🕉️ 16 October 2026, Friday · 05:17:51 AM · CDSHARMA.IN

📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

← सभी प्रकरण

४. विसर्गसन्धिः

विसर्ग सन्धि · सूत्र 103–114 (12)
«विसर्जनीयस्य सः» [96] - खरि । विष्णुस्त्राता ॥
'विसर्जनीयस्य सः' [96] — खर् परे रहते विसर्ग को स होता है। विष्णुः + त्राता = विष्णुस्त्राता।

सरल व्याख्या: विसर्ग सन्धि का मूल नियम — विसर्ग के बाद कठोर व्यंजन (त, थ आदि) हो तो विसर्ग स् बन जाता है।
१०३ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.36
वा शरि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: विसर्जनीयस्य, विसर्जनीयः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
शरि विसर्गस्य विसर्गो वा। हरिः शेते, हरिश्शेते॥
हिन्दी अनुवाद
शर् (श, ष, स) परे रहते विसर्ग को विकल्प से विसर्ग ही रहता है। हरिः शेते, हरिश्शेते।
सरल व्याख्या
विसर्ग के बाद श्/ष्/स् हो तो विसर्ग रहे या स् (फिर श्/ष्) बने — दोनों शुद्ध।
१०४ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.66
ससजुषो रुः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
पदान्तस्य सस्य सजुषश्च रुः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
पदान्त स और 'सजुष्' शब्द (के ष) को रु होता है।
सरल व्याख्या
पद के अन्त का स् पहले 'रु' (र्) बनता है — फिर अवसान में विसर्ग। रामस् → रामर् → रामः। यही विसर्ग-सन्धि का आधार है।
१०५ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.113
अतो रोरप्लुतादप्लुते ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अति, उत्, संहितायाम्
वृत्तिः
अप्लुतादतः परस्य रोरुः स्यादप्लुतेऽति। शिवोऽर्च्यः॥
हिन्दी अनुवाद
अप्लुत ह्रस्व अ से परे रु को उ होता है, अप्लुत ह्रस्व अ परे रहते। शिवोऽर्च्यः।
सरल व्याख्या
अः + अ हो तो विसर्ग → उ, फिर अ + उ = ओ, और अगला अ पूर्वरूप से लुप्त (ऽ): शिवः + अर्च्यः = शिवोऽर्च्यः; सः + अहम् = सोऽहम्।
१०६ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.114
हशि च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उत्, अतः, रोः, अप्लुतात्, संहितायाम्
वृत्तिः
तथा। शिवो वन्द्यः॥
हिन्दी अनुवाद
हश् (मृदु व्यंजन) परे रहते भी वैसे ही (अ से परे रु को उ)। शिवो वन्द्यः।
सरल व्याख्या
अः के बाद मृदु व्यंजन (ग, ज, द, ब, न, म, य, र, ल, व, ह आदि) हो तो अः → ओ: रामः + गच्छति = रामो गच्छति, मनः + रथः = मनोरथः।
१०७ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.17
भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रोः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
एतत्पूर्वस्य रोर्यादेशोऽशि। देवा इह, देवायिह। भोस् भगोस् अघोस् इति सान्ता निपाताः। तेषां रोर्यत्वे कृते॥
हिन्दी अनुवाद
भोस्, भगोस्, अघोस् और अवर्ण जिसके पूर्व में हो ऐसे रु को अश् परे रहते य आदेश होता है। देवा इह, देवायिह। भोस्, भगोस्, अघोस् — ये सकारान्त निपात हैं; इनके रु का य होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
आः या भोः के बाद स्वर/मृदु व्यंजन हो तो विसर्ग → य्, जो आगे विकल्प से लुप्त होता है: देवाः + इह = देवा इह।
१०८ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.22
हलि सर्वेषाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: भो-भगो-अघो-अपूर्वस्य, अशि, व्योः, लोपः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
भोभगोअघोअपूर्वस्य यस्य लोपः स्याद्धलि। भो देवाः। भगो नमस्ते। अघो याहि॥
हिन्दी अनुवाद
भो, भगो, अघो और अवर्ण जिसके पूर्व में हो ऐसे य का हल् परे रहते (सभी के मत में) लोप होता है। भो देवाः, भगो नमस्ते, अघो याहि।
सरल व्याख्या
आः + मृदु व्यंजन में विसर्ग पूरी तरह हट जाता है: देवाः + गच्छन्ति = देवा गच्छन्ति; भोः + देवाः = भो देवाः।
१०९ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.69
