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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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२. अच्सन्धिः

अच् सन्धि · सूत्र 15–61 (47)
१५ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.77
इको यणचि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: संहितायाम्
वृत्तिः
इकः स्थाने यण् स्यादचि संहितायां विषये। सुधी उपास्य इति स्थिते॥
हिन्दी अनुवाद
संहिता के विषय में अच् परे रहते इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) के स्थान पर यण् (य, व, र, ल) होता है। 'सुधी + उपास्यः' ऐसी स्थिति में (आगे के सूत्र लगते हैं)।
सरल व्याख्या
यह यण् सन्धि है। इ/ई के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो इ → य्; उ/ऊ → व्; ऋ → र्; ऌ → ल्। जैसे सुधी + उपास्यः → सुध्य् + उपास्यः → सुध्युपास्यः; इति + आदि → इत्यादि।
१६ परिभाषासूत्रम् · सप्तमीविभक्तिनिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.1.66
तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य ॥
वृत्तिः
सप्तमीनिर्देशेन विधीयमानं कार्यं वर्णान्तरेणाव्यवहितस्य पूर्वस्य बोध्यम्॥
हिन्दी अनुवाद
सप्तमी विभक्ति से कहा गया कार्य, किसी अन्य वर्ण से अव्यवहित (बिलकुल सटे हुए) पूर्व वर्ण को होता है।
सरल व्याख्या
जब सूत्र में कोई शब्द सप्तमी में हो (जैसे 'अचि' = अच् परे रहते), तो कार्य उसके ठीक पहले वाले वर्ण पर होता है, बीच में कोई अक्षर हो तो नहीं।
१७ परिभाषासूत्रम् · आदेशचयननिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.1.50
स्थानेऽन्तरतमः ॥
वृत्तिः
प्रसङ्गे सति सदृशतम आदेशः स्यात् । सुध्य् उपास्य इति जाते ॥
हिन्दी अनुवाद
जब (आदेश का) प्रसंग हो, तो सबसे अधिक समान (सदृशतम) आदेश होता है। 'सुध्य् उपास्य' ऐसा बनने पर।
सरल व्याख्या
एक वर्ण के स्थान पर कई विकल्प प्राप्त हों तो वही आदेश होगा जो स्थान आदि में सबसे मिलता-जुलता हो। जैसे इ (तालव्य) के स्थान पर यण् में से तालव्य 'य्' ही आता है, व्-र्-ल् नहीं।
१८ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.47
अनचि च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: यरः, अचः, द्वे, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
अचः परस्य यरो द्वे वा स्तो न त्वचि। इति धकारस्य द्वित्वेन सुध्ध्य् उपास्य इति जाते॥
हिन्दी अनुवाद
अच् से परे यर् (ह को छोड़ सभी व्यंजन) को विकल्प से द्वित्व होता है, पर अच् परे रहते नहीं। इससे धकार को द्वित्व होकर 'सुध्ध्य् उपास्य' बनता है।
सरल व्याख्या
स्वर के बाद आया व्यंजन, यदि उसके बाद स्वर न हो, तो विकल्प से दोहराया जा सकता है। सुध्य् में ध् के बाद य् है (स्वर नहीं), इसलिए ध् → ध्ध्।
१९ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.53
झलां जश् झशि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
स्पष्टम्। इति पूर्वधकारस्य दकारः॥
हिन्दी अनुवाद
(अर्थ) स्पष्ट है — झश् परे रहते झल् को जश् होता है। इससे पहले धकार का दकार होता है।
सरल व्याख्या
किसी वर्ग के तीसरे/चौथे वर्ण (झश्) से पहले झल् (ऊष्म और वर्गों के 1-4 वर्ण) को उसी वर्ग का तीसरा वर्ण (ज ब ग ड द) हो जाता है। सुध्ध्य् → सुद्ध्य्। अन्तिम रूप — सुद्ध्युपास्यः।
२० विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.23
संयोगान्तस्य लोपः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
संयोगान्तं यत्पदं तदन्तस्य लोपः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
जो पद संयोगान्त हो, उसके अन्तिम वर्ण का लोप हो।
सरल व्याख्या
