अट् (स्वर, ह, य, व, र), कवर्ग, पवर्ग, आङ्, नुम् — इनसे अलग-अलग या मिलकर व्यवधान होने पर भी, एक पद में र और ष से परे न को ण होता है। यह प्राप्त होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
यह णत्व विधि है: एक ही शब्द में र्/ष्/ऋ के बाद न् आए तो ण् बनता है, बीच में स्वर, क-वर्ग, प-वर्ग, य, व, ह हों तो भी — जैसे रामेन → रामेण, कृष्णेन → कृष्णेण नहीं (पहले से ण)।
आदेश स्थानी (जिसके स्थान पर हुआ) के समान माना जाता है, पर स्थानी के वर्ण-आश्रित विधि में नहीं। स्थानिवत् होने से (य को सुप् मानकर) 'सुपि च' से दीर्घ — रामाय, रामाभ्याम्।
सरल व्याख्या
जो आदेश जिसके स्थान पर आया उसके गुण भी ले लेता है। 'य' ङे के स्थान पर आया, अतः वह भी 'सुप्' माना गया और राम का अ दीर्घ होकर 'रामाय' बना।
इण् (अ को छोड़ स्वर, ह, य, व, र, ल) और कवर्ग से परे, अपदान्त, आदेश-रूप या प्रत्यय के अवयव स को मूर्धन्य (ष) आदेश होता है। ईषद्विवृत स के स्थान पर वैसा ही ष। रामेषु। इसी प्रकार कृष्ण आदि अदन्त शब्द।
सरल व्याख्या
यह षत्व विधि है: इ, उ, ए आदि या क् के बाद प्रत्यय का स् → ष्: रामे + सु = रामेषु, हरि + सु = हरिषु। (पूरे राम शब्द के रूप यहाँ पूरे हुए।)
सर्व विश्व उभ उभय डतर डतम अन्य अन्यतर इतर त्वत् त्व नेम सम सिम। पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम्। स्वमज्ञातिधनाख्यायाम्। अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः। त्यद् तद् यद् एतद् इदम् अदस् एक द्वि युष्मद् अस्मद् भवतु किम्॥
हिन्दी अनुवाद
सर्व आदि (गणपठित शब्द) सर्वनाम कहलाते हैं — सर्व, विश्व, उभ, उभय, डतर, डतम, अन्य, अन्यतर, इतर, त्वत्, त्व, नेम, सम, सिम; पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर — व्यवस्था अर्थ में, संज्ञा न होने पर; स्व — ज्ञाति और धन के नाम न होने पर; अन्तर — बाह्य और उपसंव्यान (अधोवस्त्र) अर्थ में; त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवतु, किम्।
सरल व्याख्या
ये शब्द 'सर्वनाम' हैं और इनके रूप राम से कुछ भिन्न चलते हैं (सर्वे, सर्वस्मै, सर्वेषाम्)। पूर्व, पर आदि दिशा/क्रम के अर्थ में ही सर्वनाम हैं, किसी के नाम के रूप में नहीं।
अवर्णान्त सर्वनाम से परे आम् को सुट् आगम होता है। एत्व और षत्व होकर — सर्वेषाम्। सर्वस्मिन्। शेष रूप राम के समान। इसी प्रकार विश्व आदि अदन्त शब्द। 'उभ' शब्द सदा द्विवचनान्त है — उभौ, उभौ, उभाभ्याम् (तीन बार), उभयोः (दो बार); इसका सर्वादिगण में पाठ अकच् प्रत्यय के लिये है। 'उभय' का द्विवचन नहीं होता — उभयः, उभये, उभयम्, उभयान्, उभयेन, उभयैः, उभयस्मै, उभयेभ्यः, उभयस्मात्, उभयेभ्यः, उभयस्य, उभयेषाम्, उभयस्मिन्, उभयेषु। डतर और डतम प्रत्यय हैं; प्रत्यय के ग्रहण से तदन्त (उस प्रत्यय से अन्त होने वाले — कतर, कतम) का ग्रहण होता है। 'नेम' आधा अर्थ में। 'सम' सर्व का पर्याय होने पर सर्वनाम है, तुल्य का पर्याय होने पर नहीं — 'यथासंख्यमनुदेशः समानाम्' सूत्र इसका ज्ञापक है।
