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सम्पूर्ण एकादशी व्रत कथा | उत्पत्ति, नियम एवं पौराणिक महत्व

✍️ CD Sharma · 📅 19 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ एकादशी व्रत, एकादशी कथा, भगवान विष्णु, व्रत नियम, cdsharma.in

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सम्पूर्ण एकादशी व्रत कथा | उत्पत्ति, नियम एवं पौराणिक महत्व

सनातन धर्म में एकादशी व्रत को समस्त व्रतों का राजा माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार, एकादशी केवल एक तिथि मात्र नहीं है, बल्कि भगवान श्रीहरि विष्णु के तेज से प्रकट हुई साक्षात एक दिव्य शक्ति हैं।

​"न गंगा सदृशं तीर्थं न देवः केशवात्परः। न चैकादशी समं किञ्चित् पावनं भुवि विद्यते॥"
(अर्थात्: गंगा जैसा कोई तीर्थ नहीं, श्रीहरि जैसा कोई देव नहीं और एकादशी जैसा पृथ्वी पर कोई पावन व्रत नहीं।)


​देवी एकादशी की उत्पत्ति की पावन कथा

​दैत्य मुर का आतंक और देवताओं का पलायन

सत्ययुग में 'मुर' नामक एक महाबलशाली और क्रूर दैत्य ने अपने तप और शक्ति के बल पर स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। इंद्र, वरुण, यमराज और अग्नि सहित सभी देवता स्वर्ग छोड़कर त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान शिव की शरण में पहुंचे। महादेव के परामर्श पर सभी देवताओं ने जगत के पालनकर्ता भगवान श्रीहरि विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की।

​हेमावती गुफा और देवी का प्राकट्य

देवताओं के उद्धार के लिए भगवान विष्णु और दैत्य मुर के बीच सैकड़ों वर्षों तक भीषण युद्ध हुआ। युद्ध के उपरांत जब श्रीहरि बद्रिकाश्रम स्थित 'हेमावती' गुफा में योगनिद्रा में विश्राम करने लगे, तब दैत्य मुर उन्हें निद्रा में ही मारने के उद्देश्य से गुफा में प्रविष्ट हुआ।

​जैसे ही मुर ने शस्त्र उठाया, उसी क्षण भगवान श्रीहरि के दिव्य शरीर से एक अलौकिक, रूपवती और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित देवी प्रकट हुईं।

​मुर का वध और भगवान विष्णु का वरदान

देवी ने दैत्य मुर को भीषण युद्ध में ललकारा और अपने चक्र से क्षणभर में उसका वध कर दिया। जब भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागे, तो उन्होंने मुर को मृत पाकर अत्यंत प्रसन्नता प्रकट की।

​श्रीहरि ने वरदान देते हुए कहा:

  • ​“तुम्हारा प्राकट्य मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को हुआ है, अतः तुम्हारा नाम एकादशी होगा।”
  • ​“तीनों लोकों में तुम मुझे सर्वाधिक प्रिय रहोगी। जो भी मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से एकादशी का व्रत करेगा, उसके संपूर्ण पाप नष्ट होंगे और वह वैकुंठ धाम प्राप्त करेगा।”

​एकादशी व्रत के प्रमुख नियम

  • ​अन्न वर्जन: एकादशी तिथि पर चावल (अक्षत) और समस्त प्रकार के तामसिक अन्न का सेवन पूर्णतः वर्जित है।
  • ​साधना व जप: फलाहार या निर्जला रहकर दिनभर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र का मानसिक जप करें।
  • ​रात्रि जागरण: रात्रि के समय भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन और श्रीमद्भागवत का पाठ अत्यंत शुभ माना गया है।
  • ​द्वादशी पारण: अगले दिन सूर्योदय के पश्चात शुभ मुहूर्त में ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को दान-दक्षिणा देने के बाद ही व्रत खोलें।

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