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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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७. अजन्तनपुंसकलिङ्गाः

अजन्त नपुंसकलिंग · सूत्र 233–249 (17)
२३३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.24
अतोऽम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: स्वमोः, नपुंसकात्, अङ्गस्य
वृत्तिः
अतोऽङ्गात् क्लीबात्स्वमोरम्। अमि पूर्वः। ज्ञानम्। एङ्ह्रस्वादिति हल्लोपः। हे ज्ञान॥
हिन्दी अनुवाद
अकारान्त नपुंसक अङ्ग से परे सु और अम् को अम् होता है; 'अमि पूर्वः' से पूर्वरूप — ज्ञानम्। 'एङ्ह्रस्वात्' से हल्-लोप — हे ज्ञान।
सरल व्याख्या
नपुंसकलिङ्ग ज्ञान + सु → ज्ञानम् (प्रथमा भी 'म्' वाला)। सम्बोधन: हे ज्ञान।
२३४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.19
नपुंसकाच्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: शी, औङः, अङ्गस्य
वृत्तिः
क्लीबादौङः शी स्यात्। भसंज्ञायाम्॥
हिन्दी अनुवाद
नपुंसक से परे औङ् को शी होता है। भ-संज्ञा होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
ज्ञान + औ → ज्ञान + ई।
२३५ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.148
यस्येति च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: तद्धिते, लोपः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, भस्य
वृत्तिः
ईकारे तद्धिते च परे भस्येवर्णावर्णयोर्लोपः। इत्यल्लोपे प्राप्ते «औङः श्यां प्रतिषेधो वाच्यः» (वार्त्तिकम्)। ज्ञाने॥
हिन्दी अनुवाद
ईकार और तद्धित परे रहते भ-संज्ञक के इवर्ण और अवर्ण का लोप होता है। इससे अ-लोप प्राप्त होने पर — (वार्तिक) औङ् के स्थान पर हुए शी में (लोप का) निषेध कहना चाहिए। ज्ञाने।
सरल व्याख्या
सामान्यतः ई से पहले अ का लोप होता, पर यहाँ वार्तिक से नहीं; अतः ज्ञान + ई → ज्ञाने (गुण)।
२३६ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.20
जश्शसोः शिः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: नपुंसकात्, च, अङ्गस्य
वृत्तिः
क्लीबादनयोः शिः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
नपुंसक से परे जस् और शस् को शि होता है।
सरल व्याख्या
ज्ञान + जस्/शस् → ज्ञान + इ।
२३७ संज्ञासूत्रम् · सर्वनामस्थानसंज्ञा अष्टा० 1.1.42
शि सर्वनामस्थानम् ॥
वृत्तिः
शि इत्येतदुक्तसंज्ञं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
'शि' उक्त (सर्वनामस्थान) संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
नपुंसक का यह 'शि' (इ) सर्वनामस्थान माना जाता है — इससे आगे नुम् और उपधा-दीर्घ होते हैं।
२३८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.72
नपुंसकस्य झलचः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: नुम्, सर्वनामस्थाने, अङ्गस्य
वृत्तिः
झलन्तस्याजन्तस्य च क्लीबस्य नुम् स्यात् सर्वनामस्थाने॥
हिन्दी अनुवाद
झलन्त और अजन्त नपुंसक को सर्वनामस्थान परे रहते नुम् होता है।
सरल व्याख्या
ज्ञान + इ में न् (नुम्) जुड़ता है।
२३९ परिभाषासूत्रम् · आगमस्थाननिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.1.47
मिदचोऽन्त्यात्परः ॥
वृत्तिः
अचां मध्ये योऽन्त्यस्तस्मात्परस्तस्यैवान्तावयवो मित्स्यात्। उपधादीर्घः। ज्ञानानि। पुनस्तद्वत्। शेषं पुंवत्॥ एवं धनवनफलादयः॥
हिन्दी अनुवाद
मित् (म् इत् वाला आगम) स्वरों में जो अन्तिम है उसके बाद आता है और उसी का अन्तावयव होता है। उपधा-दीर्घ होकर — ज्ञानानि। फिर (द्वितीया) वैसा ही। शेष पुंलिङ्ग के समान। इसी प्रकार धन, वन, फल आदि।
सरल व्याख्या
