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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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६. अजन्तस्त्रीलिङ्गाः

अजन्त स्त्रीलिंग · सूत्र 215–232 (18)
रमा ॥
रमा (अजन्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का आदर्श उदाहरण 'रमा' है)।

सरल व्याख्या: आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप 'रमा' (लक्ष्मी) शब्द से सीखे जाते हैं — रमा, रमे, रमाः; रमया, रमायै, रमायाः, रमायाम्।
२१५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.18
औङ आपः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: शी, अङ्गस्य
वृत्तिः
आबन्तादङ्गात्परस्यौङः शी स्यात्। औङित्यौकारविभक्तेः संज्ञा। रमे। रमाः॥
हिन्दी अनुवाद
आबन्त अङ्ग से परे औङ् को शी होता है। 'औङ्' औकार विभक्ति (प्रथमा-द्वितीया द्विवचन) की संज्ञा है। रमे, रमाः।
सरल व्याख्या
स्त्रीलिङ्ग आकारान्त रमा + औ → रमा + ई → रमे (गुण)। प्रथमा: रमा, रमे, रमाः।
२१६ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.106
सम्बुद्धौ च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: झलि, एत्, आङि, अङ्गस्य
वृत्तिः
आप एकारः स्यात्सम्बुद्धौ। एङ्ह्रस्वादिति संबुद्धिलोपः। हे रमे। हे रमे। हे रमाः। रमाम्। रमे। रमाः॥
हिन्दी अनुवाद
सम्बुद्धि में आप् (आ) को एकार होता है; 'एङ्ह्रस्वात्' से सम्बुद्धि का लोप। हे रमे, हे रमे, हे रमाः। रमाम्, रमे, रमाः।
सरल व्याख्या
सम्बोधन एकवचन: रमा → हे रमे; दुर्गा → हे दुर्गे।
२१७ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.105
आङि चापः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: झलि, एत्, ओसि, अङ्गस्य
वृत्तिः
आङि ओसि चाप एकारः। रमया। रमाभ्याम्। रमाभिः॥
हिन्दी अनुवाद
आङ् (टा) और ओस् परे रहते आप् को एकार होता है। रमया, रमाभ्याम्, रमाभिः।
सरल व्याख्या
रमा + टा → रमे + आ → रमया (अयादि)। रमा + ओस् → रमयोः।
२१८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.113
याडापः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: घेः, ङिति, अङ्गस्य
वृत्तिः
आपो ङितो याट्। वृद्धिः। रमायै। रमाभ्याम्। रमाभ्यः। रमायाः। रमयोः। रमाणाम्। रमायाम्। रमासु। एवं दुर्गाम्बिकादयः॥
हिन्दी अनुवाद
आप् से परे ङित् को याट् आगम होता है; वृद्धि होकर — रमायै, रमाभ्याम्, रमाभ्यः, रमायाः, रमयोः, रमाणाम्, रमायाम्, रमासु। इसी प्रकार दुर्गा, अम्बिका आदि।
सरल व्याख्या
रमा + ङे → रमा + या + ए → रमायै; पञ्चमी/षष्ठी रमायाः, सप्तमी रमायाम्। (रमा के सब रूप पूर्ण।)
२१९ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.114
सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ङिति, आपः, अङ्गस्य
वृत्तिः
आबन्तात्सर्वनाम्नो ङितः स्याट् स्यादापश्च ह्रस्वः। सर्वस्यै। सर्वस्याः। सर्वासाम्। सर्वस्याम्। शेषं रमावत्॥ एवं विश्वादय आबन्ताः॥
हिन्दी अनुवाद
