भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (हे) महाबाहो! भूयः एव मे परमं वचः शृणु, यत् अहं प्रीयमाणाय ते हितकाम्यया वक्ष्यामि।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन, जिसे मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिये हित की इच्छा से कहूँगा।
भावार्थ
दसवाँ अध्याय 'विभूतियोग' कहलाता है, जिसमें भगवान् अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं। भगवान् कहते हैं कि वे यह 'परम वचन' अर्जुन को इसलिये बता रहे हैं कि अर्जुन 'प्रीयमाण' हैं — भगवान् के वचनों को सुनकर प्रसन्न होते हैं, उनमें आनन्द लेते हैं। और भगवान् 'हितकाम्यया' — अर्जुन के हित की इच्छा से — बोल रहे हैं। जब श्रोता प्रेम से सुनता है, तो वक्ता का उत्साह बढ़ता है। गुरु-शिष्य का यह प्रेमपूर्ण सम्बन्ध ज्ञान के प्रवाह को सहज बनाता है।
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥
अन्वय
मे प्रभवं न सुरगणाः विदुः, न महर्षयः; हि अहं देवानां महर्षीणां च सर्वशः आदिः (अस्मि)।
हिन्दी अनुवाद
मेरी उत्पत्ति को अर्थात् लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ।
भावार्थ
भगवान् के मूल को देवता और महर्षि भी नहीं जानते। क्यों? क्योंकि भगवान् उन सबके 'आदि' — मूल कारण — हैं। संतान अपने माता-पिता के जन्म को कैसे देख सकती है? जो बाद में आया, वह पहले वाले के मूल को पूरी तरह नहीं जान सकता। देवता और ऋषि भगवान् से उत्पन्न हुए हैं, इसलिये वे भगवान् के आदि-स्वरूप को अपनी सीमित दृष्टि से नहीं माप सकते। भगवान् को केवल उनकी कृपा से ही जाना जा सकता है।
जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तव में जन्मरहित, अनादि और लोकों का महान् ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान् पुरुष सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
भावार्थ
भगवान् को तीन रूपों में जानने का फल — 'अज' (जन्मरहित), 'अनादि' (आदिरहित, सदा से विद्यमान) और 'लोकमहेश्वर' (सब लोकों के महान् ईश्वर)। जो इन्हें तत्त्व से जानता है, वह 'असम्मूढ़' — मोह से मुक्त — हो जाता है और सब पापों से छूट जाता है। भगवान् के सच्चे स्वरूप को जानना ही सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है, क्योंकि इससे हृदय में उनके प्रति श्रद्धा और प्रेम जागता है, जो सब पापों को धो देता है।
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥
अन्वय
बुद्धिः, ज्ञानम्, असम्मोहः, क्षमा, सत्यं, दमः, शमः, सुखं, दुःखं, भवः, अभावः, भयं च अभयम् एव च —
हिन्दी अनुवाद
निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का वश में करना, मन का निग्रह, सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय —
भावार्थ
यहाँ से भगवान् बताते हैं कि प्राणियों के विभिन्न भाव भी उनसे ही उत्पन्न होते हैं। 'बुद्धि' (निर्णय की शक्ति), 'ज्ञान', 'असम्मोह' (भ्रम न होना), 'क्षमा', 'सत्य', 'दम' (इन्द्रिय-संयम), 'शम' (मन की शान्ति) — ये सकारात्मक गुण हैं। फिर द्वन्द्व — 'सुख-दुःख', 'भव-अभाव' (उत्पत्ति-विनाश), 'भय-अभय'। ध्यान देने योग्य है कि दुःख और भय भी भगवान् से ही हैं। जीवन के सब अनुभव — अच्छे और बुरे — भगवान् की व्यवस्था के अंग हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
तथा अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति — ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं।
भावार्थ
भावों की सूची जारी है — 'अहिंसा' (किसी को कष्ट न देना), 'समता', 'तुष्टि' (सन्तोष), 'तप', 'दान', 'यश' और 'अयश' (अपकीर्ति)। ये सब बीस भाव प्राणियों में भगवान् से ही उत्पन्न होते हैं। इसका अर्थ यह है कि जब हम किसी में क्षमा, सत्य या दान जैसे गुण देखते हैं, तो वह भगवान् की ही अभिव्यक्ति है। और जब हममें ये गुण आते हैं, तो उन पर अहंकार नहीं करना चाहिये — वे भगवान् की देन हैं।
सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु — ये मुझमें भाव वाले सब के सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह सम्पूर्ण प्रजा है।
भावार्थ
