📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी
वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या
मूल वृत्ति
हिन्दी अनुवाद
सरल व्याख्या
६२
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.40
स्तोः श्चुना श्चुः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
सकारतवर्गयोः शकारचवर्गाभ्यां योगे शकारचवर्गौ स्तः । रामश्शेते । रामश्चिनोति । सच्चित् । शार्ङ्गिञ्जय ॥
हिन्दी अनुवाद
स और तवर्ग का श और चवर्ग के साथ योग होने पर (क्रमशः) श और चवर्ग होते हैं। रामश्शेते, रामश्चिनोति, सच्चित्, शार्ङ्गिञ्जय।
सरल व्याख्या
यह श्चुत्व सन्धि है: स्/त-वर्ग के पहले या बाद में श्/च-वर्ग हो तो स् → श्, त् → च्, द् → ज्, न् → ञ्। जैसे सत् + चित् = सच्चित्, रामस् + शेते = रामश्शेते।
६३
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.44
शात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: श्चुः, न, तोः, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
शात्परस्य तवर्गस्य चुत्वं न स्यात्। विश्नः। प्रश्नः॥
हिन्दी अनुवाद
श से परे तवर्ग को चवर्ग नहीं होता। विश्नः, प्रश्नः।
सरल व्याख्या
श् के बाद आया न् ञ् नहीं बनता — इसलिए 'प्रश्नः' ही रहता है।
६४
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.41
ष्टुना ष्टुः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: स्तोः, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
स्तोः ष्टुना योगे ष्टुः स्यात् । रामष्षष्ठः । रामष्टीकते । पेष्टा । तट्टीका । चक्रिण्ढौकसे ॥
हिन्दी अनुवाद
स और तवर्ग का ष और टवर्ग के साथ योग होने पर (क्रमशः) ष और टवर्ग होते हैं। रामष्षष्ठः, रामष्टीकते, पेष्टा, तट्टीका, चक्रिण्ढौकसे।
सरल व्याख्या
यह ष्टुत्व सन्धि है: स्/त-वर्ग का ष्/ट-वर्ग से मेल हो तो स् → ष्, त् → ट्, द् → ड्, न् → ण्। जैसे तत् + टीका = तट्टीका।
६५
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.42
न पदान्ताट्टोरनाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: स्तोः, ष्टुः, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
पदान्ताट्टवर्गात्परस्यानामः स्तोः ष्टुर्न स्यात्। षट् सन्तः। षट् ते। पदान्तात्किम्? ईट्टे। टोः किम्? सर्पिष्टमम्। «अनाम्नवतिनगरीणामिति वाच्यम्» (वार्त्तिकम्) । षण्णाम् । षण्णवतिः। षण्णगर्य्यः॥
हिन्दी अनुवाद
पदान्त टवर्ग से परे स और तवर्ग को ष्टुत्व नहीं होता, 'नाम्' को छोड़कर। षट् सन्तः, षट् ते। पदान्त क्यों? ईट्टे। टवर्ग से क्यों? सर्पिष्टमम्। (वार्तिक) अनाम्, नवति, नगरी — इनको छोड़कर कहना चाहिए — षण्णाम्, षण्णवतिः, षण्णगर्यः।
सरल व्याख्या
पद के अन्त के ट-वर्ग के बाद आए स्/त-वर्ग नहीं बदलते (षट् सन्तः); पर नाम्, नवति, नगरी में बदलते हैं — षण्णाम्।
६६
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.43
तोः षि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ष्टुः, न, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
न ष्टुत्वम्। सन्षष्ठः॥
हिन्दी अनुवाद
तवर्ग को ष परे रहते ष्टुत्व नहीं होता। सन्षष्ठः।
सरल व्याख्या
सन् + षष्ठः में न् का ण् नहीं होता।
६७
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.39
झलां जशोऽन्ते ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
पदान्ते झलां जशः स्युः। वागीशः॥
हिन्दी अनुवाद
