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षड्विंशत् एकादशी व्रत विवरण: 26 एकादशियों के नाम, नियम, शास्त्रीय निर्णय एवं संपूर्ण व्रत कथाएं

✍️ CD Sharma · 📅 19 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ Ekadashi Vrat, 26 Ekadashi List, Ekadashi Niyam, Ekadashi Paran Vidhi, Vrat Katha, Sanatan Dharma, Hindu Fasting Rules

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षड्विंशत् एकादशी व्रत विवरण: 26 एकादशियों के नाम, नियम, शास्त्रीय निर्णय एवं संपूर्ण व्रत कथाएं

षड्विंशत् एकादशी व्रत विवरण

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक सामान्य वर्ष में कुल चौबीस एकादशियां होती हैं, किंतु जिस वर्ष अधिकमास (मलमास/पुरुषोत्तम मास) आता है, उस वर्ष इनकी संख्या बढ़कर छब्बीस (षड्विंशत्) हो जाती है।

26 एकादशियों की वैदिक नामावली एवं पालक देवता

(पश्चिम देश प्रसिद्ध नाना पुराणोक्त षड्विंशत्येकादशी नामानि)

  • १. चैत्र मास (मार्च–अप्रैल) — पालक देवता: भगवान विष्णु
  • कृष्णपक्ष: पापमोचिनी एकादशी
  • शुक्लपक्ष: कामदा एकादशी
  • २. वैशाख मास (अप्रैल–मई) — पालक देवता: भगवान मधुसूदन
  • कृष्णपक्ष: वरुथिनी एकादशी
  • शुक्लपक्ष: मोहिनी एकादशी
  • ३. ज्येष्ठ मास (मई–जून) — पालक देवता: भगवान त्रिविक्रम
  • कृष्णपक्ष: अपरा (अचला) एकादशी
  • शुक्लपक्ष: निर्जला एकादशी
  • ४. आषाढ़ मास (जून–जुलाई) — पालक देवता: भगवान वामन
  • कृष्णपक्ष: योगिनी एकादशी
  • शुक्लपक्ष: देवशयनी एकादशी
  • ५. श्रावण मास (जुलाई–अगस्त) — पालक देवता: भगवान श्रीधर
  • कृष्णपक्ष: कामिका (कामदा) एकादशी
  • शुक्लपक्ष: पुत्रदा एकादशी
  • ६. भाद्रपद मास (अगस्त–सितंबर) — पालक देवता: भगवान हृषीकेश
  • कृष्णपक्ष: जया (अजा) एकादशी
  • शुक्लपक्ष: पद्मा (परिवर्तिनी) एकादशी
  • ७. आश्विन मास (सितंबर–अक्टूबर) — पालक देवता: भगवान पद्मनाभ
  • कृष्णपक्ष: इंदिरा एकादशी
  • शुक्लपक्ष: पापांकुशा एकादशी
  • ८. कार्तिक मास (अक्टूबर–नवंबर) — पालक देवता: भगवान दामोदर
  • कृष्णपक्ष: रमा (रम्भा) एकादशी
  • शुक्लपक्ष: प्रबोधिनी एकादशी
  • ९. मार्गशीर्ष मास (नवंबर–दिसंबर) — पालक देवता: भगवान केशव
  • कृष्णपक्ष: उत्पन्ना एकादशी
  • शुक्लपक्ष: मोक्षदा एकादशी
  • १०. पौष मास (दिसंबर–जनवरी) — पालक देवता: भगवान नारायण
  • कृष्णपक्ष: सफला एकादशी
  • शुक्लपक्ष: पुत्रदा एकादशी
  • ११. माघ मास (जनवरी–फरवरी) — पालक देवता: भगवान माधव
  • कृष्णपक्ष: षटतिला एकादशी
  • शुक्लपक्ष: जया एकादशी
  • १२. फाल्गुन मास (फरवरी–मार्च) — पालक देवता: भगवान गोविंद
  • कृष्णपक्ष: विजया एकादशी
  • शुक्लपक्ष: आमलकी एकादशी
  • १३. अधिक मास (मलमास - ३ वर्ष में एक बार) — पालक देवता: भगवान पुरुषोत्तम
  • कृष्णपक्ष: परमा (कमला) एकादशी
  • शुक्लपक्ष: पद्मिनी (समुद्रा) एकादशी
संख्याविशेषः । एगार इति भाषा । यथा महाभारते (६/१६/२१) — “एकादशी धार्त्तराष्ट्री कौरवाणां महाचमूः” ।।