भगवान् सृष्टि के आदि पुरुषों का उल्लेख करते हैं — 'सप्त महर्षि' (मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ), 'चत्वारः' (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार — चार कुमार, या कुछ व्याख्याओं में चार मनु) और 'मनु'। ये सब भगवान् के 'मानस' — संकल्प से — उत्पन्न हुए और 'मद्भावाः' — भगवान् के भाव से युक्त थे। इन्हीं से संसार की सारी प्रजा उत्पन्न हुई। इस प्रकार हम सब भगवान् की ही संतान हैं, एक ही परिवार के सदस्य।
जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्य रूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है, वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है — इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
भावार्थ
भगवान् की 'विभूति' (ऐश्वर्य, सृष्टि में उनकी अभिव्यक्तियाँ) और 'योग' (उनकी दिव्य शक्ति) को तत्त्व से जानने का फल — 'अविकम्प योग', अर्थात् ऐसी भक्ति जो कभी डगमगाती नहीं। जब कोई सब जगह भगवान् की महिमा देखने लगता है — सूर्य के प्रकाश में, पर्वतों की ऊँचाई में, महापुरुषों के गुणों में — तो उसकी श्रद्धा अटल हो जाती है। ज्ञान श्रद्धा को दृढ़ बनाता है। इसीलिये भगवान् आगे अपनी विभूतियों का विस्तार से वर्णन करेंगे।
मैं वासुदेव ही सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत् चेष्टा करता है — इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान् भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरन्तर भजते हैं।
भावार्थ
श्लोक 8 से 11 तक को 'चतुःश्लोकी गीता' कहा जाता है — गीता का सार चार श्लोकों में। पहला सत्य — 'अहं सर्वस्य प्रभवः' — भगवान् सबके मूल हैं; और 'मत्तः सर्वं प्रवर्तते' — उन्हीं से सब कुछ चलता है। जो 'बुध' — ज्ञानी — इसे समझ लेते हैं, वे 'भावसमन्वित' — प्रेम और श्रद्धा से भरे हृदय से — भगवान् को भजते हैं। यहाँ ज्ञान और भक्ति का सुन्दर मेल है — सही समझ से सच्चा प्रेम उत्पन्न होता है।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥
अन्वय
मच्चित्ताः मद्गतप्राणाः (ते) परस्परं बोधयन्तः, नित्यं मां कथयन्तः च तुष्यन्ति च रमन्ति च।
हिन्दी अनुवाद
निरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जनाते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरन्तर सन्तुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरन्तर रमण करते हैं।
भावार्थ
यह भक्तों के जीवन का सुन्दर चित्र है। वे 'मच्चित्त' — मन भगवान् में लगाये — और 'मद्गतप्राण' — प्राण भगवान् को अर्पित किये — रहते हैं। जब भक्त मिलते हैं, तो 'परस्परं बोधयन्तः' — एक-दूसरे को भगवान् की महिमा समझाते हैं — और 'कथयन्तः' — भगवान् की कथाएँ कहते हैं। इसी में वे 'तुष्यन्ति' (सन्तुष्ट होते हैं) और 'रमन्ति' (आनन्द लेते हैं)। यह सत्संग का महत्व है — समान विचार वाले लोगों के साथ भगवान् की चर्चा करना भक्ति को पोषित करता है। जैसे प्रेमी अपने प्रिय की बातें करते नहीं थकते।
उन निरन्तर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञान रूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
भक्तों के प्रति भगवान् की प्रतिक्रिया — जो 'सततयुक्त' (निरन्तर जुड़े) और 'प्रीतिपूर्वक' (प्रेम से) भजते हैं, उन्हें भगवान् स्वयं 'बुद्धियोग' — सही समझ, विवेक — देते हैं, जिससे वे भगवान् तक पहुँचते हैं। भक्त को सब कुछ स्वयं जानने की आवश्यकता नहीं; भगवान् स्वयं उसे मार्ग दिखाते हैं। जैसे कोई अन्धेरे में चलते हुए यात्री को प्रकाश दे दे। प्रेम करो, ज्ञान भगवान् देंगे।
हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिये उनके अन्तःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञान रूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ।
भावार्थ
चतुःश्लोकी का अन्तिम श्लोक भगवान् की करुणा का चरम है। 'अनुकम्पार्थम्' — केवल दया के कारण — भगवान् भक्त के हृदय में स्थित होकर 'भास्वता ज्ञानदीपेन' — चमकते हुए ज्ञान के दीपक से — अज्ञान के अन्धकार को नष्ट कर देते हैं। भक्त को कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं; भगवान् भीतर से ही प्रकाश देते हैं। यह भक्ति और ज्ञान के सम्बन्ध का सुन्दर वर्णन है — भक्ति से ज्ञान स्वयं प्रकट होता है, भगवान् की कृपा से।
