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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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१. संज्ञाप्रकरणम्

संज्ञा प्रकरण · सूत्र 1–14 (14)
॥ नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम् । पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीम् ॥

॥ १. अइउण् । २. ऋऌक् । ३. एओङ् । ४. ऐऔच् । ५. हयवरट् । ६. लण् । ७. ञमङणनम् । ८. झभञ् । ९. घढधष् । १०. जबगडदश् । ११. खफछठथचटतव् । १२. कपय् । १३. शषसर् । १४. हल् ॥ इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसंज्ञार्थानि । एषामन्त्याः इतः । हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः । लण्मध्ये त्वित्संज्ञकः ॥
(मङ्गलाचरण) शुद्ध और गुणमयी देवी सरस्वती को नमस्कार करके मैं पाणिनीय व्याकरण में प्रवेश के लिये लघुसिद्धान्तकौमुदी की रचना करता हूँ।

(माहेश्वर सूत्र) 1. अइउण् 2. ऋऌक् 3. एओङ् 4. ऐऔच् 5. हयवरट् 6. लण् 7. ञमङणनम् 8. झभञ् 9. घढधष् 10. जबगडदश् 11. खफछठथचटतव् 12. कपय् 13. शषसर् 14. हल् — ये माहेश्वर सूत्र अण् आदि (प्रत्याहार) संज्ञाओं के लिये हैं। इनके अन्तिम वर्ण इत् (संकेत) हैं। ह आदि (व्यंजनों) में अकार उच्चारण के लिये है। पर 'लण्' के बीच का अकार इत्-संज्ञक है (जिससे 'र' प्रत्याहार बनता है)।

सरल व्याख्या: परम्परा के अनुसार ये चौदह सूत्र भगवान् शिव के डमरू से निकले, इसलिये 'माहेश्वर सूत्र' कहलाते हैं। इनमें संस्कृत के सभी वर्ण एक विशेष क्रम में हैं और हर सूत्र के अन्त में एक संकेत-अक्षर (इत्) है। इन्हीं से 'अच्' (सब स्वर), 'हल्' (सब व्यंजन), 'अण्', 'इक्', 'यण्' जैसे छोटे नाम (प्रत्याहार) बनते हैं, जिनसे पाणिनि बहुत संक्षेप में नियम कह पाते हैं।
१ संज्ञासूत्रम् · इत्संज्ञा अष्टा० 1.3.3
हलन्त्यम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उपदेशे, इत्
वृत्तिः
उपदेशेऽन्त्यं हलित्स्यात्। उपदेश आद्योच्चारणम्। सूत्रेष्वदृष्टं पदं सूत्रान्तरादनुवर्तनीयं सर्वत्र॥
हिन्दी अनुवाद
उपदेश में अन्तिम हल् (व्यंजन) इत्-संज्ञक होता है। 'उपदेश' का अर्थ है आद्य उच्चारण (पाणिनि आदि द्वारा पहली बार बताया गया रूप)। जो पद सूत्र में न दिखे, उसे सर्वत्र दूसरे सूत्र से अनुवृत्ति द्वारा ले आना चाहिए।
सरल व्याख्या
माहेश्वर सूत्रों, धातुओं, प्रत्ययों आदि के मूल रूप (उपदेश) के अन्त में जो व्यंजन होता है, वह केवल संकेत के लिये है — उसे 'इत्' कहते हैं। जैसे 'अइउण्' में ण्, 'सुप्' में प्। ये अक्षर प्रयोग में नहीं आते, केवल पहचान का काम करते हैं।
२ संज्ञासूत्रम् · लोपसंज्ञा अष्टा० 1.1.60
अदर्शनं लोपः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: स्थाने
वृत्तिः
प्रसक्तस्यादर्शनं लोपसंज्ञं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
प्राप्त (होने योग्य) वर्ण का न दिखना 'लोप' कहलाता है।
सरल व्याख्या
जो वर्ण वहाँ आना चाहिए था पर सुनाई/दिखाई नहीं देता, उसकी 'लोप' संज्ञा है। लोप का अर्थ है — अदर्शन, अर्थात् हटा देना।
३ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.9
तस्य लोपः ॥
वृत्तिः
तस्येतो लोपः स्यात्। णादयोऽणाद्यर्थाः॥
हिन्दी अनुवाद
उस इत्-संज्ञक वर्ण का लोप हो। ण् आदि इत् वर्ण अण् आदि प्रत्याहार बनाने के लिये हैं।
सरल व्याख्या