एकादशी व्रत के अनिवार्य नियम

एकादशी व्रत का संकल्प लेने वाले व्रती को दशमी तिथि से ही शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करना चाहिए:

  • दशमी के दिन: इस दिन माँस, प्याज, लहसुन, मसूर की दाल आदि तामसिक व निषिद्ध भोजन न करें। रात्रि में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें और भोग-विलास से दूर रहें।
  • एकादशी के दिन:
  • प्रातः काल लकड़ी का दातून न करें। स्वयं गिरे हुए नींबू, जामुन या आम के पत्तों से दाँत व कंठ साफ करें (जीवित वृक्ष से पत्ता तोड़ना वर्जित है)। यदि पत्ता उपलब्ध न हो, तो केवल जल से १२ बार कुल्ले कर लें।
  • स्नानादि के उपरांत मंदिर में जाकर गीता का पाठ करें अथवा श्रवण करें।
  • प्रभु के सामने यह दृढ़ संकल्प करें: “आज मैं चोर, पाखंडी और दुराचारी मनुष्यों से बात नहीं करूँगा, किसी का दिल नहीं दुखाऊँगा और रात्रि में जागरण कर कीर्तन करूँगा।”
  • मंत्र जप: द्वादशाक्षर मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" और श्रीविष्णुसहस्रनाम का पाठ करें।
  • एकादशी के दिन घर में झाड़ू न लगाएँ, ताकि सूक्ष्म जीवों की हिंसा न हो। बाल व नाखून न कटवाएँ और अधिक बोलने से बचें।
  • फलाहार का नियम: गाजर, शलजम, गोभी, पालक, कुलफा का साग आदि ग्रहण न करें। केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता आदि फल ग्रहण किए जा सकते हैं। प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर और तुलसीदल अर्पित करके ही लें।
  • द्वादशी के दिन: ब्राह्मणों को भोजन, मिष्ठान्न व दक्षिणा दें। स्वयं किसी का दिया अन्न न खाएं, शांत रहें और मधुर वाणी बोलें।

एकादशी निर्णय एवं शास्त्रीय विधान

धर्मसिंधु के अनुसार एकादशी दो प्रकार की होती है — विद्धा और शुद्धा।

  • विद्धा एकादशी: यदि एकादशी तिथि दशमी से युक्त हो तो वह विद्धा कहलाती है।
  • पूर्वविद्धा: यदि सूर्योदय से पूर्व अरुणोदय काल (सूर्योदय से १ घंटा ३६ मिनट पूर्व) में दशमी का किंचित् मात्र अंश भी हो, तो वह पूर्वविद्धा कहलाती है। पद्मपुराण के अनुसार ऐसी एकादशी दैत्यों का बल बढ़ाने वाली और पुण्यों का नाश करने वाली होती है, अतः यह सर्वथा त्याज्य है।
  • परविद्धा: द्वादशी से युक्त एकादशी परविद्धा कहलाती है। यह सर्वदा ग्राह्य है और भक्ति में वृद्धि करने वाली मानी गई है।
  • शुद्धा एकादशी: सूर्योदय के समय केवल एकादशी हो और वह द्वादशी से युक्त हो, उसे शुद्धा एकादशी कहते हैं। सामान्य जनसाधारण को शुद्धा एकादशी का व्रत ही रखना चाहिए।

शास्त्र प्रमाण एवं श्लोक

एकादशीसमं किञ्चित् पावनं न च विद्यते । स्वर्गमोक्षप्रदा ह्येषा राज्यपुत्त्रप्रदायिनी ॥ एकादशीव्रतं भक्त्या यः करोति नरः सदा । स विष्णुलोकं व्रजति याति विष्णोः सरूपताम् ॥ (तत्त्वसागरे)
शुक्ले वा यदि वा कृष्णे विष्णुपूजनतत्परः । एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि ॥ (भविष्य पुराण)
दशम्येकादशी यत्र तत्र नोपवसेद्बुधः । अपत्यानि विनश्यन्ति विष्णुलोकं न गच्छति ॥ (वशिष्ठ स्मृति)

अष्ट महाद्वादशी निरूपण

शास्त्रों में चार तिथिजन्य और चार नक्षत्रजन्य कुल आठ महाद्वादशियों का वर्णन है, जो समस्त पापों का हरण करने वाली हैं:

