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🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय ११ — विश्वरूपदर्शनयोग

५५ श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 अर्जुन को दिव्य दृष्टि और विश्वरूप-दर्शन; कालोऽस्मि; अर्जुन की स्तुति और क्षमा-याचना।
११.१ अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्। यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — मदनुग्रहाय त्वया यत् परमं गुह्यम् अध्यात्मसंज्ञितं वचः उक्तम्, तेन मम अयं मोहः विगतः।
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — मुझ पर अनुग्रह करने के लिये आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है।
भावार्थ
ग्यारहवाँ अध्याय 'विश्वरूपदर्शनयोग' कहलाता है — गीता का सबसे नाटकीय और अद्भुत अध्याय। अर्जुन कृतज्ञता से आरम्भ करते हैं — भगवान् ने 'मदनुग्रहाय' — केवल उन पर कृपा करने के लिये — जो अध्यात्म-ज्ञान दिया, उससे उनका मोह दूर हो गया। पहले अध्याय में जो अर्जुन मोह से ग्रस्त होकर धनुष छोड़ बैठे थे, वे अब स्वीकार करते हैं कि उनका भ्रम मिट गया है। यह गीता के उपदेश की प्रभावशीलता का प्रमाण है।
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया। त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥
अन्वय
(हे) कमलपत्राक्ष! हि मया त्वत्तः भूतानां भवाप्ययौ विस्तरशः श्रुतौ, अव्ययं माहात्म्यम् अपि च (श्रुतम्)।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि हे कमलनेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है।
भावार्थ
अर्जुन बताते हैं कि उन्होंने क्या सुना — प्राणियों की 'भव' (उत्पत्ति) और 'अप्यय' (प्रलय) का विस्तृत वर्णन, और भगवान् का 'अव्यय माहात्म्य' — अविनाशी महिमा। 'कमलपत्राक्ष' — कमल की पंखुड़ी जैसे सुन्दर नेत्रों वाले — यह सम्बोधन अर्जुन के प्रेम को प्रकट करता है। सातवें से दसवें अध्याय तक भगवान् ने जो कुछ बताया, अर्जुन उसका सार स्मरण कर रहे हैं। सुनने के बाद अब उनके मन में देखने की इच्छा जागती है।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर। द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
अन्वय
(हे) परमेश्वर! त्वम् आत्मानं यथा आत्थ, एतत् एवम् (एव); (हे) पुरुषोत्तम! ते ऐश्वरं रूपं द्रष्टुम् इच्छामि।
हिन्दी अनुवाद
हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है; परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्यमय रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।
भावार्थ
अर्जुन पहले भगवान् के वचनों को पूर्ण सत्य स्वीकार करते हैं — 'एवमेतद्यथात्थ' — जैसा आप कहते हैं, वैसा ही है। उन्हें कोई संशय नहीं। फिर भी वे भगवान् के 'ऐश्वर रूप' — दिव्य, ऐश्वर्यमय स्वरूप — को प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं। यह अविश्वास नहीं, बल्कि प्रेम की स्वाभाविक इच्छा है। सुनने और देखने में अन्तर है — जैसे किसी सुन्दर स्थान का वर्णन सुनकर उसे स्वयं देखने की इच्छा होती है। श्रद्धा अनुभव की प्यास जगाती है।
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो। योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥
अन्वय
(हे) प्रभो! यदि मया तत् द्रष्टुं शक्यम् इति (त्वं) मन्यसे, ततः (हे) योगेश्वर! त्वं मे अव्ययम् आत्मानं दर्शय।
हिन्दी अनुवाद
हे प्रभो! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है — ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइये।
भावार्थ
अर्जुन की विनम्रता देखने योग्य है। वे माँगते नहीं, बल्कि प्रार्थना करते हैं — 'यदि आप मुझे इसके योग्य समझें'। वे स्वयं अपनी योग्यता का निर्णय नहीं करते, भगवान् पर छोड़ देते हैं। यह सच्चे भक्त का लक्षण है — वह अपनी इच्छा भगवान् के सामने रखता है, पर अन्तिम निर्णय उन्हीं का मानता है। 'योगेश्वर' — योग के स्वामी — कहकर वे संकेत करते हैं कि भगवान् की योगशक्ति से ही यह सम्भव है।
११.५ श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (हे) पार्थ! मे शतशः अथ सहस्रशः नानाविधानि नानावर्णाकृतीनि च दिव्यानि रूपाणि पश्य।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हज़ारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख।
भावार्थ
भगवान् तुरन्त अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार करते हैं — 'पश्य' — देखो! वे एक नहीं, 'शतशः सहस्रशः' — सैकड़ों-हज़ारों — रूप दिखाने वाले हैं, जो 'नानाविध' (विभिन्न प्रकार के), 'नानावर्ण' (विभिन्न रंगों के) और 'नानाकृति' (विभिन्न आकारों के) हैं। भगवान् का विश्वरूप एकरूप नहीं, बल्कि सारी सृष्टि की विविधता को अपने में समेटे हुए है। भक्त की सच्ची प्रार्थना भगवान् कभी अस्वीकार नहीं करते।
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा। बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याऽश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥
अन्वय
(हे) भारत! आदित्यान्, वसून्, रुद्रान्, अश्विनौ, तथा मरुतः पश्य; बहूनि अदृष्टपूर्वाणि आश्चर्याणि पश्य।
हिन्दी अनुवाद
हे भरतवंशी अर्जुन! तू मुझमें आदित्यों को, वसुओं को, रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को और मरुद्गणों को देख तथा और भी बहुत-से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख।
भावार्थ
भगवान् अपने रूप में विभिन्न देवगणों को दिखाते हैं — बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, दो अश्विनीकुमार और उनचास मरुत। और साथ ही 'अदृष्टपूर्व आश्चर्य' — ऐसे अद्भुत दृश्य जो पहले कभी किसी ने नहीं देखे। सारे देवता भगवान् के ही अंग हैं, उन्हीं में स्थित हैं। यह दसवें अध्याय की विभूतियों का प्रत्यक्ष दर्शन है — जो पहले सुना, अब देखेंगे।
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्। मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
अन्वय
(हे) गुडाकेश! अद्य इह मम देहे एकस्थं सचराचरं कृत्स्नं जगत्, यत् च अन्यत् द्रष्टुम् इच्छसि (तत् च) पश्य।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो, सो देख।
भावार्थ
भगवान् कहते हैं — 'मेरे एक शरीर में सम्पूर्ण चराचर जगत् को एक साथ देखो।' यह अद्भुत है — सारा ब्रह्माण्ड, उसके सब प्राणी, सब लोक — एक ही शरीर में! और 'यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि' — जो कुछ और देखना चाहो, वह भी। अर्जुन यह जानना चाहते थे कि युद्ध का परिणाम क्या होगा; वह भी उन्हें इसी रूप में दिखेगा। भगवान् में भूत, वर्तमान और भविष्य सब एक साथ विद्यमान हैं।