अर्जुन बोले — आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं; क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष, देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं।
भावार्थ
भगवान् के वचनों से अर्जुन का हृदय भर आता है और वे स्तुति करने लगते हैं। वे भगवान् को 'परम ब्रह्म' (सर्वोच्च सत्य), 'परम धाम' (सर्वोच्च आश्रय), 'परम पवित्र' (सबसे पवित्र करने वाले), 'शाश्वत पुरुष', 'दिव्य', 'आदिदेव' (देवताओं के भी आदि), 'अज' (अजन्मा) और 'विभु' (सर्वव्यापी) कहते हैं। यह अर्जुन की श्रद्धा का प्रकटीकरण है — अब वे श्रीकृष्ण को केवल मित्र नहीं, परमेश्वर के रूप में देख रहे हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥
अन्वय
सर्वे ऋषयः तथा देवर्षिः नारदः, असितः, देवलः, व्यासः (च) त्वाम् (एवम्) आहुः; स्वयं च एव मे ब्रवीषि।
हिन्दी अनुवाद
वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और आप भी मेरे प्रति कहते हैं।
भावार्थ
अर्जुन कहते हैं कि यह केवल उनकी व्यक्तिगत धारणा नहीं — सभी ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल और महर्षि व्यास ने भी यही कहा है। और अब भगवान् स्वयं अपने मुख से यही बता रहे हैं। यह शास्त्र-प्रमाण, ऋषि-प्रमाण और भगवान् के स्वयं के वचन — तीनों का मेल है। अर्जुन ने ऋषियों से भगवान् की महिमा पहले सुनी थी, पर अब स्वयं भगवान् से सुनकर उनका विश्वास दृढ़ हो गया है।
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
न हि ते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥
अन्वय
(हे) केशव! यत् मां वदसि, एतत् सर्वम् ऋतं मन्ये; हि (हे) भगवन्! ते व्यक्तिं न देवाः विदुः, न दानवाः।
हिन्दी अनुवाद
हे केशव! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपके लीलामय स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही।
भावार्थ
अर्जुन पूर्ण श्रद्धा व्यक्त करते हैं — 'सर्वमेतदृतं मन्ये' — आप जो कुछ कहते हैं, वह सब सत्य है। यह अन्धविश्वास नहीं, बल्कि अनुभव और समझ से उत्पन्न विश्वास है। फिर वे स्वीकार करते हैं कि भगवान् की 'व्यक्ति' — प्रकट स्वरूप — को न देवता जानते हैं, न दानव। देवता अपने सुखों में, दानव अपने अहंकार में उलझे रहते हैं; दोनों ही भगवान् के वास्तविक स्वरूप तक नहीं पहुँच पाते। केवल भगवान् की कृपा से ही उन्हें जाना जा सकता है।
हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत् के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं।
भावार्थ
अर्जुन भगवान् को पाँच सम्बोधनों से पुकारते हैं — 'भूतभावन' (प्राणियों को उत्पन्न करने वाले), 'भूतेश' (प्राणियों के स्वामी), 'देवदेव' (देवताओं के भी देवता), 'जगत्पति' (जगत् के पालक) और 'पुरुषोत्तम' (पुरुषों में श्रेष्ठ)। और वे कहते हैं — 'स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ' — आप ही अपने द्वारा अपने को जानते हैं। जैसे सूर्य को देखने के लिये किसी दूसरे प्रकाश की आवश्यकता नहीं, वह स्वयं प्रकाशित है; वैसे ही भगवान् स्वयं-प्रकाश हैं, उन्हें केवल वे ही पूरी तरह जानते हैं।
इसलिये आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को सम्पूर्णता से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों के द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।
भावार्थ
क्योंकि भगवान् ही अपने को पूरी तरह जानते हैं, इसलिये अर्जुन प्रार्थना करते हैं कि वे स्वयं अपनी दिव्य विभूतियों का 'अशेषेण' — पूर्ण रूप से — वर्णन करें — वे विभूतियाँ जिनसे वे सब लोकों में व्याप्त हैं। अर्जुन जानना चाहते हैं कि संसार में भगवान् कहाँ-कहाँ और किन रूपों में दिखाई देते हैं। यह जिज्ञासा केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि भक्ति से उत्पन्न है — प्रेमी अपने प्रिय के बारे में सब कुछ जानना चाहता है।
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥
अन्वय
(हे) योगिन्! अहं सदा परिचिन्तयन् त्वां कथं विद्याम्? (हे) भगवन्! च (त्वं) केषु केषु भावेषु मया चिन्त्यः असि?