पदान्त में झल् को जश् होते हैं। वागीशः (वाक् + ईशः)।
सरल व्याख्या
पद के अन्त के व्यंजन (झल्) अपने वर्ग के तीसरे अक्षर (ज, ब, ग, ड, द) में बदल जाते हैं: वाक् + ईशः = वागीशः, जगत् + ईशः = जगदीशः।
६८
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.45
यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदान्तस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
यरः पदान्तस्यानुनासिके परेऽनुनासिको वा स्यात् । एतन्मुरारिः एतद् मुरारिः । «प्रत्यये भाषायां नित्यम्» (वार्त्तिकम्) । तन्मात्रम् । चिन्मयम् ॥
हिन्दी अनुवाद
पदान्त यर् को अनुनासिक परे रहते विकल्प से अनुनासिक होता है। एतन्मुरारिः, एतद् मुरारिः। (वार्तिक) प्रत्यय परे रहते लोक-भाषा में नित्य — तन्मात्रम्, चिन्मयम्।
सरल व्याख्या
पद के अन्त का व्यंजन यदि आगे न/म आदि नासिक्य हो तो अपने वर्ग का पाँचवाँ अक्षर बन सकता है: एतद् + मुरारिः = एतन्मुरारिः; चित् + मयम् = चिन्मयम् (प्रत्यय में अवश्य)।
६९
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.60
तोर्लि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: परसवर्णः, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
तवर्गस्य लकारे परे परसवर्णः। तल्लयः। विद्वाँल्लिखति। नस्यानुनासिको लः॥
हिन्दी अनुवाद
तवर्ग को ल परे रहते परसवर्ण (ल) होता है। तल्लयः, विद्वाँल्लिखति। न के स्थान पर अनुनासिक ल होता है।
सरल व्याख्या
त्/द्/न् के बाद ल् हो तो वे भी ल् बन जाते हैं: तत् + लयः = तल्लयः; न् से अनुनासिक 'ल्ँ' — विद्वाँल्लिखति।
७०
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.61
उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सवर्णः, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
उदः परयोः स्थास्तम्भोः पूर्वसवर्णः ॥
हिन्दी अनुवाद
उद् उपसर्ग से परे स्था और स्तम्भ् धातु को पूर्वसवर्ण होता है।
सरल व्याख्या
उद् + स्थानम् में स् के स्थान पर उद् के द् जैसा वर्ण आता है — आगे के सूत्रों से 'उत्थानम्' बनता है।
७१
परिभाषासूत्रम् · पञ्चमीविभक्तिनिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.1.67
तस्मादित्युत्तरस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: निर्दिष्टे
वृत्तिः
पञ्चमीनिर्देशेन क्रियमाणं कार्यं वर्णान्तरेणाव्यवहितस्य परस्य ज्ञेयम्॥
हिन्दी अनुवाद
पञ्चमी से निर्दिष्ट होकर किया जाने वाला कार्य, किसी अन्य वर्ण से अव्यवहित परवर्ती (बाद वाले) को समझना चाहिए।
सरल व्याख्या
सूत्र में पञ्चमी (जैसे 'उदः' = उद् से) हो तो कार्य उसके ठीक बाद वाले शब्द/वर्ण पर होता है।
७२
परिभाषासूत्रम् · आदेशस्थाननिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.1.54
आदेः परस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: षष्ठी, स्थाने, अलः
वृत्तिः
परस्य यद्विहितं तत्तस्यादेर्बोध्यम्। इति सस्य थः॥
हिन्दी अनुवाद
पर (बाद वाले) को जो विहित है, वह उसके आदि (प्रथम वर्ण) को समझना चाहिए। इससे स का थ होता है।
सरल व्याख्या
बाद वाले शब्द पर कार्य हो तो केवल उसके पहले अक्षर पर होता है। उद् + स्थान में 'स्' (महाप्राण-अघोष सदृश) का 'थ्' बनता है → उद्थ्थान।
७३
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.65
झरो झरि सवर्णे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: परसवर्णः, अन्यतरस्याम्, हलः, लोपः, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