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥
अन्वय
तु अनेन स्वचक्षुषा एव मां द्रष्टुं न शक्यसे; ते दिव्यं चक्षुः ददामि; मे ऐश्वरं योगं पश्य।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसन्देह समर्थ नहीं है; इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक चक्षु देता हूँ; उससे तू मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख।
भावार्थ
एक महत्वपूर्ण सत्य — भगवान् के दिव्य रूप को साधारण आँखों से नहीं देखा जा सकता। जैसे सूक्ष्म जीवाणुओं को देखने के लिये सूक्ष्मदर्शी यन्त्र और दूर के तारों को देखने के लिये दूरबीन चाहिये, वैसे ही भगवान् को देखने के लिये 'दिव्य चक्षु' चाहिये। यह दिव्य दृष्टि भगवान् स्वयं कृपा करके देते हैं। आध्यात्मिक सत्य इन्द्रियों से नहीं, बल्कि भगवत्कृपा से प्राप्त आन्तरिक दृष्टि से अनुभव होते हैं।
११.९ सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः। दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥
अन्वय
सञ्जयः उवाच — (हे) राजन्! एवम् उक्त्वा ततः महायोगेश्वरः हरिः पार्थाय परमम् ऐश्वरं रूपं दर्शयामास।
हिन्दी अनुवाद
सञ्जय बोले — हे राजन्! महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान् ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात् अर्जुन को परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूप दिखलाया।
भावार्थ
अब सञ्जय, जो धृतराष्ट्र को युद्ध का वर्णन सुना रहे हैं, कथा को आगे बढ़ाते हैं। सञ्जय को भी व्यासजी ने दिव्य दृष्टि दी थी, इसलिये वे भी इस विश्वरूप को देख रहे हैं। भगवान् को 'महायोगेश्वर' — महान् योग के स्वामी — और 'हरि' — पापों को हरने वाले — कहा गया है। 'दर्शयामास' — दिखाया — इस शब्द के साथ गीता का सबसे अद्भुत दृश्य आरम्भ होता है।
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्। अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥
अन्वय
अनेकवक्त्रनयनम्, अनेकाद्भुतदर्शनम्, अनेकदिव्याभरणं, दिव्यानेकोद्यतायुधम् —
हिन्दी अनुवाद
अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत-से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत-से दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाये हुए —
भावार्थ
सञ्जय विश्वरूप का वर्णन करते हैं। उसमें 'अनेक मुख और नेत्र' हैं — क्योंकि सब प्राणियों के मुख और नेत्र भगवान् के ही हैं; 'अनेक अद्भुत दर्शन' — अनगिनत आश्चर्यजनक दृश्य; 'अनेक दिव्य आभूषण' — दिव्य अलंकार; और 'अनेक उठाये हुए दिव्य शस्त्र' — जो भगवान् की शक्ति और धर्म-रक्षा के संकल्प के प्रतीक हैं। यह वर्णन अगले श्लोक में जारी रहता है।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्। सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥
अन्वय
दिव्यमाल्याम्बरधरं, दिव्यगन्धानुलेपनं, सर्वाश्चर्यमयम्, अनन्तं, विश्वतोमुखं देवं (अर्जुनः अपश्यत्)।
हिन्दी अनुवाद
दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए और दिव्य गन्ध का सारे शरीर में लेप किये हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किये हुए विराट् स्वरूप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।
भावार्थ
विश्वरूप का वर्णन जारी है — 'दिव्य मालाएँ और वस्त्र' धारण किये हुए, 'दिव्य सुगन्ध' का लेप किये हुए, 'सर्वाश्चर्यमय' — सब आश्चर्यों से भरा, 'अनन्त' — जिसकी कोई सीमा नहीं, और 'विश्वतोमुख' — सब दिशाओं में मुख वाला। यह रूप सौन्दर्य, ऐश्वर्य और असीमता का अद्भुत मेल है। मानवीय कल्पना की सारी सीमाएँ यहाँ टूट जाती हैं।
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
अन्वय
यदि दिवि सूर्यसहस्रस्य भाः युगपत् उत्थिता भवेत्, सा तस्य महात्मनः भासः सदृशी स्यात् (वा न स्यात्)।
हिन्दी अनुवाद
आकाश में हज़ार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित् ही हो।
भावार्थ
यह गीता का अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है। विश्वरूप के तेज का वर्णन करने के लिये सञ्जय कहते हैं — यदि आकाश में एक साथ हज़ार सूर्य उदय हो जायें, तो उनका प्रकाश शायद उस तेज के समान हो — शायद! अर्थात् वह भी पर्याप्त नहीं। एक सूर्य को ही हम सीधे नहीं देख सकते; हज़ार सूर्यों की कल्पना भी कठिन है। यह श्लोक इतना प्रभावशाली है कि परमाणु बम के पहले परीक्षण के समय वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपनहाइमर को यही श्लोक याद आया था।
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा। अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥
अन्वय
तदा पाण्डवः तत्र देवदेवस्य शरीरे अनेकधा प्रविभक्तं कृत्स्नं जगत् एकस्थम् अपश्यत्।
हिन्दी अनुवाद
पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात् पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण जगत् को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान् के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा।
भावार्थ
अर्जुन ने देवों के देव के शरीर में सम्पूर्ण जगत् को 'अनेकधा प्रविभक्त' — अनेक भागों में बँटा हुआ — पर 'एकस्थ' — एक ही स्थान में स्थित — देखा। यह विविधता में एकता का प्रत्यक्ष दर्शन है। सारे लोक, सारे प्राणी, सारी वस्तुएँ अपनी-अपनी अलग पहचान के साथ, पर एक ही परमात्मा के शरीर में। जैसे एक शरीर में अनेक अंग होते हैं, पर शरीर एक है।
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः। प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥
अन्वय
ततः सः विस्मयाविष्टः हृष्टरोमा धनञ्जयः देवं शिरसा प्रणम्य कृताञ्जलिः (सन्) अभाषत।
हिन्दी अनुवाद
उसके अनन्तर वह आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर अर्जुन प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा-भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला।
भावार्थ
इस अद्भुत दर्शन से अर्जुन की दशा — 'विस्मयाविष्ट' (आश्चर्य से भरे हुए), 'हृष्टरोमा' (रोमांचित, शरीर के रोंगटे खड़े)। वे सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं और हाथ जोड़कर बोलते हैं। जो अर्जुन श्रीकृष्ण को सखा समझकर उनके साथ हँसी-मज़ाक करते थे, अब उनके दिव्य रूप के सामने नतमस्तक हैं। यह भक्ति का स्वाभाविक भाव है — महानता के सामने विनम्रता।
११.१५ अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्। ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) देव! तव देहे सर्वान् देवान् तथा भूतविशेषसङ्घान्, कमलासनस्थं ब्रह्माणम्, ईशं, सर्वान् ऋषीन् च दिव्यान् उरगान् च पश्यामि।
