🕉️ 29 October 2026, Thursday · 09:24:30 PM · CDSHARMA.IN

🔱 श्रीरुद्राभिषेकम्

सम्पूर्ण प्रयोग-विधि — पार्थिव-पूजन, षोडशोपचार, द्रव्याभिषेक, रुद्राष्टाध्यायी (१–१०), हवन, शिवमहिम्नः स्तोत्र, आरती व विसर्जन
भगवान् भूतभावन कपर्दिन महाशिव के पावनचरणों में सादर समर्पित। संभार, विधि तथा पूजन एवं पूर्ण प्रयोग विधि, श्रद्धा-विश्वास तथा इष्ट के प्रति समर्पण- ये वस्तुएं पूर्ण सत्य का उद्घाटन करते हैं। रुद्राभिषेक निर्विशेष का पूजन है। निर्विकार, अदृश्य को पूजा प्राप्त कराने की वैदिक पद्धति ही रुद्राभिषेक है।
संकलन — पं. छत्रधर शर्मा, नानापुरी (पण्डरिया), जिला कबीरधाम, छत्तीसगढ़

🕉️ आज का शिववास — गुरुवार, कृष्ण पक्ष चतुर्थी

शिव कैलाश पर — ✅ सकाम रुद्राभिषेक हेतु ग्राह्य
अत्यंत शुभ। साधक को सुख, मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति व आनंद की प्राप्ति होती है।
ⓘ यह सिर्फ़ काम्य (विशेष-संकल्पित) रुद्राभिषेक हेतु प्रासंगिक है — नित्य-पूजा/जलार्पण के लिए शिववास देखने की आवश्यकता नहीं।

🔥 आज का अग्निवास (हवन हेतु)

अग्नि स्वर्ग (आकाश) में — ⚠️ हवन हेतु अशुभ
अशुभ। अग्नि जब आकाश में स्थित होती है, तो हवन करने से आयु का क्षय, प्राणपीड़ा, मानसिक उद्वेग व अनिष्ट की संभावना रहती है। अतः इस स्थिति में हवन नहीं करना चाहिए।
ⓘ यह सिर्फ़ काम्य-अनुष्ठान (नवचंडी, ग्रह-शांति, विशेष-मनोकामना-हवन आदि) हेतु प्रासंगिक है — विवाह/उपनयन जैसे षोडश-संस्कार, नित्य-अग्निहोत्र व नवरात्र/ग्रहण/श्राद्ध-निमित्त हवन में अग्निवास सदा पृथ्वी पर ही माना जाता है, विचार की आवश्यकता नहीं।
विस्तृत विचार: पूजा-योग्यता · पंचांग

📅 आगामी १० दिनों का शिववास

30-10 · शुककृष्ण पक्ष पंचमी
वृषभ (नंदी) पर आरूढ़
✅ ग्राह्य
31-10 · शनिकृष्ण पक्ष षष्ठी
भोजन करते हुए
❌ वर्जित
01-11 · रविकृष्ण पक्ष सप्तमी
श्मशान में
❌ वर्जित
02-11 · सोमकृष्ण पक्ष अष्टमी
माँ गौरी के सान्निध्य में
🌟 सोमवार
03-11 · मंगकृष्ण पक्ष नवमी
सभा में
❌ वर्जित
04-11 · बुधकृष्ण पक्ष दशमी
क्रीड़ा (खेल) में
❌ वर्जित
05-11 · गुरकृष्ण पक्ष एकादशी
कैलाश पर
✅ ग्राह्य
06-11 · शुककृष्ण पक्ष द्वादशी
वृषभ (नंदी) पर आरूढ़
✅ ग्राह्य
07-11 · शनिकृष्ण पक्ष त्रयोदशी
भोजन करते हुए
🌟 प्रदोष-व्रत (त्रयोदशी)
08-11 · रविकृष्ण पक्ष चतुर्दशी
श्मशान में
❌ वर्जित
✅ = काम्य (सकाम) रुद्राभिषेक हेतु शिववास शुभ। 🌟 = सोमवार / श्रावण / प्रदोष / महाशिवरात्रि — इन दिनों शिववास-विचार आवश्यक नहीं। निष्काम पूजा, नित्य-पूजा व ज्योतिर्लिंग में शिववास नहीं देखा जाता। (तिथि प्रातः ८ बजे की)

📑 क्रम-सूची (21 भाग)

  1. 🙏 पूर्वाङ्ग — आचमन, भस्म-रुद्राक्ष धारण, आसन-शुद्धि, दिग्बन्धन, न्यास व ध्यान
  2. 🏺 पार्थिव-लिङ्ग निर्माण, वेदिका व प्राण-प्रतिष्ठा
  3. 🌼 षोडशोपचार पूजन व द्रव्याभिषेक (पञ्चामृत, उदक, गङ्गोदक आदि)
  4. 🔱 अष्टमूर्ति पूजन, तर्पण, एकादश रुद्र, रुद्र-शक्ति व शिवगण पूजन
  5. 📜 रुद्राष्टाध्यायी — प्रथम अध्याय (गणपति, शिवसङ्कल्प सूक्त)
  6. 📜 रुद्राष्टाध्यायी — द्वितीय अध्याय (पुरुष सूक्त)
  7. 📜 रुद्राष्टाध्यायी — तृतीय अध्याय (अप्रतिरथ सूक्त)
  8. 📜 रुद्राष्टाध्यायी — चतुर्थ अध्याय (मैत्र / सूर्य सूक्त)
  9. 📜 रुद्राष्टाध्यायी — पञ्चम अध्याय (रुद्र — नमकम्)
  10. 📜 रुद्राष्टाध्यायी — षष्ठ अध्याय (महामृत्युञ्जय)
  11. 📜 रुद्राष्टाध्यायी — सप्तम अध्याय (जटा)
  12. 📜 रुद्राष्टाध्यायी — अष्टम अध्याय (चमकम्)
  13. 📜 रुद्राष्टाध्यायी — नवम शान्ति अध्याय
  14. 📜 रुद्राष्टाध्यायी — दशम स्वस्ति-प्रार्थना अध्याय
  15. 🌺 उत्तर-पूजन (षोडशोपचार) व प्रार्थना
  16. 🔥 दशाक्षर मन्त्र-जप, होम-संकल्प, पञ्चभूसंस्कार व अग्नि-स्थापन
  17. 🕉️ श्रीशिवमहिम्नः स्तोत्रम्
  18. 🪔 ध्यान, शान्तिपाठ, महानीराजन, आरती, प्रदक्षिणा व पुष्पाञ्जलि
  19. 🔱 श्रीरुद्राष्टकम्
  20. 🙏 क्षमा-प्रार्थना, विसर्जन, अर्पण व आशीर्वाद
  21. 🧺 शिवपूजन-सामग्री सूची

🖨️ श्रीरुद्राभिषेकम् — प्रिंट / PDF (₹351)

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¥🙏 पूर्वाङ्ग — आचमन, भस्म-रुद्राक्ष धारण, आसन-शुद्धि, दिग्बन्धन, न्यास व ध्यान▾
॥ ॐ परमात्मने नमः॥
॥ श्रीरुद्राभिषेकम् ॥

आचमनम्

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्॥
ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमः शिवाय॥

विभूति धारणम्

ॐ प्रसद्य भस्मना योनिमपश्च पृथिवीमग्ने।
सꣳसृज्यमातृभिष्ट्वं ज्योतिष्मान पुनरासऽदः॥

रुद्राक्षधारणम्

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात्॥

आसन शुद्धि विनियोग

ॐ पृथिवीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

आसनशुद्धिः

ॐ पृथ्वि त्वयाधृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरुचासनम्॥

दिग्बन्धनम्

गौरसर्षपान् गृहीत्वा
ॐ रक्षोहणं वलगहनं वैष्णवीमिद महन्तं वलग मुत्किरामि यं मे निष्टयो यममात्यो निचखानेद महन्तं वलगमुत्किरामि यं मे समानो यमसमानो निचखानेद महन्तं वलगमुत्किरामि यं मे सबन्धुर्यम सबन्धुर्निचखानेद महन्तं वलगमुत्किरामि यं मे सजातो यमसजातो निचखानोत्कृत्यां किरामि॥
अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमिसंस्थिता।
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया॥
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतोदिशः।
सर्वेषाम विरोधेन शिवपूजनमारभे॥
पूर्वेबलविकरणो दक्षिणे कालशासनः।
पश्चिमे पार्वतीनाथ उत्तरे मां मनोन्मनः॥
ऐशान्यामीश्वरः पायादाग्नेय्यामग्निलोचनः।
नैऋत्यां शंभुख्यांन्मांवायव्यां वायुवाहनं॥
ऊर्ध्वंबल प्रमथनः पाताले परमेश्वरः।
दशदिक्षु सदापातु साम्बसदाशिवश्चमाम्॥

नमस्कारम्

दक्षिणस्यां महादेवो रक्षेन्मे गिरिनायकः। अघोराख्यो महादेव पूर्वस्यां परिरक्षतु॥
वामदेवः पश्चिमास्यां सदा मे परिरक्षतु। उत्तरस्यां सदापातु सद्योजातः स्वरूपधृक्॥

विनियोगः

ॐ अपवित्रः पवित्रोपवेत्यस्य वामदेव ऋषिः विष्णुदेवताः गायत्री छन्दः हृदिपवित्रकरणे विनियोगः।

पवित्रमन्त्रः

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
पुण्डरीकाक्षः पुनातु॥ पुण्डरीकाक्षः पुनातु॥ पुण्डरीकाक्षः पुनातु॥

🪔 संकल्प — आज के पंचांग से साइट द्वारा जोड़ा गया

दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, बिल्वपत्र व द्रव्य लेकर संकल्प पढ़ें, फिर जल भूमि पर छोड़ दें। नाम, गोत्र, स्थान व कामना भरते ही संकल्प बदल जाता है।
🔄 अभी के पंचांग से

विनियोगः

ॐ अस्यश्रीपार्थिवेश्वर चिन्तामणि विद्यामन्त्रस्य निग्रहानुग्रहकर्ता ब्रह्माऋषिः गायत्री छन्दः पार्थिवेश्वरचिन्तामणिकामदाद्योदेवता ममाभिष्ट सिद्ध्यर्थे सकलपाप क्षयार्थे चतुर्विध पुरुषार्थ हेतवे शिवप्रीत्यर्थे पूजने विनियोगः॥
ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः शिवाय नमः॥

करन्यासः

ॐ शिवाय अंगुष्ठाभ्यां नमः॥
ॐ भवाय तर्जनीभ्यां नमः॥
ॐ शर्वाय मध्यमाभ्यां नमः॥
ॐ पशुपतये अनामिकाभ्यां नमः॥
ॐ महादेवाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः॥
ॐ ईशानाय करतलपृष्ठाभ्यां नमः॥

हृदयादिन्यासः

ॐ शिवाय हृदयाय नमः॥
ॐ भवाय शिरसे स्वाहा॥
ॐ शर्वाय शिखायै वषट्॥
ॐ पशुपतये कवचाय हुं॥
ॐ महादेवाय नेत्रत्रयाय वौषट्॥
ॐ ईशानाय अस्त्राय फट्॥

ध्यानम्

ततो पुष्पाक्षतविल्वपत्राणि गृहीत्वा ध्यायेत्
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं,
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्॥
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं,
विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
अद्धेन्दु मौलिममलाममराभिवन्द्यामम्भोज पाशसृक्पूर्ण कपाल हस्ताम्।
रक्तांग रागवसना भरणां त्रिनेत्रां ध्योच्छिवस्य वनिता मदविह्वलान्गीम्॥
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारं।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि॥
वन्दे महेशं सुरसिद्ध सेवितं कल्पद्रुमौ पूजितपादपंकजम्।
विद्याप्रदं भक्तजनैकवन्द्यं ध्यायेच्चिरं कामदुधं प्रसन्नम्॥
कैलाशपीठासन मध्यसंस्थं भक्तैश्चनन्द्यादिभि सेव्यमानं।
भक्तार्तिदावानलमप्रमेयं ध्यायेदुमालिन्गित विश्वरूपम्॥
यो योगमाया ग्रहतेव पुंसां ज्ञानं विधत्तेखिलवस्तु नीहितं।
श्रीविश्वनाथं कलिकल्मषघ्नं ध्यायेदुमालिन्गित वैकदेहम्॥
¦🏺 पार्थिव-लिङ्ग निर्माण, वेदिका व प्राण-प्रतिष्ठा▾

मृदाहरणम्

गणेश, नन्दि, गौरी, कार्तिकेय, कीर्तिमुखादीन यथोक्त मन्त्रेण मृदाहरणं कुर्यात्
ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः मृदाहरणम्।
ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः महेश्वराय नमः संघट्टनम्।
ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः प्रतिष्ठाप्य। स्थां स्थिं स्थिरोभव॥

आवाहनम्

ततो पुष्पाक्षतबिल्वपत्रेणावाहयेत्
ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः पिनाकपाणये नमः।
ॐ कैलाशशिखरान्मध्ये समागच्छ मम प्रभो।
पूजा जपं गृहीत्वा च यथोक्त फलदो भव॥
देव देवश देवेशं सर्वलोक हितेरतं।
यथोक्त रूपिणं देवं शम्भुमावाहयाम्यहम्॥

वेदिकां परिस्थापयेत्

ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः शूलपाणये नमः इह स्थितो भव॥
पार्थिवलिंगपात्रे निधाय घृतेनाभ्युक्ष्य तदुपरिदुग्धधारां च पातयेत्