हलः परस्य झरो वा लोपः सवर्णे झरि॥
हिन्दी अनुवाद
हल् से परे झर् का सवर्ण झर् परे रहते विकल्प से लोप होता है।
सरल व्याख्या
व्यंजन के बाद आया व्यंजन, यदि उसके बाद उसी का सवर्ण हो, तो हट सकता है — उद्थ्थान → उद्थान।
७४
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.55
खरि च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: झलाम्, चर्, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
खरि झलां चरः स्युः । इत्युदो दस्य तः। उत्थानम्। उत्तम्भनम्॥
हिन्दी अनुवाद
खर् परे रहते झल् को चर् होते हैं। इससे उद् के द का त होता है — उत्थानम्, उत्तम्भनम्।
सरल व्याख्या
कठोर व्यंजन (खर् = क ख च छ ट ठ त थ प फ श ष स) से पहले आने वाला व्यंजन भी अपने वर्ग का पहला अक्षर बन जाता है: उद् + थान = उत्थानम्, सद् + कार = सत्कार।
७५
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.62
झयो होऽन्यतरस्याम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: परसवर्णः, पूर्वस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
झयः परस्य हस्य वा पूर्वसवर्णः। नादस्य घोषस्य संवारस्य महाप्राणस्य तादृशो वर्गचतुर्थः। वाग्घरिः, वाग्हरिः॥
हिन्दी अनुवाद
झय् से परे ह को विकल्प से पूर्वसवर्ण होता है। नाद-घोष-संवार-महाप्राण ह के स्थान पर वैसा ही वर्ग का चौथा वर्ण आता है। वाग्घरिः, वाग्हरिः।
सरल व्याख्या
वर्गीय व्यंजन के बाद आए ह् का विकल्प से उसी वर्ग का चौथा अक्षर हो जाता है: वाक् → वाग् + हरिः = वाग्घरिः; तत् + हितम् = तद्धितम्।
७६
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.63
शश्छोऽटि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: झयः, अन्यतरस्याम्, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
झयः परस्य शस्य छो वाऽटि। तद् शिव इत्यत्र दस्य श्चुत्वेन जकारे कृते खरि चेति जकारस्य चकारः। तच्छिवः, तच्शिवः। «छत्वममीति वाच्यम्» (वार्त्तिकम्) । तच्छ्लोकेन॥
हिन्दी अनुवाद
झय् से परे श को अट् परे रहते विकल्प से छ होता है। 'तद् शिवः' में द को श्चुत्व से ज, फिर 'खरि च' से ज का च — तच्छिवः, तच्शिवः। (वार्तिक) अम् परे रहते भी छत्व कहना चाहिए — तच्छ्लोकेन।
सरल व्याख्या
त्/द् आदि के बाद श् और उसके बाद स्वर/अन्तःस्थ हो तो श् → छ् (विकल्प से): तत् + शिवः = तच्छिवः।
७७
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.23
मोऽनुस्वारः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: हलि, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
मान्तस्य पदस्यानुस्वारो हलि । हरिं वन्दे ॥
हिन्दी अनुवाद
मकारान्त पद के म को हल् परे रहते अनुस्वार होता है। हरिं वन्दे।
सरल व्याख्या
पद के अन्त का म्, अगर आगे व्यंजन हो, तो अनुस्वार (ं) बन जाता है: हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे। आगे स्वर हो तो नहीं: हरिम् + अहम्।
७८
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.24
नश्चापदान्तस्य झलि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: मः, अनुस्वारः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
नस्य मस्य चापदान्तस्य झल्यनुस्वारः। यशांसि। आक्रंस्यते। झलि किम्? मन्यते॥
हिन्दी अनुवाद
अपदान्त न और म को झल् परे रहते अनुस्वार होता है। यशांसि, आक्रंस्यते। झल् क्यों? मन्यते।
