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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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५. अजन्तपुंलिङ्गाः

अजन्त पुंलिंग · सूत्र 115–214 (100)
११५ संज्ञासूत्रम् · प्रातिपदिकसंज्ञा अष्टा० 1.2.45
अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥
वृत्तिः
धातुं प्रत्ययं प्रत्ययान्तं च वर्जयित्वा अर्थवच्छब्दस्वरूपं प्रातिपदिकसंज्ञं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्त को छोड़कर अर्थयुक्त शब्द-स्वरूप 'प्रातिपदिक' कहलाता है।
सरल व्याख्या
विभक्ति लगाने से पहले का मूल संज्ञा-शब्द प्रातिपदिक है — जैसे राम, हरि, ज्ञान। इसी में सु, औ, जस् आदि लगकर पद बनते हैं।
११६ संज्ञासूत्रम् · प्रातिपदिकसंज्ञा अष्टा० 1.2.46
कृत्तद्धितसमासाश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रातिपदिकम्
वृत्तिः
कृत्तद्धितान्तौ समासाश्च तथा स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
कृत्-प्रत्ययान्त, तद्धित-प्रत्ययान्त और समास भी प्रातिपदिक होते हैं।
सरल व्याख्या
प्रत्ययान्त होने पर भी कृदन्त (कारक, पाचक), तद्धितान्त (दाशरथि) और समास (राजपुरुष) प्रातिपदिक माने जाते हैं, ताकि उनमें विभक्ति लग सके।
११७ विधिसूत्रम् अष्टा० 4.1.2
स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाङ्ङ्योस्सुप् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्
वृत्तिः
सु औ जस् इति प्रथमा । अम् औट् शस् इति द्वितीया । टा भ्याम् भिस् इति तृतीया । ङे भ्याम् भ्यस् इति चतुर्थी । ङसि भ्याम् भ्यस् इति पञ्चमी । ङस् ओस् आम् इति षष्ठी । ङि ओस् सुप् इति सप्तमी ॥
हिन्दी अनुवाद
सु, औ, जस् — प्रथमा; अम्, औट्, शस् — द्वितीया; टा, भ्याम्, भिस् — तृतीया; ङे, भ्याम्, भ्यस् — चतुर्थी; ङसि, भ्याम्, भ्यस् — पञ्चमी; ङस्, ओस्, आम् — षष्ठी; ङि, ओस्, सुप् — सप्तमी।
सरल व्याख्या
ये 21 'सुप्' प्रत्यय हैं — सात विभक्ति × तीन वचन। इन्हीं से सारे शब्दरूप बनते हैं। इत् हटाने पर: स्, औ, अस्; अम्, औ, अस्; आ, भ्याम्, भिस्; ए, भ्याम्, भ्यस्; अस्, भ्याम्, भ्यस्; अस्, ओस्, आम्; इ, ओस्, सु।
११८ अधिकारसूत्रम् · प्रातिपदिकाधिकारः अष्टा० 4.1.1
ङ्याप्प्रातिपदिकात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्
हिन्दी अनुवाद
(अधिकार सूत्र — वृत्ति नहीं) ङी-प्रत्ययान्त, आप्-प्रत्ययान्त और प्रातिपदिक से (आगे के प्रत्यय होते हैं)।
सरल व्याख्या
यह अधिकार सूत्र है: आगे (पाँचवें अध्याय के अन्त तक) कहे गए प्रत्यय प्रातिपदिक या स्त्रीप्रत्ययान्त (नदी, रमा) शब्दों से होते हैं।
११९ संज्ञासूत्रम् · प्रत्ययसंज्ञा अष्टा० 3.1.1
प्रत्ययः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः
हिन्दी अनुवाद
(अधिकार सूत्र — वृत्ति नहीं) (आगे जो कहे जाएँगे वे) प्रत्यय (कहलाते हैं)।
सरल व्याख्या
यह अधिकार है — तीसरे से पाँचवें अध्याय तक विहित सभी शब्दांश 'प्रत्यय' कहलाते हैं।
१२० अधिकारसूत्रम् · प्रत्ययस्य परत्वाधिकारः अष्टा० 3.1.2
परश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च
वृत्तिः
इत्यधिकृत्य । ङ्यन्तादाबन्तात्प्रातिपदिकाच्च परे स्वादयः प्रत्ययाः स्युः ॥
हिन्दी अनुवाद
(प्रत्यय) बाद में होता है — यह अधिकार करके (कहा गया)। ङ्यन्त, आबन्त और प्रातिपदिक से परे सु आदि प्रत्यय होते हैं।
सरल व्याख्या
प्रत्यय सदा मूल शब्द के बाद जुड़ता है। इन तीनों सूत्रों को मिलाकर अर्थ हुआ — प्रातिपदिक के बाद सु, औ, जस् आदि लगते हैं।
१२१ संज्ञासूत्रम् · एकवचनसंज्ञा अष्टा० 1.4.103
सुपः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: त्रीणि, त्रीणि, तानि, एकवचनद्विवचनबहुवचनान्येकशः, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
सुपस्त्रीणि त्रीणि वचनान्येकश एकवचनद्विवचनबहुवचनसंज्ञानि स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
सुप् के तीन-तीन वचन क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचन कहलाते हैं।
सरल व्याख्या
हर विभक्ति के तीन प्रत्ययों में पहला एकवचन, दूसरा द्विवचन, तीसरा बहुवचन है।
१२२ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.4.22
द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
द्वित्वैकत्वयोरेते स्तः॥
हिन्दी अनुवाद
द्वित्व और एकत्व (की विवक्षा) में ये (द्विवचन और एकवचन) होते हैं।
सरल व्याख्या
एक वस्तु कहनी हो तो एकवचन, दो कहनी हों तो द्विवचन।
१२३ संज्ञासूत्रम् · अवसानसंज्ञा अष्टा० 1.4.110
विरामोऽवसानम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
वर्णानामभावोऽवसानसंज्ञः स्यात्। रुत्वविसर्गौ। रामः॥
हिन्दी अनुवाद
वर्णों का अभाव (विराम) 'अवसान' कहलाता है। (राम + स् में) रुत्व और विसर्ग होकर — रामः।
सरल व्याख्या
बोलने में जहाँ रुकते हैं (आगे कोई वर्ण नहीं), वह अवसान है। अवसान में र् → विसर्ग: राम + सु → रामस् → रामर् → रामः।
१२४ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.2.64
सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ ॥
वृत्तिः
एकविभक्तौ यानि सरूपाण्येव दृष्टानि तेषामेक एव शिष्यते॥
हिन्दी अनुवाद
एक विभक्ति में जो समान रूप वाले (शब्द) दिखें, उनमें से एक ही शेष रहता है।
सरल व्याख्या
'राम और राम' कहने के लिये 'रामः रामः' नहीं, एक 'राम' बचकर द्विवचन लगता है — रामौ। इसी से द्विवचन-बहुवचन का एक ही शब्द बनता है।
१२५ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.102
प्रथमयोः पूर्वसवर्णः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, दीर्घः, अकः, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
अकः प्रथमाद्वितीययोरचि पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः स्यात्। इति प्राप्ते॥
हिन्दी अनुवाद
प्रथमा और द्वितीया के अच् परे रहते अक् को पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश होता है। यह प्राप्त होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
राम + औ में अ + औ के स्थान पर पहले वाले स्वर का दीर्घ (आ) प्राप्त होता है — पर अगला सूत्र इसे रोकता है।
१२६ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.104
नादिचि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, दीर्घः, अकः, पूर्वसवर्णः, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
आदिचि न पूर्वसवर्णदीर्घः। वृद्धिरेचि। रामौ॥
हिन्दी अनुवाद
इच् (इ से औ तक) परे रहते पूर्वसवर्ण दीर्घ नहीं होता। तब 'वृद्धिरेचि' से — रामौ।
सरल व्याख्या
राम + औ में दीर्घ न होकर वृद्धि सन्धि से 'रामौ' बनता है।
१२७ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.4.21
बहुषु बहुवचनम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
बहुत्वविवक्षायां बहुवचनं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
बहुत्व की विवक्षा में बहुवचन होता है।
सरल व्याख्या
तीन या अधिक वस्तुएँ कहनी हों तो बहुवचन।
१२८ संज्ञासूत्रम् · इत्संज्ञा अष्टा० 1.3.7
चुटू ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उपदेशे, इत्, आदिः, प्रत्ययस्य
वृत्तिः
प्रत्ययाद्यौ चुटू इतौ स्तः॥
हिन्दी अनुवाद
प्रत्यय के आदि में स्थित चवर्ग और टवर्ग इत्-संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
प्रत्यय के आरम्भ में आए च्, ज्, ट्, ड् आदि केवल संकेत हैं — जैसे 'जस्' का ज्, 'टा' का ट् हट जाता है।
१२९ संज्ञासूत्रम् · विभक्तिसंज्ञा अष्टा० 1.4.104
विभक्तिश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: तिङः, त्रीणि, त्रीणि, सुपः, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