प्राणप्रतिष्ठा विनियोग

ॐ अस्य श्रीसाम्बसदाशिवस्य प्राणप्रतिष्ठा मन्त्रस्य ब्रह्माविष्णुरुद्राऋषयः ऋग्यजुःसाम छन्दांसि क्रियामयवपुः प्राणाख्यादेवता प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः।
तद्यथा तत्र हस्ताभ्यां पुष्पाक्षत बिल्वपत्राणि गृहीत्वा लिंगोपरि हस्तांजलौकृत्वा प्राणप्रतिष्ठा मन्त्रान् पठेत्
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं हं सः सोऽहं अस्य श्रीसाम्बसदाशिवस्य अस्य श्रीगणेशस्य अस्यश्रीनन्दिकेश्वरस्य अस्यश्रीकीर्तिमुखस्य जीवइहस्थितः ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं हं सः सोऽहं अस्य श्रीसाम्बसदाशिवस्य अस्य श्रीगणेशस्य अस्यश्रीनन्दिकेश्वरस्य अस्यश्रीकीर्तिमुखस्य सर्वेन्द्रियाणि इहागच्छन्तु इहतिष्ठन्तु वाक् पाणि पाद पायूपस्थ वांग मनश्चक्षु श्रोत्र जिह्वा घ्राण प्राणइहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा शूलपाणे सर्वेन्द्रियाणि इहागच्छन्तु इह तिष्ठन्तु। अत्राधिष्ठानं कुरु।
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं हं सः सोऽहं अस्य श्रीसाम्बसदाशिवस्य सर्वेन्द्रियाणि मनश्चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राणादय इमे अमुस्मिनपार्थिवलिंगे सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।
ॐ स्वामिन् सर्वजगन्नाथ यावत्पूजा करोम्यहम्।
तावत्वं प्रीतिभावेन लिंगेऽस्मिन सन्निधोभव॥
पुनरपि पुष्पाक्षत बिल्वपत्राणि गृहीत्वा
ॐ अयं पुरोभवस्तस्य प्राणो भौवायनो वासन्तः प्राणायनो गायत्री वासन्ती गायत्र्यै गायत्र्यं गायत्र्या दुपाꣳशोस्त्रि वृत्त्रि वृतो रथन्तरं वशिष्ठ ऋषिः प्रजापति गृहीतया त्वया प्राणं गृह्णामि प्रजाब्भ्यः॥१॥
ॐ अयं दक्षिणा विश्वकर्मा तस्य मनोवैश्च कर्मणं ग्रीष्मो मानसस्त्रिष्टुब्ग्रैष्मी त्रिष्टुभः स्वारꣳ स्वारा दन्तर्यामोन्तर्यामात् पंचदशः पंचदशाद्वैरूपं बृहद्भरद्वाज ऋषिः प्रजापति गृहीतया त्वया मनो गृह्णामि प्रजाब्भ्यः॥२॥
ॐ अयं पश्चाद्विश्वस्य चास्तस्य चक्षुर्वैश्वव्य च संवर्षाश्चाक्षुष्यो जगती वार्षी जगत्या ऋक्साम मृक्सामाच्छुक्रः शुक्रात्सप्तदशः सप्तदशाद्वैरूपं जमदग्नि ऋषिः प्रजापति गृहीतया त्वया चक्षुर्गृह्णामि प्रजाब्भ्यः॥३॥
ॐ इदमुत्तरात् स्वस्तयश्श्रोत्रꣳसौवꣳशरच्छौत्रानुष्टुप् शारद्यनुष्टुभ ऐडमैथान्मन्थीमन्थिन एक विꣳश एक विꣳशाद्वैराज्यं विश्वामित्र ऋषिः प्रजापति गृहीतया त्वया श्रोत्रं गृह्णामि प्रजाब्भ्यः॥४॥
ॐ इदमुपरिमितस्तस्यै वाङ्मत्या हेमन्तौ वाच्यं पंक्तिर्हेमन्तौ पंक्तौ निधनतव आग्रयण आग्रयणा त्रिनव अपस्त्रिꣳशौत्रिनव त्रयस्त्रिꣳसाम्याꣳसौकृरौप्यते विश्वकर्मा ऋषिः प्रजापति गृहीतया वाचं गृह्णामि प्रजाब्भ्यो लाकेतामिन्द्रः॥५॥
ॐ मनाजूतिर्जषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनात्वरिष्टं यज्ञꣳसमिमं दधातु। विश्वेदेवास इह मादयन्तामों३प्रतिष्ठ॥
ॐ उमादेव्यै नमः। ॐ गणेशाय नमः। ॐ कीर्तिमुखाय नमः। ॐ नन्दिश्वराय नमः। ॐ पार्वत्यै नमः। ॐ शंकरप्रियायै नमः॥
गणेशादि शिवपंचायतन देवताभ्यः स्नानादि ताम्बूलान्तं पूजयेत्॥
श्रीशिवपंचायतन देवेभ्यो नमः सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षत पुष्पाणि समर्पयामि नमो नमः। ततः प्रार्थयेत्॥
à🌼 षोडशोपचार पूजन व द्रव्याभिषेक (पञ्चामृत, उदक, गङ्गोदक आदि)▾
ततो पुष्पाक्षत बिल्वपत्राणि गृहीत्वा ध्यायेत्
ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः पशुपतये नमः॥
ॐ ततो मणिस्तम्भ विराजमानं हिरण्मयं द्वारकपाट तोरणं,
महार्हनीलामणिवर्य वेदिका तदैव ध्यायेच्छिखरे शिवालयम्।
संतप्त हेमकलशैर्बहुभिर्विचित्रैः प्रोद्भासितं स्फटिक सौधवलाभिरामं,
रम्यं च तच्छिववरंपुरपीठमध्ये लिंगंस्वरत्नसहितं मनसाभिध्याये॥
ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः शिवाय नमः। प्रपन्नपारिजाताय स्वाहा॥

आवाहनम्

अक्षतेन्
ॐ नमस्ते रुद्र मन्न्यव ऽउतोत इषवे नमः। बाहुभ्यां मुतते नमः॥
आगच्छ देवदेवश महादेवा भयंकरः।
गृहाणसहपार्वत्या तव पूजां करोम्यहम्॥
(पूजा मयाकृतम्)॥

आसनम्

पुष्पेन्
ॐ या ते रुद्र शिवातनूर घोरा पापकाशिनी।
तया नस्तन्वाशन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि॥
विश्वेश्वर महादेव राजराज प्रियेश्वर।
आसनं दिव्यमीशान दासोऽहं परमेश्वर॥

पाद्यम्

जलेन्
ॐ यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे।
शिवां गिरित्रतां कुरु मा हिꣳसीः पुरुषं जगत्॥
महादेव महेशान महानन्द परात्परं।
गृहाण पाद्यं पाद्यन्ते पार्वती सहितेश्वर॥

हस्तयोः अर्घम्

जलाक्षत पुष्प बिल्वपत्र गन्धैः
ॐ शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छा वदामसि।
यथा नः सर्वमिज्जगद् यक्ष्मꣳसुमना असत्॥
तापत्रय हरं दिव्यं परमानन्द लक्षणम्।
तापत्रय विमोक्षाय तवार्घ्यं कल्पयाम्यहम्॥
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

आचमनम्

ॐ अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमोदैव्योभिषक्।
अहींश्च सर्वान्जम्भयन्त्सर्वांश्च यातुधान्योऽधराचीः परासुवः॥
त्रिपुरान्तक दीनार्तनाशिन् श्रीकण्ठभूपते।
गृहाणाचमनं चारु पवित्रोदककल्पितम्॥

मधुपर्कम्

ॐ अन्नपतेन्नस्य नो देह्यमीवस्य शुष्मिणः।
प्र पदातारं तारिषं ऊर्ज्जनो धेहि द्विपदे चतुष्पदे॥
उमाकान्त महादेव तत्वज्ञान स्वरूपिणम्।
मधुपर्क गृहाणेदं पार्वतीपतये विभो।
इदं मधु मया दत्तं तव तुष्ट्यर्थमेव च।
गृहाणशम्भोमे भक्त्या सुप्रसन्नो भव प्रभो॥

आचमनम्

ॐ आच्याजानु दक्षिणतो निषधेमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे।
मा हिꣳसिष्टः पितरः केनचिन्नो यद्वड आगः पुरुषता कराम्॥
त्रिपुरारि नमस्तुभ्यं त्रिदशैरभिवन्दितं।
गंगाहृतेन तोयेन शीघ्रमाचमनं कुरु॥

पयः स्नानम्

ॐ पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयोदिव्यऽन्तरिक्षे पयोधाः।
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्॥

शुद्धस्नानम्

ॐ आपोहिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातनः। महेरणाय चक्षसे॥

दधिम्

ॐ दधिक्राब्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः।
सुरभिनो मुखाकरत्प्रण आयूꣳषितारिषत्॥
-पुनर्जलेन।

घृतम्

ॐ घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृतेश्रितो घृतमवस्यधाम।
अनुष्वधमावहमादय स्व स्वाहा कृतं वृषभवर्क्षि हव्यम्॥

शुद्धस्नानम्

ॐ तस्माऽअरं गगाम वो अस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जन यथा च नः॥

मधुस्नानम्

ॐ मधुवाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधि॥ मधुनक्त मुतोषसो मधुमत्पार्थिवꣳरजः।
मधुद्यौरस्तु नः पिता॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधु मां २ अस्तु सूर्यः।
माध्वीर्गावो भवन्तु नः॥

शुद्धस्नानम्

ॐ आपो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतस्य पुनन्तु।
विश्वꣳहिरि प्रं प्रवहन्ति देवी रुदिदाभ्यः शुचिरापूत एभि॥

शर्करास्नानम्

ॐ अपाꣳरसमुद्ववयसꣳसूर्ये सन्तꣳसमाहितम्।
अपाꣳरसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयाम गृहीतोऽसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम्॥

शुद्धस्नानम्

ॐ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयते हनः। उशतीरिवमातरः॥

पंचामृतम्

ॐ पंचनद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्त्रोतसः।
सरस्वती तु पंचधा सो देशेऽभवत्सरित॥
सर्पिस्सुदुग्धदधिमाक्षिकशर्कराद्यै र्भागैर्युतैः कनक कुम्भभृतैः समन्त्रैः।
कर्पूर केशर सुगन्धिभिरिन्दु मौले स्नानार्थमर्पितमिदं विधिवत् गृहाण॥

शुद्धोदक

ॐ शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्तआश्विनः।
श्येतः श्येताक्षो ऽरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णायामा अवलिप्ता रौद्रा नभो रूपाः पार्जन्याः॥

ईक्षुरस

ॐ उर्क्चमे सुनृताचमे पयश्चमे रसस्चमे घृतंचमे मधुचमे सग्धिश्चमे सपीतिश्चमे कृषिश्चमे वृष्टिश्चमे जैत्रंचम ऽऔद्भिद्यंचमे यज्ञेन कल्पन्ताम्।
-पुनर्जलेन।

गंधोदक

ॐ अꣳशुनाते अꣳशुः पृच्यतां परुषापरुः।
गन्धस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः।
-पुनर्जलेन।

कुशोदक

ॐ शरासः कुशरासो दर्भासाः सैर्याउत।
मोज्जाअदृष्टा वैरिणा सर्वेसाकं न्यलिप्सत्॥
-पुनर्जलेन।

पुष्पोदक

ॐ कोदण्ड खण्डित पुरत्रियारोषच्चूर्णीकृता, समशराप ललाट वक्त्रेत्स्तुत्या।
सुरादिभि रजतस्त्रमतिस्तु तापं, स्नानायतेस्तु सुरभिकृत पुष्पतोयं॥
-पुनर्जलेन।

फलोदक

ॐ खर्जूरजम्बुकदली पनसाम्रपक्व, पूगीकपित्थ बदरीजमुदुम्बराणि।
धात्रीफलानि मनोहराणि भक्त्या निरन्तरमहं स्नपयामि शम्भो॥
-पुनर्जलेन।

रत्नोदक

ॐ रत्नोदकैर्मणिगणैरुदितार्क बिम्ब तुल्यैसमान विमलैर्गुण मौक्तिकानि।
वज्रप्रवालमणिरन्जितनीलकाद्यैः भक्त्या निरन्तरमहं स्नपयामि शम्भो॥
-पुनर्जलेन।

उष्णोदक

ॐ नमः उष्णीषिणे गिरिचराय कुलुन्चानां पतये नमो नम इषुमद्भ्यो धन्वायिभ्यश्च वो नमो।
नम आतन्वानेभ्यः प्रतिदधानेभ्यश्च वो नमो नम आयच्छद्भ्योस्यद्भयश्च वो नमो नमो विसृजद्भ्यः॥
-पुनर्जलेन।

भस्मोदक

ॐ प्रसद्य भस्मना योनिमपश्च पृथिवीमग्ने।
सꣳसृज्ज्य मातृभिष्ट्वं ज्ज्योतिष्मान् पुनराऽसदः॥
ॐ गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढ़ गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानी कलत्रं भजेपंचवत्रम्॥
ॐ गंगाधरं शशिकिशोरधरं त्रिलोकी रक्षाधरं निटिल चन्द्रधरं।
भस्मावधूलनधरं गिरिराजकन्या दिव्यावलोकनधरं वरदं प्रपद्ये॥
-पुनर्जलेन।

कर्पूरोदक

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षिय मामृतात्॥
-पुनर्जलेन।

सुगन्धोदक

(गुलाबजल, केवड़ाजल, इत्र)
ॐ अꣳशुश्चमे रश्मिश्चमे ऽदाभ्यश्चमे ऽधिपतिश्चम ऽउपाꣳशुश्चमे ऽन्तर्यामश्चम ऽऐन्द्रवायवश्चमे मैत्रावरुणश्चम ऽआश्विनश्चमे प्रतिप्रस्थानश्चमे शुक्क्रश्चमे मन्थी च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥
-पुनर्जलेन।

वर्षाजल

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीयमामुतः॥
-पुनर्जलेन।

अभ्रोदक

ॐ आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः।
क्षोभणश्चर्षणीनाम्। सङ्क्रन्दनो निमिष ऽएकवीरः शतꣳसेना अजयत्साकमिन्द्रः॥
-पुनर्जलेन।

औषधी

ॐ या ओषधीः पूर्वाजाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।
मनैनुबभ्रुणामहꣳशतं धामानि सप्त च॥
ॐ या ऽओषधीः सोमराज्ञीर्विष्ठिता पृथिवीमनु।
बृहस्पतिप्प्रसूता ऽअस्यै सन्दत्तवीर्य्यम्॥
-पुनर्जलेन।

गंगोदक

ॐ स्वात्राः पीता भवत यूमगापो ऽअस्माकमन्तरुदरे सुशेवा ताऽअस्मब्भ्यः म यक्ष्मथा ऽअनमीवा ऽअनागसः स्वदन्तु देवी स्मृताऽ ऋतावृधः॥
गङ्गोदकं च यमुनोदकमेतदीश गोदावरीजलमिदं सरयूजलं च।
रेवोदकं च मम भावनया प्रणीत शुद्धोदकं परिगृहाण सुनुप्रसन्नः॥
ॐ गंगागंगेति यो बू्रयात् योजनानां शतैरपि।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥
स्मृत्वा जन्मशतं पापं दृष्ट्वा जन्मशतद्वयं।
पीत्वा जन्मसहस्रेषु हरेद्गंगा कलौयुगे॥
-पुनर्जलेन।