सरल व्याख्या
शब्द के बीच में आए न्/म् के बाद ऊष्म या वर्गीय व्यंजन हो तो अनुस्वार होता है: यशान्सि → यशांसि।
७९
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.58
अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
हिन्दी अनुवाद
(अर्थ) स्पष्ट है — अनुस्वार को यय् परे रहते परसवर्ण होता है। शान्तः।
सरल व्याख्या
अनुस्वार के बाद वर्गीय व्यंजन हो तो अनुस्वार उसी वर्ग का पाँचवाँ अक्षर बन जाता है: शां + तः → शान्तः; अं + कः → अङ्कः।
८०
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.59
वा पदान्तस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अनुस्वारस्य, ययि, परसवर्णः, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
त्वङ्करोषि, त्वं करोषि॥
हिन्दी अनुवाद
पदान्त अनुस्वार को (यय् परे) विकल्प से परसवर्ण होता है। त्वङ्करोषि, त्वं करोषि।
सरल व्याख्या
पद के अन्त में यह परिवर्तन वैकल्पिक है — 'त्वं करोषि' और 'त्वङ्करोषि' दोनों शुद्ध।
८१
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.25
मो राजि समः क्वौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
क्विबन्ते राजतौ परे समो मस्य म एव स्यात्। सम्राट्॥
हिन्दी अनुवाद
क्विप् प्रत्ययान्त 'राज्' परे रहते सम् के म को म ही रहता है (अनुस्वार नहीं)। सम्राट्।
सरल व्याख्या
सम् + राट् में म् अनुस्वार नहीं बनता, इसलिए 'सम्राट्' लिखा जाता है, 'संराट्' नहीं।
८२
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.26
हे मपरे वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: मः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
मपरे हकारे परे मस्य मो वा। किम् ह्मलयति, किं ह्मलयति। «यवलपरे यवला वा» (वार्त्तिकम्) । किय्ँ ह्यः, किं ह्यः। किव्ँ ह्वलयति, किं ह्वलयति। किल्ँ ह्लादयति, किं ह्लादयति॥
हिन्दी अनुवाद
म परे जिसके ऐसे ह के परे रहते (पदान्त) म को विकल्प से म ही रहता है। किम् ह्मलयति, किं ह्मलयति। (वार्तिक) य, व, ल जिसके परे हों ऐसे ह के परे म को विकल्प से (अनुनासिक) य, व, ल — किय्ँ ह्यः, किं ह्यः; किव्ँ ह्वलयति, किं ह्वलयति; किल्ँ ह्लादयति, किं ह्लादयति।
सरल व्याख्या
ह्म, ह्य, ह्व, ह्ल से पहले के म् के विशेष वैकल्पिक रूप।
८३
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.27
नपरे नः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: मः, हे, वा, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
नपरे हकारे मस्य नो वा। किन् ह्नुते, किं ह्नुते॥
हिन्दी अनुवाद
न परे जिसके ऐसे ह के परे रहते म को विकल्प से न होता है। किन् ह्नुते, किं ह्नुते।
सरल व्याख्या
ह्न से पहले म् → न् (विकल्प से)।
८४
परिभाषासूत्रम् · आगमस्थाननिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.1.46
आद्यन्तौ टकितौ ॥
वृत्तिः
टित्कितौ यस्योक्तौ तस्य क्रमादाद्यन्तावयवौ स्तः॥
हिन्दी अनुवाद
टित् और कित् (ट्/क् इत् वाले) आगम, जिसके लिये कहे गए हैं, उसके क्रमशः आदि और अन्त अवयव होते हैं।
सरल व्याख्या
जो आगम ट्-इत् वाला हो (जैसे 'सुट्') वह शब्द के आरम्भ में जुड़ता है; जो क्-इत् वाला हो (जैसे 'तुक्', 'कुक्') वह अन्त में।
८५
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.28
ङ्णोः कुक्टुक् शरि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वा, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