सुप्तिङौ विभक्तिसंज्ञौ स्तः॥
हिन्दी अनुवाद
सुप् और तिङ् विभक्ति संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
शब्दों के सुप् और धातुओं के तिङ् — दोनों प्रकार के प्रत्यय 'विभक्ति' कहलाते हैं।
१३० संज्ञासूत्रम् · इत्संज्ञा अष्टा० 1.3.4
न विभक्तौ तुस्माः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उपदेशे, इत्, हल्, अन्त्यम्
वृत्तिः
विभक्तिस्थास्तवर्गसमा नेतः। इति सस्य नेत्त्वम्। रामाः॥
हिन्दी अनुवाद
विभक्ति में स्थित तवर्ग, स और म इत्-संज्ञक नहीं होते। इससे (जस् के) स की इत्-संज्ञा नहीं होती — रामाः।
सरल व्याख्या
सामान्यतः अन्तिम व्यंजन इत् होता है, पर विभक्ति के अन्त के स्, म्, त् आदि बने रहते हैं: राम + जस् (अस्) → रामास् → रामाः।
१३१ संज्ञासूत्रम् · सम्बुद्धिसंज्ञा अष्टा० 2.3.49
एकवचनं संबुद्धिः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रथमा, सम्बोधने, अनभिहिते
वृत्तिः
सम्बोधने प्रथमाया एकवचनं सम्बुद्धिसंज्ञं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
सम्बोधन में प्रथमा का एकवचन 'सम्बुद्धि' कहलाता है।
सरल व्याख्या
किसी को पुकारने (हे राम) में प्रयुक्त प्रथमा एकवचन 'सु' का नाम सम्बुद्धि है।
१३२ संज्ञासूत्रम् · अङ्गसंज्ञा अष्टा० 1.4.13
यस्मात् प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
यः प्रत्ययो यस्मात् क्रियते तदादिशब्दस्वरूपं तस्मिन्नङ्गं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
जो प्रत्यय जिससे विहित हो, उस प्रत्यय के परे रहते उससे आरम्भ होने वाला शब्द-स्वरूप 'अङ्ग' कहलाता है।
सरल व्याख्या
प्रत्यय जुड़ने से पहले वाला भाग 'अङ्ग' है — राम + सु में 'राम' अङ्ग है। अङ्ग पर ही बहुत से कार्य (दीर्घ, गुण आदि) होते हैं।
१३३ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.69
एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोपः, हल्-ङि-आब्भ्यः
वृत्तिः
एङन्ताद्ध्रस्वान्ताच्चाङ्गाद्धल्लुप्यते सम्बुद्धेश्चेत्। हे राम। हे रामौ। हे रामाः॥
हिन्दी अनुवाद
एङन्त और ह्रस्वान्त अङ्ग से परे हल् का लोप होता है, यदि वह सम्बुद्धि का हो। हे राम, हे रामौ, हे रामाः।
सरल व्याख्या
सम्बोधन एकवचन में राम + स् का स् हट जाता है — 'हे राम' (हे रामः नहीं)।
१३४ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.107
अमि पूर्वः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, अकः, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
अकोऽम्यचि पूर्वरूपमेकादेशः। रामम्। रामौ॥
हिन्दी अनुवाद
अम् का अच् परे रहते अक् को पूर्वरूप एकादेश होता है। रामम्, रामौ।
सरल व्याख्या
राम + अम् में अ + अ का दीर्घ न होकर पहला अ ही बचता है — रामम्।
१३५ संज्ञासूत्रम् · इत्संज्ञा अष्टा० 1.3.8
लशक्वतद्धिते ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उपदेशे, इत्, आदिः, प्रत्ययस्य
वृत्तिः
तद्धितवर्जप्रत्ययाद्या लशकवर्गा इतः स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
तद्धित को छोड़ अन्य प्रत्ययों के आदि में स्थित ल, श और कवर्ग इत्-संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
शस् का श्, क्त का क्, ल्युट् का ल् आदि इत् हैं और हट जाते हैं।
१३६ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.103
तस्माच्छसो नः पुंसि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, दीर्घः, अकः, पूर्वसवर्णः, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
पूर्वसवर्णदीर्घात्परो यः शसः सस्तस्य नः स्यात्पुंसि॥
हिन्दी अनुवाद
पूर्वसवर्ण दीर्घ के बाद आए शस् के स को पुंलिङ्ग में न होता है।
सरल व्याख्या
राम + शस् (अस्) → रामास् → पुंलिङ्ग में स् → न्: रामान्।
१३७ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.2
अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रषाभ्याम्, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
अट् कवर्गः पवर्गः आङ् नुम् एतैर्व्यस्तैर्यथासंभवं मिलितैश्च व्यवधानेऽपि रषाभ्यां परस्य नस्य णः समानपदे । इति प्राप्ते ॥
हिन्दी अनुवाद
अट् (स्वर, ह, य, व, र), कवर्ग, पवर्ग, आङ्, नुम् — इनसे अलग-अलग या मिलकर व्यवधान होने पर भी, एक पद में र और ष से परे न को ण होता है। यह प्राप्त होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
यह णत्व विधि है: एक ही शब्द में र्/ष्/ऋ के बाद न् आए तो ण् बनता है, बीच में स्वर, क-वर्ग, प-वर्ग, य, व, ह हों तो भी — जैसे रामेन → रामेण, कृष्णेन → कृष्णेण नहीं (पहले से ण)।
१३८ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.37
पदान्तस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रषाभ्याम्, न, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
नस्य णो न। रामान्॥
हिन्दी अनुवाद
पदान्त न को ण नहीं होता। रामान्।
सरल व्याख्या
पद के अन्त का न् ण् नहीं बनता, इसलिए 'रामान्' ही रहता है, 'रामाण्' नहीं।
१३९ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.12
टाङसिङसामिनात्स्याः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अतः, अङ्गस्य
वृत्तिः
अदन्ताट्टादीनामिनादयः स्युः। णत्वम्। रामेण॥
हिन्दी अनुवाद
अदन्त (अकारान्त अङ्ग) से परे टा, ङसि और ङस् के स्थान पर क्रमशः इन, आत् और स्य होते हैं। णत्व होकर — रामेण।
सरल व्याख्या
अकारान्त शब्दों में तृतीया एकवचन 'इन', पञ्चमी 'आत्', षष्ठी 'स्य': राम + इन → रामेन → रामेण; रामात्; रामस्य।
१४० विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.102
सुपि च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: यञि, अतः, दीर्घः, अङ्गस्य
वृत्तिः
यञादौ सुपि अतोऽङ्गस्य दीर्घः। रामाभ्याम्॥
हिन्दी अनुवाद
यञादि सुप् परे रहते अकारान्त अङ्ग को दीर्घ होता है। रामाभ्याम्।
सरल व्याख्या
भ्याम्, भ्यस् जैसे य/व/र/ल/म/भ आदि से शुरू होने वाले सुप् से पहले अ दीर्घ हो जाता है: राम + भ्याम् = रामाभ्याम्।
१४१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.9
अतो भिस ऐस् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
अनेकाल्शित्सर्वस्य । रामैः ॥
हिन्दी अनुवाद
अकारान्त से परे भिस् को ऐस् होता है; 'अनेकाल्शित्सर्वस्य' से पूरे के स्थान पर। रामैः।
सरल व्याख्या
राम + भिस् → राम + ऐस् → रामैस् → रामैः (वृद्धि सन्धि)।
१४२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.13
ङेर्यः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अतः, अङ्गस्य
वृत्तिः
अतोऽङ्गात्परस्य ङेर्यादेशः ॥
हिन्दी अनुवाद
अकारान्त अङ्ग से परे ङे (चतुर्थी एकवचन) को य आदेश होता है।
सरल व्याख्या
राम + ङे (ए) → राम + य।
१४३ अतिदेशसूत्रम् · स्थानिवद्भावातिदेशः अष्टा० 1.1.56
स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ॥
वृत्तिः
आदेशः स्थानिवत्स्यान्न तु स्थान्यलाश्रयविधौ। इति स्थानिवत्त्वात् सुपि चेति दीर्घः। रामाय। रामाभ्याम्॥
हिन्दी अनुवाद
आदेश स्थानी (जिसके स्थान पर हुआ) के समान माना जाता है, पर स्थानी के वर्ण-आश्रित विधि में नहीं। स्थानिवत् होने से (य को सुप् मानकर) 'सुपि च' से दीर्घ — रामाय, रामाभ्याम्।
सरल व्याख्या
जो आदेश जिसके स्थान पर आया उसके गुण भी ले लेता है। 'य' ङे के स्थान पर आया, अतः वह भी 'सुप्' माना गया और राम का अ दीर्घ होकर 'रामाय' बना।
१४४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.103
बहुवचने झल्येत् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अतः, दीर्घः, सुपि, अङ्गस्य
वृत्तिः
झलादौ बहुवचने सुप्यतोऽङ्गस्यैकारः। रामेभ्यः। सुपि किम्? पचध्वम्॥
हिन्दी अनुवाद