अभिषेकस्नानम्

ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव उता त इषवे नमः।
बाहुभ्यामुत ते नमः॥१॥
या ते रुद्र शिवा तनूर घोरा ऽपापकाशिनी।
तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि॥२॥
यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिꣳसीः पुरुषं जगत्॥३॥
शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छावदामसि।
यथा नः सर्वमिज्जगदयक्ष्मꣳसुमना असत्॥४॥
अध्यवा च दधिवक्ता प्रथमो दैव्योभिषक्।
अहींश्च सर्वान्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्यो ऽधराचीः परासुव॥५॥
असौयस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमंगलः।
ये चैनꣳरुद्रा अभितो दिक्षुश्रिताः सहस्रशो वैषाꣳहेड ऽइमहे॥६॥
असौ यो ऽवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः।
उतैनं गोपा अदृश्रन्नुदहार्यः स दृष्टो मृडयाति नः॥७॥
नमोस्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे।
अथो ये अस्य सत्वानोऽहं नेभ्योऽ करं नमः॥८॥
प्रमुन्च धन्वनस्त्वमुभयोरार्त्न्योर्ज्याम्।
याश्च ते हस्त इषवः पराता भगवोवप॥९॥
विज्यं धनुः कपर्दिनो विशल्यो बाणवाँ २ उत॥१०॥
या ते हेतिर्मीढुष्ठम हस्ते बभूव ते धनुः।
तया ऽस्मान्विश्वतस्त्वम यक्ष्मया परिभुज॥११॥
परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः।
अथो य इषुधिस्तवारे अस्मन्निधेहितम्॥१२॥
अवतत्य धनुष्ट्वꣳसहस्राक्ष शतेषुधे।
निशीर्य शल्यानां मुखा शिवो नः सुमनाभव॥१३॥
नमस्त आयुधायानातनाय धृष्णवे।
उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने॥१४॥
मानोमहान्तमुतमानो अर्भकं मान उक्षन्तमुतमानउक्षितम्।
मानो वधीः पितरं मोतमातरं मानः प्रियास्तन्वोरुद्ररीरिषः॥१५॥
मानस्तोके तनये मान आयुषिमानो गोषुमानो अश्वेषुरीरिषः।
मानो वीरान् रुद्रभामिनोवधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे॥१६॥

आचमनम्

ॐ अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमोदैव्योभिषक्।
अहींश्च सर्वान्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातु धान्योऽ धराचीः परासुव॥
त्रिपुरारि नमस्तुभ्यं त्रिदशैरभिवन्दितम्।
मयादत्तमिदं तोयं गृहाणाचमनं कुरु॥

सुगन्धित तैलाभ्यंगम्

ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातोमलादिव।
पूतं पवित्रेणे वाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥

वस्त्रम्

ॐ असौ योऽवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः।
उतैनंगोपा अदृश्रन्नुदहार्यः स दृष्टो मृडयातिनः॥
ॐ युवा सुवासाः परिवीतऽ आगात्सऽ उश्रेयान्भवति जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्योमनसादेवयन्तः॥
वस्त्र युग्मं समानीतं पट्टसूत्रेण निर्मितम्।
सूक्ष्मं कार्पास तन्तूनां सुवर्णेन विराजितम्॥
-पुनर्जलेन(आचमनम्)।

यज्ञोपवीतम्

ॐ नमोऽस्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे।
अथो ये अस्य सत्वानोऽहं तेभ्योऽ करं नमः॥
ॐ यज्ञोपवीतं परमंपवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुन्चशुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
-पुनर्जलेन(आचमनम्)।

पुनर्वसनम्

ॐ नमः कपर्दिने च व्युप्त केशाय च नमः सहस्राक्षाय च शतधन्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्ठाय य॥
ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरुथमाऽ सदत्स्वः।
वासो अग्ने विश्वरूपꣳसंव्ययस्व विभावसो॥
-पुनर्जलेन(आचमनम्)।

गन्धम्

ॐ प्रमुन्च धन्वनस्त्वमुभयोरार्त्न्योर्ज्याम।
याश्चते हस्त इषवः पराता भगवोवपः॥
ॐ त्वां गन्धर्वाऽ अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः।
त्वमोषधे सोमोराजा विद्वानयक्ष्मादमुच्यत॥

कुंकुमम्

ॐ इन्द्रस्य रूपमृषयो बलाय कर्णाब्भ्याꣳश्रोतं मृतं गुहाब्भ्याम्।
यवानबर्हिर्श्रुविकेसराणि कर्कन्धु यज्ञे मधुरारघमुखात॥

भस्मम्

ॐ प्रसद्य भस्मना योनिमपश्च पृथिवीमग्ने।
सꣳसृज्य मातृभिष्ट्वं ज्ज्योतिष्मान् पुनराऽसदः॥
ॐ यदङ्गसंसर्गकृता वरेण्यं मौलौनिजे सङ्गमयन्ति देवाः।
देहे सदैवाहितविश्वभारे सारे जगत्या वितनोति भस्म॥

अक्षतम्

ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमशंकराय च मयस्करायच नमः शिवाय च शिवतरायच।
ॐ श्वेतैरखण्डित मनोहरशालिबीजैः संक्षालितैः शुचिजलैश्च सुगन्धिमिश्रैः।
त्वामर्चयामि भगवन्! मनसा सदाहं गौरीपतेमयि निधेहि कृपाकटाक्षम् ॥

सप्तधान्यम्

ॐ व्रीहयश्चमे यवाश्चमे माषाश्चमे तिलाश्चमे मुद्गाश्चमे खल्वाश्चमे प्रियङ्गवश्चमे ऽणचश्चमे श्यामाकाश्चमे नीवाराश्चमे गोधूमाश्चमे मसूराश्चमे यज्ञेनकल्पन्ताम्॥

बिल्वपत्रम्

ॐ नमो बिल्मिने च कवचिने च नमो वर्मिणे च वरुथिने च नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्याय चाहनन्याय च।
ॐ अमृताद्भवं च श्रीवृक्षं शंकरस्य सदाप्रियम्।
बिल्वपत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते सुरेश्वर॥
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम्।
त्रिजन्मपाप संहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
मालूर वृक्ष जनितानि मनोहराणि भक्त्यात्वदर्थमनिशं प्रतिपादितानि।
श्रीबिल्वपत्र विपुलानि समर्पितानि गौरीपते परिगृहाण सुकोमलानि॥

बिल्वाष्टकेन नामलिखितं बिल्वपत्रम्

ॐ त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्।
त्रिजन्म पाप संहारं बिल्व पत्रं शिवार्पणम्॥
काशीवास निवासी च कालभैरव दर्शनम्।
कोटीकन्यामहादानं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
दर्शनं बिल्वपत्रस्य स्पर्शनं पापनाशनम्।
अघोरपाप संकाशं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
अखण्डैर्बिल्वपत्रैश्च पूजयेच्छिवशंकरम्।
कोटीकन्यामहादानं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
गृहाण बिल्पपत्राणि सपुष्पाणि महेश्वरः।
सुगन्धीनि भवानीश शिव त्वं कुसुमप्रियः॥
त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च अच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः।
तव पूजां करिष्यामि गृहाण परमेश्वर॥
श्रीवृक्षामृतसम्भूतं शंकरस्य सदाप्रियम्।
पवित्रं ते प्रयच्छामि बिल्वपत्रम् सुरेश्वरम्॥
त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च कोमलैश्चातिसुन्दरैः।
त्वां पूजयामि विश्वेश प्रसन्नो भव सर्वदा॥
ॐ अमृताद्भव श्रीवृक्षं शंकरस्य सदाप्रियम्।
तत्ते शम्भो प्रयच्छामि बिल्वपत्रं सुरेश्वर॥

पुष्पम्

ॐ नमः पार्याय चावार्याय च नमः प्रतरणाय चोत्तरणायच नमस्तीर्थ्याय च कूल्याय च नमः शष्प्याय च फेन्न्याय च॥

शमीपत्रम्

ॐ अग्नेस्तनूरसि वाचो विसर्जनं देववीयते त्वा गृह्णामि बृहद्ग्रावासि वानस्पत्यः स इदं देवेब्भ्यो हविः शमीष्व सुशमि शमीष्व। हविष्कृदेहि हविष्कृदेहि॥
ॐ ऋतवस्तऽ ऋतुथा पर्वशमीतारो विशासतु।
संवत्सरस्य तेजसा शमीभीः शम्यन्तुत्वा॥
अमंगलानां शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च।
दुःस्वप्न नाशिनीं धम्यां प्रपद्येऽहं शमींशुभाम्॥

तुलसीमन्जरीम्

ॐ शिवोभव प्रजाब्भ्यो मानुषीब्भ्यस्त्वमंगिरः।
म द्यावा पृथिवीऽ अभिशोचीर्म्मान्तरिक्षम्मावनस्पतीम्॥

कनकपुष्पं फलं वा

ॐ कार्षिरसि समुद्द्रस्य त्वाक्षित्याऽ उन्नयामि।
समापोऽ अद्भिरग्मत समोषधिभिरोषधीः॥
ॐ धीरंधैर्य परीक्षार्थ धारितं परमेष्ठिना।
धत्तूरं कण्टकाकीर्णं गृहाण परमेश्वर॥

सुगन्धित द्रव्यम्

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात्॥
ॐ श्रीकेतकीबकुलचम्पकमल्लिकानां, संभृत्यसार सुचितं किल गन्धद्रव्यम्।
पात्रे हाटकमये मणिरन्जितान्मे। तुलगृहाण जगदीश सुगन्धि युक्ताम्॥

आभूषणम्

ॐ युवंतमिन्द्रा पर्व्वताः पुरोयुधा योनऽ एतन्याद पतन्तमिद्धत वज्रेणतन्तमिद्धतम्।
दूरेतत्ताय छन्त्सद्गहन यदिनक्षत्॥
वज्रमाणिक्यवैदूर्यमुक्ता विद्रुममण्डितम्।
पुष्पराग समायुक्तं भूषणं प्रतिगृह्यताम्॥

नानापरिमल द्रव्यम्

ॐ अहिरिव भोगैः पर्येतिबाहुं ज्यायाहेतिं परिबाधमानः।
हस्तघ्नो विश्वावयुनानि विद्वान पुमान पुमाꣳसं परिपातु विश्वतः॥
ॐ श्वेतातिरेणु सहितं शुभरक्तचूर्णं सिंदूरचूर्ण विपुलान्वित पीतचूर्णम्।
कर्पूरकेसर सुगन्धि सुवासितं च सौभाग्य चूर्णमुररी कुरु दीनबन्धो॥

सिन्दूरम्

ॐ सिन्धोरिव प्राध्वनो शूघनाशोवातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः।
घृतस्य धाराअरुषोनवाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः॥

अंगपूजनम्

ॐ शिवाय नमः पादौ पूजयामि।
ॐ सर्वात्मने नमः शिरः पूजयामि।
ॐ हराय नमः ललाटं पूजयामि।
ॐ त्रिनेत्राय नमः नेत्रान्पूजयामि।
ॐ इन्दुमुखाय नमः मुखं पूजयामि।
ॐ असितकण्ठाय नमः कण्ठं पूजयामि।
ॐ वामदेवाय नमः स्कन्धौ पूजयामि।
ॐ सद्योजाताय नमः कर्णौ पूजयामि।
ॐ वृषभध्वजाय नमः भुजौ पूजयामि।
ॐ अघोराय नमः हृदयं पूजयामि।
ॐ तत्पुरुषाय नमः स्तनौ पूजयामि।
ॐ ईशानाय नमः उदरं पूजयामि।
ॐ ज्ञानमूर्तये नमः कटिं पूजयामि।
ॐ अनन्तवैराग्य सिंहाय नमः उरुं पूजयामि।
ॐ अनन्तैश्वर्याय नमः जानुनीं पूजयामि।
ॐ प्रधानाय नमः जंघौ पूजयामि।
ॐ व्योमात्मने नमः गुल्फौ पूजयामि।
ॐ व्योमकेशाय नमः केशान्पूजयामि।
ॐ आत्मरूपाय नमः पृष्ठं पूजयामि।
ॐ वामेपार्वत्यै नमः हस्तौ पूजयामि।
ॐ तुष्टे नमः सर्वाङ्गं पूजयामि॥
- इत्यङ्ग पूजनम् ततो-

धूपम्

ॐ या ते हेतिर्मीढुष्टम हस्ते वभूव ते धनुः।
तयाऽस्मान्विश्व तस्त्वयक्ष्मया परिभुज॥
ॐ कालाङ्गुरोश्च घृतमिश्रित गुग्गुलस्य, धूपोमयाविरचितो भवतः पुरस्तात्।
आघ्राय तं शुचि मनोहर गन्धचूर्णं, तूर्णं विनाशय महेश्वर मोहजालम्॥

दीपम्

ॐ परितेधन्वनो हेतिरस्मान् वृणक्तुविश्वतः।
अथोयइषुधिस्तवारे अस्मन्निधेहितम्॥
ॐ पूर्णे घृतेन गिरिजेश सुवर्णपात्रे, कौसुम्भ सूत्र दृढ़वर्तिविराजमानः।
दीपः पुरस्तव मयारचितो य एष, शीघ्रं विनाशयतु मे दुरितान्धकारम्॥

नैवेद्यम्

ॐ अवतत्य धनुष्ट्वꣳसहस्राक्षशतेषुधे।
निशीर्य शल्यानां मुखाशिवो नः सुमना भव॥
ॐ जिह्वासुधां कनकपात्र विराजमान मन्त्रादिकं मधुरशाकफलावलीढम्।
पंचामृतल्पुतमनेकविधं रसौधं संकल्पितं त्वमुररी कुरु दीनबन्धोः॥
ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा। ॐ व्यानाय स्वाहा। ॐ उदानाय स्वाहा। ॐ समानाय स्वाहा॥

आचमनीयं जलम्

मध्ये जलम्
ॐ नमः सोभ्याय च प्रतिसर्याय च नमो याम्याय च क्षेम्याय च नमः श्लोक्याय च वसान्याय च नमः उर्वर्याय च खल्याय च॥

करोद्वर्तनम्

ॐ सिन्चति परिषिन्चन्त्युत्सिन्चन्ति पुनन्ति च।
सुरायै बभ्रवै मदे किन्त्वो वदति किन्त्वः॥
ॐ अꣳशुना ते अꣳशुः पृच्यतां परुषा परु।
गन्धस्ते सोममवतु मदायरसो ऽअच्युतः॥