वा स्तः। «चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम्» (वार्त्तिकम्) । प्राङ्ख् षष्ठः, प्राङ्क्षष्ठः, प्राङ् षष्ठः। सुगण्ठ् षष्ठः सुगण्ट् षष्ठः, सुगण् षष्ठः॥
हिन्दी अनुवाद
ङ् और ण् को शर् परे रहते विकल्प से (क्रमशः) कुक् और टुक् आगम होते हैं। (वार्तिक) पौष्करसादि आचार्य के मत में शर् परे रहते चय् को द्वितीय वर्ण होता है। प्राङ्ख् षष्ठः, प्राङ्क्षष्ठः, प्राङ् षष्ठः; सुगण्ठ् षष्ठः, सुगण्ट् षष्ठः, सुगण् षष्ठः।
सरल व्याख्या
प्राङ् + षष्ठः में बीच में क् (या ख्) जुड़कर तीन रूप बनते हैं।
८६
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.29
डः सि धुट् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वा, शरि, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
डात्परस्य सस्य धुड्वा। षट्त्सन्तः, षट् सन्तः॥
हिन्दी अनुवाद
ड से परे स को विकल्प से धुट् (ध्) आगम होता है। षट्त्सन्तः, षट् सन्तः।
सरल व्याख्या
षड् + सन्तः में बीच में ध् जुड़ता है जो आगे त् बनता है — षट्त्सन्तः; या बिना आगम षट् सन्तः।
८७
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.30
नश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वा, शरि, सि, धुट्, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
नान्तात्परस्य सस्य धुड्वा। सन्त्सः, सन्सः॥
हिन्दी अनुवाद
नकारान्त से परे स को (भी) विकल्प से धुट् होता है। सन्त्सः, सन्सः।
सरल व्याख्या
सन् + सः → सन्त्सः या सन्सः।
८८
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.31
शि तुक् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वा, नः, च, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
पदान्तस्य नस्य शे परे तुग्वा। सञ्छम्भुः, सञ्च्छम्भुः, सञ्च्शम्भुः, सञ्शम्भुः॥
हिन्दी अनुवाद
पदान्त न को श परे रहते विकल्प से तुक् आगम होता है। सञ्छम्भुः, सञ्च्छम्भुः, सञ्च्शम्भुः, सञ्शम्भुः।
सरल व्याख्या
सन् + शम्भुः में बीच में त् जुड़ने और उसके श्चुत्व, छत्व आदि से चार रूप बनते हैं।
८९
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.32
ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
ह्रस्वात्परो यो ङम् तदन्तं यत्पदं तस्मात्परस्याचो ङमुट्। प्रत्यङ्ङात्मा। सुगण्णीशः। सन्नच्युतः॥
हिन्दी अनुवाद
ह्रस्व स्वर के बाद आया ङम् (ङ्, ण्, न्) जिसके अन्त में हो, ऐसे पद से परे अच् को (नित्य) ङमुट् आगम होता है। प्रत्यङ्ङात्मा, सुगण्णीशः, सन्नच्युतः।
सरल व्याख्या
ह्रस्व स्वर + ङ्/ण्/न् पद के अन्त में हो और आगे स्वर हो, तो वह व्यंजन दोहराया जाता है: सन् + अच्युतः = सन्नच्युतः; राजन् + आगच्छ → (ह्रस्व नहीं, इसलिए नहीं)।
९०
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.5
समः सुटि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रु, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्, अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा
हिन्दी अनुवाद
सुट् परे रहते सम् (के म) को रु (र्) होता है।
सरल व्याख्या
सम् + स्कर्ता (सुट् आगम सहित) में म् के स्थान पर र् (रु) आता है — आगे के सूत्रों से 'संस्कर्ता' बनता है।
९१
अधिकारसूत्रम् · अनुनासिकविध्यधिकारः अष्टा० 8.3.2
अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रु, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्, अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा
वृत्तिः
अत्र रुप्रकरणे रोः पूर्वस्यानुनासिको वा॥
हिन्दी अनुवाद
इस रु-प्रकरण में रु से पूर्व वर्ण को विकल्प से अनुनासिक होता है।
सरल व्याख्या
जहाँ म्/न् का रु बना हो, उससे पहले वाले स्वर पर विकल्प से चन्द्रबिन्दु (ँ) आता है।
९२
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.4
अनुनासिकात् परोऽनुस्वारः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रु, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्, अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा
वृत्तिः
अनुनासिकं विहाय रोः पूर्वस्मात्परोऽनुस्वारागमः॥
हिन्दी अनुवाद
अनुनासिक को छोड़कर (दूसरे पक्ष में), रु से पूर्व वर्ण के बाद अनुस्वार आगम होता है।
सरल व्याख्या
अनुनासिक न करने पर उसके बदले अनुस्वार (ं) जुड़ता है — इसलिए 'सँस्कर्ता' और 'संस्कर्ता' दोनों।
९३
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.15
खरवसानयोर्विसर्जनीयः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
खरि अवसाने च पदान्तस्य रेफस्य विसर्गः। «संपुंकानां सो वक्तव्यः» (वार्त्तिकम्) । सँस्स्कर्ता, संस्स्कर्ता॥
हिन्दी अनुवाद
खर् परे रहते और अवसान (वाक्य/पद के विराम) में पदान्त रेफ (र्) को विसर्ग होता है। (वार्तिक) सम्, पुम्, कान् के (विसर्ग को) स कहना चाहिए। सँस्स्कर्ता, संस्स्कर्ता।
सरल व्याख्या
पद के अन्त का र्, यदि आगे कठोर व्यंजन हो या कुछ न हो, तो विसर्ग (ः) बन जाता है — रामर् → रामः। सम्, पुम्, कान् में वह विसर्ग फिर स् बन जाता है: संस्कर्ता।
९४
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.6
पुमः खय्यम्परे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रु, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्, अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा
वृत्तिः
अम्परे खयि पुमो रुः। पुँस्कोकिलः, पुंस्कोकिलः॥
हिन्दी अनुवाद
अम् परे जिसके ऐसे खय् के परे रहते पुम् (के म) को रु होता है। पुँस्कोकिलः, पुंस्कोकिलः।
सरल व्याख्या
पुम् + कोकिलः → पुंस्कोकिलः (नर कोयल)।
९५
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.7
नश्छव्यप्रशान् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रु, अम्परे, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्, अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा
वृत्तिः
अम्परे छवि नान्तस्य पदस्य रुः ; न तु प्रशान्शब्दस्य॥
हिन्दी अनुवाद
अम् परे जिसके ऐसे छव् (छ ठ थ च ट त) के परे रहते नकारान्त पद को रु होता है; पर 'प्रशान्' शब्द को नहीं।
सरल व्याख्या
पद के अन्त के न् के बाद च/ट/त आदि और उसके बाद स्वर हो तो न् → र् (रु), जो आगे स् बनता है — जैसे चक्रिन् + त्रायस्व → चक्रिंस्त्रायस्व।
९६
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.34
विसर्जनीयस्य सः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: खर्, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
खरि। चक्रिँस्त्रायस्व, चक्रिंस्त्रायस्व । अप्रशान् किम् ? प्रशान् तनोति । पदस्येति किम् ? हन्ति॥
हिन्दी अनुवाद
खर् परे रहते विसर्ग को स होता है। चक्रिँस्त्रायस्व, चक्रिंस्त्रायस्व। 'अप्रशान्' क्यों कहा? प्रशान् तनोति (यहाँ नहीं)। 'पद का' क्यों? हन्ति (यहाँ नहीं)।
सरल व्याख्या