पद के अन्त में संयुक्त व्यंजन हो तो अन्तिम व्यंजन हट जाता है। जैसे 'राजन्स्' जैसी स्थिति में अन्त का स् हट जाता है।
२१ परिभाषासूत्रम् · आदेशस्थाननिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.1.52
अलोऽन्त्यस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: षष्ठी, स्थाने
वृत्तिः
षष्ठीनिर्दिष्टस्यान्त्यस्याल आदेशः स्यात्। इति यलोपे प्राप्ते - «यणः प्रतिषेधो वाच्यः» (वार्त्तिकम्) (वार्त्तिकम्)। सुद्ध्युपास्यः। मद्ध्वरिः। धात्रंशः। लाकृतिः॥
हिन्दी अनुवाद
षष्ठी विभक्ति से निर्दिष्ट (शब्द) के अन्तिम अल् (वर्ण) के स्थान पर आदेश होता है। इससे (सुद्ध्य् के) यकार का लोप प्राप्त हुआ, तो — (वार्तिक) यण् के लोप का निषेध कहना चाहिए। अतः सुद्ध्युपास्यः, मद्ध्वरिः (मधु + अरिः), धात्रंशः (धातृ + अंशः), लाकृतिः (ऌ + आकृतिः)।
सरल व्याख्या
जब सूत्र कहे 'इसके स्थान पर यह हो' तो पूरा शब्द नहीं, केवल उसका अन्तिम वर्ण बदलता है। वार्तिक से यण् का लोप नहीं होता, इसलिए य्/व्/र्/ल् बने रहते हैं।
२२ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.78
एचोऽयवायावः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, संहितायाम्
वृत्तिः
एचः क्रमादय् अव् आय् आव् एते स्युरचि॥
हिन्दी अनुवाद
अच् परे रहते एच् (ए, ओ, ऐ, औ) के स्थान पर क्रमशः अय्, अव्, आय्, आव् होते हैं।
सरल व्याख्या
यह अयादि सन्धि है: ए → अय्, ओ → अव्, ऐ → आय्, औ → आव्, जब इनके बाद कोई स्वर हो। जैसे हरे + ए → हरये, विष्णो + ए → विष्णवे, नै + अकः → नायकः, पौ + अकः → पावकः।
२३ परिभाषासूत्रम् · अनुदेशपद्धतिविधानपरिभाषा अष्टा० 1.3.10
यथासंख्यमनुदेशः समानाम् ॥
वृत्तिः
समसंबन्धी विधिर्यथासंख्यं स्यात्। हरये। विष्णवे। नायकः। पावकः॥
हिन्दी अनुवाद
समान संख्या वाले (उद्देश्य और आदेश) का विधान क्रम से होता है। हरये, विष्णवे, नायकः, पावकः।
सरल व्याख्या
जब सूत्र में कई स्थानी और उतने ही आदेश हों, तो पहले का पहला, दूसरे का दूसरा — इस क्रम से लगते हैं। इसीलिए ए का अय्, ओ का अव् — क्रम से।
२४ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.79
वान्तो यि प्रत्यये ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, एचः, संहितायाम्
वृत्तिः
यकारादौ प्रत्यये परे ओदौतोः अव् आव् एतौ स्तः। गव्यम्। नाव्यम्। «अध्वपरिमाणे च» (वार्त्तिकम्) गव्यूतिः॥
हिन्दी अनुवाद
यकारादि प्रत्यय परे रहते ओ और औ के स्थान पर अव् और आव् होते हैं। गव्यम् (गो + यत्), नाव्यम् (नौ + यत्)। (वार्तिक) मार्ग के परिमाण अर्थ में भी — गव्यूतिः।
सरल व्याख्या
य से शुरू होने वाला प्रत्यय आए तो भी ओ → अव्, औ → आव् होता है (यद्यपि य स्वर नहीं है)। गो + य → गव्यम् (गाय से सम्बन्धित)।
२५ संज्ञासूत्रम् · गुणसंज्ञा अष्टा० 1.1.2
अदेङ् गुणः ॥
वृत्तिः
अत् एङ् च गुणसंज्ञः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
अ, ए, ओ — ये गुण संज्ञक हैं।
सरल व्याख्या
व्याकरण में अ, ए, ओ को 'गुण' कहते हैं। जब इ का गुण कहा जाए तो ए, उ का ओ, ऋ का अर् होता है।
२६ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.1.70
तपरस्तत्कालस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: स्वम्, रूपम्, सवर्णस्य
वृत्तिः
तः परो यस्मात्स च तात्परश्चोच्चार्यमाणसमकालस्यैव संज्ञा स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
जिसके बाद त् हो (या जो त् के बाद हो), वह उच्चारण किए जा रहे काल वाले वर्ण का ही बोधक होता है।
सरल व्याख्या
'अत्' लिखा हो तो केवल ह्रस्व अ लिया जाएगा, आ नहीं। तकार जोड़कर उस वर्ण की मात्रा को सीमित कर दिया जाता है।