सरल व्याख्या
षष्ठी बहुवचन में सर्व + आम् के बीच स् जुड़कर सर्वेषाम् (तेषाम्, केषाम्) बनता है। उभ (दोनों) केवल द्विवचन में, उभय केवल एक/बहुवचन में चलता है।
एतेषां व्यवस्थायामसंज्ञायां च सर्वनामसंज्ञा गणसूत्रात्सर्वत्र या प्राप्ता सा जसि वा स्यात्। पूर्वे, पूर्वाः। असंज्ञायां किम्? उत्तराः कुरवः। स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्यवस्था। व्यवस्थायां किम्? दक्षिणा गाथकाः, कुशला इत्यर्थः॥
हिन्दी अनुवाद
पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर — इनको व्यवस्था अर्थ में, संज्ञा न होने पर, गणसूत्र से सर्वत्र जो सर्वनाम संज्ञा प्राप्त है, वह जस् में विकल्प से होती है। पूर्वे, पूर्वाः। संज्ञा न होने पर क्यों? उत्तराः कुरवः (देश का नाम)। अपने वाच्य की अपेक्षा से अवधि का नियम 'व्यवस्था' है। व्यवस्था क्यों? दक्षिणाः गाथकाः — अर्थात् कुशल गायक।
सरल व्याख्या
दिशा/क्रम अर्थ में ये शब्द प्रथमा बहुवचन में दोनों रूप लेते हैं — पूर्वे और पूर्वाः। पर 'दक्षिण' = चतुर, या 'उत्तर कुरु' (देश) जैसे अर्थ में सर्वनाम नहीं।
ज्ञाति (सम्बन्धी) और धन से भिन्न अर्थ वाले 'स्व' शब्द की प्राप्त संज्ञा जस् में विकल्प से होती है। स्वे, स्वाः — अपने, या आत्मा। ज्ञाति/धन अर्थ में तो 'स्वाः' ही — सम्बन्धी या धन।
सरल व्याख्या
'स्व' = अपना — तब स्वे/स्वाः दोनों; 'स्व' = सम्बन्धी या धन — तब केवल स्वाः।
बाह्ये परिधानीये चार्थऽन्तरशब्दस्य प्राप्ता संज्ञा जसि वा । अन्तरे, अन्तरा वा गृहाः , बाह्या इत्यर्थः । अन्तरे, अन्तरा वा शाटकाः परिधानीया इत्यर्थः ॥
हिन्दी अनुवाद
बाहरी और पहनने के (अधो)वस्त्र अर्थ में 'अन्तर' शब्द की प्राप्त संज्ञा जस् में विकल्प से। अन्तरे/अन्तराः गृहाः — बाहर के घर; अन्तरे/अन्तराः शाटकाः — पहनने की धोतियाँ।
सरल व्याख्या
अन्तर = बाहरी या अधोवस्त्र — इन अर्थों में प्रथमा बहुवचन के दो रूप।
एभ्यो ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ वा स्तः। पूर्वस्मात्, पूर्वात्। पूर्वस्मिन्, पूर्वे। एवं परादीनाम्। शेषं सर्ववत्॥
हिन्दी अनुवाद
पूर्व आदि नौ शब्दों से ङसि और ङि को विकल्प से स्मात् और स्मिन् होते हैं। पूर्वस्मात्, पूर्वात्; पूर्वस्मिन्, पूर्वे। इसी प्रकार पर आदि। शेष सर्व के समान।
सरल व्याख्या
पूर्व, पर आदि के पञ्चमी/सप्तमी एकवचन में दोनों प्रकार के रूप: पूर्वस्मात् / पूर्वात्, पूर्वस्मिन् / पूर्वे।
प्रथम, चरम, तय-प्रत्ययान्त, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम — ये जस् में विकल्प से उक्त (सर्वनाम) संज्ञा वाले होते हैं। प्रथमे, प्रथमाः। 'तय' प्रत्यय है — द्वितये, द्वितयाः; शेष राम के समान। नेमे, नेमाः; शेष सर्व के समान। (वार्तिक) 'तीय' प्रत्ययान्त को ङित् विभक्तियों में विकल्प से — द्वितीयस्मै, द्वितीयाय इत्यादि। इसी प्रकार तृतीय। (अब) निर्जरः।
सरल व्याख्या
