ईकार और तद्धित परे रहते भ-संज्ञक के इवर्ण और अवर्ण का लोप होता है। इससे अ-लोप प्राप्त होने पर — (वार्तिक) औङ् के स्थान पर हुए शी में (लोप का) निषेध कहना चाहिए। ज्ञाने।
सरल व्याख्या
सामान्यतः ई से पहले अ का लोप होता, पर यहाँ वार्तिक से नहीं; अतः ज्ञान + ई → ज्ञाने (गुण)।
अचां मध्ये योऽन्त्यस्तस्मात्परस्तस्यैवान्तावयवो मित्स्यात्। उपधादीर्घः। ज्ञानानि। पुनस्तद्वत्। शेषं पुंवत्॥ एवं धनवनफलादयः॥
हिन्दी अनुवाद
मित् (म् इत् वाला आगम) स्वरों में जो अन्तिम है उसके बाद आता है और उसी का अन्तावयव होता है। उपधा-दीर्घ होकर — ज्ञानानि। फिर (द्वितीया) वैसा ही। शेष पुंलिङ्ग के समान। इसी प्रकार धन, वन, फल आदि।
सरल व्याख्या
नुम् अन्तिम स्वर के बाद जुड़ता है: ज्ञान + न् + इ → ज्ञानन् + इ → (उपधा दीर्घ) ज्ञानानि। फल → फलानि।
डित् परे रहते भ-संज्ञक की टि का लोप होता है। कतरत्, कतरद्; कतरे, कतराणि; हे कतरत्; शेष पुंलिङ्ग के समान। इसी प्रकार कतमत्, इतरत्, अन्यत्, अन्यतरत्। अन्यतम का तो 'अन्यतमम्' ही। (वार्तिक) एकतर से निषेध कहना चाहिए — एकतरम्।
इगन्त नपुंसक को अजादि विभक्ति परे रहते नुम् होता है। वारिणी, वारीणि। 'न लुमता' के अनित्य होने से पक्ष में सम्बुद्धि-निमित्त गुण — हे वारे, हे वारि। 'आङो ना' से वारिणा। 'घेर्ङिति' से गुण प्राप्त होने पर — (वार्तिक) वृद्धि, औत्व, तृज्वद्भाव, गुण से पहले नुम् होता है (पूर्वविप्रतिषेध) — वारिणे, वारिणः, वारिणोः। 'नुमचिर' से नुट् — वारीणाम्, वारिणि। हलादि में हरि के समान।
सरल व्याख्या
वारि के स्वरादि रूपों में न् जुड़ता है: वारिणी, वारीणि, वारिणा, वारिणे, वारिणः, वारिणि। मधु → मधुनी, मधूनि।
अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थानयजादिस्वादिपरो योऽन् तस्याकारस्य लोपो वा स्यात् ङिश्योः परयोः। दध्नि, दधनि। शेषं वारिवत्॥ एवमस्थिसक्थ्यक्षि॥ सुधि। सुधिनी। सुधीनि। हे सुधे, हे सुधि॥
हिन्दी अनुवाद
ङि और शी परे रहते (उस अन् के अ का) लोप विकल्प से होता है। दध्नि, दधनि; शेष वारि के समान। इसी प्रकार अस्थि, सक्थि, अक्षि। सुधि — सुधिनी, सुधीनि, हे सुधे, हे सुधि।
प्रवृत्तिनिमित्तैक्ये भाषितपुंस्कमिगन्तं क्लीबं पुंवद्वा टादावचि। सुधिया, सुधिनेत्यादि॥ मधु। मधुनी। मधूनि। हे मधो, हे मधु॥ सुलु। सुलुनी। सुलूनि। सुलुनेत्यादि॥ धातृ। धातृणी। धातॄणि। हे धातः, हे धातृ। धातॄणाम्॥ एवं ज्ञात्रादयः॥
हिन्दी अनुवाद
प्रवृत्ति-निमित्त एक होने पर, जो पुंलिङ्ग में भी प्रयुक्त हो ऐसा इगन्त नपुंसक, टा आदि अजादि में विकल्प से पुंलिङ्ग के समान होता है (गालव के मत में)। सुधिया, सुधिना इत्यादि। मधु — मधुनी, मधूनि, हे मधो, हे मधु। सुलु — सुलुनी, सुलूनि, सुलुना इत्यादि। धातृ — धातृणी, धातॄणि, हे धातः, हे धातृ, धातॄणाम्। इसी प्रकार ज्ञातृ आदि।
सरल व्याख्या
विशेषण रूप नपुंसक शब्दों (सुधि = बुद्धिमान, जो तीनों लिङ्गों में चलता है) के तृतीया आदि में पुंलिङ्ग जैसे रूप भी: सुधिया / सुधिना।
ह्रस्व आदेश किए जाने पर एच् (ए, ओ, ऐ, औ) के स्थान पर इक् ही होता है। प्रद्यु, प्रद्युनी, प्रद्यूनि, प्रद्युना इत्यादि। प्ररि, प्ररीणि, प्ररिणा; (परिभाषा) एक भाग में विकार होने पर भी (शब्द) अन्य नहीं होता — प्रराभ्याम्, प्ररीणाम्। सुनु, सुनुनी, सुनूनि, सुनुना इत्यादि।
सरल व्याख्या
नपुंसक में ह्रस्व करना हो तो ए/ऐ → इ, ओ/औ → उ: प्रद्यो → प्रद्यु, प्ररै → प्ररि, सुनौ → सुनु।