हिन्दी अनुवाद
हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिन्तन करने योग्य हैं?
भावार्थ
अर्जुन का प्रश्न अत्यन्त व्यावहारिक है — 'मैं आपका निरन्तर चिन्तन कैसे करूँ?' भगवान् निराकार और सर्वव्यापी हैं; उनका ध्यान कैसे किया जाये? इसलिये अर्जुन पूछते हैं कि 'किन-किन भावों में' — किन वस्तुओं, व्यक्तियों या रूपों में — भगवान् का चिन्तन किया जाये। यह प्रश्न हर साधक के लिये महत्वपूर्ण है। सामान्य मन को ध्यान के लिये कोई आधार चाहिये। भगवान् इसका उत्तर अपनी विभूतियों के वर्णन से देंगे।
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥
अन्वय
(हे) जनार्दन! आत्मनः योगं विभूतिं च विस्तरेण भूयः कथय; हि अमृतं शृण्वतः मे तृप्तिः न अस्ति।
हिन्दी अनुवाद
हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिये, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात् सुनने की उत्कण्ठा बनी ही रहती है।
भावार्थ
अर्जुन का यह वचन भक्ति की सुन्दर अभिव्यक्ति है — 'शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्' — आपके अमृत समान वचन सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती। भगवान् ने सातवें और नौवें अध्याय में भी अपनी विभूतियों के बारे में बताया था, पर अर्जुन फिर से, और विस्तार से सुनना चाहते हैं। सच्चे भक्त को भगवान् की कथा कभी पुरानी नहीं लगती; जितना सुनता है, उतनी प्यास बढ़ती है। यही कारण है कि भक्त बार-बार रामायण, भागवत, गीता का पाठ करते हैं।
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (हे) कुरुश्रेष्ठ! हन्त! (अहं) ते दिव्याः आत्मविभूतयः प्राधान्यतः कथयिष्यामि; हि मे विस्तरस्य अन्तः न अस्ति।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तेरे लिये प्रधानता से कहूँगा; क्योंकि मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।
भावार्थ
भगवान् प्रसन्न होकर 'हन्त' — अच्छा! — कहते हैं और विभूतियों का वर्णन करना स्वीकार करते हैं। पर वे स्पष्ट करते हैं कि वे केवल 'प्राधान्यतः' — मुख्य-मुख्य — विभूतियाँ बतायेंगे, क्योंकि उनके विस्तार का कोई अन्त नहीं। अनन्त को सीमित शब्दों में कैसे समेटा जाये? जैसे समुद्र के जल को एक घड़े में भरकर नहीं दिखाया जा सकता, केवल कुछ बूँदें दिखाई जा सकती हैं। आगे के श्लोकों में भगवान् हर वर्ग की सर्वश्रेष्ठ वस्तु को अपनी विभूति बतायेंगे।
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
अन्वय
(हे) गुडाकेश! अहं सर्वभूताशयस्थितः आत्मा (अस्मि); अहं भूतानाम् आदिः च मध्यं च अन्तः एव च (अस्मि)।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ।
भावार्थ
विभूतियों का वर्णन सबसे महत्वपूर्ण विभूति से आरम्भ होता है — 'अहमात्मा सर्वभूताशयस्थितः' — मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। भगवान् को कहीं दूर खोजने की आवश्यकता नहीं; वे हमारे भीतर ही हैं। और वे सब प्राणियों के 'आदि' (उत्पत्ति), 'मध्य' (स्थिति) और 'अन्त' (लय) हैं। यह सबसे गहरी विभूति है; बाकी सब विभूतियाँ इसी का विस्तार हैं। अर्जुन को 'गुडाकेश' — निद्रा को जीतने वाला — कहा गया, जो उनकी जागरूकता का संकेत है।
मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायु-देवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चन्द्रमा हूँ।
भावार्थ
अब विभूतियों का क्रमबद्ध वर्णन आरम्भ होता है — हर वर्ग में जो सर्वश्रेष्ठ है, वह भगवान् की विभूति है। बारह आदित्यों (अदिति के पुत्रों) में 'विष्णु' (वामन अवतार); प्रकाशमान पिण्डों में किरणों वाला 'सूर्य'; उनचास मरुतों (वायु देवताओं) में 'मरीचि'; और नक्षत्रों में 'चन्द्रमा'। इन विभूतियों का उद्देश्य यह है कि जब हम किसी वस्तु की श्रेष्ठता देखें — सूर्य का तेज, चन्द्रमा की शीतलता — तो उसमें भगवान् का स्मरण करें।
मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ और भूत-प्राणियों की चेतना अर्थात् जीवनी-शक्ति हूँ।
भावार्थ
वेदों में 'सामवेद' — जो संगीतमय है और जिसमें भक्ति का माधुर्य है; देवताओं में 'वासव' (इन्द्र) — देवताओं के राजा; इन्द्रियों में 'मन' — जो सब इन्द्रियों का स्वामी और संचालक है; और प्राणियों में 'चेतना' — जीवन की शक्ति, जो जड़ और चेतन का भेद करती है। सामवेद को श्रेष्ठ बताना दिखाता है कि भगवान् को संगीत और भक्ति प्रिय है। और मन को विभूति बताना हमें याद दिलाता है कि मन को भगवान् में लगाना ही सबसे बड़ी साधना है।
रुद्राणां शङ्करः च अस्मि, यक्षरक्षसां वित्तेशः, वसूनां पावकः च अस्मि, शिखरिणाम् अहं मेरुः।
हिन्दी अनुवाद
मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ; मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखर वाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ।
भावार्थ
ग्यारह रुद्रों में 'शंकर' (शिव) — कल्याणकारी; यक्षों और राक्षसों में 'वित्तेश' (कुबेर) — धन के स्वामी; आठ वसुओं में 'पावक' (अग्नि) — पवित्र करने वाला; और पर्वतों में 'मेरु' — पौराणिक सुमेरु पर्वत, जो ब्रह्माण्ड का केन्द्र माना जाता है। शिव को अपनी विभूति बताकर भगवान् विष्णु-शिव की एकता का संकेत देते हैं — वे अलग नहीं, एक ही परमात्मा के रूप हैं। यह साम्प्रदायिक भेदभाव को मिटाने वाला सन्देश है।
पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कन्द और जलाशयों में समुद्र हूँ।
भावार्थ
पुरोहितों में 'बृहस्पति' — देवताओं के गुरु और पुरोहित, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक; सेनापतियों में 'स्कन्द' (कार्तिकेय) — देवताओं की सेना के सेनापति, जिन्होंने तारकासुर का वध किया; और जलाशयों में 'सागर' — सबसे विशाल और गहरा। अर्जुन एक योद्धा हैं, इसलिये सेनापतियों में स्कन्द का उल्लेख उनके लिये विशेष प्रासंगिक है। सागर की विशालता और गहराई भगवान् की अनन्तता का प्रतीक है।
मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूँ; सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पर्वत हूँ।
भावार्थ
महर्षियों में 'भृगु' — जो इतने तेजस्वी थे कि उन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा ली; वाणी में 'एकाक्षर' (ॐ) — सब शब्दों का मूल; यज्ञों में 'जपयज्ञ' — भगवन्नाम का जप; और स्थिर वस्तुओं में 'हिमालय' — सबसे ऊँचा और अटल। जपयज्ञ को सबसे श्रेष्ठ बताना विशेष महत्वपूर्ण है — क्योंकि इसमें किसी सामग्री, धन या विशेष स्थान की आवश्यकता नहीं; कोई भी, कहीं भी, कभी भी भगवन्नाम का जप कर सकता है। यह सबसे सरल और शुद्ध यज्ञ है।
मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।
भावार्थ
वृक्षों में 'अश्वत्थ' (पीपल) — जो पवित्र माना जाता है, दीर्घायु होता है और रात में भी ऑक्सीजन देता है; देवर्षियों में 'नारद' — भगवान् के परम भक्त, जो वीणा बजाते हुए हरि-नाम का प्रचार करते हैं; गन्धर्वों (स्वर्ग के संगीतज्ञों) में 'चित्ररथ'; और सिद्धों में 'कपिल मुनि' — सांख्य दर्शन के प्रवर्तक। पीपल का उल्लेख पन्द्रहवें अध्याय में संसार-वृक्ष के रूप में भी आयेगा। नारद भक्ति के आदर्श हैं।
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥
अन्वय
अश्वानाम् अमृतोद्भवम् उच्चैःश्रवसं, गजेन्द्राणाम् ऐरावतं, नराणां च नराधिपं मां विद्धि।
हिन्दी अनुवाद
घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा मुझको जान।
भावार्थ