उन्मीलनी वञ्जुली च त्रिस्पृशा पक्षवर्द्धिनी । जया च विजया चैव जयन्ती पापनाशिनी ॥ (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
  • १. उन्मीलनी: जब सम्पूर्ण एकादशी अगले दिन द्वादशी में बढ़े, परंतु द्वादशी की वृद्धि न हो।
  • २. वञ्जुली: जब एकादशी की वृद्धि न होकर केवल द्वादशी की वृद्धि हो (त्रयोदशी में मुहूर्तार्ध द्वादशी हो)।
  • ३. त्रिस्पृशा: अरुणोदय काल में एकादशी, दिन-रात द्वादशी और अंत में त्रयोदशी का स्पर्श हो।
  • ४. पक्षवर्द्धिनी: अमावस्या अथवा पूर्णिमा की वृद्धि होने पर द्वादशी को पक्षवर्द्धिनी महाद्वादशी का व्रत होता है।
  • ५. जया: पुष्य नक्षत्र से युक्त द्वादशी।
  • ६. विजया: श्रवण नक्षत्र से युक्त द्वादशी।
  • ७. जयन्ती: पुनर्वसु नक्षत्र से युक्त द्वादशी।
  • ८. पापनाशिनी: रोहिणी नक्षत्र से युक्त द्वादशी।

एकादशी व्रत एवं पारण के विशेष नियम

  • व्रत का संकल्प मंत्र:
दशमीदिनमारभ्य करिष्येऽहं व्रतं तव । त्रिदिनं देवदेवेश निर्विघ्नं कुरु केशव ॥
  • उपवास के दिन श्राद्ध निषेध: एकादशी के दिन माता-पिता की मृत्यु तिथि आने पर भी श्राद्ध कर्म द्वादशी को ही करना चाहिए, एकादशी को केवल उपवास रखें।
  • द्वादशी के दिन त्याज्य ८ बातें: दिन में सोना, पराया अन्न, दोबारा भोजन, मैथुन, शहद, काँसे के पात्र में भोजन, माँस और तेल।
  • व्रत न टूटने वाली ८ वस्तुएं (अत्यंत संकट काल में):
अष्टौ तान्य व्रतघ्नानि आपो मूलं फलं पयः । हविर्ब्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ॥ (स्कंद पुराण) (जल, कंदमूल, फल, दूध, घृत, ब्राह्मण की इच्छा, गुरु का वचन और औषधि।)
  • पारण के नियम:
  • पारण सदैव द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना आवश्यक है।
  • हरिवासर निषेध: द्वादशी के प्रथम चरण (एक चौथाई अवधि) को हरिवासर कहते हैं; इस समय पारण करना वर्जित है।
  • पारण के लिए प्रातःकाल सर्वोत्तम होता है, मध्याह्न काल से बचना चाहिए।
  • यदि एकादशी दो दिन पड़े, तो गृहस्थ पहले दिन और संन्यासी/वैष्णव दूसरे दिन (दूजी एकादशी) व्रत रखते हैं।
  • पारण संकल्प मंत्र:
एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरे ऽहनि । भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

सभी 26 एकादशियों की संपूर्ण पौराणिक व्रत कथा एवं माहात्म्य

१. चैत्र कृष्णपक्ष — पापमोचिनी एकादशी

  • देवता: भगवान विष्णु
  • माहात्म्य एवं कथा: भविष्योत्तर पुराण के अनुसार महर्षि लोमश ने राजा मान्धाता को यह कथा सुनाई। चैत्ररथ वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या में लीन थे। मंजुघोषा नामक अप्सरा ने कामदेव की सहायता से ऋषि का तपोभंग कर दिया। काम-वासना में डूबकर ऋषि वर्षों तक शिव-साधना भूल गए। जब उन्हें आत्मज्ञान हुआ, तो उन्होंने कुपित होकर अप्सरा को पिशाचिनी बनने का शाप दिया। अप्सरा के पश्चाताप करने पर ऋषि ने उसे चैत्र कृष्ण ‘पापमोचिनी एकादशी’ का विधिपूर्वक व्रत करने को कहा। मेधावी मुनि ने स्वयं भी अपने पाप-प्रायश्चित हेतु यह व्रत रखा। व्रत के प्रभाव से अप्सरा पिशाच योनि से मुक्त होकर दिव्य रूप में स्वर्ग गई और ऋषि का खोया हुआ तपोबल व तेज पुनः लौट आया।