ताम्बूलम्

ॐ नमस्त आयुधायानातनाय धृष्णवे।
उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने॥
ॐ मानस्तोके तनये मान आयुषिमानो गोषुमानो अश्वेषुरीरिषः।
मानो वीरान् रुद्रभामिनोवधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे॥

पूगीफलम्

ॐ इमारुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्रभरामहेमतीः।
यथाशमसद्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम्॥

लवंगम्

ॐ सोमाय लवानालभते त्वष्ट्रे कौलीकान् गोषादिर्देवानां पत्नीब्भ्यः कुलीका देवजामिब्भ्योऽग्नये गृहपतये पारुष्णान्॥

इलायचिम्

ॐ ये पथां पथिरक्षय ऽऐलवृदाऽ आयुर्युधः।
तेषाꣳसहस्त्रयोजनेऽव धन्न्वानि तन्न्मसि॥

जायफलम्

ॐ त्वमग्नेद्युभिस्त्वमाशु शुक्षणिस्त्व मदब्भ्यस्त्व मश्मनस्परि त्वं वनेब्भ्य त्वमोषधिब्भ्य स्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः॥

जावित्री

ॐ यावतिद्याधा पृथिवी यावच्च सप्त सिन्धवो वितस्थिरे।
तावन्तमिन्द्र ते ग्रहमूर्जा गृह्णाम्यक्षितं मयि गृह्णाम्यक्षितम्॥

ऋतुफलम्

ॐ उदीचीमारोहानुष्टुत्वावतु वैराजꣳसामैक विꣳशस्तोमः शरदृतः फलं द्रविणम्। सीसेन तन्त्रं मनसा मनीषिण ऽऊर्णा सूत्रेण कवयोवयन्ति। अश्विना यज्ञꣳसविता सरस्वतीन्द्रस्य रूपंवरुणोभिषज्यन्। अश्विना धर्मं पातꣳहाध्वनि महर्दिवाभिरुतिभिः॥

सुगन्धित द्रव्यम्

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात्॥
ॐ श्रीकेतकीबकुलचम्पकमल्लिकानां, संभृत्यसार सुचितं किल गन्धद्रव्यम्।
पात्रे हाटकमये मणिरन्जितान्मे। तुलगृहाण जगदीश सुगन्धि युक्ताम्॥

श्रीफलम्

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।
बृहस्पति प्रसूतास्तानो मुन्चन्त्वꣳहसः॥

दक्षिणा द्रव्यम्

ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
सदाधार पृथिवींद्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम्॥

प्रार्थना

शान्तं पद्मासनस्थं शशिधर मुकुटं पन्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।
शूलं वज्रं च खड्गं परशुमभयदं दक्षिणाङ्गे वहन्तम्॥
नगं पाशं च घण्टां डमरुक सहितं साङ्कुशं वामभागे।
ननालंकार युक्तं स्फटिक मणिनिभं पार्वतीशं नमामि ॥
(स्मरामि)॥
¥🔱 अष्टमूर्ति पूजन, तर्पण, एकादश रुद्र, रुद्र-शक्ति व शिवगण पूजन▾

मूर्तिपूजनम्

वामावर्त क्रमेण

ततः अष्टमूर्तिन्आवाहयेत्

ॐ शर्वायक्षतिमूर्तये नमः।
ॐ भवायजलमूर्तये नमः।
ॐ रुद्राय अग्निमूर्तये नमः।
ॐ उग्राय वायुमूर्तये नमः।
ॐ भीमाय आकाशमूर्तये नमः।
ॐ पशुपतये यजमानमूर्तये नमः।
ॐ महादेवाय सोममूर्तये नमः।
ॐ ईशानाय सूर्यमूर्तये नमः॥
॥ ॐ अष्टमूतिधर शिवाय नमः॥ इति मन्त्रेण यथोपचार द्रव्यैः पूजयेत्
(पंचोपचार पूजनक्रमे “सर्वोपचारार्थे गंधाक्षत पुष्पाणि समर्पयामि”)।

ध्यानम्

ॐ वेदान्तेषु यमाहुरेक पुरुषं व्याप्य स्थितं रोदसि,
यस्मिन्नीश्वर इत्यनन्य विषयः शब्दो यथार्थाक्षरः।
अंतर्यश्च मुमुक्षिभिर्नियमतः प्राणादिभिर्मृग्यते,
संस्थाणुः स्थिर भक्तियोग सुलभोनिःश्रेयसायास्तुवः॥

तर्पणम्

यव-तिल-जलेन्
ॐ नमः शिवाय शिवं तर्पयामि।
ॐ नमो भवाय भवं तर्पयामि।
ॐ नम उग्राय उग्रं तर्पयामि।
ॐ नमो मृडाय मृडं तर्पयामि।
ॐ नमो हराय हरं तर्पयामि।
ॐ नमः शशिशेखराय शशिशेखरं तर्पयामि।
ॐ नमः शंकराय शंकरं तर्पयामि।
ॐ नमो विरूपाक्षाय विरूपाक्षं तर्पयामि।
ॐ नमो विश्वरूपाय विश्वरूपं तर्पयामि।
ॐ नमः कपर्दिने कपर्दिनं तर्पयामि।
ॐ नमस्त्र्यम्बकाय त्र्यम्बकं तर्पयामि।
ॐ नमो महेश्वराय महेश्वरं तर्पयामि।

एकादश रुद्रपूजनम्

अक्षतेन
ॐ अघोराय नमः।
ॐ पशुपतये नमः।
ॐ शिवाय नमः।
ॐ विरूपाक्षाय नमः।
ॐ त्र्यम्बकाय नमः।
ॐ भैरवाय नमः।
ॐ कपर्दिने नमः।
ॐ ईशानाय नमः।
ॐ शूलपाणये नमः।
ॐ पिनाकपाणये नमः।
ॐ महेश्वराय नमः॥
एकादशरुद्रान् षोडशोपचारैः पूजयेत्- पुरुषसूक्तेन।
(अथवा “सर्वोपचारार्थे अक्षत-पुष्पाणि समर्पयामि।”)।

ततो ध्यानम्

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं,
द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यं।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधी साक्षिभूतं,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥
कल्याणनां निधानां कलिमलमथनं पावनं पावनानां,
पाथेयं यन्मुमुक्षोः सपदि परपदं प्राप्तये प्रस्थितस्य।
विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्जनानां,
बींज धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम॥

एकादश रुद्रशक्ति पूजनम्

ततः शक्तिन् आवाहयेत्
ॐ भगवत्यै नमः।
ॐ उमादेव्यै नमः।
ॐ शिवायै नमः।
ॐ शंकरप्रियायै नमः।
ॐ पार्वत्यै नमः।
ॐ गौर्यै नमः।
ॐ कालिन्द्यै नमः।
ॐ कोटिन्यै नमः।
ॐ शिवधारिण्यै नमः।
ॐ विश्वेश्वर्यै नमः।
ॐ विश्वमात्रे नमः।
ॐ रुद्रशक्तिभ्यो नमः॥
षोडशोपचारैः पूजयेत्

आवाहनम्

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्ण रजतस्रजाजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥

आसनम्

ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥

पाद्यम्

ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद प्रमोदिनीम्।
श्रियं देवी मुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥

अर्घ्यम्

ॐ कांसोस्मितां हिरण्य प्राकाशमार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तातर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥

आचमनम्

ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मनीमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि॥

स्नानम्

ॐ आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥

वस्त्रोपवस्त्रम्

ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽमि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिवृद्धिं ददातु मे॥

स्वर्णोपवीतम्

ॐ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥

चन्दनम्

ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥

अक्षतान्

ॐ अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रियाऽअधूषत।
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजान्विन्द्रते हरी॥

हरिद्राचूर्णम्

ॐ तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्विततꣳसं जभार।
यदेदयुक्त हरितः सधस्थादात्री वासस्तनुते सिमस्मै॥

कुंकुमम्

ॐ उस्त्रावेतं धूर्षाहौ युज्येथामनश्रुऽ अबीरहणौ ब्रह्म चै दनौ।
स्वस्ति यजमानस्य जहान गच्छतम्॥

सिन्दूरम्

ॐ सिन्धोरिव प्राद्ध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः।
घृतस्यधारा ऽअरुषो न वाजी काष्ठाभिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः॥

आभूषणम्

अस्माकꣳशत्रुन् षरिशूर विश्वतो दर्मादर्षीष्टविश्वतः।
भूर्भुवः स्वः सु प्रजाः प्रजाभिः स्याम सुवीरा वीरैः सुपोषाः पोषैः॥

पुष्पाणि

ॐ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥

सौभाग्यद्रव्यम्

ॐ कर्दमेन प्रजाभूतामयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥

धूपम्

ॐ यः शुचि प्रयतोभूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पन्चदशर्च च श्रीकामः सततं जपेत्॥

दीपम्

ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीतवस मे गृहे।
थ्न च देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले॥

नैवेद्यम्

ॐ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयी लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥

ऋतुफलम्

ॐ याः फलिनीर्या ऽअफला ऽअपुष्पायाश्च पुष्पिणीः। बृहस्पति प्रसूतास्तानो मुन्चन्त्वꣳहसः॥

ताम्बूलम्

ॐ उतस्मास्यद्द्रवतस्तुरण्यतः पर्णन्नवेरनुवाति प्रगर्द्धिनः।
श्येनस्येव ध्रजतो अंकसम्परि दधिक्राब्णः सहोर्ज्जातरित्रतः स्वाहा॥

दक्षिणा

ॐ हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक ऽआसीत्।
सदाधार पृथिवीं द्यामुतमां कस्मै देवाय हविषा विधेम्॥

नमस्कार

ॐ आर्द्रां यः करिणीं यष्टि सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आवह॥

प्रदक्षिणा

ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतिं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥

पुष्पान्जलिः

ॐ यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्य मन्वहम्।
सूक्तं पन्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥

ध्यानम्

गौरीं चतुर्भुजां चण्डीं त्रिनेत्रां मुकुटोज्वलां।
पद्म दर्पण हस्तां च वरदाभय हस्तकाम्॥
दिव्यवस्त्र परीधानां दिव्यालंकार भूषितां।
प्रसन्नवदनां ध्यायेच्छिवोत्संगे तु वामतः॥
शैलेन्द्रादव तारिणी निजजले मज्जज्जनोतारिणी,
परावार विहारिणी भवभयश्रेणीसमत्सारिणी।
शेषाहेरनुकारिणी हरशिरोवल्लीदलाकारिणी,
काशीप्रान्तविहारिणी विजयते गंगा मनोहारिणी॥

शिवगणपूजनम्

ॐ गणपतये नमः। ॐ कार्तिकेयाय नमः। ॐ पुष्कराय नमः। ॐ कालिन्द्याय नमः। ॐ देवेशाय नमः। ॐ नन्दिने नमः। ॐ भृंगाय नमः। ॐ किरीटाय नमः। ॐ वृषभाय नमः। ॐ स्कन्दाय नमः। ॐ कपर्दिने नमः। ॐ कीर्तिमुखाय नमः। ॐ वीरभद्राय नमः॥
- षोडशोपचारैः पूजयेत्-