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ।
भावार्थ
अब अर्जुन स्वयं जो देख रहे हैं, उसका वर्णन करते हैं। भगवान् के शरीर में सब देवता, विभिन्न प्राणियों के समूह, कमल पर बैठे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, 'ईश' (शिव), सब ऋषि और दिव्य नाग — सब एक साथ। त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु (स्वयं विश्वरूप) और शिव — सब इस एक रूप में हैं। यह दिखाता है कि सब देवता एक ही परमात्मा के अंग हैं; उनमें कोई प्रतिस्पर्धा नहीं।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्। नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥
अन्वय
(हे) विश्वेश्वर! (हे) विश्वरूप! अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं सर्वतः अनन्तरूपं त्वां पश्यामि; तव न अन्तं, न मध्यं, न पुनः आदिं पश्यामि।
हिन्दी अनुवाद
हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामी! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही।
भावार्थ
अर्जुन भगवान् की अनन्तता का अनुभव करते हैं — अनगिनत भुजाएँ, उदर, मुख, नेत्र; और सब ओर अनन्त रूप। सबसे आश्चर्यजनक — 'न अन्त, न मध्य, न आदि' — इस रूप का कोई आरम्भ, मध्य या अन्त दिखाई नहीं देता। सीमित मन असीम को कैसे समझे? अर्जुन जितना देखते हैं, उतना ही अनन्त लगता है। यह अनुभव मनुष्य को अपनी लघुता और भगवान् की महानता का बोध कराता है।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम्। पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥
अन्वय
किरीटिनं, गदिनं, चक्रिणं च, तेजोराशिं, सर्वतः दीप्तिमन्तं, दुर्निरीक्ष्यं, दीप्तानलार्कद्युतिम्, अप्रमेयं त्वां समन्तात् पश्यामि।
हिन्दी अनुवाद
आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेय स्वरूप देखता हूँ।
भावार्थ
विश्वरूप में अर्जुन भगवान् विष्णु के परिचित चिह्न भी देखते हैं — 'किरीट' (मुकुट), 'गदा' और 'चक्र'। साथ ही वह रूप 'तेजोराशि' — तेज का पुंज — है, सब ओर प्रकाशमान, 'दुर्निरीक्ष्य' — जिसे देखना कठिन है — और प्रज्वलित अग्नि तथा सूर्य जैसा तेजस्वी। 'अप्रमेय' — जिसे मापा न जा सके। परिचित और अपरिचित, सौम्य और भयंकर — दोनों एक साथ।
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥
अन्वय
त्वं वेदितव्यं परमम् अक्षरम्, त्वम् अस्य विश्वस्य परं निधानम्, त्वम् अव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता, त्वं सनातनः पुरुषः (इति) मे मतः।
हिन्दी अनुवाद
आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हैं, आप ही इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं — ऐसा मेरा मत है।
भावार्थ
दर्शन से अर्जुन का निश्चय दृढ़ हो जाता है। वे भगवान् को 'परम अक्षर' (अविनाशी परब्रह्म), 'वेदितव्य' (जानने योग्य एकमात्र तत्त्व), 'विश्व का परम निधान' (आश्रय, भण्डार), 'अव्यय' (अविनाशी), 'शाश्वतधर्मगोप्ता' (सनातन धर्म के रक्षक) और 'सनातन पुरुष' मानते हैं। 'मतो मे' — यह मेरा मत है — अब यह केवल सुनी हुई बात नहीं, अर्जुन का अपना अनुभव है। अनुभव से ही दृढ़ निश्चय होता है।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य- मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्। पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥
अन्वय
अनादिमध्यान्तम्, अनन्तवीर्यम्, अनन्तबाहुं, शशिसूर्यनेत्रं, दीप्तहुताशवक्त्रं, स्वतेजसा इदं विश्वं तपन्तं त्वां पश्यामि।
हिन्दी अनुवाद
आपको आदि, अन्त और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुख वाले और अपने तेज से इस जगत् को सन्तप्त करते हुए देखता हूँ।
भावार्थ
अर्जुन का वर्णन जारी है — 'अनादिमध्यान्त' (आदि, मध्य, अन्त से रहित), 'अनन्तवीर्य' (असीम शक्ति वाले), 'अनन्तबाहु' (असंख्य भुजाओं वाले), 'शशिसूर्यनेत्र' (चन्द्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं), 'दीप्तहुताशवक्त्र' (प्रज्वलित अग्नि जैसा मुख)। और वे अपने तेज से सारे विश्व को 'तपन्तम्' — तपा रहे हैं। यहाँ से विश्वरूप का भयंकर पक्ष प्रकट होने लगता है। सूर्य और चन्द्र को नेत्र बताना वैदिक पुरुषसूक्त की परम्परा से जुड़ा है।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः। दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥
अन्वय
(हे) महात्मन्! द्यावापृथिव्योः इदम् अन्तरं सर्वाः दिशः च त्वया एकेन हि व्याप्तम्; तव इदम् अद्भुतम् उग्रं रूपं दृष्ट्वा लोकत्रयं प्रव्यथितम्।
हिन्दी अनुवाद
हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं; तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अति व्यथा को प्राप्त हो रहे हैं।
भावार्थ
भगवान् अकेले ही पृथ्वी और आकाश के बीच के सारे स्थान और सब दिशाओं में व्याप्त हैं। उनका 'अद्भुत' और 'उग्र' — भयंकर — रूप देखकर तीनों लोक 'प्रव्यथित' — भयभीत, व्याकुल — हैं। अब तक विश्वरूप का सौन्दर्य और ऐश्वर्य दिख रहा था; अब उसका भयानक पक्ष सामने आ रहा है। भगवान् केवल सृष्टि और पालन ही नहीं, संहार भी करते हैं; उनका यह रूप भी सत्य है।
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति। स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥
अन्वय
अमी सुरसङ्घाः हि त्वां विशन्ति; केचित् भीताः प्राञ्जलयः (सन्तः) गृणन्ति; महर्षिसिद्धसङ्घाः 'स्वस्ति' इति उक्त्वा पुष्कलाभिः स्तुतिभिः त्वां स्तुवन्ति।
हिन्दी अनुवाद
वे ही देवताओं के समूह आपमें प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं, तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय 'कल्याण हो' ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं।
भावार्थ
विश्वरूप में अर्जुन विभिन्न प्राणियों की प्रतिक्रियाएँ देखते हैं। देवताओं के समूह भगवान् में प्रवेश कर रहे हैं — विलीन हो रहे हैं; कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े भगवान् का नाम पुकार रहे हैं; और महर्षि तथा सिद्ध 'स्वस्ति' — कल्याण हो — कहकर उत्तम स्तोत्रों से स्तुति कर रहे हैं। एक ही दृश्य पर तीन प्रतिक्रियाएँ — विलय, भय और स्तुति। ज्ञानी भगवान् के भयंकर रूप में भी कल्याण देखते हैं।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च। गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥
अन्वय
रुद्रादित्याः वसवः ये च साध्याः विश्वे अश्विनौ मरुतः च ऊष्मपाः च गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः सर्वे एव विस्मिताः (सन्तः) त्वां वीक्षन्ते।
हिन्दी अनुवाद
जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं — वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं।