२७ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.87
आद्गुणः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
अवर्णादचि परे पूर्वपरयोरेको गुण आदेशः स्यात्। उपेन्द्रः। गङ्गोदकम्॥
हिन्दी अनुवाद
अवर्ण (अ/आ) से अच् परे रहते पूर्व और पर दोनों के स्थान पर एक गुण आदेश होता है। उपेन्द्रः (उप + इन्द्रः), गङ्गोदकम् (गङ्गा + उदकम्)।
सरल व्याख्या
यह गुण सन्धि है: अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्। जैसे महा + ईशः = महेशः, सूर्य + उदयः = सूर्योदयः।
२८ संज्ञासूत्रम् · इत्संज्ञा अष्टा० 1.3.2
उपदेशेऽजनुनासिक इत् ॥
वृत्तिः
उपदेशेऽनुनासिकोऽजित्संज्ञः स्यात्। प्रतिज्ञानुनासिक्याः पाणिनीयाः। लण्सूत्रस्थावर्णेन सहोच्चार्यमाणो रेफो रलयोः संज्ञा॥
हिन्दी अनुवाद
उपदेश में अनुनासिक अच् इत्-संज्ञक होता है। पाणिनि के अनुयायी अनुनासिकता को प्रतिज्ञा (परम्परा) से जानते हैं। 'लण्' सूत्र के अकार के साथ उच्चारित रेफ (र) से 'रँ' प्रत्याहार बनता है जो र और ल का बोधक है।
सरल व्याख्या
धातु-प्रत्यय आदि के मूल रूप में जो स्वर नाक से बोला गया हो वह इत् है और हट जाता है। लिखने में अनुनासिक चिह्न न होने से यह परम्परा से जाना जाता है। 'र' प्रत्याहार = र और ल।
२९ परिभाषासूत्रम् · ऋकारादेशविधानपरिभाषा अष्टा० 1.1.51
उरण् रपरः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: षष्ठी, स्थाने
वृत्तिः
ऋ इति त्रिंशतः संज्ञेत्युक्तम्। तत्स्थाने योऽण् स रपरः सन्नेव प्रवर्तते। कृष्णर्द्धिः। तवल्कारः॥
हिन्दी अनुवाद
ऋ तीस भेदों का बोधक है, यह कहा गया। उसके स्थान पर जो अण् (अ, इ, उ) होता है, वह र-पर (र् सहित) होकर ही प्रवृत्त होता है। कृष्णर्द्धिः (कृष्ण + ऋद्धिः), तवल्कारः (तव + ऌकारः)।
सरल व्याख्या
ऋ के स्थान पर गुण-वृद्धि आदि से अ/इ/उ आए तो साथ में र् भी जुड़ता है — अर्, इर्, उर् (ऌ के स्थान पर अल्)। इसीलिए कृष्ण + ऋद्धिः = कृष्णर्द्धिः।
३० विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.19
लोपः शाकल्यस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: भो-भगो-अघो-अपूर्वस्य, अशि, व्योः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
अवर्णपूर्वयोः पदान्तयोर्यवयोर्लोपो वाऽशि परे॥
हिन्दी अनुवाद
अवर्ण के बाद पदान्त में स्थित य् और व् का अश् (स्वर तथा मृदु व्यंजन) परे रहते विकल्प से लोप होता है (शाकल्य आचार्य के मत में)।
सरल व्याख्या
अयादि सन्धि से बने य्/व् का लोप विकल्प से हो जाता है। हरे + इह → हरय् + इह → हर इह (लोप) या हरयिह (लोप नहीं)।
३१ अधिकारसूत्रम् · पूर्वत्रासिद्धम् इत्यधिकारः अष्टा० 8.2.1
पूर्वत्रासिद्धम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
सपादसप्ताध्यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा, त्रिपाद्यामपि पूर्वं प्रति परं शास्त्रमसिद्धम्। हर इह, हरयिह। विष्ण इह, विष्णविह॥
हिन्दी अनुवाद
सवा सात अध्यायों (1.1 से 8.1 तक) की दृष्टि में अन्तिम तीन पाद (त्रिपादी, 8.2–8.4) असिद्ध हैं; और त्रिपादी में भी पहले सूत्र की दृष्टि में बाद वाला सूत्र असिद्ध है। हर इह, हरयिह; विष्ण इह, विष्णविह।
सरल व्याख्या
अष्टाध्यायी के अन्तिम तीन पादों के सूत्रों का किया कार्य पहले वाले सूत्रों के लिए 'हुआ ही नहीं' माना जाता है। इसीलिए 'हर इह' में य् का लोप (8.3.19) होने के बाद भी अ + इ का गुण (6.1.87) नहीं होता — गुण-सूत्र को लोप दिखता ही नहीं।
३२ संज्ञासूत्रम् · वृद्धिसंज्ञा अष्टा० 1.1.1
वृद्धिरादैच् ॥
वृत्तिः
आदैच्च वृद्धिसंज्ञः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
आ और ऐच् (ऐ, औ) वृद्धि संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