प्रथम, अल्प, अर्ध आदि सर्वनाम नहीं हैं, पर प्रथमा बहुवचन में सर्वनाम जैसा रूप भी ले सकते हैं — प्रथमे / प्रथमाः।
अजादि विभक्ति परे रहते 'जरा' को विकल्प से 'जरस्' होता है। (परिभाषा) पद और अङ्ग के अधिकार में उस शब्द का और उससे अन्त होने वाले का भी ग्रहण होता है; (परिभाषा) आदेश निर्दिष्ट शब्द के स्थान पर ही होते हैं; (परिभाषा) एक भाग में विकार हुआ शब्द अन्य नहीं हो जाता — इनसे (निर्जर के) 'जर' को जरस्। निर्जरसौ, निर्जरसः इत्यादि। दूसरे पक्ष में तथा हलादि में राम के समान। (अब) विश्वपाः।
सरल व्याख्या
निर्जर (देवता) शब्द में स्वरादि विभक्तियों पर विकल्प से 'जर' का 'जरस्' बनता है — निर्जरसौ / निर्जरौ।
कप् प्रत्यय तक के सु आदि प्रत्ययों में जो सर्वनामस्थान नहीं हैं, उनके परे रहते पूर्व (भाग) पद संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
भ्याम्, भिस्, सु आदि व्यंजनादि प्रत्यय (सर्वनामस्थान नहीं) से पहले का अङ्ग 'पद' माना जाता है — इससे वहाँ पदान्त के नियम लगते हैं, जैसे राजन् + भ्याम् → राजभ्याम्।
अनुवृत्ति/अधिकार: स्वादिषु, असर्वनामस्थाने, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
यादिष्वजादिषु च कप्प्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्वं भसंज्ञं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
कप् तक के सर्वनामस्थान-भिन्न सु आदि में से यकारादि और अजादि प्रत्ययों के परे रहते पूर्व (भाग) 'भ' संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
स्वर या य से शुरू होने वाले (सर्वनामस्थान-भिन्न) प्रत्ययों से पहले का अङ्ग 'भ' कहलाता है — इस पर लोप आदि विशेष कार्य होते हैं, जैसे राजन् + आ → राज्ञा।
इत ऊर्ध्वं कडाराः कर्मधारय इत्यतः प्रागेकस्यैकैव संज्ञा ज्ञेया। या परानवकाशा च॥
हिन्दी अनुवाद
यहाँ से आगे 'कडाराः कर्मधारये' सूत्र तक एक (शब्द) की एक ही संज्ञा समझनी चाहिए — वही जो बाद वाली और अनवकाश (जिसका अन्यत्र अवसर न हो) हो।
सरल व्याख्या
जहाँ एक शब्द पर दो संज्ञाएँ प्राप्त हों (जैसे पद और भ), वहाँ केवल एक लगेगी — बाद वाली या जिसका और कहीं उपयोग न हो। इसलिए अजादि प्रत्यय से पहले 'भ' होगा, 'पद' नहीं।
आकारान्तो यो धातुस्तदन्तस्य भस्याङ्गस्य लोपः। «अलोऽन्त्यस्य»(1.1.52)। विश्वपः। विश्वपा। विश्वपाभ्यामित्यादि। एवं शङ्खध्मादयः। धातोः किम्? हाहान्॥ हरिः। हरी॥
हिन्दी अनुवाद
आकारान्त जो धातु, तदन्त भसंज्ञक अङ्ग का लोप होता है — 'अलोऽन्त्यस्य' से अन्तिम वर्ण का। विश्वपः, विश्वपा, विश्वपाभ्याम् इत्यादि। इसी प्रकार शङ्खध्मा आदि। धातु क्यों? हाहान् (यहाँ नहीं)। (अब) हरिः, हरी।
सरल व्याख्या
विश्वपा (पा धातु से) + शस्/टा आदि में अन्तिम आ हट जाता है: विश्वपः (द्वितीया बहुवचन), विश्वपा (तृतीया एकवचन)।
हलन्त से परे, और दीर्घ ङी-आप् से परे, सु, ति, सि — इनका अपृक्त हल् लुप्त होता है।
सरल व्याख्या
