होता। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई दर्शक नाटक देखता है, पर उसमें स्वयं को नहीं खोता। साक्षी-भाव का अभ्यास मानसिक शान्ति का एक प्रभावी उपाय है।
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ २९ ॥
अन्वय
प्रकृतेः गुणसम्मूढाः गुणकर्मसु सज्जन्ते; कृत्स्नवित् तान् अकृत्स्नविदः मन्दान् न विचालयेत्।
हिन्दी अनुवाद
प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं; उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्ण रूप से जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे।
भावार्थ
भगवान् फिर से (श्लोक २६ की तरह) ज्ञानी को सावधान करते हैं। जो लोग प्रकृति के गुणों से मोहित हैं और कर्म में आसक्त हैं, वे 'अकृत्स्नवित्' हैं — सत्य को अधूरा जानने वाले। ज्ञानी को उन्हें अचानक उनके कर्म-मार्ग से हटाना नहीं चाहिये। धीरे-धीरे, उनकी समझ के अनुसार उन्हें ऊपर उठाना चाहिये। यदि किसी को तैरना न आता हो, तो उसकी नाव छीन लेना उसे डुबो देगा। आध्यात्मिक मार्गदर्शन में धैर्य और विवेक अत्यन्त आवश्यक हैं।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३० ॥
अन्वय
अध्यात्मचेतसा सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य निराशीः निर्ममः (च) भूत्वा विगतज्वरः (सन्) युध्यस्व।
हिन्दी अनुवाद
मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके, आशा-रहित, ममता-रहित और सन्ताप-रहित होकर युद्ध करो।
भावार्थ
यह श्लोक कर्मयोग और भक्तियोग का सुन्दर संगम है। भगवान् कहते हैं — 'मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य', सब कर्म मुझे अर्पण करो। जब कर्म ईश्वर को समर्पित होता है, तो उसका फल भी ईश्वर का हो जाता है, और कर्ता चिन्ता से मुक्त रहता है। 'निराशीः' — फल की आशा न हो; 'निर्ममः' — 'मेरा' भाव न हो; 'विगतज्वरः' — मानसिक सन्ताप, बेचैनी न हो। इस भाव से किया गया युद्ध भी पूजा बन जाता है। जीवन के हर संघर्ष को इस समर्पण भाव से लड़ना ही गीता का संदेश है।
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥
अन्वय
ये मानवाः श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः (च सन्तः) मे इदं मतं नित्यम् अनुतिष्ठन्ति, ते अपि कर्मभिः मुच्यन्ते।
हिन्दी अनुवाद
जो मनुष्य दोष-दृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों के बन्धन से छूट जाते हैं।
भावार्थ
भगवान् अपने उपदेश के पालन का फल बताते हैं — कर्म-बन्धन से मुक्ति। इसके लिये दो शर्तें हैं — 'श्रद्धावन्तः' (श्रद्धा रखने वाले) और 'अनसूयन्तः' (दोष न देखने वाले)। श्रद्धा का अर्थ अन्धविश्वास नहीं, बल्कि उपदेश में विश्वास रखकर उसे जीवन में उतारने का प्रयत्न है। 'असूया' का अर्थ है गुणों में भी दोष ढूँढना; जो व्यक्ति उपदेश में कमियाँ ही ढूँढता रहे, वह उससे लाभ नहीं उठा सकता। ग्रहणशीलता और विश्वास के साथ किया गया छोटा अभ्यास भी बड़ा फल देता है।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्। सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥
अन्वय
ये तु एतत् अभ्यसूयन्तः मे मतं न अनुतिष्ठन्ति, तान् सर्वज्ञानविमूढान् अचेतसः नष्टान् विद्धि।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मत में दोषारोपण करते हुए इसका अनुसरण नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और विवेकहीन लोगों को तुम नष्ट हुआ ही समझो।
भावार्थ
पिछले श्लोक के विपरीत, भगवान् उन लोगों की गति बताते हैं जो इस उपदेश में दोष देखते हैं और इसे नहीं अपनाते। वे 'सर्वज्ञानविमूढ' हैं — सब प्रकार के ज्ञान में भ्रमित, और 'अचेतस' — विवेकहीन। ऐसे लोग आध्यात्मिक रूप से 'नष्ट' — अपने कल्याण के मार्ग से भटके हुए — हैं। यह किसी को डराने के लिये नहीं, बल्कि सत्य बताने के लिये है: जो व्यक्ति सही मार्गदर्शन को अस्वीकार करता है, वह स्वयं अपनी हानि करता है। बीमार व्यक्ति यदि दवा को ही दोषपूर्ण माने, तो उसका रोग कैसे जायेगा?