आ, ऐ, औ को 'वृद्धि' कहते हैं। इ की वृद्धि ऐ, उ की औ, ऋ की आर्।
३३ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.88
वृद्धिरेचि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
आदेचि परे वृद्धिरेकादेशः स्यात्। गुणापवादः। कृष्णैकत्वम्। गङ्गौघः। देवैश्वर्यम्। कृष्णौत्कण्ठ्यम्॥
हिन्दी अनुवाद
अवर्ण से एच् परे रहते (पूर्व-पर के स्थान पर) एक वृद्धि आदेश होता है। यह गुण का अपवाद है। कृष्णैकत्वम्, गङ्गौघः, देवैश्वर्यम्, कृष्णौत्कण्ठ्यम्।
सरल व्याख्या
यह वृद्धि सन्धि है: अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ। जैसे सदा + एव = सदैव, वन + ओषधिः = वनौषधिः।
३४ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.89
एत्येधत्यूठ्सु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्, एचि, वृद्धिः, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
अवर्णादेजाद्योरेत्येधत्योरूठि च परे वृद्धिरेकादेशः स्यात्। उपैति। उपैधते। प्रष्ठौहः। एजाद्योः किम्? उपेतः। मा भवान्प्रेदिधत्। «अक्षादूहिन्यामुपसंख्यानम्» (वार्त्तिकम्) । अक्षौहिणी सेना। «प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु» (वार्त्तिकम्)। प्रौहः। प्रौढः। प्रौढिः। प्रैषः। प्रैष्यः। «ऋते च तृतीयासमासे» (वार्त्तिकम्)। सुखेन ऋतः सुखार्तः। तृतीयेति किम्? परमर्तः। «प्रवत्सतरकम्बलवसनार्णदशानामृणे» (वार्त्तिकम्) । प्रार्णम्, वत्सतरार्णम्, इत्यादि॥
हिन्दी अनुवाद
अवर्ण से एजादि (ए/ऐ/ओ/औ से आरम्भ) 'इण्' (एति) और 'एध्' (एधति) धातु, तथा 'ऊठ्' परे रहते वृद्धि एकादेश होता है। उपैति, उपैधते, प्रष्ठौहः। एजादि क्यों कहा? उपेतः, मा भवान् प्रेदिधत् (यहाँ गुण ही)। (वार्तिक) अक्ष से ऊहिनी परे — अक्षौहिणी सेना। (वार्तिक) प्र से ऊह, ऊढ, ऊढि, एष, एष्य परे — प्रौहः, प्रौढः, प्रौढिः, प्रैषः, प्रैष्यः। (वार्तिक) तृतीया समास में ऋत परे — सुखेन ऋतः = सुखार्तः; तृतीया न हो तो परमर्तः। (वार्तिक) प्र, वत्सतर, कम्बल, वसन, ऋण, दश से ऋण परे — प्रार्णम्, वत्सतरार्णम् इत्यादि।
सरल व्याख्या
कुछ विशेष स्थितियों में गुण के स्थान पर वृद्धि होती है — उप + एति → उपैति (उपेति नहीं)। वार्तिकों से प्रौढ, अक्षौहिणी, सुखार्त जैसे प्रसिद्ध शब्द सिद्ध होते हैं।
३५ संज्ञासूत्रम् · निपातसंज्ञा अष्टा० 1.4.59
उपसर्गाः क्रियायोगे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रादयः, आकडारात् एका संज्ञा, प्राग्रीश्वरान्निपाताः
वृत्तिः
प्रादयः क्रियायोगे उपसर्गसंज्ञाः स्युः। प्र परा अप सम् अनु अव निस् निर् दुस् दुर् वि आङ् नि अधि अपि अति सु उत् अभि प्रति परि उप - एते प्रादयः॥
हिन्दी अनुवाद
प्र आदि शब्द क्रिया के योग में उपसर्ग संज्ञक होते हैं। प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आङ्, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप — ये प्रादि (22) हैं।
सरल व्याख्या
ये 22 शब्द जब धातु के साथ जुड़ें तो 'उपसर्ग' कहलाते हैं और धातु का अर्थ बदल देते हैं — जैसे हार (हृ) से प्रहार, आहार, विहार, संहार।
३६ संज्ञासूत्रम् · धातुसंज्ञा अष्टा० 1.3.1
भूवादयो धातवः ॥
वृत्तिः
क्रियावाचिनो भ्वादयो धातुसंज्ञाः स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
क्रिया का बोध कराने वाले भू आदि (धातुपाठ में पढ़े) शब्द धातु संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
धातुपाठ में दिए गए भू, गम्, पठ् आदि क्रियावाची मूल शब्द 'धातु' कहलाते हैं। इन्हीं से क्रिया-पद और कृदन्त शब्द बनते हैं।
३७ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.91