व्यंजनान्त शब्द (सखान् + स्) या दीर्घ ई/आ वाले स्त्रीलिङ्ग (रमा + स्, नदी + स्) के बाद आया एक-अक्षरीय प्रत्यय स् हट जाता है — इसीलिए 'रमा', 'नदी' बिना विसर्ग के।
लुमता शब्देन लुप्ते तन्निमित्तमङ्गकार्यं न स्यात्। कति कति । कतिभिः। कतिभ्यः कतिभ्यः । कतीनाम्। कतिषु। युष्मदस्मत् षट् संज्ञकास्त्रिषु सरूपाः॥ त्रिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः। त्रयः। त्रीन्। त्रिभिः। त्रिभ्यः त्रिभ्यः ॥
हिन्दी अनुवाद
'लु' वाले शब्दों (लुक्, श्लु, लुप्) से लुप्त होने पर उसके निमित्त से होने वाला अङ्ग-कार्य नहीं होता। कति, कति; कतिभिः; कतिभ्यः, कतिभ्यः; कतीनाम्; कतिषु। युष्मद्, अस्मद् और षट्-संज्ञक तीनों लिङ्गों में एक रूप वाले हैं। 'त्रि' शब्द सदा बहुवचनान्त — त्रयः, त्रीन्, त्रिभिः, त्रिभ्यः, त्रिभ्यः।
सरल व्याख्या
पिछले नियम का अपवाद: लुक् से हटे प्रत्यय के कारण अङ्ग पर कार्य नहीं होता। इसलिए कति + जस् (लुक्) में गुण नहीं — 'कति' ही, 'कतयः' नहीं।
त्यद् आदि (सर्वनामों) को विभक्ति परे रहते (अन्तिम वर्ण का) अ होता है। (वार्तिक) यह द्वि तक के शब्दों के लिये ही इष्ट है। द्वौ, द्वौ; द्वाभ्याम् (तीन बार); द्वयोः, द्वयोः। जो लोक की रक्षा करता है वह 'पपीः' (सूर्य)। 'दीर्घाज्जसि च' से — पप्यौ, पप्यौ, पप्यः, हे पपीः, पपीम्, पपीन्, पप्या, पपीभ्याम् (तीन बार), पपीभिः, पप्ये, पपीभ्यः (दो बार), पप्यः (दो बार), पप्योः; दीर्घ होने से नुट् नहीं — पप्याम्; ङि में सवर्ण-दीर्घ — पपी, पप्योः, पपीषु। इसी प्रकार वातप्रमी आदि। जिसकी बहुत-सी श्रेयसी (स्त्रियाँ) हों वह 'बहुश्रेयसी'।
सरल व्याख्या
तद्, यद्, एतद्, द्वि आदि के अन्तिम वर्ण का अ हो जाता है: तद् → त → सः, तौ, ते; द्वि → द्व → द्वौ। साथ ही पपी (ईकारान्त पुंलिङ्ग) के रूप दिए गए हैं।
नित्य स्त्रीलिङ्ग ईकारान्त और ऊकारान्त शब्द 'नदी' संज्ञक होते हैं। (वार्तिक) प्रथम लिङ्ग का भी ग्रहण हो — अर्थात् जो पहले स्त्रीवाची था, उसके (समास में) गौण होने पर भी नदी-संज्ञा कहनी चाहिए।
सरल व्याख्या
नदी, गौरी, वधू जैसे स्त्रीलिङ्ग ई/ऊ-अन्त शब्द 'नदी' कहलाते हैं। बहुश्रेयसी (पुंलिङ्ग बहुव्रीहि) में भी मूल 'श्रेयसी' स्त्रीवाची था, इसलिए नदी-संज्ञा।
नद्यन्त, आबन्त और 'नी' शब्द से परे ङि को आम् होता है। बहुश्रेयस्याम्; शेष पपी के समान। ङी-प्रत्ययान्त न होने से सु का लोप नहीं — अतिलक्ष्मीः; शेष बहुश्रेयसी के समान। (अब) प्रधीः।
सरल व्याख्या
सप्तमी एकवचन: नद्याम्, रमायाम्। 'लक्ष्मी' में ङी प्रत्यय नहीं (मूल ई), इसलिए 'लक्ष्मीः' विसर्ग सहित।
धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य इवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तदन्तस्यानेकाचोऽङ्गस्य यणजादौ प्रत्यये। प्रध्यौ। प्रध्यः। प्रध्यम्। प्रध्यौ। प्रध्यः। प्रध्यि। शेषं पपीवत्। एवं ग्रामणीः। ङौ तु ग्रामण्याम्॥ अनेकाचः किम्? नीः। नियौ। नियः। अमि शसि च परत्वादियङ्, नियम्। ङेराम्; नियाम्॥ असंयोगपूर्वस्य किम्? सुश्रियौ। यवक्रियौ॥