झलादि बहुवचन सुप् परे रहते अकारान्त अङ्ग को एकार होता है। रामेभ्यः। सुप् क्यों? पचध्वम् (यहाँ नहीं)।
सरल व्याख्या
भ्यस्, सु जैसे बहुवचन प्रत्ययों से पहले अ → ए: राम + भ्यस् = रामेभ्यः, राम + सु = रामेषु।
१४५ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.56
वाऽवसाने ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: झलाम्, चर्, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
अवसाने झलां चरो वा। रामात्, रामाद्। रामाभ्याम्। रामेभ्यः। रामस्य॥
हिन्दी अनुवाद
अवसान में झल् को विकल्प से चर् होता है। रामात्, रामाद्; रामाभ्याम्, रामेभ्यः, रामस्य।
सरल व्याख्या
पद के अन्त में (रुकने पर) द् का त् बनना वैकल्पिक है — रामात् / रामाद्।
१४६ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.104
ओसि च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अतः, दीर्घः, झलि, एत्, अङ्गस्य
वृत्तिः
अतोऽङ्गस्यैकारः। रामयोः॥
हिन्दी अनुवाद
ओस् परे रहते भी अकारान्त अङ्ग को एकार होता है। रामयोः।
सरल व्याख्या
राम + ओस् → रामे + ओस् → रामयोस् (अयादि) → रामयोः।
१४७ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.54
ह्रस्वनद्यापो नुट् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आमि, अङ्गस्य
वृत्तिः
ह्रस्वान्तान्नद्यन्तादाबन्ताच्चाङ्गात्परस्यामो नुडागमः॥
हिन्दी अनुवाद
ह्रस्वान्त, नदी-संज्ञकान्त और आबन्त अङ्ग से परे आम् को नुट् (न्) आगम होता है।
सरल व्याख्या
षष्ठी बहुवचन 'आम्' से पहले न् जुड़ता है: राम + आम् → राम + नाम्।
१४८ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.3
नामि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: दीर्घः, अङ्गस्य
वृत्तिः
अजन्ताङ्गस्य दीर्घः। रामाणाम्। रामे। रामयोः। सुपि - एत्त्वे कृते॥
हिन्दी अनुवाद
नाम् परे रहते अजन्त अङ्ग को दीर्घ होता है। रामाणाम्। रामे, रामयोः। सुप् परे एत्व करने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
राम + नाम् → रामानाम् → णत्व: रामाणाम्। सप्तमी: रामे, रामयोः।
१४९ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.59
आदेशप्रत्यययोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सः, नुम्विसर्जनीयशर्व्यवाये, अपि, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्, अपदान्तस्य मूर्धन्यः, इण्कोः
वृत्तिः
इण्कुभ्यां परस्यापदान्तस्यादेशस्य प्रत्ययावयवस्य यः सस्तस्य मूर्धन्यादेशः। ईषद्विवृतस्य सस्य तादृश एव षः। रामेषु। एवं कृष्णादयोऽप्यदन्ताः॥
हिन्दी अनुवाद
इण् (अ को छोड़ स्वर, ह, य, व, र, ल) और कवर्ग से परे, अपदान्त, आदेश-रूप या प्रत्यय के अवयव स को मूर्धन्य (ष) आदेश होता है। ईषद्विवृत स के स्थान पर वैसा ही ष। रामेषु। इसी प्रकार कृष्ण आदि अदन्त शब्द।
सरल व्याख्या
यह षत्व विधि है: इ, उ, ए आदि या क् के बाद प्रत्यय का स् → ष्: रामे + सु = रामेषु, हरि + सु = हरिषु। (पूरे राम शब्द के रूप यहाँ पूरे हुए।)
१५० संज्ञासूत्रम् · सर्वनामसंज्ञा अष्टा० 1.1.27
सर्वादीनि सर्वनामानि ॥
वृत्तिः
सर्व विश्व उभ उभय डतर डतम अन्य अन्यतर इतर त्वत् त्व नेम सम सिम। पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम्। स्वमज्ञातिधनाख्यायाम्। अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः। त्यद् तद् यद् एतद् इदम् अदस् एक द्वि युष्मद् अस्मद् भवतु किम्॥
हिन्दी अनुवाद
सर्व आदि (गणपठित शब्द) सर्वनाम कहलाते हैं — सर्व, विश्व, उभ, उभय, डतर, डतम, अन्य, अन्यतर, इतर, त्वत्, त्व, नेम, सम, सिम; पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर — व्यवस्था अर्थ में, संज्ञा न होने पर; स्व — ज्ञाति और धन के नाम न होने पर; अन्तर — बाह्य और उपसंव्यान (अधोवस्त्र) अर्थ में; त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवतु, किम्।
सरल व्याख्या
ये शब्द 'सर्वनाम' हैं और इनके रूप राम से कुछ भिन्न चलते हैं (सर्वे, सर्वस्मै, सर्वेषाम्)। पूर्व, पर आदि दिशा/क्रम के अर्थ में ही सर्वनाम हैं, किसी के नाम के रूप में नहीं।
१५१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.17
जसः शी ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अतः, सर्वनाम्नः, अङ्गस्य
वृत्तिः
अदन्तात्सर्वनाम्नो जसः शी स्यात्। अनेकाल्त्वात्सर्वादेशः। सर्वे॥
हिन्दी अनुवाद
अकारान्त सर्वनाम से परे जस् को शी (ई) होता है। अनेक-वर्ण होने से (शी पूरे जस् के स्थान पर)। सर्वे।
सरल व्याख्या
सर्व + जस् → सर्व + ई → सर्वे (गुण सन्धि)। इसलिए 'सर्वाः' नहीं, 'सर्वे' बनता है — जैसे ते, ये, के।
१५२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.14
सर्वनाम्नः स्मै ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अतः, ङेः, अङ्गस्य
वृत्तिः
अतः सर्वनाम्नो ङेः स्मै । सर्वस्मै ॥
हिन्दी अनुवाद
अकारान्त सर्वनाम से परे ङे को स्मै होता है। सर्वस्मै।
सरल व्याख्या
चतुर्थी एकवचन में सर्वनाम का रूप 'स्मै' से बनता है: सर्वस्मै, तस्मै, कस्मै।
१५३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.15
ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अतः, सर्वनाम्नः, अङ्गस्य
वृत्तिः
अतः सर्वनाम्न एतयोरेतौ स्तः। सर्वस्मात्॥
हिन्दी अनुवाद
अकारान्त सर्वनाम से परे ङसि और ङि को क्रमशः स्मात् और स्मिन् होते हैं। सर्वस्मात्।
सरल व्याख्या
पञ्चमी एकवचन 'स्मात्' (सर्वस्मात्, तस्मात्) और सप्तमी एकवचन 'स्मिन्' (सर्वस्मिन्, तस्मिन्)।
१५४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.52
आमि सर्वनाम्नः सुट् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्, अङ्गस्य
वृत्तिः
अवर्णान्तात्परस्य सर्वनाम्नो विहितस्यामः सुडागमः। एत्वषत्वे। सर्वेषाम्। सर्वस्मिन्। शेषं रामवत्। एवं विश्वादयोऽप्यदन्ताः॥ उभशब्दो नित्यं द्विवचनान्तः। उभौ उभौ। उभाभ्याम् उभाभ्याम् उभाभ्याम्। उभयोः उभयोः। तस्येह पाठोऽकजर्थः। उभयशब्दस्य द्विवचनं नास्ति। उभयः। उभये। उभयम्। उभयान्। उभयेन। उभयैः। उभयस्मै। उभयेभ्यः। उभयस्मात्। उभयेभ्यः। उभयस्य। उभयेषाम्। उभयस्मिन्। उभयेषु॥ डतरडतमौ प्रत्ययौ, प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणमिति तदन्ता ग्राह्याः॥ नेम इत्यर्धे॥ समः सर्वपर्यायस्तुल्यपर्यायस्तु न, यथासंख्यमनुदेशः समानामिति ज्ञापकात्॥
हिन्दी अनुवाद
अवर्णान्त सर्वनाम से परे आम् को सुट् आगम होता है। एत्व और षत्व होकर — सर्वेषाम्। सर्वस्मिन्। शेष रूप राम के समान। इसी प्रकार विश्व आदि अदन्त शब्द। 'उभ' शब्द सदा द्विवचनान्त है — उभौ, उभौ, उभाभ्याम् (तीन बार), उभयोः (दो बार); इसका सर्वादिगण में पाठ अकच् प्रत्यय के लिये है। 'उभय' का द्विवचन नहीं होता — उभयः, उभये, उभयम्, उभयान्, उभयेन, उभयैः, उभयस्मै, उभयेभ्यः, उभयस्मात्, उभयेभ्यः, उभयस्य, उभयेषाम्, उभयस्मिन्, उभयेषु। डतर और डतम प्रत्यय हैं; प्रत्यय के ग्रहण से तदन्त (उस प्रत्यय से अन्त होने वाले — कतर, कतम) का ग्रहण होता है। 'नेम' आधा अर्थ में। 'सम' सर्व का पर्याय होने पर सर्वनाम है, तुल्य का पर्याय होने पर नहीं — 'यथासंख्यमनुदेशः समानाम्' सूत्र इसका ज्ञापक है।
सरल व्याख्या
षष्ठी बहुवचन में सर्व + आम् के बीच स् जुड़कर सर्वेषाम् (तेषाम्, केषाम्) बनता है। उभ (दोनों) केवल द्विवचन में, उभय केवल एक/बहुवचन में चलता है।
१५५ संज्ञासूत्रम् · सर्वनामसंज्ञा अष्टा० 1.1.34
पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामानि, विभाषा, जसि
वृत्तिः
एतेषां व्यवस्थायामसंज्ञायां च सर्वनामसंज्ञा गणसूत्रात्सर्वत्र या प्राप्ता सा जसि वा स्यात्। पूर्वे, पूर्वाः। असंज्ञायां किम्? उत्तराः कुरवः। स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्यवस्था। व्यवस्थायां किम्? दक्षिणा गाथकाः, कुशला इत्यर्थः॥