उपसर्गादृति धातौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्, वृद्धिः, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
अवर्णान्तादुपसर्गादृकारादौ धातौ परे वृद्धिरेकादेशः स्यात्। प्रार्च्छति॥
हिन्दी अनुवाद
अवर्णान्त उपसर्ग से ऋकारादि धातु परे रहते वृद्धि एकादेश होता है। प्रार्च्छति (प्र + ऋच्छति)।
सरल व्याख्या
उपसर्ग के अ/आ के बाद ऋ से शुरू होने वाली धातु आए तो गुण (अर्) नहीं, वृद्धि (आर्) होती है — प्र + ऋच्छति = प्रार्च्छति।
३८ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.94
एङि पररूपम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्, उपसर्गात्, धातौ, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
आदुपसर्गादेङादौ धातौ पररूपमेकादेशः स्यात् । प्रेजते । उपोषति ॥
हिन्दी अनुवाद
अवर्णान्त उपसर्ग से एङ् (ए, ओ) आदि धातु परे रहते पररूप एकादेश होता है। प्रेजते (प्र + एजते), उपोषति (उप + ओषति)।
सरल व्याख्या
'पररूप' का अर्थ है — दोनों के स्थान पर बाद वाला स्वर ही रह जाना। प्र + एजते में वृद्धि (प्रैजते) न होकर प्रेजते बनता है।
३९ संज्ञासूत्रम् · टिसंज्ञा अष्टा० 1.1.64
अचोऽन्त्यादि टि ॥
वृत्तिः
अचां मध्ये योऽन्त्यः स आदिर्यस्य तट्टिसंज्ञं स्यात्। «शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्» (वार्त्तिकम्) । तच्च टेः। शकन्धुः। कर्कन्धुः मनीषा। आकृतिगणोऽयम्। मार्त्तण्डः॥
हिन्दी अनुवाद
स्वरों में जो अन्तिम स्वर है, वह जिसके आदि में हो, उस (भाग) की टि संज्ञा होती है। (वार्तिक) शकन्धु आदि में पररूप कहना चाहिए, और वह टि के स्थान पर होता है। शकन्धुः (शक + अन्धुः), कर्कन्धुः, मनीषा (मनस् + ईषा)। यह आकृतिगण है। मार्तण्डः।
सरल व्याख्या
शब्द के अन्तिम स्वर से लेकर अन्त तक का भाग 'टि' है — जैसे 'मनस्' में 'अस्', 'राजन्' में 'अन्'। वार्तिक से कुछ शब्दों में टि का पररूप होता है: मनस् + ईषा = मनीषा।
४० विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.95
ओमाङोश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, आत्, पररूपम्, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
ओमि आङि चात्परे पररूपमेकादेशः स्यात् । शिवायों नमः । शिव एहि ॥
हिन्दी अनुवाद
अवर्ण से 'ओम्' और 'आङ्' (आ) परे रहते पररूप एकादेश होता है। शिवाय + ओं नमः = शिवायों नमः; शिव + आ + इहि = शिव एहि।
सरल व्याख्या
ओम् से पहले अ/आ हो तो वृद्धि न होकर ओम् ही बचता है: शिवाय + ओम् = शिवायोम्।
४१ अतिदेशसूत्रम् · एकादेशस्य अन्तादिवदतिदेशः अष्टा० 6.1.85
अन्तादिवच्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
योऽयमेकादेशः स पूर्वस्यान्तवत्परस्यादिवत्। शिवेहि॥
हिन्दी अनुवाद
जो यह एकादेश है, वह पूर्व के अन्त के समान और पर के आदि के समान माना जाता है। शिवेहि।
सरल व्याख्या
दो वर्णों के स्थान पर बना एक वर्ण दोनों शब्दों का हिस्सा माना जाता है — पिछले का अन्तिम भी और अगले का प्रथम भी। इससे आगे के नियम दोनों ओर से लग सकते हैं।
४२ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.101
अकः सवर्णे दीर्घः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
अकः सवर्णेऽचि परे पूर्वपरयोर्दीर्घ एकादेशः स्यात्। दैत्यारिः। श्रीशः। विष्णूदयः। होतॄकारः॥
हिन्दी अनुवाद
अक् (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) से सवर्ण अच् परे रहते पूर्व-पर के स्थान पर एक दीर्घ आदेश होता है। दैत्यारिः (दैत्य + अरिः), श्रीशः (श्री + ईशः), विष्णूदयः (विष्णु + उदयः), होतॄकारः (होतृ + ऋकारः)।
सरल व्याख्या
यह दीर्घ सन्धि है: समान स्वर मिलें तो उनका दीर्घ बन जाता है — अ+अ = आ, इ+इ = ई, उ+उ = ऊ, ऋ+ऋ = ॠ। जैसे विद्या + आलयः = विद्यालयः।