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥
अन्वय
ज्ञानवान् अपि स्वस्याः प्रकृतेः सदृशं चेष्टते; भूतानि प्रकृतिं यान्ति; निग्रहः किं करिष्यति?
हिन्दी अनुवाद
ज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृति (स्वभाव) के अनुसार ही चेष्टा करता है; सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चलते हैं, फिर इसमें किसी का हठपूर्वक निग्रह क्या करेगा?
भावार्थ
भगवान् स्वभाव की शक्ति को स्वीकार करते हैं। हर व्यक्ति अपने पूर्व-संस्कारों और गुणों से बने स्वभाव के अनुसार ही कार्य करता है; ज्ञानी भी अपने स्वभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं होता। केवल हठपूर्वक दमन (निग्रह) से स्वभाव नहीं बदलता। इसलिये उचित यह है कि अपने स्वभाव के अनुकूल कर्तव्य को चुनें और उसे निष्काम भाव से करें। अर्जुन का स्वभाव क्षत्रिय का है; यदि वह हठपूर्वक संन्यासी बनने का प्रयास करे, तो सफल नहीं होगा। स्वभाव को समझकर उसे सही दिशा देना ही बुद्धिमानी है।
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥
अन्वय
इन्द्रियस्य इन्द्रियस्य अर्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ; तयोः वशं न आगच्छेत्, हि तौ अस्य परिपन्थिनौ।
हिन्दी अनुवाद
प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं; मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिये, क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण-मार्ग में विघ्न करने वाले महान् शत्रु हैं।
भावार्थ
स्वभाव के अनुसार कर्म करने की छूट का अर्थ यह नहीं कि राग-द्वेष के वश में हो जायें। हर इन्द्रिय-विषय के साथ राग (पसन्द) और द्वेष (नापसन्द) जुड़े रहते हैं — मीठा अच्छा लगता है, कड़वा बुरा। ये स्वाभाविक हैं, पर इनके 'वश' में नहीं होना चाहिये। इन्हें 'परिपन्थी' — मार्ग के लुटेरे — कहा गया है, जो साधक की आध्यात्मिक सम्पत्ति लूट लेते हैं। स्वभाव का सम्मान और राग-द्वेष पर नियन्त्रण — यही सन्तुलित साधना है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥
अन्वय
स्वनुष्ठितात् परधर्मात् विगुणः (अपि) स्वधर्मः श्रेयान्; स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मः भयावहः।
हिन्दी अनुवाद
अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित होने पर भी अपना धर्म अति उत्तम है; अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है, पर दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
भावार्थ
यह गीता का एक प्रसिद्ध सिद्धान्त है — स्वधर्म की श्रेष्ठता। अपना कर्तव्य, भले ही उसमें कुछ कमियाँ हों, दूसरे के कर्तव्य से श्रेष्ठ है, चाहे वह कितनी ही अच्छी तरह किया जा सके। अर्जुन क्षत्रिय-धर्म छोड़कर ब्राह्मण की तरह भिक्षा माँगने की बात कर रहे थे; भगवान् कहते हैं कि यह परधर्म है। अपने स्वभाव और स्थिति के अनुसार कर्तव्य करने में ही विकास और शान्ति है; दूसरे की नकल करने में भय और भ्रम है। आज के समय में भी, अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार कार्य चुनना, दूसरों की देखा-देखी नहीं — यही सफलता और सन्तोष का मार्ग है।
३.३६ अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) वार्ष्णेय! अथ अयं पूरुषः अनिच्छन् अपि बलात् नियोजितः इव केन प्रयुक्तः (सन्) पापं चरति?
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी, मानो बलपूर्वक लगाया हुआ, किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?