आबन्त सर्वनाम से परे ङित् को स्याट् आगम और आप् को ह्रस्व होता है। सर्वस्यै, सर्वस्याः, सर्वासाम्, सर्वस्याम्; शेष रमा के समान। इसी प्रकार विश्वा आदि आबन्त।
सरल व्याख्या
स्त्रीलिङ्ग सर्वनाम: सर्वा + ङे → सर्व + स्यै → सर्वस्यै; तस्यै, तस्याः, तस्याम्, तासाम्।
२२० संज्ञासूत्रम् · सर्वनामसंज्ञा अष्टा० 1.1.28
विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वादीनि, सर्वनामानि
वृत्तिः
सर्वनामता वा। उत्तरपूर्वस्यै, उत्तरपूर्वायै। तीयस्येति वा सर्वनामसंज्ञा। द्वितीयस्यै, द्वितीयायै॥ एवं तृतीया॥ अम्बार्थेति ह्रस्वः। हे अम्ब। हे अक्क। हे अल्ल॥ जरा। जरसौ इत्यादि। पक्षे रमावत्॥ गोपाः, विश्वपावत्॥ मतीः। मत्या॥
हिन्दी अनुवाद
दिशा-वाचक बहुव्रीहि समास में सर्वनाम-संज्ञा विकल्प से होती है। उत्तरपूर्वस्यै, उत्तरपूर्वायै। 'तीयस्य' वार्तिक से विकल्प से सर्वनाम-संज्ञा — द्वितीयस्यै, द्वितीयायै; इसी प्रकार तृतीया। 'अम्बार्थ' से ह्रस्व — हे अम्ब, हे अक्क, हे अल्ल। जरा — जरसौ इत्यादि; पक्ष में रमा के समान। गोपाः — विश्वपा के समान। (अब) मतिः, मत्या।
सरल व्याख्या
उत्तरपूर्वा (ईशान दिशा) के सर्वनाम/सामान्य दोनों रूप। माता-वाचक अम्बा आदि का सम्बोधन ह्रस्व: हे अम्ब।
२२१ संज्ञासूत्रम् · नदीसंज्ञा अष्टा० 1.4.6
ङिति ह्रस्वश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: यू, स्त्र्याख्यौ, नदी, न, इयङ्-उवङ्-स्थानौ, अस्त्री, वा, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
इयङुवङ्स्थानौ स्त्रीशब्दभिन्नौ नित्यस्त्रीलिङ्गावीदूतौ, ह्रस्वौ चेवर्णोवर्णौ, स्त्रियां वा नदीसंज्ञौ स्तो ङिति। मत्यै, मतये। मत्याः मत्याः । मतेः मतेः॥
हिन्दी अनुवाद
इयङ्-उवङ् के स्थान वाले, 'स्त्री' शब्द से भिन्न, नित्य-स्त्रीलिङ्ग ई-ऊ तथा ह्रस्व इवर्ण-उवर्ण — स्त्रीलिङ्ग में ङित् परे रहते विकल्प से नदी-संज्ञक होते हैं। मत्यै, मतये; मत्याः, मत्याः; मतेः, मतेः।
सरल व्याख्या
मति, बुद्धि जैसे स्त्रीलिङ्ग इकारान्त शब्दों के ङित् रूपों में दो-दो रूप: मत्यै/मतये, मत्याः/मतेः।
२२२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.117
इदुद्भ्याम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आम्, ङेः, अङ्गस्य
वृत्तिः
इदुद्भ्यां नदीसंज्ञकाभ्यां परस्य ङेराम्। मत्याम्, मतौ। शेषं हरिवत्॥ एवं बुद्ध्यादयः॥
हिन्दी अनुवाद
नदी-संज्ञक इ और उ से परे ङि को आम् होता है। मत्याम्, मतौ; शेष हरि के समान। इसी प्रकार बुद्धि आदि।
सरल व्याख्या
सप्तमी एकवचन: मत्याम् / मतौ।
२२३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.99
त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: विभक्तौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
स्त्रीलिङ्गयोरेतौ स्तो विभक्तौ॥
हिन्दी अनुवाद
स्त्रीलिङ्ग में त्रि और चतुर् को विभक्ति परे रहते (क्रमशः) तिसृ और चतसृ आदेश होते हैं।
सरल व्याख्या
तीन/चार स्त्रियों के लिये: तिस्रः (तीन), चतस्रः (चार)।
२२४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.100