४३ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.109
एङः पदान्तादति ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पूर्वः, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
पदान्तादेङोऽति परे पूर्वरूपमेकादेशः स्यात्। हरेऽव। विष्णोऽव॥
हिन्दी अनुवाद
पदान्त एङ् (ए, ओ) से ह्रस्व अ परे रहते पूर्वरूप एकादेश होता है। हरेऽव (हरे + अव), विष्णोऽव (विष्णो + अव)।
सरल व्याख्या
पद के अन्त के ए/ओ के बाद अ आए तो अ लुप्त हो जाता है (पहला स्वर ही बचता है) और उसके स्थान पर अवग्रह (ऽ) लिखा जाता है। जैसे सो + अहम् = सोऽहम्।
४४ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.122
सर्वत्र विभाषा गोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अति, प्रकृत्या, संहितायाम्
वृत्तिः
लोके वेदे चैङन्तस्य गोरति वा प्रकृतिभावः पदान्ते। गोअग्रम्, गोऽग्रम्। एङन्तस्य किम्? चित्रग्वग्रम्। पदान्ते किम्? गोः॥
हिन्दी अनुवाद
लोक और वेद में, पदान्त में एङन्त 'गो' शब्द को ह्रस्व अ परे रहते विकल्प से प्रकृतिभाव (सन्धि का अभाव) होता है। गो अग्रम्, गोऽग्रम्। एङन्त क्यों? चित्रग्वग्रम् (यहाँ गु)। पदान्त क्यों? गोः।
सरल व्याख्या
'गो' के बाद अ आए तो सन्धि करना वैकल्पिक है — गो अग्रम् (बिना सन्धि) या गोऽग्रम्।
४५ परिभाषासूत्रम् · आदेशस्थाननिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.1.55
अनेकाल्शित्सर्वस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: षष्ठी, स्थाने
वृत्तिः
इति प्राप्ते॥
हिन्दी अनुवाद
(यह सूत्र अनेक वर्णों वाले और शित् आदेश को पूरे स्थानी के स्थान पर करता है) — यह (पूरे के स्थान पर आदेश) प्राप्त होने पर (आगे का सूत्र लगता है)।
सरल व्याख्या
जो आदेश एक से अधिक वर्णों का हो, या जिसमें श् इत् हो, वह पूरे शब्द के स्थान पर होता है, केवल अन्तिम वर्ण के स्थान पर नहीं।
४६ परिभाषासूत्रम् · आदेशस्थाननिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.1.53
ङिच्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: षष्ठी, स्थाने, अलः, अन्त्यस्य
वृत्तिः
ङिदनेकालप्यन्त्यस्यैव स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
ङित् (ङ् इत् वाला) आदेश अनेक वर्णों का होने पर भी अन्तिम वर्ण के स्थान पर ही होता है।
सरल व्याख्या
पिछले सूत्र का अपवाद — जिस आदेश में ङ् इत् हो (जैसे 'अवङ्'), वह भले ही अनेक वर्णों का हो, पूरे शब्द के स्थान पर नहीं, केवल अन्तिम वर्ण के स्थान पर आता है।
४७ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.123
अवङ् स्फोटायनस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, प्रकृत्या, विभाषा, गोः, संहितायाम्
वृत्तिः
पदान्ते एङन्तस्य गोरवङ् वाऽचि । गवाग्रम्, गोऽग्रम् । पदान्ते किम् ? गवि ॥
हिन्दी अनुवाद
पदान्त में एङन्त 'गो' शब्द के (अन्तिम ओ के) स्थान पर अच् परे रहते विकल्प से 'अवङ्' (अव) आदेश होता है (स्फोटायन आचार्य के मत में)। गवाग्रम्, गोऽग्रम्। पदान्त क्यों? गवि (यहाँ नहीं)।
सरल व्याख्या
गो + अग्रम् में ओ के स्थान पर 'अव' आकर गव + अग्रम् = गवाग्रम् (दीर्घ सन्धि) बनता है; विकल्प से गोऽग्रम् भी।
४८ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.124
इन्द्रे च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, प्रकृत्या, गोः, अवङ्, संहितायाम्
वृत्तिः
गोरवङ् स्यादिन्द्रे। गवेन्द्रः॥
हिन्दी अनुवाद
इन्द्र शब्द परे रहते गो को (नित्य) अवङ् होता है। गवेन्द्रः।
सरल व्याख्या
गो + इन्द्रः → गव + इन्द्रः → गवेन्द्रः (गुण सन्धि)। यहाँ विकल्प नहीं, अवश्य होता है।