घोड़ों में 'उच्चैःश्रवा' — समुद्र-मन्थन से अमृत के साथ निकला दिव्य घोड़ा; हाथियों में 'ऐरावत' — इन्द्र का श्वेत हाथी, जो भी समुद्र-मन्थन से निकला; और मनुष्यों में 'नराधिप' (राजा)। राजा को विभूति इसलिये कहा गया कि वह प्रजा का पालन और रक्षा करता है, जो भगवान् का ही कार्य है। पर यह केवल धर्मपरायण राजा पर लागू होता है; अत्याचारी राजा भगवान् की विभूति नहीं, बल्कि उनके कोप का पात्र है।
मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ; शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ।
भावार्थ
शस्त्रों में 'वज्र' — इन्द्र का अस्त्र, जो दधीचि ऋषि की हड्डियों से बना था, त्याग का प्रतीक; गायों में 'कामधेनु' — जो सब इच्छाओं को पूरा करने वाली दिव्य गाय है; 'प्रजन कन्दर्प' — संतानोत्पत्ति का कारण कामदेव, अर्थात् धर्मानुकूल काम; और सर्पों में 'वासुकि' — जिसे समुद्र-मन्थन में रस्सी बनाया गया था। 'प्रजनः' विशेषण महत्वपूर्ण है — केवल वह काम भगवान् की विभूति है जो संतानोत्पत्ति और धर्म के लिये है, वासना के लिये नहीं।
नागानाम् अनन्तः च अस्मि, यादसाम् अहं वरुणः, पितॄणाम् अर्यमा च अस्मि, संयमताम् अहं यमः।
हिन्दी अनुवाद
मैं नागों में शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ; पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ।
भावार्थ
नागों में 'अनन्त' (शेषनाग) — जिन पर भगवान् विष्णु शयन करते हैं; जलचरों में 'वरुण' — जल के देवता; पितरों में 'अर्यमा' — पितरों के प्रमुख; और नियन्त्रण करने वालों में 'यम' — मृत्यु के देवता, जो सबके कर्मों का न्याय करते हैं। यमराज को विभूति बताना दिखाता है कि मृत्यु और न्याय भी भगवान् की व्यवस्था के अंग हैं। यम निष्पक्ष न्यायाधीश हैं — वे किसी के साथ पक्षपात नहीं करते, जो भगवान् का गुण है।
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥
अन्वय
दैत्यानां प्रह्लादः च अस्मि, कलयताम् अहं कालः, मृगाणां च अहं मृगेन्द्रः, पक्षिणां वैनतेयः च (अस्मि)।
हिन्दी अनुवाद
मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ।
भावार्थ
दैत्यों में 'प्रह्लाद' — यह अत्यन्त सुन्दर है! दैत्य कुल में जन्म लेकर भी प्रह्लाद भगवान् के परम भक्त थे। यह दिखाता है कि जन्म से कोई महान् या नीच नहीं होता; भक्ति ही श्रेष्ठता का मापदण्ड है। गणना करने वालों में 'काल' — जो सबको गिनता और नापता है; पशुओं में 'मृगेन्द्र' (सिंह) — वन का राजा; और पक्षियों में 'वैनतेय' (गरुड़) — भगवान् विष्णु का वाहन। प्रह्लाद का उदाहरण हर उस व्यक्ति को आशा देता है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में जन्मा है।
मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ।
भावार्थ
पवित्र करने वालों में 'पवन' (वायु) — जो सबको शुद्ध करता है; शस्त्रधारियों में 'राम' — मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, जिन्होंने शस्त्र का प्रयोग केवल धर्म की रक्षा के लिये किया; जलचरों में 'मकर' (मगर) और नदियों में 'जाह्नवी' (गंगा) — जो पापों को धोने वाली मानी जाती है। श्रीराम को अपनी विभूति बताकर श्रीकृष्ण दोनों अवतारों की एकता का संकेत देते हैं। गंगा भारतीय संस्कृति में पवित्रता का सर्वोच्च प्रतीक है।
(हे) अर्जुन! सर्गाणाम् आदिः अन्तः च मध्यं च एव अहम्; विद्यानाम् अध्यात्मविद्या, प्रवदतां वादः अहम्।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अन्त तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्त्व-निर्णय के लिये किया जाने वाला वाद हूँ।
भावार्थ