२. चैत्र शुक्लपक्ष — कामदा एकादशी

  • देवता: भगवान विष्णु
  • माहात्म्य एवं कथा: यह व्रत ब्रह्महत्या जैसे घोर पापों और पिशाचत्व का नाश करने वाला है। भोगीपुर नगर के राजा पुण्डरीक की राजसभा में गंधर्व ललित और उसकी पत्नी ललिता रहते थे। एक दिन गायन करते समय ललित का ध्यान अपनी प्रियतमा पर चला गया, जिससे उसका सुर-ताल बिगड़ गया। राजा ने क्रुद्ध होकर ललित को विशालकाय नरभक्षी राक्षस बनने का शाप दे दिया। पति के उद्धार के लिए ललिता ऋष्यमूक पर्वत पर श्रृंगी ऋषि के आश्रम पहुँची। ऋषि के आदेश पर उसने चैत्र शुक्ल ‘कामदा एकादशी’ का व्रत रखकर उसका पुण्य अपने पति को अर्पित किया। पुण्य मिलते ही ललित राक्षस योनि से मुक्त होकर दिव्य रूप में आया और दोनों विमान से स्वर्ग सिधारे।

३. वैशाख कृष्णपक्ष — वरुथिनी एकादशी

  • देवता: भगवान मधुसूदन
  • माहात्म्य एवं कथा: भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया कि यह व्रत दस हजार वर्षों की कठिन तपस्या के समान फल देता है। शास्त्रों में अश्वदान से गजदान, गजदान से भूमिदान, भूमिदान से तिलदान, तिलदान से स्वर्णदान और स्वर्णदान से अन्नदान श्रेष्ठ बताया गया है। कन्यादान व गोदान भी इसके समान हैं, किंतु संसार में सबसे बड़ा विद्यादान है। वरुथिनी एकादशी का व्रत करने वाला व्यक्ति विद्यादान और कन्यादान दोनों का संपूर्ण फल अनायास पा लेता है। यह तिथि पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्य जी की जयंती तिथि भी है।

४. वैशाख शुक्लपक्ष — मोहिनी एकादशी

  • देवता: भगवान मधुसूदन
  • माहात्म्य एवं कथा: महर्षि वशिष्ठ ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को यह कथा सुनाई थी। भद्रावती नगरी में धनपाल नामक धर्मात्मा वैश्य का छोटा पुत्र धृष्टबुद्धि अत्यंत पापी, जुआरी और दुराचारी था। पिता द्वारा त्यागे जाने पर वह भटकते हुए महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम पहुँचा और पापमुक्ति का उपाय माँगा। ऋषि के उपदेश से उसने वैशाख शुक्ल ‘मोहिनी एकादशी’ का व्रत किया। इस पावन व्रत के प्रभाव से उसके मेरु पर्वत समान संचित महापाप भस्म हो गए और वह गरुड़ पर आरूढ़ होकर विष्णुलोक चला गया। इसके पठन-श्रवण से एक सहस्र गोदान का फल मिलता है।

५. ज्येष्ठ कृष्णपक्ष — अपरा (अचला) एकादशी

  • देवता: भगवान त्रिविक्रम
  • माहात्म्य एवं कथा: यह एकादशी ब्रह्महत्या, परस्त्रीगमन, झूठी गवाही तथा गुरुनिंदा जैसे महापातकों का शमन करती है। मकर के सूर्य में प्रयाग-स्नान और कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के दान के बराबर इसका फल है। धर्मात्मा राजा महीध्वज को उसके छोटे भाई वज्रध्वज ने मारकर जंगल में पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु से राजा प्रेत बन गया। धौम्य ऋषि ने प्रेत को देखकर अपने तपोबल से उसका उद्धार करने के लिए स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी को उसका पुण्य प्रेत को दे दिया। राजा तत्काल प्रेत योनि से मुक्त होकर पुष्पक विमान से स्वर्ग चला गया।

६. ज्येष्ठ शुक्लपक्ष — निर्जला एकादशी

  • देवता: भगवान त्रिविक्रम
  • माहात्म्य एवं कथा: महर्षि वेदव्यास ने पांडुपुत्र भीमसेन को बताया कि यदि वे वर्ष की चौबीस एकादशियों का व्रत भूख सहन न होने के कारण नहीं कर सकते, तो ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को केवल जल का त्याग करके व्रत रखें। सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक बिना जल ग्रहण किए व्रत रखने से वर्षभर की संपूर्ण एकादशियों का फल प्राप्त हो जाता है। भीमसेन ने इस कठिन व्रत को पूर्ण किया, इसलिए इसे 'भीमसेनी एकादशी' या 'पांडव एकादशी' कहा जाता है। इस दिन जल से भरा कलश, छाता और वस्त्र दान करने का विधान है।
  • कलश दान मंत्र:
देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक । उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम् ॥