अचि र ऋतः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: विभक्तौ, तिसृचतसृ, अङ्गस्य
वृत्तिः
तिसृचतसृ एतयोर्ऋकारस्य रेफादेशः स्यादचि। गुणदीर्घोत्वानामपवादः। तिस्रः। तिस्रः । तिसृभिः । तिसृभ्यः। तिसृभ्यः। आमि नुट्॥
हिन्दी अनुवाद
तिसृ और चतसृ के ऋकार को अच् परे रहते रेफ आदेश होता है — यह गुण, दीर्घ और उत्व का अपवाद है। तिस्रः, तिस्रः, तिसृभिः, तिसृभ्यः, तिसृभ्यः। आम् परे नुट्।
सरल व्याख्या
तिसृ + जस् → तिस्र् + अस् → तिस्रः।
२२५ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.4
न तिसृचतसृ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: दीर्घः, नामि, अङ्गस्य
वृत्तिः
एतयोर्नामि दीर्घो न। तिसृणाम्। तिसृषु॥ द्वे। द्वे। द्वाभ्याम्। द्वाभ्याम्। द्वाभ्याम्। द्वयोः। द्वयोः॥ गौरी। गौर्य्यौ। गौर्य्यः। हे गौरि। गौर्य्यै इत्यादि। एवं नद्यादयः॥ लक्ष्मीः। शेषं गौरीवत्॥ एवं तरीतन्त्र्यादयः॥ स्त्री। हे स्त्रि॥
हिन्दी अनुवाद
तिसृ और चतसृ को नाम् परे रहते दीर्घ नहीं होता। तिसृणाम्, तिसृषु। (स्त्रीलिङ्ग द्वि) द्वे, द्वे, द्वाभ्याम् (तीन बार), द्वयोः (दो बार)। गौरी — गौर्यौ, गौर्यः, हे गौरि, गौर्यै इत्यादि; इसी प्रकार नदी आदि। लक्ष्मीः — शेष गौरी के समान; इसी प्रकार तरी, तन्त्री आदि। स्त्री — हे स्त्रि।
सरल व्याख्या
तिसृणाम् (दीर्घ नहीं)। ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग नदी/गौरी के रूप: नदी, नद्यौ, नद्यः; हे नदि; नद्यै, नद्याः, नद्याम्।
२२६ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.79
स्त्रियाः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: इयङ्-उवङौ, अचि, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
अस्येयङ् स्यादजादौ प्रत्यये परे। स्त्रियौ। स्त्रियः॥
हिन्दी अनुवाद
अजादि प्रत्यय परे रहते 'स्त्री' को इयङ् होता है। स्त्रियौ, स्त्रियः।
सरल व्याख्या
स्त्री + औ → स्त्रियौ।
२२७ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.80
वाऽम्शसोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: इयङ्-उवङौ, अचि, स्त्रियाः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
अमि शसि च स्त्रिया इयङ् वा स्यात्। स्त्रियम्, स्त्रीम्। स्त्रियः, स्त्रीः। स्त्रिया। स्त्रियै। स्त्रियाः। परत्वान्नुट्। स्त्रीणाम्। स्त्रीषु॥ श्रीः। श्रियौ। श्रियः॥
हिन्दी अनुवाद
अम् और शस् परे रहते स्त्री को विकल्प से इयङ् होता है। स्त्रियम्, स्त्रीम्; स्त्रियः, स्त्रीः। स्त्रिया, स्त्रियै, स्त्रियाः। पर होने से नुट् — स्त्रीणाम्, स्त्रीषु। श्रीः — श्रियौ, श्रियः।
सरल व्याख्या
स्त्री के द्वितीया में दो रूप: स्त्रियम्/स्त्रीम्, स्त्रियः/स्त्रीः।
२२८ संज्ञासूत्रम् · नदीसंज्ञा अष्टा० 1.4.4
नेयङुवङ्स्थानावस्त्री ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: यू, स्त्र्याख्यौ, नदी, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
इयङुवङोः स्थितिर्ययोस्तावीदूतौ नदीसंज्ञौ न स्तो न तु स्त्री। हे श्रीः। श्रियै, श्रिये। श्रियाः, श्रियः॥
