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श्रीदेव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम् अर्थ सहित | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 13 Oct 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र, Devi Aparadha Kshamapana Stotram, देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र हिन्दी अर्थ, Devi Aparadha Kshamapan Stotram Meaning in Hindi, आदि शंकराचार्य स्तोत्र, Adi Shankaracharya Stotram, दुर्गा क्षमा प्रार्थना, Durga Puja Kshama Prarthana,

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श्रीदेव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम् अर्थ सहित | cdsharma.in

देव्यपराधक्षमापणस्तोत्रम् (मूल श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद)

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो

न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः।

न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं

परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥१॥

हिन्दी अर्थ: हे माँ! मैं न मन्त्र जानता हूँ, न यन्त्र और न ही स्तुति करना जानता हूँ। मुझे न तो आपका आवाहन करना आता है, न ध्यान लगाना और न ही आपकी महिमा व कथाओं का ज्ञान है। मैं न तो आपकी मुद्राओं को जानता हूँ और न ही व्याकुल होकर पुकारना जानता हूँ; किन्तु हे माता! मैं केवल इतना जानता हूँ कि आपके चरणों की शरण में रहना ही समस्त क्लेशों और दुःखों को हरने वाला है।

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया

विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्।

तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥

हिन्दी अर्थ: पूजा-विधि के अज्ञान से, धन के अभाव से, आलस्य के कारण अथवा विवशतावश सामर्थ्य न होने से आपके चरणों की सेवा में जो भूल या त्रुटि हुई है, हे संसार का उद्धार करने वाली कल्याणमयी माँ! वह सब क्षमा करने योग्य है; क्योंकि पुत्र कुपुत्र (बुरा पुत्र) भले ही हो सकता है, किन्तु माता कभी कुमाता (बुरी माता) नहीं होती।

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः

परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः।

मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥

हिन्दी अर्थ: हे जननी! इस पृथ्वी पर आपके बहुत से सीधे-सादे और आज्ञाकारी पुत्र हैं, परन्तु उन सबके बीच में मैं एक अत्यन्त चंचल और भटका हुआ पुत्र हूँ। हे शिवे! इस कारण से मेरा त्याग कर देना आपके लिए कदापि उचित नहीं है; क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती।

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता

न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।

तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥

हिन्दी अर्थ: हे जगन्माता! हे माँ! मैंने कभी आपके चरणों की यथोचित सेवा नहीं की और न ही हे देवी! मैंने आपको बहुत सा धन-द्रव्य ही अर्पित किया। फिर भी आप मुझ पर जो अनुपम और असीम स्नेह बरसाती हैं, वह केवल आपकी वात्सल्यमयी दया है; क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, किन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती।

परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया

मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।

इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता

निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥५॥

हिन्दी अर्थ: विभिन्न प्रकार की कठिन पूजा-विधियों से व्याकुल होकर मैंने अन्य देवताओं की आराधना छोड़ दी है और अब मेरी आयु भी पचासी वर्ष से अधिक बीत चुकी है। हे गणेश जी की माता (लम्बोदर-जननी)! यदि इस वृद्धावस्था में भी मुझ पर आपकी कृपा नहीं होगी, तो मुझ बेसहारा को और किसका सहारा मिलेगा? मैं किसकी शरण में जाऊँगा?

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा

निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।

तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं

जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥

हिन्दी अर्थ: हे अपर्णे! आपके मूल मन्त्र का एक भी अक्षर यदि किसी के कान में पड़ जाता है, तो उसका यह चमत्कारी फल होता है कि चाण्डाल (मूर्ख या अशिक्षित) भी शहद के समान मधुर वाणी बोलने वाला वाक्पटु विद्वान बन जाता है और अत्यंत निर्धन व्यक्ति भी निर्भय होकर करोड़ों स्वर्णमुद्राओं के साथ चिरकाल तक ऐश्वर्यपूर्वक जीता है। हे माता! जब मन्त्र के केवल कान में पड़ने का यह फल है, तो फिर विधिपूर्वक जप करने का क्या फल होगा, यह कौन जान सकता है!

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो

जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।

कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं

भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥

हिन्दी अर्थ: जो चिता की भस्म लगाते हैं, विष का भक्षण करते हैं, दिगम्बर (दिशाएं ही जिनके वस्त्र हैं) हैं, जटाधारी हैं, जिनके गले में सर्पराज का हार है, हाथ में कपाल धारण करने वाले तथा भूतों के स्वामी हैं—वे पशुपति भगवान शिव जो आज सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के एकमात्र 'जगदीश' पद को प्राप्त हैं, हे भवानी! यह सब केवल आपके साथ पाणिग्रहण (विवाह) करने का ही शुभ फल है।

न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे

न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।

अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै

मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥

हिन्दी अर्थ: हे चन्द्रमुखी माँ! न तो मुझे मोक्ष की कोई आकांक्षा है, न सांसारिक धन-वैभव की चाह है, न किसी विशेष ज्ञान की अपेक्षा है और न ही सांसारिक सुखों की इच्छा है। हे जननी! मैं तो केवल आपसे यही याचना करता हूँ कि मेरा पूरा जीवन केवल ‘मृडानी, रुद्राणी, शिव-शिव, भवानी’ इन आपके पावन नामों का जप करते हुए ही व्यतीत हो।

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः

किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।

श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे

धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥

हिन्दी अर्थ: हे श्यामा! मैंने नाना प्रकार की सामग्रियों और शास्त्रोक्त विधियों से आपकी आराधना नहीं की, और मेरे कठोर व कटु विचारों तथा वाणी द्वारा न जाने कितने अनुचित कर्म हुए हैं। फिर भी, यदि आप मुझ अनाथ और असहाय पर थोड़ी भी कृपा करती हैं, तो हे माँ! यह केवल आपके ही दयालु स्वभाव के योग्य और उचित है।

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं

करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।

नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः

क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥

हिन्दी अर्थ: हे दुर्गे! हे करुणा की सागर महेश्वरी! जब मैं संकटों और विपत्तियों में घिर जाता हूँ, तभी आपका स्मरण करता हूँ। मेरे इस आचरण को मेरी धूर्तता या कपट मत समझना; क्योंकि बालक भूख और प्यास से व्याकुल होने पर ही स्वाभाविक रूप से अपनी माँ को याद करता है।

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि । अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥

हिन्दी अर्थ: हे जगदम्बा! यदि मुझ जैसे अधम पर भी आपकी पूर्ण करुणा बनी हुई है, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? क्योंकि अपराधों की झड़ी लगा देने वाले पुत्र की भी कोई माता कभी उपेक्षा नहीं करती।

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।

एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥

हिन्दी अर्थ: हे महादेवी! मेरे समान इस संसार में कोई बड़ा पापी नहीं है और आपके समान कोई पापों का नाश करने वाली नहीं है। ऐसा विचार करके, जैसा आपको उचित और योग्य लगे, वैसा ही मेरे साथ कीजिए।

।। इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

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