हिन्दी अनुवाद
जिस इवर्ण के पहले धातु के अवयव का संयोग न हो, ऐसे इवर्णान्त अनेकाच् धातु-अन्त अङ्ग को अजादि प्रत्यय परे रहते यण् होता है। प्रध्यौ, प्रध्यः, प्रध्यम्, प्रध्यौ, प्रध्यः, प्रध्यि; शेष पपी के समान। इसी प्रकार ग्रामणीः; ङि में तो ग्रामण्याम्। अनेकाच् क्यों? नीः — नियौ, नियः; अम् और शस् में पर होने से इयङ् — नियम्; ङि को आम् — नियाम्। असंयोग-पूर्व क्यों? सुश्रियौ, यवक्रियौ।
सरल व्याख्या
प्रधी (प्र + धी) जैसे एक से अधिक स्वर वाले शब्दों में इयङ् न होकर यण्: प्रधी + औ → प्रध्यौ। पर एकाच् 'नी' में इयङ्: नियौ।
भू और सुधी को अजादि सुप् परे रहते यण् नहीं होता। सुधियौ, सुधियः इत्यादि। जो सुख चाहता है — सुखीः; सुतीः। सुख्यौ, सुत्यौ; सुख्युः, सुत्युः; शेष प्रधी के समान। शम्भु हरि के समान; इसी प्रकार भानु आदि।
सरल व्याख्या
सुधी (विद्वान) में यण् न होकर इयङ्: सुधियौ, सुधियः। उकारान्त शम्भु, भानु के रूप हरि जैसे।
रेफ से परे संयोगान्त (पद) के स का ही लोप होता है, अन्य का नहीं। (शेष) र को विसर्ग। क्रोष्टुः, क्रोष्टुः; क्रोष्ट्रोः, क्रोष्ट्रोः। (वार्तिक) नुम्, अचि र, तृज्वद्भाव — इनसे पहले नुट् होता है (पूर्वविप्रतिषेध से) — क्रोष्टूनाम्। क्रोष्टरि। दूसरे पक्ष में और हलादि में शम्भु के समान। हूहूः — हूह्वौ, हूह्वः, हूहूम् इत्यादि। 'अतिचमू' शब्द में नदी-कार्य विशेष है — हे अतिचमु, अतिचम्वै, अतिचम्वाः, अतिचमूनाम्। (अब) खलपूः।
सरल व्याख्या
पितुर्स् में र् के बाद स् ही हटता है → पितुर् → पितुः (षष्ठी/पञ्चमी एकवचन)। इसी से पितुः, मातुः, कर्तुः।
धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य उवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तदन्तस्यानेकाचोऽङ्गस्य यण् स्यादचि सुपि। खलप्वौ। खलप्वः। एवं सुल्वादयः॥ स्वभूः। स्वभुवौ। स्वभुवः॥ वर्षाभूः॥
हिन्दी अनुवाद
जिस उवर्ण के पहले धातु-अवयव का संयोग न हो, ऐसे उवर्णान्त अनेकाच् धातु-अन्त अङ्ग को अजादि सुप् परे रहते यण् होता है। खलप्वौ, खलप्वः। इसी प्रकार सुलू आदि। स्वभूः — स्वभुवौ, स्वभुवः। (अब) वर्षाभूः।
सरल व्याख्या
खलपू (खलिहान साफ करने वाला) + औ → खलप्वौ (यण्)। पर स्वभू में उवङ्: स्वभुवौ।
'वर्षाभू' को अजादि सुप् परे रहते यण् होता है — वर्षाभ्वौ इत्यादि। दृन्भूः — (वार्तिक) दृन्, कर, पुनः पूर्व वाले 'भू' को यण् कहना चाहिए — दृन्भ्वौ; इसी प्रकार करभूः। धाता, हे धातः, धातारौ, धातारः। (वार्तिक) ऋवर्ण से परे न को णत्व कहना चाहिए — धातॄणाम्। इसी प्रकार नप्तृ आदि। नप्तृ आदि का ग्रहण व्युत्पत्ति-पक्ष में नियम के लिये है, अतः यहाँ (पितृ में उपधा-दीर्घ) नहीं — पिता, पितरौ, पितरः, पितरम्; शेष धातृ के समान। इसी प्रकार जामातृ आदि। ना, नरौ।
सरल व्याख्या
वर्षाभू (मेंढक) → वर्षाभ्वौ। ऋकारान्त 'धातृ' (उपधा दीर्घ: धातारौ) और 'पितृ' (दीर्घ नहीं: पितरौ) के रूपों का अन्तर यहाँ स्पष्ट किया गया है।