७. आषाढ़ कृष्णपक्ष — योगिनी एकादशी

  • देवता: भगवान वामन
  • माहात्म्य एवं कथा: यह व्रत अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य प्रदान करता है। अलकापुरी के राजा कुबेर के लिए हेम नामक माली मानसरोवर से नित्य पूजा हेतु पुष्प लाता था। एक दिन वह अपनी रूपवती पत्नी विशालाक्षी के साथ कामासक्त होकर पूजा के समय पुष्प ले जाना भूल गया। कुबेर ने शाप देकर उसे कोढ़ी बनाकर पृथ्वी पर गिरा दिया। कष्ट भोगते हुए माली महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुँचा। मुनि के कथनानुसार उसने आषाढ़ कृष्ण ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत किया, जिससे उसका कोढ़ दूर हुआ और वह पुनः अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुआ।

८. आषाढ़ शुक्लपक्ष — देवशयनी एकादशी

  • देवता: भगवान वामन
  • माहात्म्य एवं चातुर्मास: इसे शयनी या पद्मनाभा एकादशी भी कहते हैं। इस पावन तिथि से भगवान श्रीहरि क्षीरसागर में चार मास के लिए योगनिद्रा में शयन करते हैं और चातुर्मास आरंभ हो जाता है। इस काल में विवाह, यज्ञोपवीत, प्रतिष्ठा आदि शुभ कार्य निषिद्ध हो जाते हैं। भगवान वामन ने राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर उसके महल में नित्य निवास करने का वचन दिया था। अतः आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक श्रीविष्णु पाताल में राजा बलि के द्वार पर विश्राम करते हैं।

९. श्रावण कृष्णपक्ष — कामिका एकादशी

  • देवता: भगवान श्रीधर
  • माहात्म्य एवं कथा: ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद को बताया कि कामिका एकादशी के दिन शंख-चक्र-गदाधारी श्रीविष्णु का पूजन करने से गंगा, काशी और कुरुक्षेत्र स्नान से भी अधिक पुण्य मिलता है। इस दिन भगवान को अर्पित एक तुलसीदल का फल चार भार चाँदी और एक भार सुवर्ण दान के बराबर माना गया है। रात्रि में मंदिर में दीपदान करने से पितरों को स्वर्ग में अमृतपान प्राप्त होता है और मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाता है।

१०. श्रावण शुक्लपक्ष — पुत्रदा एकादशी

  • देवता: भगवान श्रीधर
  • माहात्म्य एवं कथा: महिष्मति नगरी का धर्मात्मा राजा महीजित संतानहीन होने से अत्यंत दुखी था। त्रिकालदर्शी महर्षि लोमश ने बताया कि राजा ने पूर्वजन्म में ज्येष्ठ द्वादशी को दो दिन से भूखा-प्यासा रहते हुए एक प्यासी गाय को जलाशय से भगाकर स्वयं जल पी लिया था। इसी कारण उसे संतान-शोक मिला। ऋषि के आदेश पर प्रजा व राजा ने श्रावण शुक्ल ‘पुत्रदा एकादशी’ का व्रत व रात्रि-जागरण कर उसका पुण्य राजा को दिया। इसके प्रभाव से महारानी ने एक अति तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।

११. भाद्रपद कृष्णपक्ष — जया (अजा) एकादशी

  • देवता: भगवान हृषीकेश
  • माहात्म्य एवं कथा: सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने कर्म के वश होकर अपना राज्य, धन, पत्नी और पुत्र सब बेच दिया तथा स्वयं श्मशान में चांडाल के सेवक बने। गौतम ऋषि के आदेश पर राजा ने भाद्रपद कृष्ण ‘अजा एकादशी’ का निष्ठापूर्वक व्रत और रात्रि-जागरण किया। व्रत के प्रभाव से राजा के सभी पाप कट गए, उनका मृत पुत्र जीवित हो गया, पत्नी व राज्य पुनः प्राप्त हुए और अंत में वे सपरिवार वैकुंठ पधारे। कथा सुनने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