हिन्दी अनुवाद
इयङ्-उवङ् के स्थान वाले ई और ऊ नदी-संज्ञक नहीं होते, 'स्त्री' शब्द को छोड़कर। हे श्रीः। श्रियै, श्रिये; श्रियाः, श्रियः।
सरल व्याख्या
श्री, भ्रू जैसे शब्द (जिनमें इयङ्/उवङ् होता है) नदी नहीं — इसलिए सम्बोधन 'हे श्रीः' (हे श्रि नहीं)। ङित् में (221 से) विकल्प।
२२९ संज्ञासूत्रम् · नदीसंज्ञा अष्टा० 1.4.5
वाऽऽमि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: यू, स्त्र्याख्यौ, नदी, न, इयङ्-उवङ्-स्थानौ, अस्त्री, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
इयङुवङ्स्थानौ स्त्र्याख्यौ यू आमि वा नदीसंज्ञौ स्तो न तु स्त्री। श्रीणाम्, श्रियाम्। श्रियि, श्रियाम्॥ धेनुर्मतिवत्॥
हिन्दी अनुवाद
इयङ्-उवङ् स्थान वाले स्त्रीवाची ई-ऊ आम् परे रहते विकल्प से नदी-संज्ञक होते हैं, 'स्त्री' को छोड़कर। श्रीणाम्, श्रियाम्; श्रियि, श्रियाम्। धेनु मति के समान।
सरल व्याख्या
श्री की षष्ठी बहुवचन: श्रीणाम्/श्रियाम्। उकारान्त स्त्रीलिङ्ग धेनु के रूप मति जैसे।
२३० विधिसूत्रम् · तृज्वदतिदेशः अष्टा० 7.1.96
स्त्रियां च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामस्थाने, तृज्वत्, अङ्गस्य
वृत्तिः
स्त्रीवाची क्रोष्टुशब्दस्तृजन्तवद्रूपं लभते॥
हिन्दी अनुवाद
स्त्रीवाची क्रोष्टु शब्द तृजन्त (क्रोष्टृ) के समान रूप पाता है।
सरल व्याख्या
स्त्रीलिङ्ग में क्रोष्टु सदा क्रोष्टृ बनता है (फिर ङीप् से क्रोष्ट्री)।
२३१ विधिसूत्रम् अष्टा० 4.1.5
ऋन्नेभ्यो ङीप् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्
वृत्तिः
ऋदन्तेभ्यो नान्तेभ्यश्च स्त्रियां ङीप्। क्रोष्ट्री गौरीवत्॥ भ्रूः श्रीवत्॥ स्वयम्भूः पुंवत्॥
हिन्दी अनुवाद
ऋकारान्त और नकारान्त शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में ङीप् (ई) होता है। क्रोष्ट्री — गौरी के समान। भ्रूः — श्री के समान। स्वयम्भूः — पुंलिङ्ग के समान।
सरल व्याख्या
कर्तृ → कर्त्री, राजन् → राज्ञी, क्रोष्टृ → क्रोष्ट्री (मादा गीदड़)।
२३२ विधिसूत्रम् अष्टा० 4.1.10
न षट्स्वस्रादिभ्यः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ङीप्, टाप्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्
वृत्तिः
ङीप्टापौ न स्तः ॥ स्वसा तिस्रश्चतस्त्रश्च ननान्दा दुहिता तथा । याता मातेति सप्तैते स्वस्रादय उदाहृताः ॥ स्वसा । स्वसारौ ॥ माता पितृवत् । शसि मातॄ: ॥ द्यौर्गोवत् ॥ राः पुंवत् ॥ नौर्ग्लौवत् ॥
हिन्दी अनुवाद
षट्-संज्ञक और स्वसृ आदि से ङीप् और टाप् नहीं होते। स्वसा, तिस्रः, चतस्रः, ननान्दा, दुहिता, याता, माता — ये सात स्वस्रादि कहे गए हैं। स्वसा, स्वसारौ। माता पितृ के समान; शस् में मातॄः। द्यौः — गो के समान; राः — पुंलिङ्ग के समान; नौः — ग्लौ के समान।
सरल व्याख्या
माता, स्वसा, दुहिता आदि स्त्रीवाची होते हुए भी ई प्रत्यय नहीं लेते — इसलिए 'मात्री' नहीं, 'माता'।

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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