ध्यानम्

ॐ यं यं यं यक्षरूपं दशदिशि वदनं भूमि कम्पायमानं।
सं सं सं संहारमूर्तिं शिरसिधृत जटाशेखरं चन्द्रबिम्बं॥
दं दं दं दीर्घकेशं कृतनरवपुषं ऊर्ध्वरेखा करालं।
पं पं पं पापनाशं प्रणत पशुपतिं भैरवं क्षेत्रपालं॥
ॐ शुद्धं स्फटिक संकाशं त्रिनेत्रं पन्चवक्त्रम्,
गंगाधरं दशभुजं सर्वाभरण भूषितम्।
नीलग्रीवं शशांकं नागयज्ञोपवीतिनम्,
व्याघ्र चर्मोत्तरीयं च वरेण्यमभयप्रदम्॥
कमण्डल्वक्ष सूत्राभ्यामन्वितं शूलपाणिनम्।
ज्वलन्तं पिन्गलजटा जूटमुद्योत कारिणम्॥
अमृतेनाप्लुतं हृष्टमुमादेहार्ध धारिणम्,
दिव्यसिंहासनासीनं दिव्यभोगसमन्वितम्।
दिग्देवता समायुक्तं सुरासुर नमस्कृतम् नित्यं च शाश्वतं शुद्धं ध्रुवमक्षरमव्ययम्॥
सर्वव्यापी नमीशानं रुद्रं वै विश्वरूपिणम्,
एवं ध्यात्वा द्विजः सम्यक् ततो जपं समारभेत्।
स्फुटित नलिन संस्थं मौलिमध्येन्दुरेखा,
गतमृदुल जलार्धं चन्द्रवह्न्यर्क नेत्रम्।
सुकरकलितमुद्रा पाशवेदाक्षमाला,
स्फटिक रजत मौक्तं गौरिमीशं नमामि॥
रक्ताम्भोधिस्तपोतोल्लसदरुण सरोजाधिरूढ़ा कराब्जैः,
पाशं कोदण्डमिक्षूद्भवगुणमथ चाप्यं कुशं पन्चबाणान्।
विभ्राणासृक्कपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाढ्याम् देवीबालार्कवर्णा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परानः॥
§📜 रुद्राष्टाध्यायी — प्रथम अध्याय (गणपति, शिवसङ्कल्प सूक्त)▾
अथानन्तरं रुद्राष्टाध्यायी पाठं कुर्यात् (महाभिषेकः)
॥ श्रीपरमात्मने नमः॥
॥ ॐ नमः शिवाय॥
अथ श्रीरुद्राष्टाध्यायी
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥
हरिः ॐ गणानांत्वा गणपतिꣳहवामहे प्रियाणान् त्वा प्रियपतिꣳहवामहे निधीनान् त्वा निधिपतिꣳहवामहे वसो मम। आहम जानि गर्भध मा त्वम जासि गर्भधम्॥ १॥
गायत्री त्रिष्टुब् जगत्य नुष्टुप् पङ्क्त्या सह।
वृहत् युष्णिहा ककुप् सूचिभिः शम्यन् तुत्वा॥ २॥
द्विपदा याश्चतुष्पदास् त्रिपदा याश्च षट्पदाः।
विच् छन्दा याश्च सच् छन्दाः सूचिभीः शम्यन् तुत्वा॥ ३॥
सहस्तोमाः सहच् छन्दस आवृतः सह प्रमा ऋषयः सप्तदैव्याः।
पूर्वेषां पन्था मनुदृष्य धीरा अन्वा लेभिरे रथ्यो न रश्मीन्॥ ४॥
यज्जाग्रतो दूर मुदैति दैवं तदु सुप् तस्य तथै वैति।
दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन् मे मनः शिव संकल्प मस्तु॥ ५॥
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः।
यद पूर्वम् यक्ष मन्तः प्रजानाम् तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु॥ ६॥
यत् प्रज्ञान मुत चेतो धृतिश्च यज् ज्योति रन्तर मृतं प्रजासु।
यस्मान् न ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु॥ ७॥
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परि गृहीत ममृतेन सर्वम्।
येन यज्ञस् ता यते सप्त होता तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु॥ ८॥
यस्मिन् नृचः साम यजूꣳषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथना भावि वाराः।
यस् मिँश् चित्तꣳसर्व मोतं प्रजानां तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु॥ ९॥
सुषा रथि रश्वा निव यन् मनुष्यान् ने नीयतेऽभी शुभिर् वाजिन इव।
हृत् प्रतिष्ठम् यद जिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु॥ १०॥
॥ इति प्रथमोऽध्यायः॥
à📜 रुद्राष्टाध्यायी — द्वितीय अध्याय (पुरुष सूक्त)▾
॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥
हरिः ॐ ॥ सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्र पात्।
स भूमिꣳसर्वतस् पृत्वाऽत्य तिष्ठद् दशाङ् गुलम् ॥ १॥
पुरुष एवेदꣳसर्वम् यद् भूतं यच्च भाव्यम्।
उता मृतत्व स्ये शानो यदन्ने नाति रोहति ॥ २॥
एतावानस्य महिमातो ज्या याँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्या मृतन् दिवि ॥ ३॥
त्रिपादूर्ध्व उदैत् पुरुषः पादोऽस्येहा भवत् पुनः ।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत सा शना न शने अभि॥ ४॥
ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमि मथोपुरः॥ ५॥
तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृष् दाज्यम् ।
पशूँस् ताँश्चक्रे वायव्या नाराण्या ग्राम्याश्च ये ॥ ६॥
तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दाꣳसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस् तस्मा दजायत ॥ ७॥
तस्मा दश्वा अजायन्त ये के चो भयादतः ।
गावोह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज् जाता अजावयः॥ ८॥
तं यज्ञं वर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥ ९॥
यद् पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्य कल्पयन्।
मुखं किमस्या सीत् किम् बाहू किमूरु पादा उच्येते॥ १०॥
ब्राह्मणोऽस्य मुख मासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
उरु तदस्य यद् वैश्य पदभ्याꣳशूद्रो अजायत ॥ ११॥
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
श्रोत्राद् वायुश्च प्राणश्च मुखा दग्नि रजायत॥ १२॥
नाभ्या आसीदन् तरिक्षꣳशीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात् तथा लोकाँ अकल्पयन्॥ १३॥
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञ मतन्वत।
वसन्तोऽस्यासी दाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद् धविः॥ १४॥
सप्तास्या सन् परिधयस् त्रिः सप्त समिधः कृताः।
देवा यद् यज्ञं तन्वाना अबन्धनन् पुरुषं पशुम्॥ १५॥
यज्ञेन यज्ञ मय जन्त देवास् तानि धर्माणि प्रथमा न्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ १६॥
अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च विश्व कर्मणः समवर्ततागे।
तस्य त्वष्टा विदधत् रूप मेति तन् मर्त्यस्य देवत्व माजान मग्रे॥ १७॥
वेदाह मेतं पुरुषं महान्त मादित्य वर्णम् तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥ १८॥
प्रजापतिश् चरति गर्भे अन्तर जायमानो बहुधा विजायते।
तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीरास् तस्मिन् ह तस्थु र्भुवनानि विश्वा॥ १९॥
यो देवेभ्य आ तपति यो देवानां पुरोहितः।
पूर्वो यो देवेभ्यो जातो नमो रुचाय ब्राह्म ये॥ २०॥
रुचं ब्राह्मं जनयन्तो देवा अग्रे तदब्रुवन्।
यस् त्वैवं ब्राह्मणो विद्यात् तस्य देवा असन् वशे॥ २१॥
श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्या वहो रात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूप मश्विनौ व्यात्तम्।
इष्णन् निषाणा मंु म इषाण सर्व लोकं म इषाण॥ २२॥
॥ इति द्वितीयोऽध्यायः॥
¥📜 रुद्राष्टाध्यायी — तृतीय अध्याय (अप्रतिरथ सूक्त)▾
॥ अथ तृतीयोऽध्यायः॥
हरिः ॐ ॥ आशुः शिशानो वृषभो नभो नभी मो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्।
संक्रन्दनोऽनिमिष एक वीरः शतꣳसेना अजयत् साकमिन्द्रः॥ १॥
संक्रन्दने ना निमिषेण जिष्णुना युत् कारेण दुश् च्यवनेन धृष्णुना।
तदिन्द्रेण जयत तत् सहध्वं युधो नर इषु हस्तेन वृष्णा॥ २॥
स इषु हस्तैः स निषङ्गिभिर् वशी सꣳस्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन।
सꣳसृष्ट जित् सोमपा बाहु शर्ध्युग्र धन्वा प्रति हिताभि रस्ता॥ ३॥
वृहस्पते परिदीया रथेन रक्षोहाऽमित्राँ अपबाधमानः॥
प्रभञ् जन्त्सेनाः प्रमृणो युधा जयन् नस्माक मेध्यविता रथानाम्॥ ४॥
बलविज्ञाय स्थविरः प्रविरः सहस्वान् वाजी सहमान उग्रः।
अभिवीरो अभिसत्वा सहोजा जैत्र मिन्द्र रथ मा तिष्ठ गोवित्॥ ५॥
गोत्रभिदं गोविदं बज्रवाहुं जयन्त मज्म प्रमृणन् तमो जसा।
इमꣳसजाता अनु वीरयध्व मिन्द्रꣳसखायो अनु सꣳरभध्वम्॥ ६॥
अभि गोत्राणि सहसा गाहमानोऽदयो वीरः शत मन्यु रिन्द्रः।
दुश् च्यवनः पृतना षाड युध्योऽस्माकꣳसेना अवतु प्र युत्सु॥ ७॥
इन्द्र आसां नेता वृहस्पतिर् दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः।
देव सेना ना मभि भञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन् त्वग्रम्॥ ८॥
इन्द्रस्य विष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुताꣳशर्ध उग्रम्।
महामनसां भुवन च्यवानां घोषो देवानां जयता मुदस्थात्॥ ९॥
उद् धर्षय मघवन् नायुधान् युत् सत्वनां मामकानां मनाꣳसि।
उद् वृत्रहन् वाजिनां वाजिनान् युद् रथानां जयतां यन्तु घोषाः॥ १०॥
अस्माक मिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इष वस्ता जयन्तु।
अस्माकं वीरा उत्तरे भवन् त्वस्माँ उ देवा अवता हवेषु॥ ११॥
अमीषां चित्तं प्रति लोभयन्ती गृहाणाङ् गान् यप्वे परेहि।
अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकै रन्धेना मित्रास् तमसा सचन्ताम्॥ १२॥
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मा सꣳशिते।
गच्छा मित्रान् प्रपद् यस्व माऽमीषां कं चनोच्छिषः॥ १३॥
पे्रता जयता नर इन्द्रो वः शर्म यच्छतु।
उग्रा वः सन्तु वाहवोऽना धृष्या यथाऽसथ॥ १४॥
असौ या सेना मरुतः परेषा मभ्यैति न ओजसा स्पर्धमाना।
तां गूहत तमसा ऽपव्रतेन यथाऽमी अन्यो अन्यं न जानन्॥ १५॥
यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव।
तन्न इन्द्रो बृहस्पति रदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु॥ १६॥
मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस् त्वा राजा ऽमृतेना नुवस्ताम्।
उरो र्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वा ऽनु देवा मदन्तु॥ १७॥
॥ इति तृतीयोऽध्यायः॥
¨📜 रुद्राष्टाध्यायी — चतुर्थ अध्याय (मैत्र / सूर्य सूक्त)▾
॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥
हरिः ॐ ॥ विभ्राड् वृहत् पिवतु सोम्यं मध्वायुर् दधद् यज्ञपताव विह्रुतम्।
वात जूतो यो अभिरक्ष तित्मना प्रजाः पुपोष पुरुधा विराजति॥ १॥
उदुत्यं जात वेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम्॥ २॥
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जना अनु। त्वं वरुण पश्यसि॥ ३॥
दैव्या वध्वर्यू आ गतꣳरथेन सूर्य त्वचा।
मध्वा यज्ञꣳसमन्जाथे तं प्रत्नथा ऽयं वेनश् चित्रं देवानाम्॥ ४॥
ते प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथे मथा ज्येष्ठता तिम् वर्हिषद्ꣳस्वर्विदम्।
प्रतीचीनं वृजनं दोहसे धुनिमाशुं जयंत मनु यासु वर्धसे॥ ५॥
अयं वेनश् चोदयत् पृश्नि गर्भा ज्योतिर् जरायू रजसो विमाने।
इमम पाꣳसङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मति भी रिहन्ति॥ ६॥
चित्रं देवा ना मुद गादनीकं चक्षुर् मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।
आ प्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्षꣳसूर्य आत्मा जगतस् तस्थुषश्च॥ ७॥
आन इडाभिर् विदथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देव एतु।
अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्वं जगद् भि पित्वे मनीषा॥ ८॥
यदद्य कच्च वृत्रहन् नुदगा अभि सूर्य। सर्वम् तदिन्द्र ते वशे॥ ९॥
तरणिर् विश्व दर्शतो ज्योतिष् कृदसि सूर्य। विश्वमा भासिरोचनम्॥ १०॥
तत् सूर्यस्यदेव त्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर् विततꣳसं जभार।
यदेद युक्त हरितः सधस्था दा द्रात्री वासस् तनुते सि मस्मै॥ ११॥
तन् मित्रस्य वरुणस्या भिक्षसे सूर्यो रूपं कृणुते द्यो रूपस्थे।
अनन्त मन्य द्रुश दस्य पाजः कृष्ण मन्यद् धरितः सं भरन्ति॥ १२॥
बण्महाँ असि सूर्य बडा दित्य महाँ असि।
महस्ते सतो महिमा पनस्यतेऽद् धा देव महाँ असि ॥ १३॥
वट सूर्य श्रवसा महाँ असि सत्रा देव महाँ असि।
मह्ना देवाना मसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिर् दाभ्यम्॥ १४॥
श्रायन्त इव सूर्यम् विश्वे द्रिन्द्रस्य भक्षत।
वसूनी जाते जनमान ओजसा प्रति भागं न दीधिम॥ १५॥
अद्या देवा उदिता सूर्यस्य निरꣳहसः पिपृता निरवद्यात्।
तन्नो मित्रो वरुणो मा महन्ता मदितिः सिन्धुः पृथिवी उद्यतौः॥ १६॥
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन् नमृतं मर्त्यम् च।
हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ १७॥
॥ इति चतुर्थोऽध्यायः॥
à📜 रुद्राष्टाध्यायी — पञ्चम अध्याय (रुद्र — नमकम्)▾
॥ अथ पंचमोऽध्यायः॥
हरिः ॐ भू र्भुवः स्वः॥ नमस्ते रुद्र मन्यव उतोत इषवे नमः। बाहुभ्यामुतते नमः॥ १॥
या ते रुद्र शिवातनूर घोराऽपाप काशिनी।
तया नस्तन्वा शन्त मया गिरि शन्ताभि चाक शीहि॥ २॥
या मिषुं गिरि शन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिꣳसीः पुरुषं जगत्॥ ३॥
शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छा वदामसि।
यथा नः सर्वमिज् जगद यक्ष्मꣳसुमना असत्॥ ४॥
अध्यवोच दधिवक्ता प्रथमो दैव्योभिषक्।
अहींश्च सर्वान् जम्भयन्त्सर्वाश्च यातु धान्योऽधराचिः परा सुव॥ ५॥
असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमंगलः।
ये चैनꣳरुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशो ऽवैषाꣳहेड ईमहे॥ ६॥