विसर्ग के बाद क्, प् आदि को छोड़ कठोर व्यंजन (विशेषतः त्, च्, ट्) हो तो विसर्ग स् बनता है — आगे श्चुत्व/ष्टुत्व से श्/ष्: नमः + ते = नमस्ते, रामः + च = रामश्च।
९७
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.10
नॄन् पे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रु, नः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्, अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा
वृत्तिः
नॄनित्यस्य रुर्वा पे॥
हिन्दी अनुवाद
'नॄन्' शब्द (के न) को प परे रहते विकल्प से रु होता है।
सरल व्याख्या
नॄन् + पाहि में न् का विकल्प से र् (रु) बनता है — फिर विसर्ग आदि।
९८
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.37
कुप्वोः ≍क≍पौ च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: विसर्जनीयस्य, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
कवर्गे पवर्गे च विसर्गस्य ≍क ≍पौ स्तः, चाद्विसर्गः । नॄँ ≍पाहि, नॄँः पाहि, नॄं≍ पाहि नॄंः पाहि । नॄन्पाहि॥
हिन्दी अनुवाद
कवर्ग और पवर्ग परे रहते विसर्ग के स्थान पर (क्रमशः) जिह्वामूलीय और उपध्मानीय होते हैं; 'च' से विसर्ग भी। नॄँ≍पाहि, नॄँः पाहि, नॄं≍पाहि, नॄंः पाहि, नॄन्पाहि।
सरल व्याख्या
क/ख से पहले विसर्ग का आधा-विसर्ग जैसा जिह्वामूलीय और प/फ से पहले उपध्मानीय उच्चारण होता है; अन्यथा विसर्ग ही रहता है। इस प्रकार 'नॄन् पाहि' के पाँच रूप।
९९
संज्ञासूत्रम् · आम्रेडितसंज्ञा अष्टा० 8.1.2
तस्य परमाम्रेडितम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वस्य द्वे
वृत्तिः
द्विरुक्तस्य परमाम्रेडितम् स्यात् ॥
हिन्दी अनुवाद
दो बार कहे गए (शब्द) में बाद वाला 'आम्रेडित' कहलाता है।
सरल व्याख्या
किसी शब्द को दोहराने पर दूसरा शब्द आम्रेडित है — जैसे 'कान् कान्' में दूसरा 'कान्'।
१००
विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.12
कानाम्रेडिते ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रु, नः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्, अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा
वृत्तिः
कान्नकारस्य रुः स्यादाम्रेडिते। काँस्कान्, कांस्कान्॥
हिन्दी अनुवाद
आम्रेडित परे रहते 'कान्' के नकार को रु होता है। काँस्कान्, कांस्कान्।
सरल व्याख्या
कान् + कान् → कांस्कान् (किन-किन को)।
१०१
विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.73
छे च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ह्रस्वस्य, तुक्, संहितायाम्
वृत्तिः
ह्रस्वस्य छे तुक्। शिवच्छाया॥
हिन्दी अनुवाद
छ परे रहते ह्रस्व (स्वर) को तुक् (त्) आगम होता है। शिवच्छाया।
सरल व्याख्या
ह्रस्व स्वर के बाद छ आए तो बीच में त् जुड़कर च् बनता है: शिव + छाया = शिवच्छाया, वृक्ष + छाया = वृक्षच्छाया।
१०२
विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.76
पदान्ताद्वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: तुक्, छे, दीर्घात्, संहितायाम्
वृत्तिः
दीर्घात्पदान्ताच्छे तुग् वा । लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मीछाया ॥
हिन्दी अनुवाद
पदान्त दीर्घ से छ परे रहते विकल्प से तुक् होता है। लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मीछाया।
सरल व्याख्या
पद के अन्त में दीर्घ स्वर हो तो च् जोड़ना वैकल्पिक है।
मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in