सृष्टियों का 'आदि, मध्य और अन्त' — सब भगवान् ही हैं; विद्याओं में 'अध्यात्मविद्या' — आत्मा और परमात्मा का ज्ञान, जो सब विद्याओं में श्रेष्ठ है क्योंकि वह मुक्ति देती है; और बोलने वालों में 'वाद' — सत्य की खोज के लिये किया गया तर्क-वितर्क। भारतीय दर्शन में तीन प्रकार की चर्चा मानी गई है — 'जल्प' (जीतने के लिये), 'वितण्डा' (केवल खण्डन के लिये) और 'वाद' (सत्य जानने के लिये)। केवल 'वाद' भगवान् की विभूति है।
मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वन्द्व नामक समास हूँ; अक्षय काल अर्थात् काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुख वाला, विराट् स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ।
भावार्थ
अक्षरों में 'अकार' — 'अ' जो सब वर्णों का मूल है, हर व्यंजन में निहित है; समासों में 'द्वन्द्व' — जिसमें दोनों पद समान महत्व के होते हैं (जैसे राम-लक्ष्मण), जो समता का प्रतीक है; 'अक्षय काल' — अनन्त समय; और 'विश्वतोमुख धाता' — सब ओर मुख वाले पालनकर्ता। व्याकरण के उदाहरण देना दिखाता है कि भाषा और ज्ञान के सूक्ष्म नियमों में भी भगवान् की उपस्थिति है। 'अ' के बिना कोई अक्षर बोला नहीं जा सकता, वैसे ही भगवान् के बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं।
मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति-हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।
भावार्थ
भगवान् 'सर्वहर मृत्यु' हैं — जो सब कुछ हर लेती है; और 'भविष्यतामुद्भव' — भविष्य में होने वालों की उत्पत्ति। मृत्यु और जन्म दोनों भगवान् के रूप हैं। फिर स्त्रियों में सात गुण — 'कीर्ति' (यश), 'श्री' (सौन्दर्य और समृद्धि), 'वाक्' (मधुर वाणी), 'स्मृति' (स्मरण-शक्ति), 'मेधा' (बुद्धि), 'धृति' (धैर्य) और 'क्षमा'। ये गुण नारी-शक्ति की गरिमा को प्रकट करते हैं। ये सातों देवियों के नाम भी हैं। जहाँ भी स्त्रियों में ये गुण दिखें, वहाँ भगवान् का दर्शन करना चाहिये।
तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छन्दों में गायत्री छन्द हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसन्त मैं हूँ।
भावार्थ
सामवेद के गीतों में 'बृहत्साम' — इन्द्र की स्तुति का प्रमुख गान; छन्दों में 'गायत्री' — जिसमें सबसे पवित्र गायत्री मन्त्र रचा गया है; महीनों में 'मार्गशीर्ष' (अगहन) — जब फसलें पकती हैं, मौसम सुहावना होता है; और ऋतुओं में 'कुसुमाकर' (वसन्त) — फूलों की खान, जब प्रकृति अपने पूर्ण सौन्दर्य में होती है। वसन्त में जब फूल खिलें और प्रकृति मुस्कुराये, तो उसमें भगवान् का सौन्दर्य देखना चाहिये।
मैं छल करने वालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ; मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ।
भावार्थ
यह श्लोक आश्चर्यजनक है — 'छल करने वालों में जुआ' भी भगवान् की विभूति है! इसका अर्थ यह नहीं कि जुआ अच्छा है। अर्थ यह है कि छल के जितने भी साधन हैं, उनमें जुआ सबसे प्रबल है — इतना कि उसने पाण्डवों का राज्य तक छीन लिया। भगवान् यह दिखाना चाहते हैं कि सब कुछ उनकी शक्ति से ही चलता है, अच्छा भी और बुरा भी; पर इसका अर्थ यह नहीं कि बुरे का अनुसरण करें। फिर 'तेज', 'जय' (विजय), 'व्यवसाय' (दृढ़ निश्चय) और 'सत्त्व' (सात्त्विकता) — ये सकारात्मक विभूतियाँ हैं।
वृष्णिवंशियों में वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात् तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ।
भावार्थ
यह श्लोक अत्यन्त मधुर है। वृष्णि वंश में 'वासुदेव' — भगवान् स्वयं; पाण्डवों में 'धनञ्जय' — स्वयं अर्जुन! भगवान् अर्जुन को अपनी विभूति बताकर उनके प्रति अपने गहरे प्रेम को प्रकट करते हैं। भक्त और भगवान् में भेद नहीं। मुनियों में 'व्यास' — जिन्होंने वेदों का विभाजन किया, महाभारत और पुराण रचे, और जिनकी कृपा से यह गीता हमें मिली; कवियों में 'उशना' (शुक्राचार्य) — दैत्यों के गुरु, महान् विद्वान्। यहाँ अर्जुन को स्वयं को भगवान् की विभूति के रूप में देखने का अवसर मिलता है।