१२. भाद्रपद शुक्लपक्ष — पद्मा (परिवर्तिनी) एकादशी

  • देवता: भगवान हृषीकेश
  • माहात्म्य एवं कथा: इस दिन क्षीरसागर में शयन कर रहे श्रीहरि करवट बदलते हैं, इसलिए इसे 'परिवर्तिनी एकादशी' कहते हैं। राजा मान्धाता के राज्य में तीन वर्ष तक भयंकर अनावृष्टि (सूखा) पड़ी। महर्षि अंगिरा के निर्देश पर राजा ने चारों वर्णों की प्रजा सहित भादों शुक्ल ‘पद्मा एकादशी’ का व्रत रखा। इसके पुण्य से मूसलाधार वर्षा हुई और प्रजा अन्न-धन से सुखी हो गई। इस दिन जल से भरे घड़े को वस्त्र से ढककर, दही, चावल, छाता और जूते का दान करना चाहिए।
  • दान मंत्र:
नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक ॥ अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव । भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव लोकानां सुखदायकः ॥

१३. आश्विन कृष्णपक्ष — इंदिरा एकादशी

  • देवता: भगवान पद्मनाभ
  • माहात्म्य एवं कथा: यह एकादशी पितरों को यमलोक की यातना से मुक्त कर वैकुंठ पहुँचाने वाली है। महिष्मति के राजा इंद्रसेन को देवर्षि नारद ने बताया कि उनके पिता पूर्वजन्म के किसी विघ्नवश यमराज के निकट रह रहे हैं। नारदजी की विधि के अनुसार राजा ने आश्विन कृष्ण एकादशी को शालिग्राम के समक्ष व्रत, श्राद्ध और पूजन किया। द्वादशी को पारण करते ही राजा के पिता गरुड़ पर बैठकर सीधे विष्णुलोक चले गए और राजा ने भी निष्कंटक राज्य भोगकर मोक्ष पाया।
  • संकल्प मंत्र:
अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः । श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

१४. आश्विन शुक्लपक्ष — पापांकुशा एकादशी

  • देवता: भगवान पद्मनाभ
  • माहात्म्य एवं कथा: यह व्रत समस्त पापों पर अंकुश लगाकर स्वर्ग व मोक्ष देने वाला है। भगवान पद्मनाभ का पूजन करने वाला व्यक्ति अपनी मातृपक्ष, पितृपक्ष, पत्नीपक्ष और मित्रपक्ष की दस-दस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। हजारों अश्वमेध और वाजपेय यज्ञ भी इस एकादशी के सोलहवें अंश के बराबर नहीं हैं। इस दिन सुवर्ण, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, छतरी और जूती दान करने से मनुष्य यमराज का मुख नहीं देखता।

१५. कार्तिक कृष्णपक्ष — रमा (रम्भा) एकादशी

  • देवता: भगवान दामोदर
  • माहात्म्य एवं कथा: राजा मुचुकुंद की पुत्री चंद्रभागा का विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन से हुआ था। शोभन अत्यंत दुर्बल था, किंतु ससुराल में एकादशी के कड़े नियम के कारण उसने निर्जल व्रत रखा और भूख से उसका प्राणांत हो गया। व्रत के फल से शोभन को मंदराचल पर्वत पर दिव्य नगर प्राप्त हुआ, किंतु अश्रद्धा से व्रत करने के कारण वह नगर अस्थिर था। जब चंद्रभागा को सोमशर्मा ब्राह्मण द्वारा यह ज्ञात हुआ, तो उसने अपने बचपन से संचित एकादशी व्रतों का पुण्य अपने पति को दे दिया। इसके प्रभाव से वह नगर प्रलयपर्यंत स्थिर और समृद्ध हो गया।

१६. कार्तिक शुक्लपक्ष — प्रबोधिनी (देवोत्थान) एकादशी

  • देवता: भगवान दामोदर
  • माहात्म्य एवं देव-जागरण: चार मास के शयन के उपरांत भगवान श्रीहरि इस दिन योगनिद्रा से जागते हैं और चातुर्मास समाप्त होता है। इस दिन से सभी मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं।
  • भगवान को जगाने का श्लोक:
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते । त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तमिदं भवेत् ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे । हिरण्याक्षप्राणघातिन् त्रैलोक्ये मंगलं कुरु ॥ (साधारण भाषा में "उठो देवा, बैठो देवा" कहकर भगवान को जगाया जाता है।) इस दिन रात्रि में तुलसी विवाह, दीपदान और संकीर्तन का अनंत पुण्य है।