जिस वर्ण की इत्-संज्ञा हुई, उसे हटा दिया जाता है। माहेश्वर सूत्रों के अन्त के ण्, क्, ङ् आदि इसी से हटते हैं — इनका उपयोग केवल प्रत्याहार (संक्षिप्त नाम) बनाने में है।
४ संज्ञासूत्रम् · प्रत्याहारसंज्ञा अष्टा० 1.1.71
आदिरन्त्येन सहेता ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: स्वम्, रूपम्
वृत्तिः
अन्त्येनेता सहित आदिर्मध्यगानां स्वस्य च संज्ञा स्यात् । यथाऽणिति अ इ उ वर्णानां संज्ञा। एवमच् हल् अलित्यादयः॥
हिन्दी अनुवाद
अन्तिम इत्-वर्ण के साथ बोला गया आदि वर्ण, बीच के वर्णों तथा स्वयं का भी बोधक (संज्ञा) होता है। जैसे 'अण्' — अ, इ, उ वर्णों की संज्ञा है। इसी प्रकार अच्, हल्, अल् आदि।
सरल व्याख्या
यही प्रत्याहार बनाने का नियम है। किसी वर्ण को किसी आगे के इत्-वर्ण के साथ जोड़ दें तो बीच के सारे वर्ण उस नाम में आ जाते हैं। अच् = सभी स्वर (अ से औ तक), हल् = सभी व्यंजन, अल् = सभी वर्ण।
५ संज्ञासूत्रम् · ह्रस्वसंज्ञा अष्टा० 1.2.27
ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः ॥
वृत्तिः
उश्च ऊश्च उ3श्च वः; वां काल इव कालो यस्य सोऽच् क्रमाद् ह्रस्वदीर्घप्लुतसंज्ञः स्यात्। स प्रत्येकमुदात्तादिभेदेन त्रिधा॥
हिन्दी अनुवाद
उ (ह्रस्व), ऊ (दीर्घ), उ३ (प्लुत) — इनके उच्चारण-काल के समान जिस अच् का काल हो, वह क्रमशः ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत संज्ञक होता है। प्रत्येक फिर उदात्त आदि भेद से तीन प्रकार का है।
सरल व्याख्या
स्वर की लम्बाई तीन प्रकार की है — एक मात्रा वाला ह्रस्व (उ), दो मात्रा वाला दीर्घ (ऊ) और तीन मात्रा वाला प्लुत (उ३, जैसे दूर से पुकारने में)।
६ संज्ञासूत्रम् · उदात्तसंज्ञा अष्टा० 1.2.29
उच्चैरुदात्तः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अच्
हिन्दी अनुवाद
(वृत्ति नहीं) — ऊँचे स्वर से बोला गया अच् उदात्त कहलाता है।
सरल व्याख्या
तालु आदि स्थान के ऊपरी भाग से, ऊँचे स्वर में बोला गया स्वर 'उदात्त' है। यह वैदिक स्वर-भेद है।
७ संज्ञासूत्रम् · अनुदात्तसंज्ञा अष्टा० 1.2.30
नीचैरनुदात्तः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अच्
हिन्दी अनुवाद
(वृत्ति नहीं) — नीचे स्वर से बोला गया अच् अनुदात्त कहलाता है।
सरल व्याख्या
स्थान के निचले भाग से, नीचे स्वर में बोला गया स्वर 'अनुदात्त' है।
८ संज्ञासूत्रम् · स्वरितसंज्ञा अष्टा० 1.2.31
समाहारः स्वरितः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अच्
वृत्तिः
स नवविधोऽपि प्रत्येकमनुनासिकत्वाननुनासिकत्वाभ्यां द्विधा ॥
हिन्दी अनुवाद
उदात्त और अनुदात्त का मिश्रण स्वरित कहलाता है। ये नौ प्रकार के (ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत × उदात्त-अनुदात्त-स्वरित) भी प्रत्येक अनुनासिक और अननुनासिक भेद से दो-दो प्रकार के होते हैं।
सरल व्याख्या
जिस स्वर में उदात्त और अनुदात्त दोनों का मेल हो वह 'स्वरित' है। इस प्रकार 3 × 3 = 9 भेद, और नाक से बोलने/न बोलने से 18 भेद बनते हैं।
९ संज्ञासूत्रम् · अनुनासिकसंज्ञा अष्टा० 1.1.8
मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः ॥
वृत्तिः
मुखसहितनासिकयोच्चार्यमाणो वर्णोऽनुनासिकसंज्ञः स्यात् । तदित्थम् - अ इ उ ऋ एषां वर्णानां प्रत्येकमष्टादश भेदाः । ऌवर्णस्य द्वादश तस्य दीर्घाभावात् । एचामपि द्वादश तेषां ह्रस्वाभावात् ॥
हिन्दी अनुवाद