नुम् अन्तिम स्वर के बाद जुड़ता है: ज्ञान + न् + इ → ज्ञानन् + इ → (उपधा दीर्घ) ज्ञानानि। फल → फलानि।
२४० विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.25
अद्ड् डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: स्वमोः, नपुंसकात्, अङ्गस्य
वृत्तिः
एभ्यः क्लीबेभ्यः स्वमोरद्डादेशः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
डतर आदि पाँच नपुंसक शब्दों से सु और अम् को अद्ड् आदेश होता है।
सरल व्याख्या
कतर, कतम, इतर, अन्य, अन्यतर (नपुंसक) में प्रथमा-द्वितीया एकवचन 'अद्' से बनते हैं।
२४१ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.143
टेः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अत्-लोपः, डिति, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, भस्य
वृत्तिः
डिति भस्य टेर्लोपः। कतरत्, कतरद्। कतरे। कतराणि। हे कतरत्। शेषं पुंवत्॥ एवं कतमत्। इतरत्। अन्यत्। अन्यतरत्। अन्यतमस्य त्वन्यतममित्येव। «एकतरात्प्रतिषेधो वक्तव्यः» (वार्त्तिकम्) । एकतरम्॥
हिन्दी अनुवाद
डित् परे रहते भ-संज्ञक की टि का लोप होता है। कतरत्, कतरद्; कतरे, कतराणि; हे कतरत्; शेष पुंलिङ्ग के समान। इसी प्रकार कतमत्, इतरत्, अन्यत्, अन्यतरत्। अन्यतम का तो 'अन्यतमम्' ही। (वार्तिक) एकतर से निषेध कहना चाहिए — एकतरम्।
सरल व्याख्या
अन्य + अद् → अन्यत् (नपुंसक) — इसीलिए 'अन्यत्' (अन्यम् नहीं), 'इतरत्'।
२४२ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.2.47
ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य ॥
वृत्तिः
अजन्तस्येत्येव । श्रीपं ज्ञानवत् ॥ द्वे २ । त्रीणि २ ।
हिन्दी अनुवाद
नपुंसक में अजन्त प्रातिपदिक को ह्रस्व होता है। श्रीपम् — ज्ञान के समान। द्वे (दो बार), त्रीणि (दो बार)।
सरल व्याख्या
नपुंसकलिङ्ग में अन्तिम दीर्घ स्वर ह्रस्व हो जाता है: श्रीपा → श्रीप (नपुं.), ग्रामणी → ग्रामणि।
२४३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.23
स्वमोर्नपुंसकात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लुक्, अङ्गस्य
वृत्तिः
लुक् स्यात्। वारि॥
हिन्दी अनुवाद
नपुंसक से परे सु और अम् का लुक् होता है। वारि।
सरल व्याख्या
इकारान्त नपुंसक वारि (जल) + सु → वारि (प्रत्यय लुप्त)।
२४४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.73
इकोऽचि विभक्तौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: नुम्, नपुंसकस्य, अङ्गस्य
वृत्तिः
इगन्तस्य क्लीबस्य नुमचि विभक्तौ। वारिणी। वारीणि। न लुमतेत्यस्यानित्यत्वात्पक्षे संबुद्धिनिमित्तो गुणः। हे वारे, हे वारि। आङो ना,वारिणा । घेर्ङितीति गुणे प्राप्ते «वृद्ध्यौत्त्वतृज्वद्भावगुणेभ्यो नुम् पूर्वविप्रतिषेधेन» (वार्त्तिकम्)। वारिणे। वारिणः। वारिणोः। नुमचिरेति नुट्। वारीणाम्। वारिणि। हलादौ हरिवत्॥
हिन्दी अनुवाद
इगन्त नपुंसक को अजादि विभक्ति परे रहते नुम् होता है। वारिणी, वारीणि। 'न लुमता' के अनित्य होने से पक्ष में सम्बुद्धि-निमित्त गुण — हे वारे, हे वारि। 'आङो ना' से वारिणा। 'घेर्ङिति' से गुण प्राप्त होने पर — (वार्तिक) वृद्धि, औत्व, तृज्वद्भाव, गुण से पहले नुम् होता है (पूर्वविप्रतिषेध) — वारिणे, वारिणः, वारिणोः। 'नुमचिर' से नुट् — वारीणाम्, वारिणि। हलादि में हरि के समान।
सरल व्याख्या
वारि के स्वरादि रूपों में न् जुड़ता है: वारिणी, वारीणि, वारिणा, वारिणे, वारिणः, वारिणि। मधु → मधुनी, मधूनि।
२४५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.75
अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनङुदात्तः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: नुम्, नपुंसकस्य, विभक्तौ, तृतीया-आदिषु, अङ्गस्य