असौ योऽ व सर्पति नील ग्रीवो विलोहितः।
उतैनं गोपा अदृश्रन् नदृश्रन् नुदहार्यः स दृष्टो मृडयाति नः॥ ७॥
नमोऽस्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे। अथो ये अस्य सत्वानोऽहं तेभ्योऽकरं नमः॥ ८॥
प्रमुन्च धन्वनस् त्व मुभयो रार्त्न्योर् ज्याम्।
याश्चते हस्त इषवः पराता भगवो वपः॥ ९॥
विज्यं धनुः कपर्दिनो विशल्यो बाणवाँ उत।
अनेशन् नस्य या इषव आभुरस्य निषङ्गधिः॥ १०॥
या ते हेतिर् मीढुष्टम् हस्ते बभूव ते धनुः।
तयाऽस्मान् विश्वतस् त्वम् यक्ष्मया परिभुज॥ ११॥
परिते धन्वनो हेति रस्मान् वृणक्तु विश्वतः।
अथो य इषु धिस् तवारे अस्मिन् निधेहितम्॥ १२॥
अवतत्य धनुष् ट्वꣳसहस्राक्ष शतेषुधे।
निशीर्य शल्यानां मुखा शिवो नः सुमना भव॥ १३॥
नमस्त आयुधाया नातनाय धृष्णवे।
उभाभ्या मुतते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने॥ १४॥
मानो महान्त मुतमानो अर्भकं मान उक्षन्तमुत मान उक्षितम्।
मानो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्ररीरिषः॥ १५॥
मानस्तोके तनये मान आयुषि मानो गोषु मानो अश्वेषु रीरिषः।
मानो वीरान् रुद्र भामिनो वधीर् हविष्मन्तः सदमित् त्वा हवामहे॥ १६॥
नमो हिरण्य बाहवे सेनान्ये दिशां च पतये नमो नमो वृक्षेभ्यो हरि केशेभ्यः।
पशूनां पतये नमो नमः शष् पिन्जराय त्विषीमते मथीनां पतयेनमो नमो हरि केशायोप वीतिने पुष्टनांपतये नमो नमो वभ्लुशाय॥ १७॥
व्याधिनेऽन्नानां पतये नमो नमो भवस्य हेत्यै जगतां पतये नमो नमो रुद्राया ततायिने क्षेत्राणां पतये नमो नमः सूताया हन्त्यै वनानां पतये नमो नमो रोहिताय॥ १८॥
स्थपतये वृक्षाणां पतये नमो नमो भुवन्तये वारि वस्कृतायौषधीनां पतये नमो नमो मन्त्रिणे वाणिजाय कक्षाणां पतये नमो नम उच्चैर् घोषाया क्रन्दयते पत्तीनां पतये नमो नमः कृत् स्नायतया॥ १९॥
धावते सत्वानां पतये नमो नमः सहमानाय निव्याधिन आव्याधिनीनां पतये नमो नमो निषङ् गिणे ककुभाय स्तेनानां पतये नमो नमो निचेरवे परिचराया रण्यानां पतये नमो नमो निचरवे परिचराया रण्यानां पतये नमो नमो वन्चते॥ २०॥
परिवन्चते स्तायूनां पतये नमो नमो निषङ्गिणे इषुधिमते तस्कराणां पतये नमो नमः सृकायिभ्यो जिघाꣳसद्भ्यो मुष्णतां पतये नमो नमोऽसि मद्भ्यो नक्तन्चरद्भ्यो विकृन्तानां पतये नमो नमः॥ २१॥
नम उष्णीषिणे गिरिचराय कुलुन्चानां पतये नमो नम इषु मद्भ्यो धन्वा यिभ्यश्चवो नमो नम आ तन्वा नेभ्यः प्रति दधानेभ्यश्चवो नमो नम आयच् छद्योऽस्यद्भ्यश्चवो नमो॥ २२॥
नमो विसृजद्भ्यो विध्यद्भ्यश्च वो नमो नमः स्वपद्भ्यो जाग्रद्भ्यश्चवो नमो नमः शयानेभ्य आसीनेभ्यश्चवो नमो नमस् तिष्ठद्भ्यो धावद्भ्यश्च वो नमो नमः सभाभ्यः॥ २३॥
सभा पतिभ्यश्चवो नमो नमोऽश्वेभ्योऽश्वपतिभ्यश्च वो नमो नम आ व्याधिनीभ्यो विविध्यन्तीभ्यश्च वो नमो नम उगणाभ्यस् तृꣳहतीभ्यश्चवो नमो नमो गणेभ्यो ॥ २४॥
गणपतिभ्यश्चवो नमो नमो व्रातेभ्यो व्रात पतिभ्यश्चवो नमो नमो गृत् सेभ्यो गृतस् पतिभ्यश्चवो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्चवो नमो नमः सेनाभ्यः॥ २५॥
सेनानिभ्यश्चवो नमो नमो रथिभ्यो अ रथेभ्यश्चवो नमो नमः क्षतृभ्यः संग्रहीतृभ्यश्चवो नमो नमो महद्भ्यो अर्भ केभ्यश्चवो नमः॥ २६॥
नमस् तक्षभ्यो रथकारेभ्यश्चवो नमो नमः कुलालेभ्यः कर्मा रेभ्यश्चवो नमो नमो निषादेभ्यः पुन्जिष्ठेभ्यश्चवो नमो नमः श्वनिभ्यो मृग युभ्यश्चवो नमो नमः श्वभ्यः॥ २७॥
श्व पतिभ्यश्चवो नमो नमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्वाय च पशुपतये च नमो नील ग्रीवाय च शिति कण्ठाय च नमः कपर्दिने॥ २८॥
च व्युप्त केशाय च नमः सहस्राक्षाय च शत धन्वने च नमो गिरिशयाय च शिपि विष्टाय च नमो मीढुष्टमाय चेषुमते च नमो ह्रस्वाय॥ २९॥
च वामनाय च नमो वृहते च वर्षीयसे च नमो वृद्धाय च सवृधे च नमो ऽग्न्याय च प्रथमाय च नम आशवे॥ ३०॥
चा जियाय च नमः शीघ्र्याय च शीभ्याय च ऊर्म्याय चा वस्वन््याय च नमो नादेयाय च द्वीप्याय च॥ ३१॥
नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्वजाय चा परजाय च नमो मध्यमाय चाप गल्भाय च नमो जघन्याय च वुध्न्याय च॥ ३२॥
नमः सोभ्याय च प्रतिसर्याय च नमो याम्याय च क्षेम्याय च नमः श्लोक्याय चावसा न्याय च नम उर्वर्याय च खल्याय च॥ ३३॥
नमो वन्याय च कक्ष्याय च नमः श्रवाय च प्रतिश्रवाय च नम आशुषेणाय चाशुरथाय च नमः शूराय चाव भेदिने च॥ ३४॥
नमो विल्मिने च कवचिने च नमो वर्मिणे च वरुथिने च नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्याय चा हनन्याय च॥ ३५॥
नमो धृष्णवे च प्रमृशाय च नमो निषङ्गिणे चेषुधिमते च नमस् तीक्ष्णे षवे चायुधिने च नमः स्वायुधाय च सुधन्वने च॥ ३६॥
नमः स्रुत्याय च पथ्याय च नमः काट्याय च नीप्याय च नमः कुल्याय च सरस्याय च नमो नादेयाय च वैशन्ताय च॥ ३७॥
नमः कूप्याय चावट्याय च नमो वीध्य्राय चातप्ताय च नमो मेध्याय च विद्युत्याय च नमो वर्ष्याय चा वर्ष्याय च॥ ३८॥
नमो वात्याय च रेष्म्याय च नमो वास्तव्याय च वास्तुपाय च नमः सोमाय च रुद्राय च नमस् ताम्राय चा रुणाय च॥ ३९॥
नमः शङ्गवे च पशुपतये च उग्राय च नमोऽग्रे वधाय च।
दूरेवधाय च नमो हन्त्रे च हनीयसे च नमो वृक्षेभ्यो हरि केशेभ्यो नमस्ताराय॥ ४०॥
नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिव तराय च॥ ४१॥
नमः पार्याय चा वार्याय च नमः प्र्रतरणाय चोत्तरणाय च नमस् तीर्थ्याय च कूल्याय च नमः शष्प्याय च फेन्याय च नमः सिकत्याय॥ ४२॥
च प्रवाह्याय च नमः किꣳशिलाय चा क्षयणाय च नमः कपर्दिने च पुलस्तये च नम इरिण्याय च प्रपत्थ्यायच॥ ४३॥
नमो व्रज्याय च गोष्ठ्याय च नमस् तल्प्याय च गेह्याय च नमो हृदय्याय च निवेष्प्याय च नमः काट्याय च। गह्वरेष्ठाय च॥ ४४॥
नमः शुष्क्याय च हरित्याय च नमः पाꣳसव्याय च सजस्याय च नमो लोप्याय चो लप्याय च नमः ऊर्व्याय च सूर्व्याय च॥ ४५॥
नमः पर्णाय च पर्णशदाय च नमः उद्गुर माणाय चा भिघ्नते च नमः आखिदते च प्रखिदते च नमः इषु कृद्भ्यो धनुष् कृद्भ्यश्चवो नमो नमो वः किरिकेभ्यो देवानाꣳहृदयेभ्यो नमो विचिन्वत् केभ्यो नमो विक्षिणत् केभ्यो नमः आनिर्हतेभ्यः ॥ ४६॥
द्रापे अन्ध सस्पते दरिद्र नील लोहित।
आसां प्रजाना मेषां पशूनां मा भेर्मा रोङ्मो च नः किंचना ममत्॥ ४७॥
इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद् वीराय प्र भरा महे मतीः।
यथा शम सद् द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन् ननातुरम्॥ ४८॥
या ते रुद्र शिवा तनूः शिवा विश्वाहा भेषजी।
शिवा रुतस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे॥ ४९॥
परि नो रुद्रस्य हेतिर् वृणक्तु परि त्वेषस्य दुर्मति रघायोः।
अवस्थिरा मघवद् भ्यस् तनुष्व मीढ्वस्तोकाय तनयाय मृड॥ ५०॥
मीढुष्टम शिवतम शिवो नः सुमना भव।
परमे वृक्ष आयुधं निधाय कृत्रिम् वसान् आ चर पिनाकं विभ्रदा गहि॥ ५१॥
विकिरिद्र विलोहित नमस्ते अस्तु भगवः।
यास्ते सहस्रꣳहेतयोऽन्य मस्मन् निवपन्तु ताः॥ ५२॥
सहस्राणि सहस्रशो वाह्वोस्तव हेतयः।
तासा मीशानो भगवः परा चीना मुखा कृधि॥ ५३॥
असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम्।
तेषाꣳसहस्रयोजनेऽवधन्वानि तन्मसि॥ ५४॥
अस्मिन् महत्यर्णवेऽ अन्तरिक्षे भवा अधि।
तेषाꣳसहस्रयोजने ऽवधन्वानि तन्मसि॥ ५५॥
नीलग्रीवाः शितिकण्ठाः दिवꣳरुद्रा उपश्रिताः।
तेषाꣳसहस्रयोजने ऽवधन्वानितन्मसि॥ ५६॥
नीलग्रीवाः शितिकण्ठाः शर्वा अधः क्षमा चराः।
तेषाꣳसहस्रयोजनेऽ वधन्वानितन्मसि॥ ५७॥
ये वृक्षेषु शष् पिन्चरा नीलग्रीवा विलोहिताः।
तेषाꣳसहस्रयोजनेऽ व धन्वनि तन्मसि॥ ५८॥
ये वृक्षेषु शष् पिन्जरा नीलग्रीवा विलोहिताः।
तेषाꣳसहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि॥ ५८॥
ये भूताना मघिपतयो विशिखासः कपर्दिनः।
तेषाꣳसहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि॥ ५९॥
ये पथां पथिरक्षय ऐलवृदा आयुर्युधः।
तेषाꣳसहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि॥ ६०॥
ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः।
तेषाꣳसहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि॥ ६१॥
येऽन्नेषु विविध्यन्ति पात्रेषु पिवतोजनान्।
तेषाꣳसहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि॥ ६२॥
य एतावन्तश्च भूयाꣳसश्च दिशो रुद्रा वितस्थिरे।
तेषाꣳसहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि॥ ६३॥
नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येषां वर्ष मिषवः।
तेभ्यो दशप्राचीर् दशदक्षिणा दश प्रतीचीर् दशोदीचीर् दशोर्ध्वाः।
तेभ्यो नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्चनो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः॥ ६४॥
नमोऽस्तु रुदेभ्यो येऽन्तरिक्षे वात इषवः।
तेभ्यो दशप्राचीर् दशदक्षिणा दश प्रतीचीर् दशोदीचीर् दशोर्ध्वाः।
तेभ्यो नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्चनो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः॥ ६५॥
नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्यां येषा मन्नमिषवः।
तेभ्यो दशप्राचीर् दशदक्षिणा दश प्रतीचीर् दशोदीचीर् दशोर्ध्वाः।
तेभ्यो नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्चनो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः॥ ६६॥
॥ इति पंचमोऽध्यायः॥
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॥ अथ षष्ठोऽध्यायः॥
हरिः ॐ॥ वयꣳसोम व्रते तव मनस् तनुषु विभ्रतः। प्रजावन्तः सचेमहि॥ १॥
एषते रुद्रभागः सहस्व स्राम्बि कया तं जुषस्व स्वाहैषते रुद्र भाग आखुस्ते पशुः॥ २॥
अवरुद्र मदी मह्यव देवं त्र्यम्बकम्।
यथानो वस्य सस्करद् यथा नः श्रेयसस् करद् यथा नो व्यवसाय यात्॥ ३॥
भेषज मसि भेषजं गवेऽश्वाय पुरुषाय भेषजम्। सुखं मेषाय मेष्यै॥ ४॥
त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पति वेदनम्।
उर्वारुक मिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः॥ ५॥
एतत्ते रुद्रावसं तेन परो मूजवतोऽतीहि।
अव तत धन्वा पिनाकावसः कृत्तिवासा अहिꣳसन्नः शिवोऽतीहि॥ ६॥
त्रयायुषं जमदग्नेः कश्पस्य त्र्यायुषम्। यद् देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम्॥ ७॥
शिवो नामासि स्वधि तिस्ते पिता नमस्ते अस्तु मा माहिꣳसीः।
निवर्तयाम्या येषेऽन्नाद्याय प्रजननाय रायस् पोषाय सुप्रजास् त्वाय सुवीर्याय॥ ८॥
॥ इति षष्ठोऽध्यायः॥
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॥ अथ सप्तमोऽध्यायः॥
हरिः ॐ॥ उग्रश्च भीमश्च ध्वान्तश्च धुनिश्च।
सा सह्वाँश्चाभि युग्वा च विक्षिपः स्वाहा॥ १॥
अग्निꣳहृदयेना शनिꣳहृदयाग्रेण पशुपतिं कृत्सन् हृदयेन भवं यक्ना।
शर्वम् मतास्नाभ्या मीशानं मन्युना महादेवमन्तः पर्शव्ये नोग्रं देवं वनिष्ठुना वसिष्ठ हनुः शिङ्गीनि कोश्याभ्याम्॥ २॥
उग्रँ लोहितेन मित्रꣳसौव्रत्येन रुद्रं दौर् व्रत्ये नेन्द्रं प्रकीडेन मरुतो बलेन साध्यान् प्रमुदा।
भवस्य कण्ठ्यꣳरुद्रस्यान्तः पार्श्व्यम् महादेवस्य यकृच् छर्वस्य वनिष्ठुः पशु पतेः पुरीतत्॥ ३॥
लोमभ्यः स्वाहा लोमभ्यः स्वाहा त्वचे स्वाहा त्वचे स्वाहा लोहिताय स्वाहा लोहिताय स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा।
माꣳसेभ्यः स्वाहा माꣳसेभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहा ऽस्थभ्यः स्वाहा ऽस्थभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा रेतसे स्वाहा पायवे स्वाहा॥ ४॥
आयासाय स्वाहा प्रायासाय स्वाहा संयासाय स्वाहा वियासाय स्वाहोद्यासाय स्वाहा। शुचे स्वाहा शोचते स्वाहा शोचमानाय स्वाहा शोकाय स्वाहा॥ ५॥
तपसे स्वाहा तप्यते स्वाहा तप्यमानाय स्वाहा तप्ताय स्वाहा घर्माय स्वाहा निष्कृत्यै स्वाहा प्रायश्चित्यै स्वाहा भेषजाय स्वाहा॥ ६॥
यमाय स्वाहा ऽन्तकाय स्वाहा मृत्यवे स्वाहा ब्रह्मणे स्वाहा ब्रह्महत्यायै स्वाहा विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा द्यावा पृथिवीभ्याꣳस्वाहा॥ ७॥
॥ इति सप्तमोऽध्यायः॥
¥¦📜 रुद्राष्टाध्यायी — अष्टम अध्याय (चमकम्)▾
॥ अथ अष्टमोऽध्यायः॥
हरि ॐ॥ वाजस्चमे प्रसवश्चमे प्रयतिश्चमे प्रसितिश्चमे धीतिश्चमे क्रतुश्चमे स्वरश्चमे श्लोकश्चमे श्रवश्चमे श्रुतिश्चमे ज्योतिश्चमे स्वश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ १॥
प्राणश्चमे ऽपानश्चमे व्यानश्चमे ऽसुश्चमे चित्तं च म आधीतं च मे वाक् च मे मनश्चमे चक्षुश्चमे श्रोत्रं च मे दक्षश्चमे बलं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ २॥
ओजश्चमे सहश्चम आत्मा चमे तनूश्चमे शर्म च मे वर्म च मे ऽङ्गानि च मेऽस्थीनि च मे परुꣳषि च मे शरीराणि च म आयुश्च मे जरा च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ ३॥