१७. मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष — उत्पन्ना एकादशी

  • देवता: भगवान केशव
  • माहात्म्य एवं प्राकट्य कथा: सतयुग में 'मुर' नामक असुर ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग छीन लिया। भगवान विष्णु ने दैत्यों का संहार कर बद्रिकाश्रम की सिंहावती गुफा में विश्राम किया। जब मुर भगवान को मारने गुफा में घुसा, तो श्रीहरि के शरीर से एक अस्त्र-शस्त्र सुसज्जित दिव्य कन्या प्रकट हुई, जिसने अपनी हुंकार से मुर को भस्म कर दिया। भगवान ने प्रसन्न होकर उस कन्या का नाम 'एकादशी' रखा और वरदान दिया कि यह मेरी परम प्रिय तिथि होगी। अतः जीवन में एकादशी व्रत का शुभारंभ मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की इसी तिथि से किया जाता है।

१८. मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष — मोक्षदा एकादशी

  • देवता: भगवान केशव
  • माहात्म्य एवं कथा: चंपक नगर के राजा वैखानस ने स्वप्न में अपने पिता को नरक की यातनाएँ भोगते देखा। पर्वत मुनि ने बताया कि पूर्वजन्म के पाप से ऐसा हुआ है। राजा ने सपरिवार ‘मोक्षदा एकादशी’ का व्रत रखकर उसका पुण्य अपने पिता को समर्पित किया, जिससे उनके पूर्वज तत्काल नरक से छूटकर स्वर्ग चले गए। गीता जयंती: इसी दिन महाभारत युद्ध में कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य उपदेश दिया था, अतः यह तिथि 'गीता जयंती' के रूप में पूरे विश्व में पूजित है।

१९. पौष कृष्णपक्ष — सफला एकादशी

  • देवता: भगवान नारायण
  • माहात्म्य एवं कथा: चंपावती नगरी के राजा माहिष्मत के दुष्ट और वेश्यासक्त पुत्र लुम्भक को राज्य से निकाल दिया गया। वह जंगल में पीपल वृक्ष के नीचे रहता था। पौष कृष्ण दशमी की रात भीषण ठंड से वह सो न सका और एकादशी को दोपहर तक अचेत रहा। होश आने पर उसने गिरे हुए फल बटोरकर पीपल की जड़ में श्रीहरि को समर्पित कर दिए और रातभर जागता रहा। अनजाने में ही सफला एकादशी का व्रत-जागरण हो जाने से वह निष्पाप हो गया, उसे पुनः राज्य व पुत्र प्राप्त हुआ और अंत में वह वैकुंठ को गया।

२०. पौष शुक्लपक्ष — पुत्रदा एकादशी

  • देवता: भगवान नारायण
  • माहात्म्य एवं कथा: भद्रावती के राजा सुकेतु और रानी चंपा संतान न होने से अत्यंत दुखी थे। राजा वन में एक सरोवर के तट पर पहुँचे, जहाँ विश्वेदेव गण स्नान कर रहे थे। मुनियों ने राजा को पौष शुक्ल ‘पुत्रदा एकादशी’ का व्रत रखने का उपदेश दिया। राजा ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया और द्वादशी को पारण किया। व्रत के पुण्य से रानी ने एक अत्यंत धर्मात्मा, शूरवीर और कुलदीपक पुत्र को जन्म दिया। इस माहात्म्य को पढ़ने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।

२१. माघ कृष्णपक्ष — षटतिला एकादशी

  • देवता: भगवान माधव
  • माहात्म्य एवं कथा: एक धर्मपरायण ब्राह्मणी कठिन तप करती थी किंतु अन्नदान नहीं करती थी। भगवान विष्णु ने भिक्षुक बनकर भिक्षा माँगी, तो उसने मिट्टी का पिण्ड दे दिया। मृत्यु के बाद वैकुंठ में उसे सब मिला परंतु भोजन के अभाव में खाली कुटिया मिली। भगवान के निर्देश पर उसने देवकन्याओं से षटतिला एकादशी का व्रत सीखा और उसका अनुष्ठान किया, जिससे उसकी कुटिया धन-धान्य से भर गई।
  • तिल के ६ अनिवार्य प्रयोग: १. तिल मिश्रित जल से स्नान २. तिल का उबटन ३. तिल का तिलक ४. तिल मिले जल का सेवन ५. तिल का फलाहार भोजन ६. तिल से हवन
  • अर्घ्य मंत्र:
कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव । संसारार्णवमग्नानां प्रसीद पुरुषोत्तम ॥ नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु महापुरुष पूर्वज ॥ गृहाणार्घ्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते ॥