४९ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.84
दूराद्धूते च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, वाक्यस्य टेः प्लुतः उदात्तः
वृत्तिः
दूरात्सम्बोधने वाक्यस्य टेः प्लुतो वा॥
हिन्दी अनुवाद
दूर से सम्बोधन (पुकारने) में वाक्य की टि को विकल्प से प्लुत होता है।
सरल व्याख्या
दूर खड़े व्यक्ति को पुकारते समय वाक्य के अन्तिम स्वर को खींचकर तीन मात्रा का (प्लुत) बोला जाता है — जैसे 'आगच्छ कृष्ण ३'।
५० विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.125
प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रकृत्या, संहितायाम्
वृत्तिः
एतेऽचि प्रकृत्या स्युः। आगच्छ कृष्ण ३ अत्र गौश्चरति॥
हिन्दी अनुवाद
ये (प्लुत और प्रगृह्य) अच् परे रहते सदा प्रकृतिभाव से रहते हैं (इनकी सन्धि नहीं होती)। आगच्छ कृष्ण ३ अत्र गौश्चरति।
सरल व्याख्या
प्लुत स्वर और प्रगृह्य-संज्ञक शब्दों के बाद स्वर आए तो भी सन्धि नहीं होती, दोनों अलग-अलग रहते हैं।
५१ संज्ञासूत्रम् · प्रगृह्यसंज्ञा अष्टा० 1.1.11
ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम् ॥
वृत्तिः
ईदूदेदन्तं द्विवचनं प्रगृह्यं स्यात्। हरी एतौ। विष्णू इमौ। गङ्गे अमू॥
हिन्दी अनुवाद
ई, ऊ, ए जिसके अन्त में हों ऐसा द्विवचन रूप प्रगृह्य होता है। हरी एतौ, विष्णू इमौ, गङ्गे अमू।
सरल व्याख्या
द्विवचन के जो रूप ई/ऊ/ए पर समाप्त हों (हरी, विष्णू, गङ्गे), उनकी आगे के स्वर से सन्धि नहीं होती — 'हरी एतौ' ही रहता है, 'हर्येतौ' नहीं।
५२ संज्ञासूत्रम् · प्रगृह्यसंज्ञा अष्टा० 1.1.12
अदसो मात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ईदूदेद्, प्रगृह्यम्
वृत्तिः
अस्मात्परावीदूतौ प्रगृह्यौ स्तः। अमी ईशाः। रामकृष्णावमू आसाते। मात्किम्? अमुकेऽत्र॥
हिन्दी अनुवाद
अदस् शब्द के मकार से परे ई और ऊ प्रगृह्य होते हैं। अमी ईशाः, रामकृष्णौ अमू आसाते। मकार से क्यों? अमुकेऽत्र (यहाँ प्रगृह्य नहीं)।
सरल व्याख्या
'अदस्' (वह) के रूप अमी, अमू में म् के बाद आए ई/ऊ की सन्धि नहीं होती।
५३ संज्ञासूत्रम् · निपातसंज्ञा अष्टा० 1.4.57
चादयोऽसत्त्वे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा, प्राग्रीश्वरान्निपाताः
वृत्तिः
अद्रव्यार्थाश्चादयो निपाताः स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
द्रव्य (सत्त्व) अर्थ न रखने वाले च आदि शब्द निपात कहलाते हैं।
सरल व्याख्या
च, वा, ह, एव, इव आदि जो किसी वस्तु का नाम न होकर केवल सम्बन्ध या भाव बताते हैं, वे 'निपात' (अव्यय) हैं।
५४ संज्ञासूत्रम् · निपातसंज्ञा अष्टा० 1.4.58
प्रादयः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: असत्त्वे, आकडारात् एका संज्ञा, प्राग्रीश्वरान्निपाताः
वृत्तिः
एतेऽपि तथा॥
हिन्दी अनुवाद
प्र आदि भी वैसे ही (असत्त्व अर्थ में निपात) होते हैं।
सरल व्याख्या
प्र, परा आदि उपसर्ग भी जब द्रव्य-अर्थ में न हों तो निपात कहलाते हैं।
५५ संज्ञासूत्रम् · प्रगृह्यसंज्ञा अष्टा० 1.1.14
निपात एकाजनाङ् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रगृह्यम्
वृत्तिः
एकोऽज् निपात आङ्वर्जः प्रगृह्यः स्यात्। इ इन्द्रः। उ उमेशः। वाक्यस्मरणयोरङित्; आ एवं नु मन्यसे। आ एवं किल तत्। अन्यत्र ङित् ; आ ईषदुष्णम् ओष्णम्॥
हिन्दी अनुवाद
एक स्वर वाला निपात, आङ् को छोड़कर, प्रगृह्य होता है। इ इन्द्रः, उ उमेशः। वाक्य (पूर्व कथन) और स्मरण अर्थ में आ ङित् नहीं होता — आ एवं नु मन्यसे, आ एवं किल तत्। अन्य अर्थ (ईषत् आदि) में आ ङित् (आङ्) होता है — आ + उष्णम् = ओष्णम् (थोड़ा गर्म)।
सरल व्याख्या