ज्यैष्ठ्यं च म आधिपत्यं च मे मन्युश्चमे भामश्चमे ऽमश्चमे ऽम्भश्चमे जेमा च मे महिमा च मे वरिमा च मे प्रथिमा च मे वर्षिमा च मे द्राघिमा च मे वृद्धं च मे वृद्धिश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ ४॥
सत्यं च मे श्रद्धा च मे जगच्चमे धनं च मे विश्वं चमे महश्च मे क्रीडा च मे मोदश्चमे जातं च मे जनिष्यमाणं च मे सूक्तं च मे सुकृतं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ ५॥
ऋतं च मेऽमृतं च मेऽ यक्ष्मं च मे ऽनामयच्च मे जीवातुश्चमे दीर्घायुत्वं च मे ऽनमित्रं च मे ऽभयं च मे सुखं च मे शयनं च मे सूषाश्चमे सुदिनं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ ६॥
यन्ता च मे धर्ता च मे क्षेमश्चमे धृतिश्चमे विश्वं च मे महश्चमे संविच्चमे ज्ञात्रं च मे सूश्चमे प्रसूश्चमे सीरं च मे लयश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ ७॥
शं च मे मयश्चमे प्रियं च मे ऽनुकामश्चमे कामश्चमे सौमनसश्चमे भगश्चमे द्रविणं च मे भद्रं च मे श्रेयश्चमे वसीयश्चमे यशश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ ८॥
ऊर्क् च मे सूनृता च मे पयश्चमे रसश्चमे घृतं च मे मधु च मे सग्धिश्चमे सपीतिश्चमे कृषिश्चमे वृष्टिश्चमे जैत्रं च म औद्भिद्यं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ ९॥
रयिश्चमे रायश्चमे पुष्टं च मे पुष्टिश्चमे विभु च मे प्रभु च मे पूर्णम् च मे पूर्णतरं च मे कुवयं च मे ऽक्षितं च मे ऽन्नं च मे ऽक्षुच्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ १०॥
वित्तं च मे वेद्यं च मे भूतं च मे भविष्यच् च मे युगं च मे सुपथ्यं च म ऋद्धं च म ऋध्दिश्चमे क्लृप्तिश्चमे मतिश्चमे सुमतिश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ ११॥
ब्रीहयश्चमे यवाश्चमे माषाश्चमे तिलाश्चमे मुद्गाश्चमे खल्वाश्चमे प्रियङ्गवश्चमे ऽणवश्चमे श्यामा काश्चमे नीवाराश्चमे गोधूमाश्चमे मयूराश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ १२॥
अश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्चमे पर्वताश्चमे सिकताश्चमे वनस्पतयश्चमे हिरण्यं च मे ऽयश्चमे श्यामं च मे लोहं च मे सीसं च मे त्रपु च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ १३॥
अग्निश्चम ऽ आपश्चमे वीरुधश्चमे ओषधयश्चमे कृष्ट पच्याश्चमे ऽ कृष्ट पच्याश्चमे ग्राम्याश्चमे पशव आरण्याश्चमे सित्तं च मे वित्तिश्च मे भूतं च मे भूतिश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ १४॥
वसु च मे वसतिश्चमे कर्म च मे शक्तिश्चमे ऽ र्थश्चम एमश्चम इत्या च मे गतिश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ १५॥
अग्निश्चम इन्द्रश्चमे सोमश्चम इन्द्रश्चमे सविता च म इन्द्रश्चमे सरस्वती च म इन्द्रश्चमे पूषाचम इन्द्रश्चमे वृहस्पतिश्चम इन्द्रश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ १६॥
मित्रश्चम इन्द्रश्चमे वरुणश्चम इन्द्रश्चमे धाताचम इन्द्रश्चमे त्वष्टा च म इन्द्रश्चमे मरुतश्चम इन्द्रश्चमे विश्वे च मे देवा इन्द्रश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ १७॥
पृथिवी च म इन्द्रश्चमे ऽन्तरिक्षं च म इन्द्रश्चमे द्यौश्चम इन्द्रश्चमे समाश्चम इन्द्रश्चमे नक्षत्राणि च म इन्द्रश्चमे दिशश्चम इन्द्रश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ १८॥
अꣳशुश्चमे रश्मिश्चमे ऽ दाभ्यश्चमे ऽ धिपतिश्चम उपाꣳशुश्चमे ऽन्तर् यामश्चम ऐन्द्र वायवश्चमे मैत्रा वरुणश्चम आश्विनश्चमे प्रति प्रस्थानश्चमे शुक्रश्चमे मन्थी च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ १९॥
आग्रयणश्चमे वैश्व देवश्चमे ध्रुवश्चमे वैश्वानरश्चम ऐन्द्राग्नश्चमे महा वैश्व देवश्चमे मरुत्व तीयाश्चमे निष्केवल्यश्चमे सावित्रश्चमे सारस्वतश्चमे पात्नीवतश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ २०॥
स्रुचश्चमे चमसाश्चमे वायव्यानि च मे द्रोण कलशश्चमे ग्रावाणश्चमे ऽधिषवणे च मे पूत भृच्च म आधवनीयश्चमे वेदिश्चमे बर्हिश्चमे ऽवभृथश्चमे स्वागाकारश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ २१॥
अग्निश्चमे घर्मश्चमे ऽर्कश्चमे सूर्यश्चमे प्राणश्चमे ऽश्वमेधश्चमे पृथिवी च मे ऽदितिश्चमे दितिश्चमे द्यौश्चमे ऽङ्गुलयः शक्करयो दिशश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ २२॥
व्रतं च म ऋतवश्चमे तपश्चमे संवत्सरश्चमे ऽ हो रात्रे ऊर्वष्ठी वे वृहद् रथन्तरे च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ २३॥
एका च मे तिस्रश्चमे तिस्रश्चमे पंच चमे पंच चमे सप्तचमे सप्तचमे नवचमे नवचम एकादशचम एकादशचमे त्रयोदशचमे त्रयोदशचमे पंचदश चमे पंचदश चमे सप्तदश चमे सप्तदश चमे नवदश चमे नवदश चम एक विꣳशतिश्चम एक विꣳशतिश्चमे त्रयो विꣳ शतिश्चमे त्रयो विꣳशतिश्चमे पंच विꣳशतिश्चमे पंच विꣳशतिश्चमेसप्त विꣳशतिश्चमे सप्त विꣳशतिश्चमे नव विꣳशतिश्चमे नव विꣳशतिश्चम एकत्रिꣳशच्चम एकत्रिꣳ शच्चमे त्रयस्त्रिꣳशच्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ २४॥
चतस्रश्चमे ऽष्टौ च मे ऽष्टौ च मे द्वादश चमे द्वादश चमे षोडश चमे षोडश चमे विꣳ शतिश्चमे विꣳशतिश्चमे चतुर्विꣳशतिश्चमे चतुर्विꣳशतिश्चमे ऽष्टा विꣳशतिश्चमे ऽष्टा विꣳशतिश्चमे द्वात्रिꣳशच्चमे द्वात्रिꣳशच्चमे षट् त्रिꣳशच्चमे षट् त्रिꣳशच्चमे चत्वारि ꣳशच्चमे चत्वारिꣳशच्चमे चतुश्चत्वारिꣳशच्चमे चतुश्चत्वारिꣳशच्चमे ऽष्टाचत्वारिꣳ शच्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ २५॥
त्र्योविश्चमे त्र्यवीचमे दित्यवाट् चमे दित्यौही चमे पंचाविश्चमे पंचावी चमे त्रिवत्सश्चमे त्रिवत्साचमे तुर्यवाट् चमे तुर्यौही चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ २६॥
षष्ठवाट् चमे पष्ठौही च म उक्षा च मे वशा च म ऋषभश्चमे वेहच्चमे ऽनड्वाँश्चमे धेनुश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ २७॥
वाजाय स्वाहा प्रसवाय स्वाहा ऽ पिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहावसवे स्वाहा ऽर्हपतये स्वाहा ऽह्ने मुग्धाय स्वाहा वैनꣳशिनायस्वाहा विनꣳशिन आन्त्याय नाय स्वाहा ऽन्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहा ऽधिपतये स्वाहा प्रजापतये स्वाहा। इयं ते राण् मित्राय यन्ताऽसि यमन ऊर्जे त्वा वृष्ट्यै त्वा प्रजानां त्वाऽऽधिपत्याय॥ २८॥
आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पताꣳश्रोत्रं यज्ञेन कल्पतां वाग् यज्ञेन कल्पतां ज्योतिर् यज्ञेन कल्पताꣳस्वर यज्ञेन कल्पतां पृष्ठं यज्ञेन कल्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पताम्॥ स्तोमश्च यजुश्च ऋक् च साम च वृहच्च रथन्तरं च।
स्वर्देवा अगन्मामृता अभूम प्रजापतेः प्रजा अभूम वेट स्वाहा॥ २९॥
॥ इति अष्टमोऽध्यायः॥
¥à📜 रुद्राष्टाध्यायी — नवम शान्ति अध्याय▾
॥ अथ नवम शान्ति अध्यायः॥
हरिः ॐ॥ ऋचं वाचं प्रपद्ये मनो यजुः प्रपद्ये साम प्राणं प्रपद्ये चक्षुः श्रोत्रं प्रपद्ये। वागोजः सहौजो मयि प्राणपानौ॥ १॥
यन्मे छिद्रं चक्षुषो हृदयस्य मनसो वाति तृणं वृहस्पतिर्मे तद् दधातु।
शं नो भवतु भुवनस्य यस्पतिः॥ २॥
भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर् वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो योनः प्रचोदयात्॥ ३॥
कया नश्चित्र आभुव दूती सदावृधः सखा।
कया शचिष्ठया वृता॥ ४॥
कस्त्वा सत्यो मदानां मꣳहिष्ठो मत् सदन्धसः।
दृढ़ा चिदारुजे वसु॥ ५॥
अभीषुणः सखीना मविता जरितृणाम् शतं भवास्यूतिभिः॥ ६॥
कया त्वं न ऊत्याभि प्रमन्दसे वृषन्। कया स्तोतृभ्य आभर॥ ७॥
इन्द्रो विश्वस्य राजति। शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे॥ ८॥
शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा।
शं नो इन्द्रो वृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥ ९॥
शं नो वातः पवताꣳशं नस्तपतु सूर्यः।
शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्यो अभिवर्षतु॥ १०॥
अहानिशं भवन्तु नः शꣳरात्रीः प्रतिधीयताम्।
शं न इन्द्राग्नी भवता मवोभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या।
शं न इन्द्रा पूषणा वाजसातौ शमिन्द्र सोमा सुविताय शं योः॥ ११॥
शं नो देवी रभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं यो रभिस्रवन्तु नः॥ १२॥
स्योना पृथिवि नो भवा नृक्षरा निवेशनी। यच्छानः शर्म सप्रथाः॥ १३॥
आपो हिष्ठा मयो भुवस् तान ऊर्जे दधातन। महेरणाय चक्षसे॥ १४॥
यो वः शिवतमो रसस् तस्य भाजयते हनः। उशतीरिव मातरः॥ १५॥
तस्मा अरं ग माम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः॥ १६॥
द्यौः शान्ति रन् तरिक्षꣳशान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्ति रोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वꣳशान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥ १७॥
दृते दृꣳहमा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे॥ १८॥
दृते दृꣳह मा। ज्योक्ते सन् दृशि जी व्यासं ज्योक्ते सन् दृशि जी व्यासम्॥ १९॥
नमस्ते हरसे शोचिषे अस्त्वर्चिषे।
अन्याँस्ते अस्मत् तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्यꣳशिवो भव॥ २०॥
नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तन यित्नवे।
नमस्ते भगवन् नस्तु यतः स्वः समीहसे॥ २१॥
यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु।
शं नः कुरु प्रजाभ्यो ऽभयं नः पशुभ्यः॥ २२॥
सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु दुर् मित्रियास् तस्मै सन्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः॥ २३॥
तच् चक्षुर्देवहितं पुरस्तात् छुक्र मुच्चरत्।
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतꣳश्रृणुयाम शरदः शतं प्रव्रवाम शरदः शत मदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ २४॥
॥ इति नवम शान्ति अध्यायः॥
¥¥📜 रुद्राष्टाध्यायी — दशम स्वस्ति-प्रार्थना अध्याय▾
॥ अथ दशम स्वस्ति अध्यायः॥
हरिः ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस् ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु॥ १॥
पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः।
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्॥ २॥
विष्णो रराट मसि विष्णोः श्नप्त्रे स्थो विष्णोःस्यूरसि विष्णोध्रुवोऽसि। वैष्णव मसि विष्णवे त्वा॥ ३॥
अग्निर्देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रा देवता दित्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता वृहस्पतिर् देवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता॥ ४॥
ॐ॥ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः।
भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥ ५॥
वाम देवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बल प्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः॥ ६॥
अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोर घोरतरेभ्यः।
सर्वेभ्यः सर्व सर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ ७॥
तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ ८॥
ईशानः सर्व विद्याना मीश्वरः सर्वभूतानाम्।
ब्रह्माधिपतिर् ब्रह्मणोऽधिपतिर् ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदा शिवोम्॥ ९॥
ॐ॥ शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता नमस्ते अस्तु मा मा हिꣳसीः।
निवर्तयाम्यायुषेऽन्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय॥ १०॥
ॐ द्यौः शान्ति रन् तरिक्षꣳशान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्ति रोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वꣳशान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥ ११॥
ॐ विश्वानि देव सवितर् दुरितानि परासुव। यद् भद्रं तन्न आसुव॥ १२॥
ॐ सर्वेषां वा एष वेदानाꣳरसो यत् साम सर्वेषा मेवैन मेतद् वेदानाꣳरसेनाभिषिन्चति॥ १३॥
ॐ शान्तिः। शान्तिः। सुशान्तिर्भवतु। सर्वाष्टि शान्तिर्भवतु॥
॥ ॐ तत्सत् श्रीशिवार्पणमस्तु॥
॥ इति दशम स्वस्ति प्रार्थना अध्यायः॥
¥§🌺 उत्तर-पूजन (षोडशोपचार) व प्रार्थना▾
उत्तर पूजनम्-षोडशोचारैः पूजयेत्
ततो पुष्पाक्षत बिल्वपत्राणि गृहीत्वा ध्यायेत्
ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः पशुपतये नमः॥
ॐ ततो मणिस्तम्भ विराजमानं हिरण्मयं द्वारकपाट तोरणं,
महार्हनीलामणिवर्य वेदिका तदैव ध्यायेच्छिखरे शिवालयम्।
संतप्त हेमकलशैर्बहुभिर्विचित्रैः प्रोद्भासितं स्फटिक सौधवलाभिरामं,
रम्यं च तच्छिववरंपुरपीठमध्ये लिंगंस्वरत्नसहितं मनसाभिध्याये॥
ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः शिवाय नमः। प्रपन्नपारिजाताय स्वाहा॥