भावार्थ
अर्जुन एक गहरा और सार्वभौमिक प्रश्न पूछते हैं। हम जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत, फिर भी कई बार गलत कर बैठते हैं — मानो कोई शक्ति हमें बलपूर्वक खींच रही हो। यह मानव-जीवन की सबसे बड़ी पहेली है। महाभारत में दुर्योधन ने भी कहा था — 'मैं धर्म जानता हूँ पर उसमें प्रवृत्ति नहीं, अधर्म जानता हूँ पर उससे निवृत्ति नहीं।' अर्जुन जानना चाहते हैं कि वह छिपा हुआ शत्रु कौन है। यह प्रश्न हर साधक का प्रश्न है, जो अपनी कमज़ोरियों से संघर्ष कर रहा है।
३.३७ श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — रजोगुणसमुद्भवः एषः कामः, एषः क्रोधः, महाशनः महापाप्मा; इह एनं वैरिणं विद्धि।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है; यह बहुत खाने वाला (कभी तृप्त न होने वाला) और बड़ा पापी है; इसको ही तुम इस विषय में शत्रु जानो।
भावार्थ
भगवान् स्पष्ट उत्तर देते हैं — वह शत्रु है 'काम' अर्थात् कामना, इच्छा। यही काम जब बाधित होता है तो 'क्रोध' बन जाता है; इसलिये दोनों एक ही हैं। यह रजोगुण से उत्पन्न होता है — रजोगुण अर्थात् क्रियाशीलता और आसक्ति का गुण। इसे 'महाशन' कहा गया — जो कभी तृप्त नहीं होता; जितना भोग दो, उतनी भूख बढ़ती है। और 'महापाप्मा' — सबसे बड़ा पापी, क्योंकि सारे पाप इसी से प्रेरित होते हैं। अपने शत्रु को पहचानना ही उस पर विजय का पहला कदम है।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च। यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥
अन्वय
यथा वह्निः धूमेन आव्रियते, आदर्शः च मलेन (आव्रियते), यथा गर्भः उल्बेन आवृतः, तथा तेन इदम् आवृतम्।
हिन्दी अनुवाद
जैसे धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढक जाता है, तथा जैसे जेर (झिल्ली) से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है।
भावार्थ
भगवान् तीन उपमाओं से बताते हैं कि काम ज्ञान को कैसे ढकता है, और ये तीनों तीन अवस्थाओं को दर्शाती हैं। धुएँ से ढकी अग्नि — थोड़ी हवा से धुआँ हटते ही अग्नि दिख जाती है; यह सात्त्विक व्यक्ति की अवस्था है, जहाँ कामना हल्की है। मैल से ढका दर्पण — इसे साफ करने में प्रयत्न लगता है; यह राजसिक व्यक्ति की अवस्था है। जेर से ढका गर्भ — इसे हटने में समय लगता है; यह तामसिक व्यक्ति की अवस्था है। ज्ञान सबके भीतर है, केवल आवरण की मोटाई अलग-अलग है।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! ज्ञानिनः नित्यवैरिणा दुष्पूरेण अनलेन च कामरूपेण एतेन ज्ञानम् आवृतम्।
हिन्दी अनुवाद
और हे कुन्तीपुत्र! इस अग्नि के समान कभी पूर्ण न होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य शत्रु के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है।
भावार्थ
काम को 'ज्ञानियों का नित्य शत्रु' कहा गया है। अज्ञानी को तो भोग के समय काम मित्र लगता है और बाद में दुःख देने पर शत्रु; पर ज्ञानी उसे सदा शत्रु के रूप में पहचानता है। काम की तुलना 'अनल' — अग्नि — से की गई है, जिसे 'दुष्पूर' कहा गया, कभी तृप्त न होने वाली। अग्नि में जितना घी डालो, वह उतनी ही भड़कती है; इच्छाओं को भोग से शान्त करने का प्रयास भी ऐसा ही है। तृप्ति भोग में नहीं, विवेक और संयम में है।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते। एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥
अन्वय
इन्द्रियाणि मनः बुद्धिः (च) अस्य अधिष्ठानम् उच्यते; एषः एतैः ज्ञानम् आवृत्य देहिनं विमोहयति।
हिन्दी अनुवाद
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि — ये सब इस काम के निवास-स्थान कहे जाते हैं; यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को ढककर जीवात्मा को मोहित करता है।