वृत्तिः
एषामनङ् स्याट्टादावचि॥
हिन्दी अनुवाद
अस्थि, दधि, सक्थि, अक्षि — इनको टा आदि अजादि (विभक्ति) परे रहते (उदात्त) अनङ् होता है।
सरल व्याख्या
दधि (दही) + टा → दधन् + आ — आगे दध्ना।
२४६ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.134
अल्लोपोऽनः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, भस्य
वृत्तिः
अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थानयजादिस्वादिपरो योऽन् तस्याकारस्य लोपः। दध्ना। दध्ने। दध्नः। दध्नः। दध्नोः। दध्नोः॥
हिन्दी अनुवाद
अङ्ग का अवयव जो 'अन्', जिसके परे सर्वनामस्थान-भिन्न यकारादि या अजादि स्वादि हों, उसके अकार का लोप होता है। दध्ना, दध्ने, दध्नः, दध्नः, दध्नोः, दध्नोः।
सरल व्याख्या
दधन् + आ → दध्न् + आ → दध्ना। इसी नियम से राजन् + आ → राज्ञा।
२४७ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.136
विभाषा ङिश्योः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अनः, अत्-लोपः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, भस्य
वृत्तिः
अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थानयजादिस्वादिपरो योऽन् तस्याकारस्य लोपो वा स्यात् ङिश्योः परयोः। दध्नि, दधनि। शेषं वारिवत्॥ एवमस्थिसक्थ्यक्षि॥ सुधि। सुधिनी। सुधीनि। हे सुधे, हे सुधि॥
हिन्दी अनुवाद
ङि और शी परे रहते (उस अन् के अ का) लोप विकल्प से होता है। दध्नि, दधनि; शेष वारि के समान। इसी प्रकार अस्थि, सक्थि, अक्षि। सुधि — सुधिनी, सुधीनि, हे सुधे, हे सुधि।
सरल व्याख्या
सप्तमी एकवचन: दध्नि/दधनि; राज्ञि/राजनि।
२४८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.74
तृतीयादिषु भाषितपुंस्कं पुंवद्गालवस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: नुम्, नपुंसकस्य, इकः, अचि, विभक्तौ, अङ्गस्य
वृत्तिः
प्रवृत्तिनिमित्तैक्ये भाषितपुंस्कमिगन्तं क्लीबं पुंवद्वा टादावचि। सुधिया, सुधिनेत्यादि॥ मधु। मधुनी। मधूनि। हे मधो, हे मधु॥ सुलु। सुलुनी। सुलूनि। सुलुनेत्यादि॥ धातृ। धातृणी। धातॄणि। हे धातः, हे धातृ। धातॄणाम्॥ एवं ज्ञात्रादयः॥
हिन्दी अनुवाद
प्रवृत्ति-निमित्त एक होने पर, जो पुंलिङ्ग में भी प्रयुक्त हो ऐसा इगन्त नपुंसक, टा आदि अजादि में विकल्प से पुंलिङ्ग के समान होता है (गालव के मत में)। सुधिया, सुधिना इत्यादि। मधु — मधुनी, मधूनि, हे मधो, हे मधु। सुलु — सुलुनी, सुलूनि, सुलुना इत्यादि। धातृ — धातृणी, धातॄणि, हे धातः, हे धातृ, धातॄणाम्। इसी प्रकार ज्ञातृ आदि।
सरल व्याख्या
विशेषण रूप नपुंसक शब्दों (सुधि = बुद्धिमान, जो तीनों लिङ्गों में चलता है) के तृतीया आदि में पुंलिङ्ग जैसे रूप भी: सुधिया / सुधिना।
२४९ परिभाषासूत्रम् · ह्रस्वादेशनिर्णयपरिभाषा अष्टा० 1.1.48
एच इग्घ्रस्वादेशे ॥
वृत्तिः
आदिश्यमानेषु ह्रस्वेषु एच इगेव स्यात् । प्रद्यु । प्रद्युनी । प्रद्यूनि । प्रद्युनेत्यादि ॥ प्ररि । प्ररीणि । प्ररिणा । «एकदेशविकृतमनन्यवत्» (परिभाषा) । प्रराभ्याम् । प्ररीणाम् । सुनु । सुनुनी । सुनूनि । सुनुनेत्यादि ॥
हिन्दी अनुवाद
ह्रस्व आदेश किए जाने पर एच् (ए, ओ, ऐ, औ) के स्थान पर इक् ही होता है। प्रद्यु, प्रद्युनी, प्रद्यूनि, प्रद्युना इत्यादि। प्ररि, प्ररीणि, प्ररिणा; (परिभाषा) एक भाग में विकार होने पर भी (शब्द) अन्य नहीं होता — प्रराभ्याम्, प्ररीणाम्। सुनु, सुनुनी, सुनूनि, सुनुना इत्यादि।
सरल व्याख्या
नपुंसक में ह्रस्व करना हो तो ए/ऐ → इ, ओ/औ → उ: प्रद्यो → प्रद्यु, प्ररै → प्ररि, सुनौ → सुनु।

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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