मैं दमन करने वालों का दण्ड अर्थात् दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छा वालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ।
भावार्थ
दमन करने वालों में 'दण्ड' — न्याय के लिये दण्ड, जो समाज में व्यवस्था बनाये रखता है; विजय चाहने वालों में 'नीति' — सही रणनीति और नैतिकता; रहस्यों में 'मौन' — सबसे बड़ा रहस्य मौन है, जो कुछ नहीं बताता; और ज्ञानियों में 'ज्ञान'। 'नीति' विशेष महत्वपूर्ण है — विजय केवल बल से नहीं, नीति से मिलती है; और वह विजय स्थायी होती है जो नैतिकता पर आधारित हो। मौन की शक्ति भी अद्भुत है — मौन में ही गहरे सत्य प्रकट होते हैं।
(हे) अर्जुन! यत् च अपि सर्वभूतानां बीजं, तत् अहम्; मया विना यत् स्यात्, तत् चराचरं भूतं न अस्ति।
हिन्दी अनुवाद
और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ; क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो।
भावार्थ
विभूतियों के वर्णन का सारांश — भगवान् सब प्राणियों के 'बीज' हैं, और 'मया विना' — उनके बिना — कोई भी चर या अचर प्राणी अस्तित्व में नहीं रह सकता। अब तक भगवान् ने विशेष विभूतियाँ बताईं, पर वास्तव में हर वस्तु में वे हैं। विशेष विभूतियाँ इसलिये बताईं कि उनमें भगवान् का प्रकाश अधिक स्पष्ट दिखता है, पर साधारण से साधारण वस्तु भी भगवान् से रहित नहीं। यह दृष्टि सारी सृष्टि को पवित्र बना देती है।
हे परन्तप! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है; मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिये एकदेश से अर्थात् संक्षेप से कहा है।
भावार्थ
भगवान् स्पष्ट करते हैं कि उनकी विभूतियों का कोई अन्त नहीं; जो कुछ बताया गया, वह केवल 'उद्देशतः' — उदाहरण के रूप में, संकेत मात्र — है। जैसे कोई समुद्र तट पर खड़ा होकर कुछ लहरें गिनाये, पर समुद्र अनन्त है। इन उदाहरणों का उद्देश्य यह सिखाना है कि हम स्वयं हर जगह भगवान् को देखने की दृष्टि विकसित करें। जब यह दृष्टि आ जाये, तो किसी सूची की आवश्यकता नहीं रहती।
जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान।
भावार्थ
भगवान् विभूति को पहचानने का सामान्य नियम देते हैं — जहाँ भी कोई वस्तु या व्यक्ति 'विभूतिमत्' (ऐश्वर्यवान्), 'श्रीमत्' (सुन्दर, समृद्ध) या 'ऊर्जित' (शक्तिशाली) हो, उसे भगवान् के तेज का 'अंश' समझो। यह नियम सूची से अधिक उपयोगी है — अब हम स्वयं पहचान सकते हैं। किसी महान् वैज्ञानिक की प्रतिभा, किसी कलाकार की कला, किसी खिलाड़ी का कौशल, किसी माँ का प्रेम — सबमें भगवान् का तेज है। यह दृष्टि ईर्ष्या को समाप्त करती है और श्रद्धा जगाती है।
अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है? मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।
भावार्थ
दसवें अध्याय का समापन एक अद्भुत वक्तव्य से होता है — 'इतना विस्तार जानकर क्या करोगे? सार यह है कि मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश मात्र से धारण किये हुए हूँ।' यह सारा विशाल ब्रह्माण्ड — अरबों आकाशगंगाएँ, अनगिनत तारे — भगवान् का केवल एक छोटा-सा अंश है! भगवान् की वास्तविक महिमा इससे कहीं अधिक, अनन्त है। पुरुषसूक्त भी कहता है — 'पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि'। यह श्लोक अगले अध्याय की भूमिका है, जिसमें अर्जुन भगवान् के विश्वरूप का दर्शन करेंगे। यह अध्याय 'विभूतियोग' कहलाता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥
ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।