मुख सहित नासिका से बोला जाने वाला वर्ण अनुनासिक कहलाता है। इस प्रकार अ, इ, उ, ऋ — इनमें प्रत्येक के अठारह भेद हैं। ऌ के बारह भेद हैं क्योंकि उसका दीर्घ नहीं होता। ए, ऐ, ओ, औ (एच्) के भी बारह भेद हैं क्योंकि इनका ह्रस्व नहीं होता।
सरल व्याख्या
जो वर्ण मुँह और नाक दोनों से निकले (जैसे अँ, ञ, म) वह अनुनासिक है। इसी से स्वरों के कुल भेद गिने जाते हैं — अ, इ, उ, ऋ के 18-18, ऌ और ए-ऐ-ओ-औ के 12-12।
१० संज्ञासूत्रम् · सवर्णसंज्ञा अष्टा० 1.1.9
तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् ॥
वृत्तिः
ताल्वादिस्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नश्चेत्येतद्द्वयं यस्य येन तुल्यं तन्मिथः सवर्णसंज्ञं स्यात्। «ऋऌवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्» (वार्त्तिकम्) । अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः। इचुयशानां तालु। ऋटुरषाणां मूर्धा। ऌतुलसानां दन्ताः। उपूपध्मानीयानामोष्ठौ। ञमङणनानां नासिका च। एदैतोः कण्ठतालु। ओदौतोः कण्ठोष्ठम्। वकारस्य दन्तोष्ठम्। जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम्। नासिकाऽनुस्वारस्य। यत्नो द्विधा - आभ्यन्तरो बाह्यश्च। आद्यः पञ्चधा - स्पृष्टेषत्स्पृष्टेषद्विवृतविवृतसंवृतभेदात्। तत्र स्पृष्टं प्रयतनं स्पर्शानाम्। ईषत्स्पृष्टमन्तःस्थानाम्। ईषद्विवृतमूष्मणाम्। विवृतं स्वराणाम्। ह्रस्वस्यावर्णस्य प्रयोगे संवृतम्। प्रक्रियादशायां तु विवृतमेव। बाह्यप्रयत्नस्त्वेकादशधा - विवारः संवारः श्वासो नादो घोषोऽघोषोऽल्पप्राणो महाप्राण उदात्तोऽनुदात्तः स्वरितश्चेति। खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्च। हशः संवारा नादा घोषाश्च। वर्गाणां प्रथमतृतीयपञ्चमा यणश्चाल्पप्राणाः। वर्गाणां द्वितीयचतुर्थौ शलश्च महाप्राणाः। कादयो मावसानाः स्पर्शाः। यणोऽन्तःस्थाः। शल ऊष्माणः। अचः स्वराः। ≍क≍ख इति कखाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृशो जिह्वामूलीयः। ≍प≍फ इति पफाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृश उपध्मानीयः। अं अः इत्यचः परावनुस्वारविसर्गौ॥
हिन्दी अनुवाद
तालु आदि स्थान और आभ्यन्तर प्रयत्न — ये दोनों जिसके जिसके साथ समान हों, वे परस्पर सवर्ण कहलाते हैं। (वार्तिक) ऋ और ऌ का परस्पर सावर्ण्य कहना चाहिए। स्थान: अ, कवर्ग, ह और विसर्ग का कण्ठ; इ, चवर्ग, य, श का तालु; ऋ, टवर्ग, र, ष का मूर्धा; ऌ, तवर्ग, ल, स का दन्त; उ, पवर्ग, उपध्मानीय का ओष्ठ; ञ, म, ङ, ण, न का नासिका भी; ए-ऐ का कण्ठ-तालु; ओ-औ का कण्ठ-ओष्ठ; व का दन्त-ओष्ठ; जिह्वामूलीय का जिह्वामूल; अनुस्वार का नासिका। प्रयत्न दो प्रकार का है — आभ्यन्तर और बाह्य। आभ्यन्तर पाँच प्रकार का है — स्पृष्ट (स्पर्श वर्णों का), ईषत्स्पृष्ट (अन्तःस्थ य-र-ल-व का), ईषद्विवृत (ऊष्म श-ष-स-ह का), विवृत (स्वरों का), और संवृत (प्रयोग में ह्रस्व अ का; प्रक्रिया-दशा में वह विवृत ही माना जाता है)। बाह्य प्रयत्न ग्यारह प्रकार का है — विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित। खर् वर्ण विवार-श्वास-अघोष हैं; हश् वर्ण संवार-नाद-घोष हैं। वर्गों के पहले, तीसरे, पाँचवें वर्ण और य-र-ल-व अल्पप्राण हैं; वर्गों के दूसरे, चौथे वर्ण और श-ष-स-ह महाप्राण हैं। क से म तक स्पर्श, य-र-ल-व अन्तःस्थ, श-ष-स-ह ऊष्म और अच् स्वर हैं। क-ख से पहले आधे विसर्ग जैसा जिह्वामूलीय, और प-फ से पहले आधे विसर्ग जैसा उपध्मानीय होता है। अं, अः में स्वर के बाद अनुस्वार और विसर्ग होते हैं।