२२. माघ शुक्लपक्ष — जया एकादशी

  • देवता: भगवान माधव
  • माहात्म्य एवं कथा: यह व्रत मनुष्य को प्रेत व पिशाच योनि से मुक्ति दिलाता है। इंद्र की सभा में गंधर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पवती मर्यादा भूलकर नृत्य-गान करने लगे। इंद्र ने कुपित होकर दोनों को पिशाच योनि में जाने का शाप दिया। हिमालय पर दारुण शीत और भूख-प्यास के कारण माघ शुक्ल एकादशी को दोनों ने केवल फलाहार किया और रातभर जागते रहे। अनजाने में जया एकादशी का व्रत होने से दोनों की पिशाच योनि से मुक्ति हो गई और वे पुनः स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित हुए।

२३. फाल्गुन कृष्णपक्ष — विजया एकादशी

  • देवता: भगवान गोविंद
  • माहात्म्य एवं कथा: विकट परिस्थितियों में शत्रुओं पर विजय दिलाने के लिए यह एकादशी सर्वोत्तम है। त्रेतायुग में लंका चढ़ाई के समय जब समुद्र पार करने का कोई उपाय न सूझा, तब महर्षि वकदाल्भ्य के परामर्श पर भगवान श्रीराम ने अपनी समस्त वानर सेना सहित फाल्गुन कृष्ण ‘विजया एकादशी’ का विधिपूर्वक व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से समुद्र पर सेतु बँध सका और रावण का वध कर श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त की। इस दिन सप्तधान्य पर कलश स्थापित कर पूजन करने और द्वादशी को दान करने का विधान है।

२४. फाल्गुन शुक्लपक्ष — आमलकी एकादशी

  • देवता: भगवान गोविंद
  • माहात्म्य एवं कथा: भगवान विष्णु के मुख से चंद्रमा समान कांतिमान बिंदु गिरने से आंवले के आदि वृक्ष की उत्पत्ति हुई। इसके मूल में विष्णु, ऊपर ब्रह्मा, स्कंध में रुद्र, टहनियों में देवता, पत्तों में वसु और फलों में समस्त प्रजापति निवास करते हैं।
  • पूजन विधि: आंवले के वृक्ष के नीचे वेदी बनाकर कलश स्थापित करें और भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम जी की स्वर्ण मूर्ति स्थापित कर विधिवत पूजन करें। रात्रि में जागरण करें और द्वादशी को कलश व मूर्ति ब्राह्मण को दान करें। (आंवले का वृक्ष न होने पर खेजड़ी वृक्ष की पूजा की जाती है।)

२५. अधिक मास कृष्णपक्ष — परमा (कमला / हरिवल्लभा) एकादशी

  • देवता: भगवान पुरुषोत्तम
  • माहात्म्य एवं कथा: मलमास में आने वाली यह एकादशी विपुल धन-ऐश्वर्य देकर दरिद्रता का नाश करती है। काम्पिल्य नगर के अत्यंत निर्धन किंतु धर्मात्मा ब्राह्मण सुमेधा और उसकी पत्नी को महर्षि कौण्डिन्य ने इस व्रत का उपदेश दिया। इसी व्रत से कुबेर जी धनाध्यक्ष बने थे।
  • विधि: यह व्रत पाँच दिनों तक निराहार रहकर किया जाता है। सुमेधा दंपति ने पूर्ण निष्ठा से व्रत किया, जिससे उनकी सारी दरिद्रता समाप्त हो गई और वे इस लोक में सुख भोगकर वैकुंठ सिधारे।

२६. अधिक मास शुक्लपक्ष — पद्मिनी (समुद्रा) एकादशी

  • देवता: भगवान पुरुषोत्तम
  • माहात्म्य एवं कथा: यह व्रत समस्त यज्ञों, व्रतों और तपस्याओं का फल एक साथ देने वाला है। त्रेतायुग में राजा कृतवीर्य संतान प्राप्ति के लिए घोर तप कर रहे थे, किंतु सफलता नहीं मिल रही थी। तब महारानी ने सती अनुसूया से मार्ग पूछा। माता अनुसूया ने मलमास शुक्लपक्ष की ‘पद्मिनी एकादशी’ का विधान बताया। रानी द्वारा व्रत पूर्ण करने पर भगवान प्रकट हुए और वरदानस्वरूप उन्हें कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) जैसा अजेय और पराक्रमी पुत्र प्राप्त हुआ, जिसने रावण को भी बंदी बना लिया था।
  • चार प्रहर पूजा विधान: रात्रि के चारों प्रहरों में क्रमशः नारियल, बेल, सीताफल और नारंगी-सुपारी अर्पित कर भगवान विष्णु व शिव की संयुक्त पूजा की जाती है। द्वादशी को पारण के बाद ब्राह्मण-भोजन कराकर व्रत पूर्ण होता है।


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