भावार्थ
विश्व के सभी दिव्य प्राणी — रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुत, 'ऊष्मप' (पितर, जो गर्म भोजन ग्रहण करते हैं), गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्ध — सब 'विस्मित' होकर भगवान् को देख रहे हैं। देवता भी, जो स्वयं अद्भुत शक्तियों के स्वामी हैं, इस रूप को देखकर आश्चर्यचकित हैं। इससे विश्वरूप की असाधारणता का अनुमान लगाया जा सकता है।
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्। बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम् ॥ २३ ॥
अन्वय
(हे) महाबाहो! ते बहुवक्त्रनेत्रं बहुबाहूरुपादं बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं महत् रूपं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथिताः, तथा अहम् (अपि)।
हिन्दी अनुवाद
हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान् रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।
भावार्थ
अब अर्जुन स्वयं भयभीत होने लगते हैं। विश्वरूप के अनगिनत मुख, नेत्र, भुजाएँ, जंघाएँ, पैर, उदर और विशेष रूप से 'बहुदंष्ट्राकराल' — बहुत-सी भयानक दाढ़ों से विकराल रूप — देखकर सब लोक व्याकुल हैं, और 'तथाऽहम्' — मैं भी। जो अर्जुन महान् योद्धा थे, किसी से नहीं डरते थे, वे भी इस रूप के सामने काँपने लगे। भगवान् का ऐश्वर्य जितना सुन्दर है, उनका संहारक रूप उतना ही भयावह।
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्। दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥
अन्वय
(हे) विष्णो! नभःस्पृशं दीप्तम् अनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रं त्वां दृष्ट्वा हि प्रव्यथितान्तरात्मा (अहं) धृतिं शमं च न विन्दामि।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ।
भावार्थ
अर्जुन अपनी दशा का वर्णन करते हैं — आकाश को छूने वाला विशाल रूप, अनेक रंगों से दीप्त, खुले हुए मुख और चमकते विशाल नेत्र। यह देखकर उनका 'अन्तरात्मा प्रव्यथित' है — भीतर तक काँप रहा है, और उन्हें न 'धृति' (धैर्य) मिल रहा है, न 'शम' (शान्ति)। यह मानवीय सीमा का स्वाभाविक अनुभव है। अनन्त के सामने सीमित मन घबरा जाता है। अर्जुन भगवान् को 'विष्णु' कहकर पुकारते हैं — सर्वव्यापी।
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि। दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥
अन्वय
ते दंष्ट्राकरालानि कालानलसन्निभानि च मुखानि दृष्ट्वा एव दिशः न जाने, शर्म च न लभे; (हे) देवेश! (हे) जगन्निवास! प्रसीद।
हिन्दी अनुवाद
दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ; इसलिये हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।
भावार्थ
भगवान् के मुख 'कालानल' — प्रलयकाल की अग्नि — के समान हैं, भयानक दाढ़ों से युक्त। इन्हें देखकर अर्जुन 'दिशो न जाने' — दिशाओं का ज्ञान भी खो बैठे हैं; उन्हें समझ नहीं आता कि कहाँ हैं, क्या हो रहा है। वे प्रार्थना करते हैं — 'प्रसीद देवेश जगन्निवास' — हे देवताओं के स्वामी, हे जगत् के निवास, प्रसन्न होइये! भय में भक्त का एकमात्र सहारा भगवान् की कृपा ही है।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः। भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥
अन्वय
अमी च धृतराष्ट्रस्य सर्वे पुत्राः अवनिपालसङ्घैः सह एव, भीष्मः, द्रोणः, तथा असौ सूतपुत्रः, अस्मदीयैः अपि योधमुख्यैः सह, त्वाम् —
हिन्दी अनुवाद
वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आपमें प्रवेश कर रहे हैं, और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित —
भावार्थ
अब अर्जुन एक भयानक भविष्य देखते हैं। धृतराष्ट्र के सब पुत्र, उनके साथी राजा, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, 'सूतपुत्र' कर्ण, और पाण्डव पक्ष के भी प्रमुख योद्धा — सब भगवान् की ओर दौड़ रहे हैं। यहाँ भगवान् अर्जुन को युद्ध का परिणाम दिखा रहे हैं — जो अभी होना है, वह भगवान् में पहले ही हो चुका है। जिन लोगों को मारने से अर्जुन डर रहे थे, उनकी नियति पहले से निश्चित है। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि। केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥
अन्वय
ते दंष्ट्राकरालानि भयानकानि वक्त्राणि त्वरमाणाः विशन्ति; केचित् चूर्णितैः उत्तमाङ्गैः दशनान्तरेषु विलग्नाः सन्दृश्यन्ते।
हिन्दी अनुवाद
वे सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिख रहे हैं।
भावार्थ
भयानक दृश्य — सब योद्धा तेज़ी से भगवान् के विकराल मुखों में प्रवेश कर रहे हैं, और कुछ के सिर चूर-चूर होकर दाँतों के बीच फँसे दिख रहे हैं। यह काल का प्रतीकात्मक चित्रण है — काल (समय, मृत्यु) सबको निगल जाता है, कोई नहीं बचता। महान् से महान् योद्धा, राजा, गुरु — सब अन्ततः काल के ग्रास बनते हैं। यह दृश्य अर्जुन को दिखाता है कि मृत्यु भगवान् की व्यवस्था का अंग है।
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति। तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८ ॥
अन्वय
यथा नदीनां बहवः अम्बुवेगाः समुद्रम् एव अभिमुखाः द्रवन्ति, तथा अमी नरलोकवीराः तव अभिविज्वलन्ति वक्त्राणि विशन्ति।
हिन्दी अनुवाद
जैसे नदियों के बहुत-से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात् समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
भावार्थ
अर्जुन एक उपमा देते हैं — जैसे अनेक नदियों का जल स्वाभाविक रूप से समुद्र की ओर बहता है और उसमें मिल जाता है, वैसे ही ये सब वीर भगवान् के प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। नदी का समुद्र में मिलना स्वाभाविक और अनिवार्य है; वैसे ही हर प्राणी का अन्ततः परमात्मा में लय होना अनिवार्य है। इस उपमा में एक शान्त भाव है — मृत्यु विनाश नहीं, बल्कि मूल स्रोत में लौटना है।
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः। तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥
अन्वय
यथा पतङ्गाः समृद्धवेगाः (सन्तः) नाशाय प्रदीप्तं ज्वलनं विशन्ति, तथा एव लोकाः अपि समृद्धवेगाः नाशाय तव वक्त्राणि विशन्ति।
हिन्दी अनुवाद
जैसे पतंगे मोहवश नष्ट होने के लिये प्रज्वलित अग्नि में अति वेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिये आपके मुखों में अति वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।
भावार्थ