सरल व्याख्या
दो वर्ण 'सवर्ण' (एक जाति के) तभी हैं जब उनका उच्चारण-स्थान भी एक हो और भीतरी प्रयत्न भी एक हो। जैसे अ और आ दोनों कण्ठ्य और विवृत हैं, इसलिए सवर्ण हैं; पर इ और य का स्थान एक होने पर भी प्रयत्न भिन्न है, इसलिए सवर्ण नहीं। यह सूत्र सन्धि के 'दीर्घ' आदि नियमों का आधार है। वर्णों का स्थान-प्रयत्न वाला पूरा उच्चारण-विज्ञान भी यहीं दिया गया है।
११ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.1.69
अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्ययः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: स्वम्, रूपम्
वृत्तिः
प्रतीयते विधीयत इति प्रत्ययः। अविधीयमानोऽणुदिच्च सवर्णस्य संज्ञा स्यात्। अत्रैवाण् परेण णकारेण। कु चु टु तु पु एते उदितः। तदेवम् - अ इत्यष्टादशानां संज्ञा। तथेकारोकारौ। ऋकारस्त्रिंशतः। एवम् ऌकारोऽपि। एचो द्वादशानाम्। अनुनासिकाननुनासिकभेदेन यवला द्विधा; तेनाननुनासिकास्ते द्वयोर्द्वयोस्संज्ञा॥
हिन्दी अनुवाद
जिसका विधान किया जाता है वह 'प्रत्यय' है। जिसका विधान न हो रहा हो ऐसा अण् और उदित् (उ-इत् वाला) वर्ण अपने सवर्णों का भी बोधक होता है। यहाँ 'अण्' बाद वाले (लण् के) णकार से लिया गया है। कु, चु, टु, तु, पु — ये उदित् हैं (पूरे वर्ग के बोधक)। इस प्रकार 'अ' अठारह भेदों का बोधक है, ऐसे ही इ और उ; ऋ तीस भेदों का (ऌ के बारह मिलाकर), ऌ भी तीस का; एच् बारह-बारह भेदों के बोधक हैं। य, व, ल अनुनासिक और अननुनासिक भेद से दो प्रकार के हैं, अतः अननुनासिक य-व-ल दोनों-दोनों के बोधक हैं।
सरल व्याख्या
सूत्रों में लिखा गया 'अ' केवल ह्रस्व अ नहीं, बल्कि आ, आ३ और उनके सब स्वर-भेद भी पकड़ता है। इसी तरह 'कु' का अर्थ है पूरा कवर्ग (क ख ग घ ङ)। पर यह नियम तब नहीं लगता जब वह वर्ण स्वयं प्रत्यय के रूप में विहित हो।
१२ संज्ञासूत्रम् · संहितासंज्ञा अष्टा० 1.4.109
परः सन्निकर्षः संहिता ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहितासंज्ञः स्यात् ॥
हिन्दी अनुवाद
वर्णों की अत्यन्त निकटता 'संहिता' कहलाती है।
सरल व्याख्या
जब दो वर्ण बिना रुके, एकदम पास-पास बोले जाते हैं, उस स्थिति को संहिता कहते हैं। सन्धि-कार्य संहिता में ही होते हैं।
१३ संज्ञासूत्रम् · संयोगसंज्ञा अष्टा० 1.1.7
हलोऽनन्तराः संयोगः ॥
वृत्तिः
अज्भिरव्यवहिता हलः संयोगसंज्ञाः स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
स्वरों से व्यवधान-रहित (बीच में स्वर न हो ऐसे) व्यंजन 'संयोग' कहलाते हैं।
सरल व्याख्या
दो या अधिक व्यंजन जब बिना स्वर के लगातार आएँ, जैसे 'क्ष' (क्+ष), 'स्त' (स्+त), तो उन्हें संयोग (संयुक्ताक्षर) कहते हैं।
१४ संज्ञासूत्रम् · पदसंज्ञा अष्टा० 1.4.14
सुप्तिङन्तं पदम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
सुबन्तं तिङन्तं च पदसंज्ञं स्यात् ॥
हिन्दी अनुवाद
सुप्-प्रत्ययान्त (सुबन्त) और तिङ्-प्रत्ययान्त (तिङन्त) शब्द 'पद' कहलाते हैं।
सरल व्याख्या
संस्कृत में शब्द तभी वाक्य में प्रयोग योग्य 'पद' बनता है जब उसके अन्त में विभक्ति हो — संज्ञा आदि में सुप् (रामः, रामम्) और क्रिया में तिङ् (भवति, गच्छति)।

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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