हिन्दी अनुवाद
पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर — इनको व्यवस्था अर्थ में, संज्ञा न होने पर, गणसूत्र से सर्वत्र जो सर्वनाम संज्ञा प्राप्त है, वह जस् में विकल्प से होती है। पूर्वे, पूर्वाः। संज्ञा न होने पर क्यों? उत्तराः कुरवः (देश का नाम)। अपने वाच्य की अपेक्षा से अवधि का नियम 'व्यवस्था' है। व्यवस्था क्यों? दक्षिणाः गाथकाः — अर्थात् कुशल गायक।
सरल व्याख्या
दिशा/क्रम अर्थ में ये शब्द प्रथमा बहुवचन में दोनों रूप लेते हैं — पूर्वे और पूर्वाः। पर 'दक्षिण' = चतुर, या 'उत्तर कुरु' (देश) जैसे अर्थ में सर्वनाम नहीं।
१५६ संज्ञासूत्रम् · सर्वनामसंज्ञा अष्टा० 1.1.35
स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामानि, विभाषा, जसि
वृत्तिः
ज्ञातिधनान्यवाचिनः स्वशब्दस्य प्राप्ता संज्ञा जसि वा। स्वे, स्वाः; आत्मीयाः, आत्मान इति वा। ज्ञातिधनवाचिनस्तु, स्वाः; ज्ञातयोऽर्था वा॥
हिन्दी अनुवाद
ज्ञाति (सम्बन्धी) और धन से भिन्न अर्थ वाले 'स्व' शब्द की प्राप्त संज्ञा जस् में विकल्प से होती है। स्वे, स्वाः — अपने, या आत्मा। ज्ञाति/धन अर्थ में तो 'स्वाः' ही — सम्बन्धी या धन।
सरल व्याख्या
'स्व' = अपना — तब स्वे/स्वाः दोनों; 'स्व' = सम्बन्धी या धन — तब केवल स्वाः।
१५७ संज्ञासूत्रम् · सर्वनामसंज्ञा अष्टा० 1.1.36
अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामानि, विभाषा, जसि
वृत्तिः
बाह्ये परिधानीये चार्थऽन्तरशब्दस्य प्राप्ता संज्ञा जसि वा । अन्तरे, अन्तरा वा गृहाः , बाह्या इत्यर्थः । अन्तरे, अन्तरा वा शाटकाः परिधानीया इत्यर्थः ॥
हिन्दी अनुवाद
बाहरी और पहनने के (अधो)वस्त्र अर्थ में 'अन्तर' शब्द की प्राप्त संज्ञा जस् में विकल्प से। अन्तरे/अन्तराः गृहाः — बाहर के घर; अन्तरे/अन्तराः शाटकाः — पहनने की धोतियाँ।
सरल व्याख्या
अन्तर = बाहरी या अधोवस्त्र — इन अर्थों में प्रथमा बहुवचन के दो रूप।
१५८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.16
पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अतः, सर्वनाम्नः, ङसि-ङ्योः, स्मात्-स्मिनौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
एभ्यो ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ वा स्तः। पूर्वस्मात्, पूर्वात्। पूर्वस्मिन्, पूर्वे। एवं परादीनाम्। शेषं सर्ववत्॥
हिन्दी अनुवाद
पूर्व आदि नौ शब्दों से ङसि और ङि को विकल्प से स्मात् और स्मिन् होते हैं। पूर्वस्मात्, पूर्वात्; पूर्वस्मिन्, पूर्वे। इसी प्रकार पर आदि। शेष सर्व के समान।
सरल व्याख्या
पूर्व, पर आदि के पञ्चमी/सप्तमी एकवचन में दोनों प्रकार के रूप: पूर्वस्मात् / पूर्वात्, पूर्वस्मिन् / पूर्वे।
१५९ संज्ञासूत्रम् · सर्वनामसंज्ञा अष्टा० 1.1.33
प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामानि, विभाषा, जसि
वृत्तिः
एते जसि उक्तसंज्ञा वा स्युः। प्रथमे, प्रथमाः॥ तयः प्रत्ययः। द्वितये, द्वितयाः। शेषं रामवत्॥ नेमे, नेमाः। शेषं सर्ववत्॥ «तीयस्य ङित्सु वा» (वार्त्तिकम्)। द्वितीयस्मै, द्वितीयायेत्यादि। एवं तृतीयः॥ निर्जरः॥
हिन्दी अनुवाद
प्रथम, चरम, तय-प्रत्ययान्त, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम — ये जस् में विकल्प से उक्त (सर्वनाम) संज्ञा वाले होते हैं। प्रथमे, प्रथमाः। 'तय' प्रत्यय है — द्वितये, द्वितयाः; शेष राम के समान। नेमे, नेमाः; शेष सर्व के समान। (वार्तिक) 'तीय' प्रत्ययान्त को ङित् विभक्तियों में विकल्प से — द्वितीयस्मै, द्वितीयाय इत्यादि। इसी प्रकार तृतीय। (अब) निर्जरः।
सरल व्याख्या
प्रथम, अल्प, अर्ध आदि सर्वनाम नहीं हैं, पर प्रथमा बहुवचन में सर्वनाम जैसा रूप भी ले सकते हैं — प्रथमे / प्रथमाः।
१६० विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.101
जराया जरसन्यतरस्याम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: विभक्तौ, अचि, अङ्गस्य
वृत्तिः
अजादौ विभक्तौ । «पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च»(परिभाषा) । «निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति»(परिभाषा) । «एकदेशविकृतमनन्यवत्» (परिभाषा), इति जरशब्दस्य जरस्। निर्जरसौ। निर्जरस इत्यादि। पक्षे हलादौ च रामवत्॥ विश्वपाः॥
हिन्दी अनुवाद
अजादि विभक्ति परे रहते 'जरा' को विकल्प से 'जरस्' होता है। (परिभाषा) पद और अङ्ग के अधिकार में उस शब्द का और उससे अन्त होने वाले का भी ग्रहण होता है; (परिभाषा) आदेश निर्दिष्ट शब्द के स्थान पर ही होते हैं; (परिभाषा) एक भाग में विकार हुआ शब्द अन्य नहीं हो जाता — इनसे (निर्जर के) 'जर' को जरस्। निर्जरसौ, निर्जरसः इत्यादि। दूसरे पक्ष में तथा हलादि में राम के समान। (अब) विश्वपाः।
सरल व्याख्या
निर्जर (देवता) शब्द में स्वरादि विभक्तियों पर विकल्प से 'जर' का 'जरस्' बनता है — निर्जरसौ / निर्जरौ।
१६१ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.105
दीर्घाज्जसि च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, अकः, दीर्घः, पूर्वसवर्णः, न, इचि, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
दीर्घाज्जसि इचि च परे पूर्वसवर्णदीर्घो न स्यात् । विश्वपौ । विश्वपाः । हे विश्वपाः । विश्वपाम् । विश्वपौ ॥
हिन्दी अनुवाद
दीर्घ से जस् और इच् परे रहते पूर्वसवर्ण दीर्घ नहीं होता। विश्वपौ, विश्वपाः, हे विश्वपाः, विश्वपाम्, विश्वपौ।
सरल व्याख्या
आकारान्त पुंलिङ्ग विश्वपा (विश्व का रक्षक) के रूप: विश्वपाः, विश्वपौ, विश्वपाः।
१६२ संज्ञासूत्रम् · सर्वनामस्थानसंज्ञा अष्टा० 1.1.43
सुडनपुंसकस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामस्थानम्
वृत्तिः
स्वादिपञ्चवचनानि सर्वनामस्थानसंज्ञानि स्युरक्लीबस्य॥
हिन्दी अनुवाद
नपुंसक को छोड़कर, सु आदि पाँच वचन (सु, औ, जस्, अम्, औट्) 'सर्वनामस्थान' संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
प्रथमा के तीनों और द्वितीया के पहले दो वचन 'सर्वनामस्थान' कहलाते हैं — इनमें कई शब्दों का अङ्ग 'सबल' (दीर्घ आदि) होता है, जैसे राजा, राजानौ।
१६३ संज्ञासूत्रम् · पदसंज्ञा अष्टा० 1.4.17
स्वादिष्वसर्वनामस्थाने ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदम्, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
कप्प्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्वं पदं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
कप् प्रत्यय तक के सु आदि प्रत्ययों में जो सर्वनामस्थान नहीं हैं, उनके परे रहते पूर्व (भाग) पद संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
भ्याम्, भिस्, सु आदि व्यंजनादि प्रत्यय (सर्वनामस्थान नहीं) से पहले का अङ्ग 'पद' माना जाता है — इससे वहाँ पदान्त के नियम लगते हैं, जैसे राजन् + भ्याम् → राजभ्याम्।
१६४ संज्ञासूत्रम् · भसंज्ञा अष्टा० 1.4.18
यचि भम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: स्वादिषु, असर्वनामस्थाने, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
यादिष्वजादिषु च कप्प्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्वं भसंज्ञं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
कप् तक के सर्वनामस्थान-भिन्न सु आदि में से यकारादि और अजादि प्रत्ययों के परे रहते पूर्व (भाग) 'भ' संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
स्वर या य से शुरू होने वाले (सर्वनामस्थान-भिन्न) प्रत्ययों से पहले का अङ्ग 'भ' कहलाता है — इस पर लोप आदि विशेष कार्य होते हैं, जैसे राजन् + आ → राज्ञा।
१६५ अधिकारसूत्रम् · एकसंज्ञाधिकारः अष्टा० 1.4.1