दूसरी उपमा अधिक तीव्र है — जैसे पतंगे दीपक की लौ की ओर तेज़ी से उड़कर उसमें जल जाते हैं, वैसे ही ये लोग अपने विनाश के लिये भगवान् के मुखों में दौड़ रहे हैं। पहली उपमा (नदी) में स्वाभाविकता थी, इसमें 'मोह' है — पतंगा आकर्षण के कारण अपनी मृत्यु की ओर जाता है। कौरव पक्ष के लोग भी अपने लोभ, अहंकार और अधर्म के कारण स्वयं अपने विनाश की ओर दौड़ रहे थे। दोनों उपमाएँ मिलकर मृत्यु के दो पक्ष दिखाती हैं।
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः। तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३० ॥
अन्वय
(हे) विष्णो! (त्वं) ज्वलद्भिः वदनैः समग्रान् लोकान् समन्तात् ग्रसमानः लेलिह्यसे; तव उग्राः भासः समग्रं जगत् तेजोभिः आपूर्य प्रतपन्ति।
हिन्दी अनुवाद
आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं; हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत् को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।
भावार्थ
भगवान् अपने प्रज्वलित मुखों से सब लोकों को निगलते हुए 'लेलिह्यसे' — बार-बार चाट रहे हैं, जैसे कोई भूखा व्यक्ति भोजन का आस्वाद लेता है। उनका उग्र तेज सारे जगत् को भरकर तपा रहा है। यह काल का सर्वग्रासी रूप है — सब कुछ उसका भोजन है। यह चित्रण भयावह है, पर सत्य है — समय सब कुछ निगल जाता है। साम्राज्य, सभ्यताएँ, पर्वत, तारे — सब अन्ततः काल के ग्रास बनते हैं।
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद। विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥
अन्वय
उग्ररूपः भवान् कः? मे आख्याहि; (हे) देववर! ते नमः अस्तु, प्रसीद; आद्यं भवन्तं विज्ञातुम् इच्छामि; हि तव प्रवृत्तिं न प्रजानामि।
हिन्दी अनुवाद
मुझे बतलाइये कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो, आप प्रसन्न होइये। आदिपुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।
भावार्थ
भयभीत अर्जुन पूछते हैं — 'आप कौन हैं, इस उग्र रूप में?' यह प्रश्न आश्चर्यजनक है — जिन श्रीकृष्ण को वे जीवन भर से जानते हैं, उन्हें अब पहचान नहीं पा रहे। वे नमस्कार करते हैं, प्रसन्न होने की प्रार्थना करते हैं, और जानना चाहते हैं कि भगवान् की 'प्रवृत्ति' — इस रूप का उद्देश्य — क्या है। यह प्रश्न भगवान् को गीता के सबसे प्रसिद्ध वचनों में से एक कहने का अवसर देता है।
११.३२ श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (अहं) लोकक्षयकृत् प्रवृद्धः कालः अस्मि; इह लोकान् समाहर्तुं प्रवृत्तः; ये प्रत्यनीकेषु योधाः अवस्थिताः, (ते) सर्वे त्वाम् ऋते अपि न भविष्यन्ति।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिये प्रवृत्त हुआ हूँ; इसलिये जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात् तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जायेगा।
भावार्थ
यह गीता का अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है — 'कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धः' — मैं लोकों का नाश करने वाला महाकाल हूँ। भगवान् स्पष्ट करते हैं कि इस समय वे संहार के लिये प्रवृत्त हैं। और फिर निर्णायक बात — 'ऋतेऽपि त्वाम्' — तुम्हारे बिना भी ये सब योद्धा नहीं बचेंगे। अर्जुन सोच रहे थे कि वे युद्ध न करें तो ये लोग बच जायेंगे; पर भगवान् बताते हैं कि इनकी मृत्यु पहले से निश्चित है। अर्जुन केवल एक माध्यम हैं, कारण नहीं।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्। मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥
अन्वय
तस्मात् त्वम् उत्तिष्ठ, यशः लभस्व, शत्रून् जित्वा समृद्धं राज्यं भुङ्क्ष्व; एते पूर्वम् एव मया एव निहताः; (हे) सव्यसाचिन्! (त्वं) निमित्तमात्रं भव।
हिन्दी अनुवाद
अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन्! तू तो केवल निमित्त मात्र बन जा।
भावार्थ
भगवान् का आह्वान — 'उत्तिष्ठ' — उठो! यश प्राप्त करो, शत्रुओं को जीतो, राज्य भोगो। फिर गीता का एक अत्यन्त गहरा वाक्य — 'मयैवैते निहताः पूर्वमेव' — ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं; और 'निमित्तमात्रं भव' — तुम केवल निमित्त (माध्यम) बनो। यह कर्तापन के अहंकार को मिटाने वाला सूत्र है। हम अपने को कर्ता मानते हैं, पर वास्तव में हम भगवान् के हाथ के उपकरण हैं। 'सव्यसाची' — दोनों हाथों से बाण चलाने वाले — कहकर भगवान् अर्जुन की क्षमता को भी स्वीकार करते हैं। यह भाव कर्म को सहज और भार-मुक्त बना देता है।
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान्। मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥
अन्वय
मया हतान् द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथा अन्यान् अपि योधवीरान् त्वं जहि; मा व्यथिष्ठाः; युध्यस्व; रणे सपत्नान् जेता असि।
हिन्दी अनुवाद
द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत-से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार। भय मत कर। निःसन्देह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा, इसलिये युद्ध कर।
भावार्थ
भगवान् विशेष रूप से उन योद्धाओं का नाम लेते हैं जिनसे अर्जुन को सबसे अधिक भय या संकोच था — द्रोणाचार्य (गुरु, जिन्हें मारना पाप लगता), भीष्म (पितामह, जिनका इच्छा-मृत्यु का वरदान था), जयद्रथ (जिसे शिव का वरदान था) और कर्ण (जिसके पास इन्द्र की अमोघ शक्ति थी)। इन सबको भगवान् पहले ही मार चुके हैं। 'मा व्यथिष्ठाः' — व्यथित मत हो; 'जेतासि' — तुम निश्चित रूप से जीतोगे। यह भगवान् की ओर से विजय का आश्वासन है।
११.३५ सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी। नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५ ॥
अन्वय
सञ्जयः उवाच — केशवस्य एतत् वचनं श्रुत्वा कृताञ्जलिः वेपमानः किरीटी नमस्कृत्वा भीतभीतः (सन्) प्रणम्य भूयः एव सगद्गदं कृष्णम् आह।
हिन्दी अनुवाद
सञ्जय बोले — केशव भगवान् के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपता हुआ नमस्कार करके फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति गद्गद वाणी से बोला।
भावार्थ
सञ्जय अर्जुन की दशा का मार्मिक वर्णन करते हैं — हाथ जोड़े, काँपते हुए, बार-बार प्रणाम करते हुए, 'भीतभीत' (अत्यन्त भयभीत) और 'सगद्गद' (गद्गद वाणी से, भावावेश में रुँधे गले से) अर्जुन भगवान् से बोलते हैं। यहाँ सञ्जय का यह वर्णन धृतराष्ट्र के लिये एक संकेत भी है — जिस पक्ष में स्वयं भगवान् हैं, उसकी विजय निश्चित है। पर अन्धे धृतराष्ट्र ने इस संकेत को भी नहीं समझा।
११.३६ अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) हृषीकेश! स्थाने (एतत्) यत् तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यति अनुरज्यते च; रक्षांसि भीतानि (सन्ति) दिशः द्रवन्ति; सर्वे सिद्धसङ्घाः च नमस्यन्ति।