अकेले स्वर वाले निपात (इ, उ, आ) की सन्धि नहीं होती। पर 'थोड़ा', 'तक' आदि अर्थ वाला 'आङ्' प्रगृह्य नहीं, उसकी सन्धि होती है।
५६ संज्ञासूत्रम् · प्रगृह्यसंज्ञा अष्टा० 1.1.15
ओत् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रगृह्यम्, निपातः
वृत्तिः
ओदन्तो निपातः प्रगृह्यः स्यात्। अहो ईशाः॥
हिन्दी अनुवाद
ओकारान्त निपात प्रगृह्य होता है। अहो ईशाः।
सरल व्याख्या
अहो, उताहो जैसे ओ पर समाप्त होने वाले निपातों के बाद स्वर आने पर सन्धि नहीं होती।
५७ संज्ञासूत्रम् · प्रगृह्यसंज्ञा अष्टा० 1.1.16
सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रगृह्यम्, ओत्
वृत्तिः
सम्बुद्धिनिमित्तक ओकारो वा प्रगृह्योऽवैदिके इतौ परे। विष्णो इति, विष्ण इति, विष्णविति॥
हिन्दी अनुवाद
सम्बुद्धि (सम्बोधन एकवचन) के कारण हुआ ओकार, अवैदिक 'इति' परे रहते विकल्प से प्रगृह्य होता है। विष्णो इति, विष्ण इति, विष्णविति।
सरल व्याख्या
सम्बोधन 'विष्णो' के बाद 'इति' हो तो तीन रूप बनते हैं — बिना सन्धि (विष्णो इति), व् लोप सहित (विष्ण इति), और अयादि सन्धि (विष्णविति)।
५८ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.33
मय उञो वो वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
मयः परस्य उञो वो वाऽचि। किम्वुक्तम्, किमु उक्तम्॥
हिन्दी अनुवाद
मय् प्रत्याहार (ञ म ङ ण न को छोड़ अन्य वर्गीय वर्ण) से परे 'उञ्' निपात को अच् परे रहते विकल्प से व होता है। किम्वुक्तम्, किमु उक्तम्।
सरल व्याख्या
किम् + उ + उक्तम् में म् के बाद आए 'उ' निपात का विकल्प से व् हो जाता है।
५९ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.127
इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रकृत्या, अचि, नित्यम्, संहितायाम्
वृत्तिः
पदान्ता इको ह्रस्वा वा स्युरसवर्णेऽचि। ह्रस्वविधिसामर्थ्यान्न स्वरसन्धिः। चक्रि अत्र, चक्र्यत्र। पदान्ता इति किम्? गौर्यौ -
हिन्दी अनुवाद
पदान्त इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) को असवर्ण अच् परे रहते विकल्प से ह्रस्व होता है। ह्रस्व-विधान के सामर्थ्य से (उस पक्ष में) स्वर-सन्धि नहीं होती। चक्रि अत्र, चक्र्यत्र। पदान्त क्यों? गौर्यौ (आगे देखें)।
सरल व्याख्या
चक्री + अत्र में ई ह्रस्व होकर 'चक्रि अत्र' (बिना सन्धि) — या सामान्य यण् से 'चक्र्यत्र'।
६० विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.46
अचो रहाभ्यां द्वे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: यरः, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो द्वे वा स्तः। गौर्य्यौ । «न समासे» (वार्त्तिकम्) । वाप्यश्वः ॥
हिन्दी अनुवाद
अच् के बाद आए र और ह से परे यर् को विकल्प से द्वित्व होता है। गौर्य्यौ। (वार्तिक) समास में नहीं — वाप्यश्वः।
सरल व्याख्या
स्वर + र्/ह् + व्यंजन हो तो वह व्यंजन दोहराया जा सकता है: गौर्यौ → गौर्य्यौ। (हिन्दी में 'आर्य्य' जैसी पुरानी वर्तनी इसी से है।)
६१ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.128
ऋत्यकः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रकृत्या, नित्यम्, अचि, शाकल्यस्य, ह्रस्वः, च, संहितायाम्
वृत्तिः
ऋति परे पदान्ता अकः प्राग्वद्वा । ब्रह्म ऋषिः, ब्रह्मर्षिः पदान्ताः किम् ? आर्च्छत् ॥
हिन्दी अनुवाद
ऋ परे रहते पदान्त अक् को पहले की तरह विकल्प से ह्रस्व (और प्रकृतिभाव) होता है। ब्रह्म ऋषिः, ब्रह्मर्षिः। पदान्त क्यों? आर्च्छत्।
सरल व्याख्या
ब्रह्मा + ऋषिः में विकल्प से 'ब्रह्म ऋषिः' (बिना सन्धि) या गुण सन्धि से 'ब्रह्मर्षिः'।

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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