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सम्पूर्ण शिव तांडव स्तोत्र संस्कृत श्लोक एवं सरल हिंदी अर्थ सहित | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 25 Oct 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ शिव तांडव स्तोत्र, Shiva Tandava Stotram, शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित, Shiv Tandav lyrics in Hindi, रावण कृत शिव तांडव स्तोत्र, Ravan Rachit Shiv Stotra, भगवान शिव, Lord Shiva, स्तोत्र संग्रह, Shiva Stotram with Meaning, cdsharma.in

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सम्पूर्ण शिव तांडव स्तोत्र संस्कृत श्लोक एवं सरल हिंदी अर्थ सहित | cdsharma.in

सम्पूर्ण शिव तांडव स्तोत्र (संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अर्थ)


शिव तांडव स्तोत्र परम शिवभक्त लंकापति रावण द्वारा रचा गया एक अत्यंत शक्तिशाली और अद्भुत स्तोत्र है। इसमें भगवान शिव के दिव्य स्वरूप, उनके प्रलयंकारी तांडव नृत्य और उनकी असीम कृपा का काव्यात्मक वर्णन है।


जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्‌। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्‌ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सघन जटारूपी वन से प्रवाहित होकर गिरती हुई गंगाजी की धाराओं से जिनका कंठ-प्रदेश पवित्र है, जिनके गले में लंबे-लंबे विशाल सर्पों की माला लटक रही है तथा जो डमरू के 'डम-डम' गंभीर नाद के साथ प्रचंड तांडव नृत्य कर रहे हैं—वे कल्याणकारी भगवान शिव हमारा कल्याण विस्तार करें। ॥१॥

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

हिन्दी अर्थ: जटा रूपी कड़ाह में चक्कर खाकर अति वेग से विलासपूर्वक घूमती हुई देवनदी गंगा की चंचल लहरों की लताएँ जिनके मस्तक पर सुशोभित हैं, जिनके ललाट के फलक पर 'धगद्-धगद्' करती हुई अग्नि प्रचंड रूप से प्रज्वलित हो रही है—उन बाल-चन्द्रमा से विभूषित मस्तक वाले भगवान चंद्रशेखर में मेरा अनुराग प्रतिपल बढ़ता रहे। ॥२॥

धराधरेंद्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर- स्फुरद्दिगंतसंततिप्रमोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

हिन्दी अर्थ: पर्वतराज हिमाचल की पुत्री पार्वती के विलासपूर्ण कटाक्षों से जिनका मन परमानंद से उल्लसित रहता है, जिनकी कृपादृष्टि की अनवरत धारा से भक्तों की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ तुरंत दूर हो जाती हैं—उन दिशाओं को ही वस्त्र के रूप में धारण करने वाले दिगंबर शिव में मेरा चित्त निरंतर आनंदित रहे। ॥३॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

हिन्दी अर्थ: जटाओं में लिपटे हुए सर्पों के फणों की मणियों के पिंगल (पीले-लाल) प्रकाश से दिशा रूपी स्त्रियों के मुख कुंकुम के लेप से पुते हुए प्रतीत हो रहे हैं तथा जो मतवाले गजासुर के चर्म रूपी उत्तरीय वस्त्र से सुशोभित हैं—उन समस्त जीवों के पालनकर्ता भूतभावन शिव में मेरा मन अद्भुत आनंद का अनुभव करे। ॥४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर- प्रसूनधूलिधोरणीविधूसरांघ्रिपीठभूः। भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

हिन्दी अर्थ: इंद्र आदि समस्त देवताओं के मुकुटों में सजे हुए पुष्पों के पराग-कणों की धूलि से जिनके चरण-पीठ धूसरित हो रहे हैं, जिनका जटाजूट शेषनाग आदि सर्पराजों की माला से आबद्ध है और जिनके मस्तक पर चकोर के प्रिय बंधु चंद्रमा विराजमान हैं—वे भगवान शिव हमें चिरकाल के लिए अक्षय संपदा प्रदान करें। ॥५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्‌। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः ॥६॥

हिन्दी अर्थ: जिन्होंने अपने ललाट की वेदी पर प्रज्वलित अग्नि की प्रचंड ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया था, जिन्हें देवराज इंद्र भी शीश नवाते हैं तथा जो अमृतमयी किरणों वाली चंद्रकला से सुशोभित हैं—उन जटाधारी महाकपाली भगवान शिव का उन्नत मस्तक हमारे संपूर्ण ऐश्वर्य और कल्याण का निमित्त बने। ॥६॥

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्- धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके। धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

हिन्दी अर्थ: अपने विकराल ललाट-पट्ट पर 'धगद्-धगद्' जलती हुई अग्नि में कामदेव की आहुति देने वाले तथा गिरिराजपुत्री उमा के वक्षःस्थल के अग्रभाग पर विविध प्रकार के सुंदर पत्र-पुष्प उकेरने में अद्वितीय शिल्पी, उन त्रिलोचन भगवान शिव में मेरी अविचल प्रीति बनी रहे। ॥७॥

नवीनमेघमंडलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥

हिन्दी अर्थ: नवीन मेघों के समूह से घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के गहन अंधकार के समान जिनका कंठ श्यामल (नीला) है, जो देवनदी गंगा को अपनी जटाओं में धारण किए हैं, हाथी का चर्म पहने हुए हैं और चंद्रमा की कलाओं से मनोहारी रूप धरते हैं—वे संपूर्ण जगत का भार वहन करने वाले शिव हमें सब प्रकार की समृद्धि प्रदान करें। ॥८॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- विडम्बिकण्ठकन्धरा रुचिप्रबन्धकंधरम्‌। स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

हिन्दी अर्थ: खिले हुए नीलकमल की श्याम कांति से सुशोभित कंठ वाले, कामदेव का मान मर्दन करने वाले, त्रिपुरासुर का वध करने वाले, संसार के बंधनों और दुखों को काटने वाले, दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाले, गजासुर और अंधकासुर का संहार करने वाले तथा स्वयं यमराज को भी पराजित करने वाले महाकाल शिव का मैं निरंतर भजन करता हूँ। ॥९॥

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी- रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्‌। स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

हिन्दी अर्थ: असीम कल्याणकारी भगवती पार्वती की समस्त कला-रूपी कदंब मंजरियों से छलकते हुए रस-प्रवाह का आस्वादन करने वाले भ्रमर-स्वरूप, कामदेव, त्रिपुरासुर, भव-बंधन, दक्ष-यज्ञ, गजासुर तथा अंधकासुर का अंत करने वाले और यमराज के भी अंतक (काल के भी काल) भगवान शिव का मैं भजन करता हूँ। ॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमस्फुरद्- धगद्धगद्विनिर्गमत्करालभालहव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल- ध्वनिक्रमप्रवर्तितः प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

हिन्दी अर्थ: आकाश में तेजी से घूमते हुए भयंकर सर्पों की फुंकारों से जिनके ललाट की विकराल अग्नि 'धगद्-धगद्' प्रज्वलित हो रही है और मृदंग की 'धिमिद्-धिमिद्' मंगलमयी गंभीर ध्वनि के तालबद्ध आरोह-अवरोह के साथ जिनका प्रचंड तांडव नृत्य हो रहा है—वे सर्वेश्वर भगवान शिव सर्वदा विजयी हों। ॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

हिन्दी अर्थ: कठोर पत्थर और विचित्र कोमल शय्या में, विषधर सर्प और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में, तिनके और कमल-नयनी सुंदरी में, सामान्य प्रजा और चक्रवर्ती सम्राट में समान दृष्टि रखते हुए—मैं अपने मन को समभाव में स्थित कर कब सदाशिव का ध्यान करूँगा? ॥१२॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्‌। विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥

हिन्दी अर्थ: मैं कब देवनदी गंगा के सुरम्य निकुंजों में निवास करते हुए, समस्त कुविचारों से मुक्त होकर, सिर पर हाथ जोड़े, चंचल वासनाओं से विरक्त होकर, अपने ललाट को शिव चरणों में समर्पित कर 'शिव-शिव' मंत्र का उच्चारण करते हुए परम सुख को प्राप्त करूँगा? ॥१३॥

निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलिमल्लिका- निगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः। तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीं महर्निशं परिश्रयः परं पदं तदङ्गदत्विषां चयः ॥१४॥

हिन्दी अर्थ: देवांगनाओं के जूड़े में गुंथे हुए मल्लिका के फूलों से टपकते हुए सुगंधित मकरंद से आच्छादित होकर मनोहर प्रतीत होने वाली तथा परम पद की शरण स्थली भगवान शिव के दिव्य अंगों की अनुपम कांति हमारे मन को रात-दिन परमानंद से परिपूर्ण रखे। ॥१४॥

प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारिणी महाष्टसिद्धिकामिनीजनावहूतजल्पना। विमुक्तवामलोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥

हिन्दी अर्थ: प्रचंड बड़वानल की भाँति पापों का संहार करने वाली, अणिमादि अष्ट महासिद्धियों की अभिलाषा रखने वाले साधकों द्वारा संस्तुत तथा शिव-विवाह के पावन समय पर देवांगनाओं द्वारा उच्चारित मंगलमयी 'शिव-शिव' की मंगल ध्वनि संपूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करने का सामर्थ्य प्रदान करे। ॥१५॥

फलश्रुति (स्तोत्र पाठ का महात्म्य)

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति संततम्‌। हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्‌ ॥१६॥

हिन्दी अर्थ: इस उत्तमोत्तम स्तोत्र का जो मनुष्य नित्य प्रति शुद्ध भाव से पाठ, स्मरण अथवा गान करता है, वह निरंतर परम विशुद्धि को प्राप्त होता है। वह भगवान शिव एवं श्रीगुरु के प्रति अनन्य भक्ति पाता है और अन्य किसी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता; क्योंकि कल्याणकारी भगवान शिव का चिंतन देहधारियों के समस्त अज्ञान और मोह का नाश करने वाला है। ॥१६॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

हिन्दी अर्थ: प्रदोष काल में शिव पूजन की समाप्ति के पश्चात दशानन रावण द्वारा रचित इस स्तोत्र का जो भक्तिपूर्वक पाठ करता है, उसे भगवान सदाशिव रथ, हाथी और घोड़ों से परिपूर्ण स्थिर तथा प्रसन्न लक्ष्मी प्रदान करते हैं। ॥१७॥

॥ इति श्रीरावणविरचितं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम्‌ ॥

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