आ कडारादेका संज्ञा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
इत ऊर्ध्वं कडाराः कर्मधारय इत्यतः प्रागेकस्यैकैव संज्ञा ज्ञेया। या परानवकाशा च॥
हिन्दी अनुवाद
यहाँ से आगे 'कडाराः कर्मधारये' सूत्र तक एक (शब्द) की एक ही संज्ञा समझनी चाहिए — वही जो बाद वाली और अनवकाश (जिसका अन्यत्र अवसर न हो) हो।
सरल व्याख्या
जहाँ एक शब्द पर दो संज्ञाएँ प्राप्त हों (जैसे पद और भ), वहाँ केवल एक लगेगी — बाद वाली या जिसका और कहीं उपयोग न हो। इसलिए अजादि प्रत्यय से पहले 'भ' होगा, 'पद' नहीं।
१६६ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.140
आतो धातोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अत्-लोपः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, भस्य
वृत्तिः
आकारान्तो यो धातुस्तदन्तस्य भस्याङ्गस्य लोपः। «अलोऽन्त्यस्य»(1.1.52)। विश्वपः। विश्वपा। विश्वपाभ्यामित्यादि। एवं शङ्खध्मादयः। धातोः किम्? हाहान्॥ हरिः। हरी॥
हिन्दी अनुवाद
आकारान्त जो धातु, तदन्त भसंज्ञक अङ्ग का लोप होता है — 'अलोऽन्त्यस्य' से अन्तिम वर्ण का। विश्वपः, विश्वपा, विश्वपाभ्याम् इत्यादि। इसी प्रकार शङ्खध्मा आदि। धातु क्यों? हाहान् (यहाँ नहीं)। (अब) हरिः, हरी।
सरल व्याख्या
विश्वपा (पा धातु से) + शस्/टा आदि में अन्तिम आ हट जाता है: विश्वपः (द्वितीया बहुवचन), विश्वपा (तृतीया एकवचन)।
१६७ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.109
जसि च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ह्रस्वस्य, गुणः, अङ्गस्य
वृत्तिः
ह्रस्वान्तस्याङ्गस्य गुणः। हरयः॥
हिन्दी अनुवाद
जस् परे रहते ह्रस्वान्त अङ्ग को गुण होता है। हरयः।
सरल व्याख्या
हरि + जस् → हरे + अस् → हरयः (अयादि)। इसी तरह गुरु → गुरवः।
१६८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.108
ह्रस्वस्य गुणः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सम्बुद्धौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
सम्बुद्धौ। हे हरे। हरिम्। हरी। हरीन्॥
हिन्दी अनुवाद
सम्बुद्धि में ह्रस्व को गुण होता है। हे हरे। हरिम्, हरी, हरीन्।
सरल व्याख्या
सम्बोधन में हरि → हे हरे, गुरु → हे गुरो।
१६९ संज्ञासूत्रम् · घिसंज्ञा अष्टा० 1.4.7
शेषो घ्यसखि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ह्रस्वः, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
शेष इति स्पष्टार्थम्। ह्रस्वौ याविदुतौ तदन्तं सखिवर्जं घिसंज्ञम्॥
हिन्दी अनुवाद
'शेष' (पद) स्पष्टता के लिये है। सखि को छोड़कर, जो ह्रस्व इ और उ, तदन्त (शब्द) 'घि' संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
इकारान्त और उकारान्त शब्द (हरि, गुरु) 'घि' कहलाते हैं — इनके विशेष रूप बनते हैं। सखि और (स्त्रीलिङ्ग नदी-संज्ञक) इससे बाहर हैं।
१७० विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.120
आङो नाऽस्त्रियाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: घेः, अङ्गस्य
वृत्तिः
घेः परस्याङो ना स्यादस्त्रियाम्। आङिति टासंज्ञा। हरिणा। हरिभ्याम्। हरिभिः॥
हिन्दी अनुवाद
स्त्रीलिङ्ग को छोड़, घि से परे आङ् (टा) को 'ना' होता है। 'आङ्' यह टा की (प्राचीन) संज्ञा है। हरिणा, हरिभ्याम्, हरिभिः।
सरल व्याख्या
हरि + टा → हरि + ना → हरिणा (णत्व)। गुरु + टा → गुरुणा।
१७१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.111
घेर्ङिति ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: गुणः, अङ्गस्य
वृत्तिः
घिसंज्ञस्य ङिति सुपि गुणः। हरये। हरिभ्याम्। हरिभ्यः॥
हिन्दी अनुवाद
ङित् सुप् परे रहते घि-संज्ञक को गुण होता है। हरये, हरिभ्याम्, हरिभ्यः।
सरल व्याख्या
ङे, ङसि, ङस्, ङि (ङित्) से पहले हरि → हरे: हरे + ए → हरये (चतुर्थी)। गुरवे।
१७२ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.110
ङसिङसोश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पूर्वः, एङः, अति, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
एङो ङसिङसोरति पूर्वरूपमेकादेशः। हरेः हरेः। हर्योः हर्योः। हरीणाम्॥
हिन्दी अनुवाद
एङ् से ङसि और ङस् का अ परे रहते पूर्वरूप एकादेश होता है। हरेः, हरेः; हर्योः, हर्योः; हरीणाम्।
सरल व्याख्या
हरे + अस् → हरेस् → हरेः (पञ्चमी व षष्ठी एकवचन)। गुरोः।
१७३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.119
अच्च घेः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ङेः, औत्, अङ्गस्य
वृत्तिः
इदुद्भ्यामुत्तरस्य ङेरौत्, घेरच्च। हरौ। हरिषु। एवं कव्यादयः॥
हिन्दी अनुवाद
इ और उ से परे ङि को औत् होता है, और घि को अ होता है। हरौ, हरिषु। इसी प्रकार कवि आदि।
सरल व्याख्या
सप्तमी एकवचन: हरि + ङि → हर + औ → हरौ; गुरौ। (इस प्रकार हरि के सब रूप पूरे हुए।)
१७४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.93
अनङ् सौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामस्थाने, सख्युः, असम्बुद्धौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
सख्युरङ्गस्यानङादेशोऽसम्बुद्धौ सौ॥
हिन्दी अनुवाद
सम्बुद्धि-भिन्न सु परे रहते सखि अङ्ग को अनङ् आदेश होता है।
सरल व्याख्या
सखि + सु → सखन् (अन् आदेश) — आगे के सूत्रों से 'सखा' बनता है।
१७५ संज्ञासूत्रम् · उपधासंज्ञा अष्टा० 1.1.65
अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा ॥
वृत्तिः
अन्त्यादलः पूर्वो वर्ण उपधासंज्ञः॥
हिन्दी अनुवाद
अन्तिम अल् से पूर्व का वर्ण 'उपधा' संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
किसी शब्द के अन्तिम अक्षर से ठीक पहले का अक्षर 'उपधा' है — जैसे 'सखन्' में 'ख' का अ, 'राजन्' में 'ज' का अ।
१७६ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.8
सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: दीर्घः, न, उपधायाः, अङ्गस्य
वृत्तिः
नान्तस्योपधाया दीर्घोऽसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने॥
हिन्दी अनुवाद
सम्बुद्धि-भिन्न सर्वनामस्थान परे रहते नान्त (अङ्ग) की उपधा को दीर्घ होता है।
सरल व्याख्या
राजन्, सखन् आदि की उपधा (अ) प्रथमा आदि में दीर्घ होती है: सखान्, राजान्।
१७७ संज्ञासूत्रम् · अपृक्तसंज्ञा अष्टा० 1.2.41
अपृक्त एकाल् प्रत्ययः ॥
वृत्तिः
एकाल् प्रत्ययो यः सोऽपृक्तसंज्ञः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
एक वर्ण वाला जो प्रत्यय, वह 'अपृक्त' संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
केवल एक अक्षर का प्रत्यय (जैसे सु का स्, तिप् का त्) अपृक्त कहलाता है।
१७८ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.68
हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात् सुतिस्यपृक्तं हल् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोपः
वृत्तिः
हलन्तात्परं दीर्घौ यौ ङ्यापौ तदन्ताच्च परं सुतिसीत्येतदपृक्तं हल् लुप्यते॥
हिन्दी अनुवाद
हलन्त से परे, और दीर्घ ङी-आप् से परे, सु, ति, सि — इनका अपृक्त हल् लुप्त होता है।
सरल व्याख्या
व्यंजनान्त शब्द (सखान् + स्) या दीर्घ ई/आ वाले स्त्रीलिङ्ग (रमा + स्, नदी + स्) के बाद आया एक-अक्षरीय प्रत्यय स् हट जाता है — इसीलिए 'रमा', 'नदी' बिना विसर्ग के।
१७९ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.7
नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
प्रातिपदिकसंज्ञकं यत्पदं तदन्तस्य नस्य लोपः । सखा ॥
हिन्दी अनुवाद
प्रातिपदिक-संज्ञक जो पद, उसके अन्त के न का लोप होता है। सखा।
सरल व्याख्या
सखान् (सु का लोप) → अन्तिम न् हटकर 'सखा'; इसी से राजा, आत्मा।
१८० अतिदेशसूत्रम् · णित्त्वातिदेशः अष्टा० 7.1.92
सख्युरसम्बुद्धौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामस्थाने, णित्, अङ्गस्य