भावार्थ
शत्रु को जीतने के लिये उसके ठिकाने जानना आवश्यक है। भगवान् बताते हैं कि काम तीन स्थानों पर रहता है — इन्द्रियों में (विषयों की ओर खिंचाव), मन में (इच्छा और कल्पना) और बुद्धि में (भोग को उचित ठहराने वाले तर्क)। जब बुद्धि भी काम के पक्ष में तर्क देने लगती है, तब व्यक्ति पूर्णतः मोहित हो जाता है। इन तीनों किलों से काम आत्मा के ज्ञान को ढक देता है। साधना का अर्थ है इन तीनों को एक-एक करके शुद्ध करना।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ। पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥
अन्वय
तस्मात् (हे) भरतर्षभ! त्वम् आदौ इन्द्रियाणि नियम्य ज्ञानविज्ञाननाशनं पाप्मानम् एनं हि प्रजहि।
हिन्दी अनुवाद
इसलिये हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! तुम पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान् पापी काम को निश्चयपूर्वक बलपूर्वक मार डालो।
भावार्थ
भगवान् विजय की रणनीति बताते हैं — 'आदौ इन्द्रियाणि नियम्य', पहले इन्द्रियों को वश में करो। काम के तीन किलों में सबसे बाहरी इन्द्रियाँ हैं; वहीं से शुरुआत करनी चाहिये। जब इन्द्रियाँ नियन्त्रित होंगी, तो मन और बुद्धि पर काम का प्रभाव कम होगा। काम 'ज्ञान' (शास्त्र-ज्ञान) और 'विज्ञान' (अनुभवजन्य ज्ञान) दोनों का नाश करता है। 'प्रजहि' — मार डालो — यह शब्द दृढ़ संकल्प का संकेत है; काम से समझौता नहीं, पूर्ण विजय चाहिये। अर्जुन को बाहरी युद्ध से पहले भीतर का युद्ध जीतने का आदेश है।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥
अन्वय
इन्द्रियाणि पराणि आहुः, इन्द्रियेभ्यः मनः परम्, मनसः तु बुद्धिः परा, यः तु बुद्धेः परतः सः (आत्मा)।
हिन्दी अनुवाद
इन्द्रियों को (स्थूल शरीर से) श्रेष्ठ, बलवान् और सूक्ष्म कहते हैं; इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, और जो बुद्धि से भी अत्यन्त श्रेष्ठ है, वह आत्मा है।
भावार्थ
भगवान् हमारे अस्तित्व का एक पदानुक्रम बताते हैं — जो कठोपनिषद् से भी मिलता है। स्थूल शरीर से इन्द्रियाँ सूक्ष्म और बलवान् हैं, इन्द्रियों से मन, मन से बुद्धि, और बुद्धि से भी ऊपर आत्मा। यह क्रम हमें बताता है कि काम पर विजय कैसे पायें — निचले स्तर को ऊँचे स्तर से नियन्त्रित करें। इन्द्रियों को मन से, मन को बुद्धि से, और बुद्धि को आत्मा की शक्ति से। जब हम अपनी सबसे ऊँची पहचान — आत्मा — में स्थित होते हैं, तो नीचे के सभी स्तर स्वतः अनुशासित हो जाते हैं।
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥
अन्वय
(हे) महाबाहो! एवं बुद्धेः परं (आत्मानं) बुद्ध्वा आत्मना आत्मानं संस्तभ्य दुरासदं कामरूपं शत्रुं जहि।
हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार बुद्धि से भी परे आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तुम इस काम रूपी दुर्जय शत्रु को मार डालो।
भावार्थ
तीसरे अध्याय का यह समापन-श्लोक एक युद्ध-घोष की तरह है। भगवान् कहते हैं — अपनी वास्तविक पहचान को जानो, जो बुद्धि से भी परे है; फिर 'आत्मना आत्मानं संस्तभ्य' — अपने उच्च स्वरूप से अपने निम्न स्वरूप (मन) को स्थिर करो। काम को 'दुरासद' — जिसे जीतना कठिन है — कहा गया, पर असम्भव नहीं। अर्जुन को 'महाबाहो' कहकर उनके सामर्थ्य की याद दिलाई जाती है। यह अध्याय 'कर्मयोग' कहलाता है; इसमें कर्म की अनिवार्यता, यज्ञ-भाव, लोकसंग्रह, स्वधर्म और काम-विजय — सभी का सुन्दर समन्वय है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥

ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।
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