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत् अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं।
भावार्थ
अब अर्जुन एक सुन्दर स्तुति आरम्भ करते हैं, जो गीता के सबसे काव्यमय अंशों में है। 'स्थाने' — यह उचित ही है — कि भगवान् के कीर्तन से संसार हर्षित होता है और उनसे प्रेम करता है; राक्षस भयभीत होकर भागते हैं; और सिद्ध नमस्कार करते हैं। भगवान् का नाम सज्जनों के लिये आनन्द और दुर्जनों के लिये भय का कारण है। यह श्लोक 'रक्षोघ्न' (राक्षसों का नाश करने वाला) मन्त्र के रूप में भी जपा जाता है।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥
अन्वय
(हे) महात्मन्! (हे) अनन्त! (हे) देवेश! (हे) जगन्निवास! ब्रह्मणः अपि गरीयसे आदिकर्त्रे ते (ते) कस्मात् च न नमेरन्? यत् सत् असत् तत्परम् (च), त्वम् अक्षरम्।
हिन्दी अनुवाद
हे महात्मन्! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिये वे कैसे नमस्कार न करें? क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्, असत् और उनसे परे अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं।
भावार्थ
अर्जुन कहते हैं — सब आपको नमस्कार क्यों न करें? आप ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) से भी 'गरीयान्' — महान् — और उनके भी 'आदिकर्ता' हैं। आप 'अनन्त', 'देवेश' और 'जगन्निवास' हैं। आप 'सत्' (व्यक्त), 'असत्' (अव्यक्त) और 'तत्परम्' — दोनों से परे 'अक्षर' — हैं। अर्थात् जो कुछ है, जो कुछ नहीं है, और जो इन दोनों से परे है — सब भगवान् ही हैं। यह अद्वैत का काव्यमय कथन है।
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८ ॥
अन्वय
त्वम् आदिदेवः, पुराणः पुरुषः, त्वम् अस्य विश्वस्य परं निधानम्; (त्वं) वेत्ता वेद्यं च परं धाम च असि; (हे) अनन्तरूप! त्वया विश्वं ततम्।
हिन्दी अनुवाद
आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत् व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है।
भावार्थ
स्तुति जारी है — भगवान् 'आदिदेव' (सबसे पहले देव), 'पुराण पुरुष' (सनातन पुरुष), विश्व के 'परम निधान' (आश्रय) हैं। सबसे गहरी बात — वे 'वेत्ता' (जानने वाले) भी हैं और 'वेद्य' (जानने योग्य) भी। ज्ञाता और ज्ञेय दोनों एक ही हैं — यह परम ज्ञान है। वे 'परम धाम' हैं और 'अनन्तरूप' होकर सारे विश्व में व्याप्त हैं। जो जानता है और जो जाना जाता है — दोनों के पीछे एक ही चेतना है।
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च। नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥
अन्वय
त्वं वायुः, यमः, अग्निः, वरुणः, शशाङ्कः, प्रजापतिः, प्रपितामहः च (असि); ते सहस्रकृत्वः नमः नमः अस्तु, पुनः च भूयः अपि ते नमः नमः।
हिन्दी अनुवाद
आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिये हज़ारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! आपके लिये फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!!
भावार्थ
अर्जुन भगवान् को सब देवताओं के रूप में देखते हैं — वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति (ब्रह्मा) और 'प्रपितामह' (ब्रह्मा के भी पिता)। और फिर उनका हृदय भक्ति से उमड़ पड़ता है — 'नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः' — हज़ार बार नमस्कार, फिर-फिर नमस्कार! यह भावावेश की अवस्था है, जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं और केवल 'नमः नमः' ही निकलता है। सच्चा समर्पण बार-बार झुकने में प्रकट होता है।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व। अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥
अन्वय
(हे) सर्व! ते पुरस्तात् नमः, अथ पृष्ठतः (नमः), ते सर्वतः एव नमः अस्तु; अनन्तवीर्यामितविक्रमः त्वं सर्वं समाप्नोषि, ततः (त्वं) सर्वः असि।
हिन्दी अनुवाद
हे अनन्त सामर्थ्य वाले! आपके लिये आगे से और पीछे से भी नमस्कार! हे सर्वात्मन्! आपके लिये सब ओर से ही नमस्कार हो; क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं।
भावार्थ
अर्जुन आगे से, पीछे से, सब ओर से नमस्कार करते हैं — क्योंकि भगवान् सब ओर हैं। उन्हें 'सर्व' — सब कुछ — कहकर पुकारते हैं। भगवान् 'अनन्तवीर्य' (अनन्त शक्ति वाले) और 'अमितविक्रम' (असीम पराक्रम वाले) हैं, और 'सर्वं समाप्नोषि' — सबमें व्याप्त हैं, इसलिये 'सर्वः' — सब कुछ वही हैं। यह भक्ति की वह अवस्था है जहाँ भक्त को हर दिशा में भगवान् दिखते हैं।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥
अन्वय
तव इदं महिमानम् अजानता मया प्रमादात् प्रणयेन वा अपि सखा इति मत्वा 'हे कृष्ण! हे यादव! हे सखे!' इति यत् प्रसभम् उक्तम् —
हिन्दी अनुवाद
आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव!', 'हे सखे!' — इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात् कहा है —
भावार्थ
अब अर्जुन का हृदय पश्चात्ताप से भर जाता है। उन्हें याद आता है कि वे श्रीकृष्ण को साधारण मित्र मानकर 'हे कृष्ण', 'हे यादव', 'हे सखा' कहकर बुलाते थे — कभी 'प्रमाद' (असावधानी) से, कभी 'प्रणय' (प्रेम) से। उन्हें भगवान् की इस महिमा का ज्ञान नहीं था। यह बहुत मानवीय भाव है — जब हमें किसी की वास्तविक महानता का पता चलता है, तो हमें अपने पिछले साधारण व्यवहार पर संकोच होता है। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु। एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥
अन्वय
(हे) अच्युत! यत् च अवहासार्थं विहारशय्यासनभोजनेषु एकः अथवा अपि तत्समक्षम् असत्कृतः असि, तत् अप्रमेयं त्वाम् अहं क्षामये।
हिन्दी अनुवाद
और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिये विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किये गये हैं — वह सब अपराध अप्रमेय स्वरूप आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।
भावार्थ
अर्जुन क्षमा माँगते हैं — हँसी-मज़ाक में, घूमते-फिरते, सोते-बैठते, खाते-पीते, अकेले में या दूसरों के सामने, जो कुछ भी अनादर हुआ हो, उसके लिये। अर्जुन और श्रीकृष्ण की मित्रता इतनी गहरी थी कि वे साथ खाते, सोते, खेलते थे — और मित्रता में हँसी-मज़ाक स्वाभाविक है। पर अब भगवान् के 'अप्रमेय' — अमाप — स्वरूप को देखकर अर्जुन को लगता है कि वह सब अनुचित था। यह विनम्रता और प्रेम का अद्भुत मिश्रण है।
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्। न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥
अन्वय
(हे) अप्रतिमप्रभाव! (त्वम्) अस्य चराचरस्य लोकस्य पिता असि, त्वम् अस्य पूज्यः च गरीयान् गुरुः (असि); लोकत्रये अपि त्वत्समः न अस्ति, अभ्यधिकः अन्यः कुतः?