रोऽसुपि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अहन्, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
अह्नो रेफादेशो न तु सुपि। अहरहः। अहर्गणः॥
हिन्दी अनुवाद
'अहन्' (के न) को रेफ आदेश होता है, पर सुप् परे रहते नहीं। अहरहः, अहर्गणः।
सरल व्याख्या
अहन् (दिन) का न् कुछ स्थितियों में र् बनता है: अहन् + अहः = अहरहः (प्रतिदिन)।
११० विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.14
रो रि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोपः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
रेफस्य रेफे परे लोपः ॥
हिन्दी अनुवाद
रेफ परे रहते रेफ का लोप होता है।
सरल व्याख्या
र् के बाद र् आए तो पहला र् हट जाता है: पुनर् + रमते → पुन + रमते।
१११ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.3.111
ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उत्तरपदे
वृत्तिः
ढरेफयोर्लोपनिमित्तयोः पूर्वस्याणो दीर्घः। पुना रमते। हरी रम्यः। शम्भू राजते। अणः किम्? तृढः। वृढः। मनस् रथ इत्यत्र रुत्वे कृते हशि चेत्युत्वे रोरीति लोपे च प्राप्ते -
हिन्दी अनुवाद
ढ और रेफ के लोप के निमित्त ढ और र परे रहते, पूर्व अण् (अ, इ, उ) को दीर्घ होता है। पुना रमते, हरी रम्यः, शम्भू राजते। अण् क्यों? तृढः, वृढः। 'मनस् रथः' में रुत्व करके, 'हशि च' से उत्व और 'रो रि' से लोप — दोनों प्राप्त होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
र् के लोप से पहले वाला ह्रस्व स्वर दीर्घ हो जाता है: पुनर् + रमते = पुना रमते, हरिः + रम्यः = हरी रम्यः। इसकी क्षतिपूर्ति इसी दीर्घ से होती है।
११२ परिभाषासूत्रम् · विप्रतिषेधे सूत्रनिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.4.2
विप्रतिषेधे परं कार्यम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
तुल्यबलविरोधे परं कार्यं स्यात्। इति लोपे प्राप्ते। पूर्वत्रासिद्धमिति रोरीत्यस्यासिद्धत्वादुत्वमेव। मनोरथः॥
हिन्दी अनुवाद
समान बल वाले दो सूत्रों में विरोध हो तो बाद वाला (पर) कार्य होता है। इससे (रो रि से) लोप प्राप्त हुआ; पर 'पूर्वत्रासिद्धम्' से 'रो रि' के असिद्ध होने से उत्व ही होता है — मनोरथः।
सरल व्याख्या
दो नियम एक साथ लगें तो अष्टाध्यायी में बाद में आने वाला नियम जीतता है। पर त्रिपादी (8.2–8.4) का सूत्र असिद्ध होने से 'मनस् + रथः' में उत्व होकर 'मनोरथः' बनता है, 'मना रथः' नहीं।
११३ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.132
एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: संहितायाम्
वृत्तिः
अककारयोरेतत्तदोर्यः सुस्तस्य लोपो हलि न तु नञ्समासे। एष विष्णुः। स शम्भुः। अकोः किम्? एषको रुद्रः। अनञ्समासे किम्? असः शिवः। हलि किम्? एषोऽत्र॥
हिन्दी अनुवाद
ककार-रहित 'एतद्' और 'तद्' का जो सु (प्रथमा एकवचन), उसका हल् परे रहते लोप होता है, पर नञ्-समास में नहीं। एष विष्णुः, स शम्भुः। ककार-रहित क्यों? एषको रुद्रः। नञ्-समास क्यों? असः शिवः। हल् परे क्यों? एषोऽत्र।
सरल व्याख्या
सः और एषः के बाद व्यंजन हो तो विसर्ग हट जाता है: सः + गच्छति = स गच्छति, एषः + रामः = एष रामः। स्वर हो तो सामान्य नियम: सोऽहम्।
११४ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.134
सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सुलोपः, संहितायाम्
वृत्तिः
स इत्यस्य सोर्लोपः स्यादचि पादश्चेल्लोपे सत्येव पूर्य्येत । सेमामविड्ढि प्रभृतिम् । सैष दाशरथी रामः ॥
हिन्दी अनुवाद
'सः' के सु का अच् परे रहते भी लोप होता है, यदि लोप करने पर ही (श्लोक का) पाद पूरा होता हो। सेमामविड्ढि प्रभृतिम्; सैष दाशरथी रामः।
सरल व्याख्या
छन्द की मात्रा पूरी करने के लिये 'सः' + स्वर में भी विसर्ग हटाकर सन्धि होती है: सः + एषः = सैषः (सैष दाशरथी रामः)।

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

💬 ज्योतिषीय प्रश्न पूछें