वृत्तिः
सख्युरङ्गात्परं संबुद्धिवर्जं सर्वनामस्थानं णिद्वत्स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
सखि अङ्ग से परे, सम्बुद्धि को छोड़, सर्वनामस्थान णित् के समान होता है।
सरल व्याख्या
सखि के प्रथमा-द्वितीया के रूपों में प्रत्यय को 'णित्' मानकर वृद्धि होती है।
१८१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.115
अचो ञ्णिति ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वृद्धिः, अङ्गस्य
वृत्तिः
अजन्ताङ्गस्य वृद्धिर्ञिति णिति च परे। सखायौ। सखायः। हे सखे। सखायम्। सखायौ। सखीन्। सख्या। सख्ये॥
हिन्दी अनुवाद
ञित् और णित् परे रहते अजन्त अङ्ग को वृद्धि होती है। सखायौ, सखायः, हे सखे, सखायम्, सखायौ, सखीन्, सख्या, सख्ये।
सरल व्याख्या
सखि + औ → सखै + औ → सखायौ। ञ्/ण् इत् वाले प्रत्ययों से पहले अन्तिम स्वर की वृद्धि यहीं से होती है।
१८२ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.112
ख्यत्यात् परस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अति, ङसि-ङसोः, संहितायाम्
वृत्तिः
खितिशब्दाभ्यां खीतीशब्दाभ्यां कृतयणादेशाभ्यां परस्य ङसिङसोरत उः। सख्युः॥
हिन्दी अनुवाद
यण् आदेश किए हुए 'खि', 'ति', 'खी', 'ती' शब्दों से परे ङसि और ङस् के अ को उ होता है। सख्युः।
सरल व्याख्या
सखि + ङस् → सख्य् + अस् → सख्युस् → सख्युः (पञ्चमी/षष्ठी एकवचन)। पति → पत्युः।
१८३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.118
औत् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ङेः, इदुद्भ्याम्, अङ्गस्य
वृत्तिः
इतः परस्य ङेरौत्। सख्यौ। शेषं हरिवत्॥
हिन्दी अनुवाद
इ से परे ङि को औत् होता है। सख्यौ। शेष हरि के समान।
सरल व्याख्या
सप्तमी एकवचन: सख्यौ, पत्यौ।
१८४ संज्ञासूत्रम् · घिसंज्ञा अष्टा० 1.4.8
पतिः समास एव ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: घि, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
घिसंज्ञः। पत्युः पत्युः। पत्यौ। शेषं हरिवत्। समासे तु भूपतये। कतिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः॥
हिन्दी अनुवाद
'पति' शब्द समास में ही घि-संज्ञक होता है। (अकेले में) पत्युः, पत्युः, पत्यौ; शेष हरि के समान। समास में तो — भूपतये। 'कति' शब्द सदा बहुवचनान्त है।
सरल व्याख्या
अकेले 'पति' (स्वामी) के रूप सखि जैसे (पत्या, पत्ये, पत्युः, पत्यौ); समास में (भूपति, नृपति) हरि जैसे (भूपतिना, भूपतये)।
१८५ संज्ञासूत्रम् · संख्यासंज्ञा अष्टा० 1.1.23
बहुगणवतुडति संख्या ॥
हिन्दी अनुवाद
(वृत्ति नहीं) बहु, गण, वतु-प्रत्ययान्त और डति-प्रत्ययान्त शब्द 'संख्या' संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
बहु, गण, तावत्/यावत् (वतु) और कति (डति) — ये भी व्याकरण में संख्या माने जाते हैं।
१८६ संज्ञासूत्रम् · षट्संज्ञा अष्टा० 1.1.25
डति च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: संख्या, षट्
वृत्तिः
डत्यन्ता संख्या षट्संज्ञा स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
डति-प्रत्ययान्त संख्या 'षट्' संज्ञक होती है।
सरल व्याख्या
कति आदि शब्द 'षट्' कहलाते हैं (जैसे पञ्च, षट् आदि नकारान्त/षकारान्त संख्याएँ)।
१८७ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.22
षड्भ्यो लुक् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: जश्-शसोः, अङ्गस्य
वृत्तिः
जश्शसोः॥
हिन्दी अनुवाद
षट्-संज्ञकों से परे जस् और शस् का लुक् होता है।
सरल व्याख्या
षट्-संज्ञक शब्दों के प्रथमा और द्वितीया बहुवचन में प्रत्यय पूरी तरह लुप्त — कति, पञ्च, षट्।
१८८ संज्ञासूत्रम् · लुक्संज्ञा अष्टा० 1.1.61
प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अदर्शनं
वृत्तिः
लुक्श्लुलुप्शब्दैः कृतं प्रत्ययादर्शनं क्रमात्तत्तत्संज्ञं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
लुक्, श्लु और लुप् शब्दों से किया गया प्रत्यय का अदर्शन क्रमशः उन-उन नामों वाला होता है।
सरल व्याख्या
प्रत्यय के तीन प्रकार के लोप — लुक्, श्लु, लुप्। तीनों में प्रत्यय नहीं दिखता, पर उनके परिणाम अलग-अलग हैं।
१८९ परिभाषासूत्रम् · प्रत्ययलक्षणपरिभाषा अष्टा० 1.1.62
प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् ॥
वृत्तिः
प्रत्यये लुप्ते तदाश्रितं कार्यं स्यात्। इति जसि चेति गुणे प्राप्ते -
हिन्दी अनुवाद
प्रत्यय का लोप होने पर भी उस पर आश्रित कार्य होता है। इससे 'जसि च' से गुण प्राप्त होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
प्रत्यय हट जाए तो भी उसके कारण होने वाले कार्य हो सकते हैं — मानो वह मौजूद हो (प्रत्ययलक्षण)।
१९० परिभाषासूत्रम् · प्रत्ययलक्षणपरिभाषा अष्टा० 1.1.63
न लुमताङ्गस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययलोपे, प्रत्ययलक्षणम्
वृत्तिः
लुमता शब्देन लुप्ते तन्निमित्तमङ्गकार्यं न स्यात्। कति कति । कतिभिः। कतिभ्यः कतिभ्यः । कतीनाम्। कतिषु। युष्मदस्मत् षट् संज्ञकास्त्रिषु सरूपाः॥ त्रिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः। त्रयः। त्रीन्। त्रिभिः। त्रिभ्यः त्रिभ्यः ॥
हिन्दी अनुवाद
'लु' वाले शब्दों (लुक्, श्लु, लुप्) से लुप्त होने पर उसके निमित्त से होने वाला अङ्ग-कार्य नहीं होता। कति, कति; कतिभिः; कतिभ्यः, कतिभ्यः; कतीनाम्; कतिषु। युष्मद्, अस्मद् और षट्-संज्ञक तीनों लिङ्गों में एक रूप वाले हैं। 'त्रि' शब्द सदा बहुवचनान्त — त्रयः, त्रीन्, त्रिभिः, त्रिभ्यः, त्रिभ्यः।
सरल व्याख्या
पिछले नियम का अपवाद: लुक् से हटे प्रत्यय के कारण अङ्ग पर कार्य नहीं होता। इसलिए कति + जस् (लुक्) में गुण नहीं — 'कति' ही, 'कतयः' नहीं।
१९१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.53
त्रेस्त्रयः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आमि, अङ्गस्य
वृत्तिः
त्रिशब्दस्य त्रयादेशः स्यादामि। त्रयाणाम्। त्रिषु। गौणत्वेऽपि प्रियत्रयाणाम्॥
हिन्दी अनुवाद
आम् परे रहते त्रि शब्द को 'त्रय' आदेश होता है। त्रयाणाम्, त्रिषु। गौण होने पर भी — प्रियत्रयाणाम्।
सरल व्याख्या
त्रि की षष्ठी बहुवचन: त्रय + नाम् → त्रयाणाम्।
१९२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.102
त्यदादीनामः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: विभक्तौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
एषामकारो विभक्तौ। «द्विपर्य्यन्तानामेवेष्टिः» (वार्त्तिकम्) । द्वौ द्वौ। द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् । द्वयोः द्वयोः ॥ पाति लोकमिति पपीः सूर्यः॥ «दीर्घाज्जसि च» [161] - पप्यौ पप्यौ । पप्यः । हे पपीः । पपीम् । पपीन् । पप्या । पपीभ्याम् पपीभ्याम् पपीभ्याम् । पपीभिः । पप्ये । पपीभ्यः पपीभ्यः । पप्यः पप्यः । पप्योः । दीर्घत्वान्न नुट्, पप्याम् । ङौ तु सवर्णदीर्घ: । पपी । पप्योः । पपीषु । एवं वातप्रम्यादयः ॥ बह्व्यः श्रेयस्यो यस्य स बहुश्रेयसी ॥
हिन्दी अनुवाद
त्यद् आदि (सर्वनामों) को विभक्ति परे रहते (अन्तिम वर्ण का) अ होता है। (वार्तिक) यह द्वि तक के शब्दों के लिये ही इष्ट है। द्वौ, द्वौ; द्वाभ्याम् (तीन बार); द्वयोः, द्वयोः। जो लोक की रक्षा करता है वह 'पपीः' (सूर्य)। 'दीर्घाज्जसि च' से — पप्यौ, पप्यौ, पप्यः, हे पपीः, पपीम्, पपीन्, पप्या, पपीभ्याम् (तीन बार), पपीभिः, पप्ये, पपीभ्यः (दो बार), पप्यः (दो बार), पप्योः; दीर्घ होने से नुट् नहीं — पप्याम्; ङि में सवर्ण-दीर्घ — पपी, पप्योः, पपीषु। इसी प्रकार वातप्रमी आदि। जिसकी बहुत-सी श्रेयसी (स्त्रियाँ) हों वह 'बहुश्रेयसी'।
सरल व्याख्या