हिन्दी अनुवाद
आप इस चराचर जगत् के पिता और सबसे बड़े गुरु तथा अति पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाव वाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है?
भावार्थ
अर्जुन भगवान् की अद्वितीयता का वर्णन करते हैं — वे चराचर जगत् के 'पिता' हैं, 'पूज्य' हैं और 'गरीयान् गुरु' — सबसे महान् गुरु — हैं। 'अप्रतिमप्रभाव' — जिनके प्रभाव की कोई तुलना नहीं। तीनों लोकों में उनके समान भी कोई नहीं, उनसे अधिक की तो बात ही क्या! यह भगवान् की अद्वितीयता की घोषणा है। सब कुछ उनसे है, पर उनके समान कुछ नहीं।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्। पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥
अन्वय
तस्मात् (हे) देव! अहं कायं प्रणिधाय प्रणम्य ईड्यम् ईशं त्वां प्रसादये; पिता पुत्रस्य इव, सखा सख्युः इव, प्रियः प्रियायाः इव, (मम अपराधं) सोढुम् अर्हसि।
हिन्दी अनुवाद
अतएव हे प्रभो! मैं शरीर को भली-भाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं, वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं।
भावार्थ
अर्जुन दण्डवत् प्रणाम करके भगवान् से प्रार्थना करते हैं — और तीन सुन्दर सम्बन्धों की उपमा देते हैं। जैसे 'पिता पुत्र के' अपराध क्षमा करता है, जैसे 'सखा सखा के', और जैसे 'प्रिय अपनी प्रिया के' — वैसे ही आप मेरे अपराध क्षमा करें। ये तीनों सम्बन्ध प्रेम पर आधारित हैं, जहाँ क्षमा स्वाभाविक है। भक्ति के विभिन्न भाव — वात्सल्य, सख्य, माधुर्य — इस एक श्लोक में समाहित हैं। प्रेम में अपराध भी क्षम्य हो जाते हैं।
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे। तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥
अन्वय
अदृष्टपूर्वं (रूपं) दृष्ट्वा हृषितः अस्मि, भयेन च मे मनः प्रव्यथितम्; (हे) देव! मे तत् एव रूपं दर्शय; (हे) देवेश! (हे) जगन्निवास! प्रसीद।
हिन्दी अनुवाद
मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है; इसलिये आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइये। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइये।
भावार्थ
अर्जुन की मिश्रित भावना — 'हृषित' (प्रसन्न) भी हैं, क्योंकि ऐसा अद्भुत रूप पहले किसी ने नहीं देखा; और 'प्रव्यथित' (भयभीत) भी, क्योंकि यह रूप अत्यन्त भयंकर है। इसलिये वे प्रार्थना करते हैं — 'तदेव मे दर्शय देव रूपम्' — वही पहले वाला, परिचित, सौम्य रूप दिखाइये। मनुष्य का हृदय भगवान् के ऐश्वर्य से अधिक उनके सौम्य, प्रेमपूर्ण रूप को चाहता है। माधुर्य ऐश्वर्य से अधिक प्रिय है।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव। तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥
अन्वय
अहं त्वां तथा एव किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तं द्रष्टुम् इच्छामि; (हे) सहस्रबाहो! (हे) विश्वमूर्ते! तेन एव चतुर्भुजेन रूपेण भव।
हिन्दी अनुवाद
मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिये हुए देखना चाहता हूँ; इसलिये हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइये।
भावार्थ
अर्जुन विशेष रूप से भगवान् के 'चतुर्भुज' रूप — मुकुट, गदा और चक्र धारण किये हुए विष्णु रूप — को देखना चाहते हैं। 'सहस्रबाहो' — हज़ार भुजाओं वाले — से 'चतुर्भुज' — चार भुजाओं वाले — रूप में आने की प्रार्थना है। यह विश्वरूप से सौम्य रूप की ओर लौटने का पहला चरण है। चतुर्भुज रूप भगवान् का वह दिव्य किन्तु सौम्य रूप है, जिसका भक्त ध्यान करते हैं।
११.४७ श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (हे) अर्जुन! प्रसन्नेन मया आत्मयोगात् तव इदं तेजोमयम् आद्यम् अनन्तं विश्वं परं रूपं दर्शितम्, यत् मे त्वत् अन्येन न दृष्टपूर्वम्।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरा परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट् रूप तुझको दिखलाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था।
भावार्थ
भगवान् अर्जुन को आश्वस्त करते हैं — यह रूप उन्होंने 'प्रसन्नेन' — प्रसन्न होकर, कृपा करके — अपनी योगशक्ति से दिखाया। यह 'तेजोमय', 'आद्य' (सबका आदि), 'अनन्त' विश्वरूप है, जिसे अर्जुन के अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा (इस विशेष रूप में)। यह अर्जुन के प्रति भगवान् के विशेष प्रेम का प्रमाण है। भय की कोई बात नहीं — यह दर्शन कृपा का फल था, कोप का नहीं।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥
अन्वय
(हे) कुरुप्रवीर! न वेदयज्ञाध्ययनैः, न दानैः, न च क्रियाभिः, न उग्रैः तपोभिः (अपि) नृलोके एवंरूपः अहं त्वत् अन्येन द्रष्टुं शक्यः।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्वरूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दूसरे द्वारा देखा जा सकता हूँ।
भावार्थ
भगवान् इस दर्शन की दुर्लभता बताते हैं — न वेद पढ़ने से, न यज्ञ करने से, न दान से, न कर्मकाण्ड से, न कठोर तपस्या से यह रूप देखा जा सकता है। ये सब साधन अच्छे हैं, पर भगवान् को प्रत्यक्ष दिखाने में समर्थ नहीं। केवल भगवान् की कृपा से — जैसी अर्जुन पर हुई — यह सम्भव है। भगवान् किसी साधन से बँधे नहीं; वे केवल प्रेम और कृपा से प्रकट होते हैं।
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्। व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥
अन्वय
मम ईदृक् इदं घोरं रूपं दृष्ट्वा ते व्यथा मा (भूत्), विमूढभावः च मा (भूत्); त्वं व्यपेतभीः प्रीतमनाः (सन्) पुनः मे तत् एव इदं रूपं प्रपश्य।
हिन्दी अनुवाद
मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिये और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये। तू भयरहित और प्रीतियुक्त मन वाला होकर उसी मेरे इस शंख-चक्र-गदा-पद्मयुक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख।
