वृत्तिः
ताल्वादिस्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नश्चेत्येतद्द्वयं यस्य येन तुल्यं तन्मिथः सवर्णसंज्ञं स्यात्। «ऋऌवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्» (वार्त्तिकम्) । अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः। इचुयशानां तालु। ऋटुरषाणां मूर्धा। ऌतुलसानां दन्ताः। उपूपध्मानीयानामोष्ठौ। ञमङणनानां नासिका च। एदैतोः कण्ठतालु। ओदौतोः कण्ठोष्ठम्। वकारस्य दन्तोष्ठम्। जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम्। नासिकाऽनुस्वारस्य। यत्नो द्विधा - आभ्यन्तरो बाह्यश्च। आद्यः पञ्चधा - स्पृष्टेषत्स्पृष्टेषद्विवृतविवृतसंवृतभेदात्। तत्र स्पृष्टं प्रयतनं स्पर्शानाम्। ईषत्स्पृष्टमन्तःस्थानाम्। ईषद्विवृतमूष्मणाम्। विवृतं स्वराणाम्। ह्रस्वस्यावर्णस्य प्रयोगे संवृतम्। प्रक्रियादशायां तु विवृतमेव। बाह्यप्रयत्नस्त्वेकादशधा - विवारः संवारः श्वासो नादो घोषोऽघोषोऽल्पप्राणो महाप्राण उदात्तोऽनुदात्तः स्वरितश्चेति। खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्च। हशः संवारा नादा घोषाश्च। वर्गाणां प्रथमतृतीयपञ्चमा यणश्चाल्पप्राणाः। वर्गाणां द्वितीयचतुर्थौ शलश्च महाप्राणाः। कादयो मावसानाः स्पर्शाः। यणोऽन्तःस्थाः। शल ऊष्माणः। अचः स्वराः। ≍क≍ख इति कखाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृशो जिह्वामूलीयः। ≍प≍फ इति पफाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृश उपध्मानीयः। अं अः इत्यचः परावनुस्वारविसर्गौ॥
हिन्दी अनुवाद
तालु आदि स्थान और आभ्यन्तर प्रयत्न — ये दोनों जिसके जिसके साथ समान हों, वे परस्पर सवर्ण कहलाते हैं। (वार्तिक) ऋ और ऌ का परस्पर सावर्ण्य कहना चाहिए। स्थान: अ, कवर्ग, ह और विसर्ग का कण्ठ; इ, चवर्ग, य, श का तालु; ऋ, टवर्ग, र, ष का मूर्धा; ऌ, तवर्ग, ल, स का दन्त; उ, पवर्ग, उपध्मानीय का ओष्ठ; ञ, म, ङ, ण, न का नासिका भी; ए-ऐ का कण्ठ-तालु; ओ-औ का कण्ठ-ओष्ठ; व का दन्त-ओष्ठ; जिह्वामूलीय का जिह्वामूल; अनुस्वार का नासिका। प्रयत्न दो प्रकार का है — आभ्यन्तर और बाह्य। आभ्यन्तर पाँच प्रकार का है — स्पृष्ट (स्पर्श वर्णों का), ईषत्स्पृष्ट (अन्तःस्थ य-र-ल-व का), ईषद्विवृत (ऊष्म श-ष-स-ह का), विवृत (स्वरों का), और संवृत (प्रयोग में ह्रस्व अ का; प्रक्रिया-दशा में वह विवृत ही माना जाता है)। बाह्य प्रयत्न ग्यारह प्रकार का है — विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित। खर् वर्ण विवार-श्वास-अघोष हैं; हश् वर्ण संवार-नाद-घोष हैं। वर्गों के पहले, तीसरे, पाँचवें वर्ण और य-र-ल-व अल्पप्राण हैं; वर्गों के दूसरे, चौथे वर्ण और श-ष-स-ह महाप्राण हैं। क से म तक स्पर्श, य-र-ल-व अन्तःस्थ, श-ष-स-ह ऊष्म और अच् स्वर हैं। क-ख से पहले आधे विसर्ग जैसा जिह्वामूलीय, और प-फ से पहले आधे विसर्ग जैसा उपध्मानीय होता है। अं, अः में स्वर के बाद अनुस्वार और विसर्ग होते हैं।
सरल व्याख्या
दो वर्ण 'सवर्ण' (एक जाति के) तभी हैं जब उनका उच्चारण-स्थान भी एक हो और भीतरी प्रयत्न भी एक हो। जैसे अ और आ दोनों कण्ठ्य और विवृत हैं, इसलिए सवर्ण हैं; पर इ और य का स्थान एक होने पर भी प्रयत्न भिन्न है, इसलिए सवर्ण नहीं। यह सूत्र सन्धि के 'दीर्घ' आदि नियमों का आधार है। वर्णों का स्थान-प्रयत्न वाला पूरा उच्चारण-विज्ञान भी यहीं दिया गया है।