तद्, यद्, एतद्, द्वि आदि के अन्तिम वर्ण का अ हो जाता है: तद् → त → सः, तौ, ते; द्वि → द्व → द्वौ। साथ ही पपी (ईकारान्त पुंलिङ्ग) के रूप दिए गए हैं।
१९३ संज्ञासूत्रम् · नदीसंज्ञा अष्टा० 1.4.3
यू स्त्र्याख्यौ नदी ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
ईदूदन्तौ नित्यस्त्रीलिङ्गौ नदीसंज्ञौ स्तः। «प्रथमलिङ्गग्रहणं च» (वार्त्तिकम्)। पूर्वं स्त्र्याख्यस्योपसर्जनत्वेऽपि नदीत्वं वक्तव्यमित्यर्थः॥
हिन्दी अनुवाद
नित्य स्त्रीलिङ्ग ईकारान्त और ऊकारान्त शब्द 'नदी' संज्ञक होते हैं। (वार्तिक) प्रथम लिङ्ग का भी ग्रहण हो — अर्थात् जो पहले स्त्रीवाची था, उसके (समास में) गौण होने पर भी नदी-संज्ञा कहनी चाहिए।
सरल व्याख्या
नदी, गौरी, वधू जैसे स्त्रीलिङ्ग ई/ऊ-अन्त शब्द 'नदी' कहलाते हैं। बहुश्रेयसी (पुंलिङ्ग बहुव्रीहि) में भी मूल 'श्रेयसी' स्त्रीवाची था, इसलिए नदी-संज्ञा।
१९४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.107
अम्बाऽर्थनद्योर्ह्रस्वः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सम्बुद्धौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
सम्बुद्धौ। हे बहुश्रेयसि॥
हिन्दी अनुवाद
सम्बुद्धि में 'अम्बा' अर्थ वाले और नदी-संज्ञक (शब्दों) को ह्रस्व होता है। हे बहुश्रेयसि।
सरल व्याख्या
सम्बोधन में नदी-संज्ञक का अन्तिम स्वर ह्रस्व: हे नदि, हे गौरि, हे अम्ब।
१९५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.112
आण्नद्याः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: घेः, ङिति, अङ्गस्य
वृत्तिः
नद्यन्तात्परेषां ङितामाडागमः॥
हिन्दी अनुवाद
नद्यन्त से परे ङित् प्रत्ययों को आट् आगम होता है।
सरल व्याख्या
नदी आदि के ङे, ङसि, ङस्, ङि से पहले 'आ' जुड़ता है।
१९६ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.90
आटश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, आत्, वृद्धिः, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
आटोऽचि परे वृद्धिरेकादेशः। बहुश्रेयस्यै। बहुश्रेयस्याः। बहुश्रेयसीनाम्॥
हिन्दी अनुवाद
आट् से अच् परे रहते वृद्धि एकादेश होता है। बहुश्रेयस्यै, बहुश्रेयस्याः, बहुश्रेयसीनाम्।
सरल व्याख्या
आ + ए = ऐ, आ + अस् = आस्: नदी + ङे → नद्यै, नद्याः।
१९७ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.116
ङेराम्नद्याम्नीभ्यः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
नद्यन्तादाबन्तान्नीशब्दाच्च परस्य ङेराम् । बहुश्रेयस्याम् । शेषं पपीवत् ॥ अङ्यन्तत्वान्न सुलोपः । अतिलक्ष्मीः । शेषं बहुश्रेयसीवत् ॥ प्रधी: ॥
हिन्दी अनुवाद
नद्यन्त, आबन्त और 'नी' शब्द से परे ङि को आम् होता है। बहुश्रेयस्याम्; शेष पपी के समान। ङी-प्रत्ययान्त न होने से सु का लोप नहीं — अतिलक्ष्मीः; शेष बहुश्रेयसी के समान। (अब) प्रधीः।
सरल व्याख्या
सप्तमी एकवचन: नद्याम्, रमायाम्। 'लक्ष्मी' में ङी प्रत्यय नहीं (मूल ई), इसलिए 'लक्ष्मीः' विसर्ग सहित।
१९८ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.77
अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
श्नु प्रत्ययान्तस्येवर्णोवर्णान्तस्य धातोर्भ्रू इत्यस्य चाङ्गस्येयङुवङौ स्तोऽजादौ प्रत्यये परे। इति प्राप्ते -
हिन्दी अनुवाद
श्नु-प्रत्ययान्त, इवर्ण-उवर्णान्त धातु और 'भ्रू' अङ्ग को अजादि प्रत्यय परे रहते इयङ् और उवङ् होते हैं। यह प्राप्त होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
धातु के अन्तिम इ/ई का इय्, उ/ऊ का उव् हो जाता है जब आगे स्वर हो: भ्रू + औ → भ्रुवौ; श्री + औ → श्रियौ।
१९९ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.82
एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, यण्, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य इवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तदन्तस्यानेकाचोऽङ्गस्य यणजादौ प्रत्यये। प्रध्यौ। प्रध्यः। प्रध्यम्। प्रध्यौ। प्रध्यः। प्रध्यि। शेषं पपीवत्। एवं ग्रामणीः। ङौ तु ग्रामण्याम्॥ अनेकाचः किम्? नीः। नियौ। नियः। अमि शसि च परत्वादियङ्, नियम्। ङेराम्; नियाम्॥ असंयोगपूर्वस्य किम्? सुश्रियौ। यवक्रियौ॥
हिन्दी अनुवाद
जिस इवर्ण के पहले धातु के अवयव का संयोग न हो, ऐसे इवर्णान्त अनेकाच् धातु-अन्त अङ्ग को अजादि प्रत्यय परे रहते यण् होता है। प्रध्यौ, प्रध्यः, प्रध्यम्, प्रध्यौ, प्रध्यः, प्रध्यि; शेष पपी के समान। इसी प्रकार ग्रामणीः; ङि में तो ग्रामण्याम्। अनेकाच् क्यों? नीः — नियौ, नियः; अम् और शस् में पर होने से इयङ् — नियम्; ङि को आम् — नियाम्। असंयोग-पूर्व क्यों? सुश्रियौ, यवक्रियौ।
सरल व्याख्या
प्रधी (प्र + धी) जैसे एक से अधिक स्वर वाले शब्दों में इयङ् न होकर यण्: प्रधी + औ → प्रध्यौ। पर एकाच् 'नी' में इयङ्: नियौ।
२०० संज्ञासूत्रम् · निपातसंज्ञा अष्टा० 1.4.60
गतिश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रादयः, क्रियायोगे, आकडारात् एका संज्ञा, प्राग्रीश्वरान्निपाताः
वृत्तिः
प्रादयः क्रियायोगे गतिसंज्ञाः स्युः। «गतिकारकेतरपूर्वपदस्य यण् नेष्यते» (वार्त्तिकम्) । शुद्धधियौ॥
हिन्दी अनुवाद
प्र आदि क्रिया के योग में 'गति' संज्ञक होते हैं। (वार्तिक) गति, कारक से भिन्न पूर्वपद वाले को यण् इष्ट नहीं। शुद्धधियौ।
सरल व्याख्या
उपसर्गों का दूसरा नाम 'गति' है। पूर्वपद गति/कारक न हो (जैसे 'शुद्ध') तो यण् नहीं, इयङ् होता है: शुद्धधियौ।
२०१ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.85
न भूसुधियोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, यण्, एः, अनेकाचः, असंयोगपूर्वस्य, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
एतयोरचि सुपि यण्न। सुधियौ। सुधिय इत्यादि॥ सुखमिच्छतीति सुखीः। सुतीः। सुख्यौ। सुत्यौ। सुख्युः। सुत्युः। शेषं प्रधीवत्। शम्भुर्हरिवत्। एवं भान्वादयः॥
हिन्दी अनुवाद
भू और सुधी को अजादि सुप् परे रहते यण् नहीं होता। सुधियौ, सुधियः इत्यादि। जो सुख चाहता है — सुखीः; सुतीः। सुख्यौ, सुत्यौ; सुख्युः, सुत्युः; शेष प्रधी के समान। शम्भु हरि के समान; इसी प्रकार भानु आदि।
सरल व्याख्या
सुधी (विद्वान) में यण् न होकर इयङ्: सुधियौ, सुधियः। उकारान्त शम्भु, भानु के रूप हरि जैसे।
२०२ अतिदेशसूत्रम् · तृज्वदतिदेशः अष्टा० 7.1.95
तृज्वत् क्रोष्टुः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामस्थाने, असम्बुद्धौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
असम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने परे । क्रोष्टुशब्दस्य स्थाने क्रोष्टृशब्दः प्रयोक्तव्य इत्यर्थः ॥
हिन्दी अनुवाद
सम्बुद्धि-भिन्न सर्वनामस्थान परे रहते 'क्रोष्टु' तृच्-प्रत्ययान्त के समान होता है — अर्थात् क्रोष्टु के स्थान पर क्रोष्टृ शब्द का प्रयोग करना चाहिए।
सरल व्याख्या
क्रोष्टु (गीदड़) के प्रथमा आदि रूप ऋकारान्त 'क्रोष्टृ' जैसे बनते हैं: क्रोष्टा, क्रोष्टारौ।
२०३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.110
ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: गुणः, अङ्गस्य
वृत्तिः
ऋतोऽङ्गस्य गुणो ङौ सर्वनामस्थाने च । इति प्राप्ते -
हिन्दी अनुवाद
ङि और सर्वनामस्थान परे रहते ऋकारान्त अङ्ग को गुण होता है। यह प्राप्त होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
ऋ → अर्: क्रोष्टृ + औ → क्रोष्टरौ; पिता → पितरौ।
२०४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.94
ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामस्थाने, असम्बुद्धौ, अनङ्, सौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
ऋदन्तानामुशनसादीनाम् चानङ् स्यादसम्बुद्धौ सौ॥
हिन्दी अनुवाद
ऋकारान्त, उशनस्, पुरुदंसस्, अनेहस् — इनको सम्बुद्धि-भिन्न सु परे रहते अनङ् होता है।