भावार्थ
भगवान् स्नेह से अर्जुन को सान्त्वना देते हैं — 'मा ते व्यथा' — व्यथित मत हो; 'मा च विमूढभावः' — घबराओ मत। भय छोड़कर, 'प्रीतमनाः' — प्रसन्न मन से — फिर से मेरा वही रूप देखो। भगवान् अपने भक्त को भय में नहीं देख सकते। वे विश्वरूप दिखाकर अर्जुन को सत्य का बोध कराना चाहते थे, डराना नहीं। अब वे अपने सौम्य रूप में लौटने वाले हैं।
११.५० सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः। आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥
अन्वय
सञ्जयः उवाच — वासुदेवः अर्जुनं तथा इति उक्त्वा भूयः स्वकं रूपं दर्शयामास; च महात्मा पुनः सौम्यवपुः भूत्वा भीतम् एनम् आश्वासयामास।
हिन्दी अनुवाद
सञ्जय बोले — वासुदेव भगवान् ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखलाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया।
भावार्थ
सञ्जय बताते हैं कि भगवान् ने पहले अपना 'स्वक रूप' (चतुर्भुज रूप) दिखाया, और फिर 'सौम्यवपु' — सौम्य, मनुष्य रूप — धारण करके भयभीत अर्जुन को 'आश्वासयामास' — धीरज बँधाया, सान्त्वना दी। विश्वरूप से चतुर्भुज, और चतुर्भुज से द्विभुज मानव रूप — यह क्रमिक परिवर्तन अर्जुन को धीरे-धीरे सामान्य अवस्था में लाने के लिये था। भगवान् की करुणा हर क्षण भक्त का ध्यान रखती है।
११.५१ अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) जनार्दन! तव इदं सौम्यं मानुषं रूपं दृष्ट्वा इदानीं (अहं) सचेताः संवृत्तः अस्मि, प्रकृतिं गतः (च अस्मि)।
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे जनार्दन! आपके इस अति शान्त मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ।
भावार्थ
भगवान् का परिचित, सौम्य मनुष्य रूप देखकर अर्जुन को चैन मिलता है — 'सचेताः' — होश में आ गया हूँ, 'प्रकृतिं गतः' — अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आया हूँ। विश्वरूप का दर्शन अद्भुत था, पर मनुष्य के लिये उसे सहना कठिन है। भगवान् का सौम्य रूप ही भक्त के लिये सबसे प्रिय और सुखद है। इसीलिये भक्त श्रीकृष्ण के बाल रूप, गोपाल रूप या सखा रूप का ध्यान करना अधिक पसन्द करते हैं।
११.५२ श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — मम यत् इदं रूपं (त्वं) दृष्टवान् असि, (तत्) सुदुर्दर्शम्; देवाः अपि अस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः (सन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — मेरा जो चतुर्भुज रूप तुमने देखा है, यह सुदुर्दर्श है अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं; देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं।
भावार्थ
भगवान् बताते हैं कि अर्जुन ने जो रूप देखा, वह 'सुदुर्दर्श' — अत्यन्त दुर्लभ दर्शन वाला — है। देवता भी सदा इसके दर्शन के लिये लालायित रहते हैं, पर उन्हें भी यह सहज प्राप्त नहीं। अर्जुन का सौभाग्य असाधारण है। यह हमें याद दिलाता है कि भगवान् का दर्शन कोई साधारण बात नहीं; यह अनन्त पुण्य और कृपा का फल है।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
अन्वय
यथा मां (त्वं) दृष्टवान् असि, एवंविधः अहं न वेदैः, न तपसा, न दानेन, न च इज्यया द्रष्टुं शक्यः।
हिन्दी अनुवाद
जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है — इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ।
भावार्थ
भगवान् फिर से दोहराते हैं कि यह दर्शन वेद, तप, दान या यज्ञ से प्राप्त नहीं होता। यह पुनरावृत्ति इस सत्य पर बल देने के लिये है। ये सब साधन मन को शुद्ध करते हैं, पर भगवान् का साक्षात्कार उनसे परे है। तो फिर किससे होता है? अगला श्लोक इसका उत्तर देता है — गीता के सबसे महत्वपूर्ण सत्यों में से एक।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ ५४ ॥
अन्वय
तु (हे) परन्तप अर्जुन! अनन्यया भक्त्या एवंविधः अहं तत्त्वेन ज्ञातुं द्रष्टुं प्रवेष्टुं च शक्यः।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु हे परन्तप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिये, तत्त्व से जानने के लिये तथा प्रवेश करने के लिये अर्थात् एकीभाव से प्राप्त होने के लिये भी शक्य हूँ।
भावार्थ
उत्तर — 'भक्त्या त्वनन्यया' — केवल अनन्य भक्ति से! भगवान् को तीन प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है — 'ज्ञातुम्' (तत्त्व से जानना), 'द्रष्टुम्' (प्रत्यक्ष देखना) और 'प्रवेष्टुम्' (उनमें प्रवेश करना, एक हो जाना)। ये तीनों अनन्य भक्ति से सम्भव हैं। यह श्लोक गीता में भक्ति की सर्वोच्चता का स्पष्ट उद्घोष है। जो वेद, यज्ञ, तप और दान से नहीं मिलता, वह प्रेम से मिलता है।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥
अन्वय
(हे) पाण्डव! यः मत्कर्मकृत्, मत्परमः, मद्भक्तः, सङ्गवर्जितः, सर्वभूतेषु निर्वैरः (च), सः माम् एति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूत-प्राणियों में वैरभाव से रहित है, वह अनन्य भक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।
भावार्थ
ग्यारहवें अध्याय का समापन अनन्य भक्त के पाँच लक्षणों से होता है — 'मत्कर्मकृत्' (भगवान् के लिये कर्म करने वाला), 'मत्परम' (भगवान् को परम लक्ष्य मानने वाला), 'मद्भक्त' (भगवान् से प्रेम करने वाला), 'सङ्गवर्जित' (आसक्ति से रहित) और 'सर्वभूतेषु निर्वैर' — किसी भी प्राणी से वैर न रखने वाला। अन्तिम गुण विशेष महत्वपूर्ण है — भगवान् का भक्त किसी से द्वेष नहीं कर सकता, क्योंकि वह सबमें भगवान् को देखता है। इस श्लोक को शंकराचार्य ने 'सम्पूर्ण गीता का सार' कहा है। यह अध्याय 'विश्वरूपदर्शनयोग' कहलाता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नाम एकादशोऽध्यायः ॥

ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।
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