सरल व्याख्या
प्रथमा एकवचन में ऋ → अन्: पितृ + सु → पितन् → पिता; क्रोष्टा।
२०५ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.11
अप्तृन्तृच्स्वसृनप्तृनेष्टृत्वष्टृक्षत्तृहोतृपोतृप्रशास्तॄणाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: दीर्घः, उपधायाः, न, सर्वनामस्थाने, च, असम्बुद्धौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
अबादीनामुपधाया दीर्घः असंबुद्धौ सर्वनामस्थाने। क्रोष्टा। क्रोष्टारौ। क्रोष्टारः। क्रोष्टून्॥
हिन्दी अनुवाद
अप्, तृन्-तृच् प्रत्ययान्त, स्वसृ, नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ, प्रशास्तृ — इनकी उपधा को सम्बुद्धि-भिन्न सर्वनामस्थान परे रहते दीर्घ होता है। क्रोष्टा, क्रोष्टारौ, क्रोष्टारः, क्रोष्टून्।
सरल व्याख्या
कर्ता (तृच्), स्वसा, नप्ता आदि में उपधा दीर्घ: कर्तारौ, स्वसारौ (पर पिता → पितरौ, क्योंकि वह इस सूची में नहीं)।
२०६ विधिसूत्रम् · तृज्वदतिदेशः अष्टा० 7.1.97
विभाषा तृतीयादिष्वचि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामस्थाने, तृज्वत्, अङ्गस्य
वृत्तिः
अजादिषु तृतीयादिषु क्रोष्टुर्वा तृज्वत्। क्रोष्ट्रा। क्रोष्ट्रे॥
हिन्दी अनुवाद
तृतीया आदि अजादि विभक्तियों में क्रोष्टु विकल्प से तृच्-प्रत्ययान्त (क्रोष्टृ) के समान होता है। क्रोष्ट्रा, क्रोष्ट्रे।
सरल व्याख्या
क्रोष्टु के तृतीया आदि स्वरादि रूपों में दो प्रकार: क्रोष्ट्रा (क्रोष्टृ जैसा) या क्रोष्टुना (शम्भु जैसा)।
२०७ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.111
ऋत उत् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अति, ङसि-ङसोः, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
ऋतो ङसिङसोरति उदेकादेशः। रपरः॥
हिन्दी अनुवाद
ऋ से ङसि और ङस् का अ परे रहते (दोनों के स्थान पर) उ एकादेश होता है; वह र-पर होता है।
सरल व्याख्या
पितृ + अस् → पितुर् + स् — आगे पितुः बनता है।
२०८ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.24
रात्सस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: संयोगान्तस्य, लोपः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
रेफात्संयोगान्तस्य सस्यैव लोपो नान्यस्य। रस्य विसर्गः। क्रोष्टुः क्रोष्टुः । क्रोष्ट्रोः क्रोष्ट्रोः। «नुमचिरतृज्वद्भावेभ्यो नुट् पूर्वविप्रतिषेधेन» (वार्त्तिकम्) । क्रोष्टूनाम्। क्रोष्टरि। पक्षे हलादौ च शम्भुवत्॥ हूहूः। हूह्वौ। हूह्वः। हूहूम् इत्यादि॥ अतिचमूशब्दे तु नदीकार्य्यं विशेषः। हे अतिचमु। अतिचम्वै। अतिचम्वाः। अतिचमूनाम्॥ खलपूः॥
हिन्दी अनुवाद
रेफ से परे संयोगान्त (पद) के स का ही लोप होता है, अन्य का नहीं। (शेष) र को विसर्ग। क्रोष्टुः, क्रोष्टुः; क्रोष्ट्रोः, क्रोष्ट्रोः। (वार्तिक) नुम्, अचि र, तृज्वद्भाव — इनसे पहले नुट् होता है (पूर्वविप्रतिषेध से) — क्रोष्टूनाम्। क्रोष्टरि। दूसरे पक्ष में और हलादि में शम्भु के समान। हूहूः — हूह्वौ, हूह्वः, हूहूम् इत्यादि। 'अतिचमू' शब्द में नदी-कार्य विशेष है — हे अतिचमु, अतिचम्वै, अतिचम्वाः, अतिचमूनाम्। (अब) खलपूः।
सरल व्याख्या
पितुर्स् में र् के बाद स् ही हटता है → पितुर् → पितुः (षष्ठी/पञ्चमी एकवचन)। इसी से पितुः, मातुः, कर्तुः।
२०९ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.83
ओः सुपि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, यण्, एः, अनेकाचः, असंयोगपूर्वस्य, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य उवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तदन्तस्यानेकाचोऽङ्गस्य यण् स्यादचि सुपि। खलप्वौ। खलप्वः। एवं सुल्वादयः॥ स्वभूः। स्वभुवौ। स्वभुवः॥ वर्षाभूः॥
हिन्दी अनुवाद
जिस उवर्ण के पहले धातु-अवयव का संयोग न हो, ऐसे उवर्णान्त अनेकाच् धातु-अन्त अङ्ग को अजादि सुप् परे रहते यण् होता है। खलप्वौ, खलप्वः। इसी प्रकार सुलू आदि। स्वभूः — स्वभुवौ, स्वभुवः। (अब) वर्षाभूः।
सरल व्याख्या
खलपू (खलिहान साफ करने वाला) + औ → खलप्वौ (यण्)। पर स्वभू में उवङ्: स्वभुवौ।
२१० विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.84
वर्षाभ्वश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, यण्, एः, अनेकाचः, असंयोगपूर्वस्य, सुपि, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
अस्य यण् स्यादचि सुपि। वर्षाभ्वावित्यादि॥ दृन्भूः। «दृन्करपुनः पूर्वस्य भुवो यण् वक्तव्यः» (वार्त्तिकम्)। दृन्भ्वौ। एवं करभूः॥ धाता। हे धातः। धातारौ। धातारः। «ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम्» (वार्त्तिकम्) । धातॄणाम्। एवं नप्त्रादयः॥ नप्त्रादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम्। तेनेह न। पिता। पितरौ। पितरः। पितरम्। शेषं धातृवत्। एवं जामात्रादयः॥ ना। नरौ॥
हिन्दी अनुवाद
'वर्षाभू' को अजादि सुप् परे रहते यण् होता है — वर्षाभ्वौ इत्यादि। दृन्भूः — (वार्तिक) दृन्, कर, पुनः पूर्व वाले 'भू' को यण् कहना चाहिए — दृन्भ्वौ; इसी प्रकार करभूः। धाता, हे धातः, धातारौ, धातारः। (वार्तिक) ऋवर्ण से परे न को णत्व कहना चाहिए — धातॄणाम्। इसी प्रकार नप्तृ आदि। नप्तृ आदि का ग्रहण व्युत्पत्ति-पक्ष में नियम के लिये है, अतः यहाँ (पितृ में उपधा-दीर्घ) नहीं — पिता, पितरौ, पितरः, पितरम्; शेष धातृ के समान। इसी प्रकार जामातृ आदि। ना, नरौ।
सरल व्याख्या
वर्षाभू (मेंढक) → वर्षाभ्वौ। ऋकारान्त 'धातृ' (उपधा दीर्घ: धातारौ) और 'पितृ' (दीर्घ नहीं: पितरौ) के रूपों का अन्तर यहाँ स्पष्ट किया गया है।
२११ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.6
नृ च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: दीर्घः, नामि, उभयथा, अङ्गस्य
वृत्तिः
अस्य नामि वा दीर्घः। नृणाम्। नॄणाम्॥
हिन्दी अनुवाद
'नृ' को नाम् परे रहते विकल्प से दीर्घ होता है। नृणाम्, नॄणाम्।
सरल व्याख्या
नृ (मनुष्य) की षष्ठी बहुवचन में दोनों रूप शुद्ध — नृणाम्, नॄणाम्।
२१२ अतिदेशसूत्रम् · णित्त्वातिदेशः अष्टा० 7.1.90
गोतो णित् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामस्थाने, अङ्गस्य
वृत्तिः
ओकाराद्विहितं सर्वनामस्थानं णिद्वत्। गौः। गावौ। गावः॥
हिन्दी अनुवाद
ओकार से विहित सर्वनामस्थान णित् के समान होता है। गौः, गावौ, गावः।
सरल व्याख्या
गो + सु → (णित् मानकर वृद्धि) गौः; गो + औ → गावौ।
२१३ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.93
औतोऽम्शसोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, आत्, उपसर्गात्, धातौ, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
ओतोऽम्शसोरचि आकार एकादेशः। गाम्। गावौ। गाः। गवा। गवे। गोः। इत्यादि॥
हिन्दी अनुवाद
ओकार से अम् और शस् का अच् परे रहते आकार एकादेश होता है। गाम्, गावौ, गाः, गवा, गवे, गोः इत्यादि।
सरल व्याख्या
गो + अम् → गाम्, गो + शस् → गाः (द्वितीया)। गो के शेष रूप: गवा, गवे, गोः।
२१४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.85
रायो हलि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आः, विभक्तौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
अस्याकारादेशो हलि विभक्तौ । राः । रायौ । रायः । राभ्यामित्यादि ॥ ग्लौः । ग्लावौ । ग्लावः । ग्लौभ्यामित्यादि ॥
हिन्दी अनुवाद
हलादि विभक्ति परे रहते 'रै' को आकार आदेश होता है। राः, रायौ, रायः, राभ्याम् इत्यादि। ग्लौः, ग्लावौ, ग्लावः, ग्लौभ्याम् इत्यादि।
सरल व्याख्या
रै (धन): राः, रायौ, रायः, राभ्याम्। ग्लौ (चन्द्रमा): ग्लौः, ग्लावौ।

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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