पाद्यम्

जलेन्
ॐ यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे।
शिवां गिरित्रतां कुरु मा हिꣳसीः पुरुषं जगत्॥
महादेव महेशान महानन्द परात्परं।
गृहाण पाद्यं पाद्यन्ते पार्वती सहितेश्वर॥

हस्तयोः अर्घम्

जलाक्षत पुष्प बिल्वपत्र गन्धैः
ॐ शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छा वदामसि।
यथा नः सर्वमिज्जगद् यक्ष्मꣳसुमना असत्॥
तापत्रय हरं दिव्यं परमानन्द लक्षणम्।
तापत्रय विमोक्षाय तवार्घ्यं कल्पयाम्यहम्॥
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

आचमनम्

ॐ अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमोदैव्योभिषक्।
अहींश्च सर्वान्जम्भयन्त्सर्वांश्च यातुधान्योऽधराचीः परासुवः॥
त्रिपुरान्तक दीनार्तनाशिन् श्रीकण्ठभूपते।
गृहाणाचमनं चारु पवित्रोदककल्पितम्॥

मधुपर्कम्

ॐ अन्नपतेन्नस्य नो देह्यमीवस्य शुष्मिणः।
प्र पदातारं तारिषं ऊर्ज्जनो धेहि द्विपदे चतुष्पदे॥
उमाकान्त महादेव तत्वज्ञान स्वरूपिणम्।
मधुपर्क गृहाणेदं पार्वतीपतये विभो।
इदं मधु मया दत्तं तव तुष्ट्यर्थमेव च।
गृहाणशम्भोमे भक्त्या सुप्रसन्नो भव प्रभो॥

आचमनम्

ॐ आच्याजानु दक्षिणतो निषधेमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे।
मा हिꣳसिष्टः पितरः केनचिन्नो यद्वड आगः पुरुषता कराम्॥
त्रिपुरारि नमस्तुभ्यं त्रिदशैरभिवन्दितं।
गंगाहृतेन तोयेन शीघ्रमाचमनं कुरु॥

पयः स्नानम्

ॐ पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयोदिव्यऽन्तरिक्षे पयोधाः।
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्॥

शुद्धस्नानम्

ॐ आपोहिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातनः। महेरणाय चक्षसे॥

दधिम्

ॐ दधिक्राब्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः।
सुरभिनो मुखाकरत्प्रण आयूꣳषितारिषत्॥
-पुनर्जलेन।

घृतम्

ॐ घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृतेश्रितो घृतमवस्यधाम।
अनुष्वधमावहमादय स्व स्वाहा कृतं वृषभवर्क्षि हव्यम्॥

शुद्धस्नानम्

ॐ तस्माऽअरं गगाम वो अस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जन यथा च नः॥

मधुस्नानम्

ॐ मधुवाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधि॥ मधुनक्त मुतोषसो मधुमत्पार्थिवꣳरजः।
मधुद्यौरस्तु नः पिता॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधु मां २ अस्तु सूर्यः।
माध्वीर्गावो भवन्तु नः॥

शुद्धस्नानम्

ॐ आपो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतस्य पुनन्तु।
विश्वꣳहिरि प्रं प्रवहन्ति देवी रुदिदाभ्यः शुचिरापूत एभि॥

शर्करास्नानम्

ॐ अपाꣳरसमुद्ववयसꣳसूर्ये सन्तꣳसमाहितम्।
अपाꣳरसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयाम गृहीतोऽसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम्॥

शुद्धस्नानम्

ॐ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयते हनः। उशतीरिवमातरः॥

पंचामृतम्

ॐ पंचनद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्त्रोतसः।
सरस्वती तु पंचधा सो देशेऽभवत्सरित॥
सर्पिस्सुदुग्धदधिमाक्षिकशर्कराद्यै र्भागैर्युतैः कनक कुम्भभृतैः समन्त्रैः।
कर्पूर केशर सुगन्धिभिरिन्दु मौले स्नानार्थमर्पितमिदं विधिवत् गृहाण॥

शुद्धोदक

ॐ शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्तआश्विनः।
श्येतः श्येताक्षो ऽरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णायामा अवलिप्ता रौद्रा नभो रूपाः पार्जन्याः॥

ईक्षुरस

ॐ उर्क्चमे सुनृताचमे पयश्चमे रसस्चमे घृतंचमे मधुचमे सग्धिश्चमे सपीतिश्चमे कृषिश्चमे वृष्टिश्चमे जैत्रंचम ऽऔद्भिद्यंचमे यज्ञेन कल्पन्ताम्।
-पुनर्जलेन।

गंधोदक

ॐ अꣳशुनाते अꣳशुः पृच्यतां परुषापरुः।
गन्धस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः।
-पुनर्जलेन।

कुशोदक

ॐ शरासः कुशरासो दर्भासाः सैर्याउत।
मोज्जाअदृष्टा वैरिणा सर्वेसाकं न्यलिप्सत्॥
-पुनर्जलेन।

पुष्पोदक

ॐ कोदण्ड खण्डित पुरत्रियारोषच्चूर्णीकृता, समशराप ललाट वक्त्रेत्स्तुत्या।
सुरादिभि रजतस्त्रमतिस्तु तापं, स्नानायतेस्तु सुरभिकृत पुष्पतोयं॥
-पुनर्जलेन।

फलोदक

ॐ खर्जूरजम्बुकदली पनसाम्रपक्व, पूगीकपित्थ बदरीजमुदुम्बराणि।
धात्रीफलानि मनोहराणि भक्त्या निरन्तरमहं स्नपयामि शम्भो॥
-पुनर्जलेन।

रत्नोदक

ॐ रत्नोदकैर्मणिगणैरुदितार्क बिम्ब तुल्यैसमान विमलैर्गुण मौक्तिकानि।
वज्रप्रवालमणिरन्जितनीलकाद्यैः भक्त्या निरन्तरमहं स्नपयामि शम्भो॥
-पुनर्जलेन।

उष्णोदक

ॐ नमः उष्णीषिणे गिरिचराय कुलुन्चानां पतये नमो नम इषुमद्भ्यो धन्वायिभ्यश्च वो नमो।
नम आतन्वानेभ्यः प्रतिदधानेभ्यश्च वो नमो नम आयच्छद्भ्योस्यद्भयश्च वो नमो नमो विसृजद्भ्यः॥
-पुनर्जलेन।

भस्मोदक

ॐ प्रसद्य भस्मना योनिमपश्च पृथिवीमग्ने।
सꣳसृज्ज्य मातृभिष्ट्वं ज्ज्योतिष्मान् पुनराऽसदः॥
ॐ गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढ़ गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानी कलत्रं भजेपंचवत्रम्॥
ॐ गंगाधरं शशिकिशोरधरं त्रिलोकी रक्षाधरं निटिल चन्द्रधरं।
भस्मावधूलनधरं गिरिराजकन्या दिव्यावलोकनधरं वरदं प्रपद्ये॥
-पुनर्जलेन।

कर्पूरोदक

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षिय मामृतात्॥
-पुनर्जलेन।

सुगन्धोदक

(गुलाबजल, केवड़ाजल, इत्र)
ॐ अꣳशुश्चमे रश्मिश्चमे ऽदाभ्यश्चमे ऽधिपतिश्चम ऽउपाꣳशुश्चमे ऽन्तर्यामश्चम ऽऐन्द्रवायवश्चमे मैत्रावरुणश्चम ऽआश्विनश्चमे प्रतिप्रस्थानश्चमे शुक्क्रश्चमे मन्थी च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥
-पुनर्जलेन।

वर्षाजल

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीयमामुतः॥
-पुनर्जलेन।

अभ्रोदक

ॐ आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः।
क्षोभणश्चर्षणीनाम्। सङ्क्रन्दनो निमिष ऽएकवीरः शतꣳसेना अजयत्साकमिन्द्रः॥
-पुनर्जलेन।

औषधी

ॐ या ओषधीः पूर्वाजाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।
मनैनुबभ्रुणामहꣳशतं धामानि सप्त च॥
ॐ या ऽओषधीः सोमराज्ञीर्विष्ठिता पृथिवीमनु।
बृहस्पतिप्प्रसूता ऽअस्यै सन्दत्तवीर्य्यम्॥
-पुनर्जलेन।

गंगोदक

ॐ स्वात्राः पीता भवत यूमगापो ऽअस्माकमन्तरुदरे सुशेवा ताऽअस्मब्भ्यः म यक्ष्मथा ऽअनमीवा ऽअनागसः स्वदन्तु देवी स्मृताऽ ऋतावृधः॥
गङ्गोदकं च यमुनोदकमेतदीश गोदावरीजलमिदं सरयूजलं च।
रेवोदकं च मम भावनया प्रणीत शुद्धोदकं परिगृहाण सुनुप्रसन्नः॥
ॐ गंगागंगेति यो बू्रयात् योजनानां शतैरपि।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥
स्मृत्वा जन्मशतं पापं दृष्ट्वा जन्मशतद्वयं।
पीत्वा जन्मसहस्रेषु हरेद्गंगा कलौयुगे॥
-पुनर्जलेन।

अभिषेकस्नानम्

ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव उता त इषवे नमः।
बाहुभ्यामुत ते नमः॥१॥
या ते रुद्र शिवा तनूर घोरा ऽपापकाशिनी।
तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि॥२॥
यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिꣳसीः पुरुषं जगत्॥३॥
शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छावदामसि।
यथा नः सर्वमिज्जगदयक्ष्मꣳसुमना असत्॥४॥
अध्यवा च दधिवक्ता प्रथमो दैव्योभिषक्।
अहींश्च सर्वान्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्यो ऽधराचीः परासुव॥५॥
असौयस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमंगलः।
ये चैनꣳरुद्रा अभितो दिक्षुश्रिताः सहस्रशो वैषाꣳहेड ऽइमहे॥६॥
असौ यो ऽवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः।
उतैनं गोपा अदृश्रन्नुदहार्यः स दृष्टो मृडयाति नः॥७॥
नमोस्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे।
अथो ये अस्य सत्वानोऽहं नेभ्योऽ करं नमः॥८॥
प्रमुन्च धन्वनस्त्वमुभयोरार्त्न्योर्ज्याम्।
याश्च ते हस्त इषवः पराता भगवोवप॥९॥
विज्यं धनुः कपर्दिनो विशल्यो बाणवाँ २ उत॥१०॥
या ते हेतिर्मीढुष्ठम हस्ते बभूव ते धनुः।
तया ऽस्मान्विश्वतस्त्वम यक्ष्मया परिभुज॥११॥
परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः।
अथो य इषुधिस्तवारे अस्मन्निधेहितम्॥१२॥
अवतत्य धनुष्ट्वꣳसहस्राक्ष शतेषुधे।
निशीर्य शल्यानां मुखा शिवो नः सुमनाभव॥१३॥
नमस्त आयुधायानातनाय धृष्णवे।
उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने॥१४॥
मानोमहान्तमुतमानो अर्भकं मान उक्षन्तमुतमानउक्षितम्।
मानो वधीः पितरं मोतमातरं मानः प्रियास्तन्वोरुद्ररीरिषः॥१५॥
मानस्तोके तनये मान आयुषिमानो गोषुमानो अश्वेषुरीरिषः।
मानो वीरान् रुद्रभामिनोवधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे॥१६॥

आचमनम्

ॐ अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमोदैव्योभिषक्।
अहींश्च सर्वान्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातु धान्योऽ धराचीः परासुव॥
त्रिपुरारि नमस्तुभ्यं त्रिदशैरभिवन्दितम्।
मयादत्तमिदं तोयं गृहाणाचमनं कुरु॥

सुगन्धित तैलाभ्यंगम्

ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातोमलादिव।
पूतं पवित्रेणे वाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥

वस्त्रम्

ॐ असौ योऽवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः।
उतैनंगोपा अदृश्रन्नुदहार्यः स दृष्टो मृडयातिनः॥
ॐ युवा सुवासाः परिवीतऽ आगात्सऽ उश्रेयान्भवति जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्योमनसादेवयन्तः॥
वस्त्र युग्मं समानीतं पट्टसूत्रेण निर्मितम्।
सूक्ष्मं कार्पास तन्तूनां सुवर्णेन विराजितम्॥
-पुनर्जलेन(आचमनम्)।

यज्ञोपवीतम्

ॐ नमोऽस्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे।
अथो ये अस्य सत्वानोऽहं तेभ्योऽ करं नमः॥
ॐ यज्ञोपवीतं परमंपवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुन्चशुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
-पुनर्जलेन(आचमनम्)।

पुनर्वसनम्

ॐ नमः कपर्दिने च व्युप्त केशाय च नमः सहस्राक्षाय च शतधन्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्ठाय य॥
ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरुथमाऽ सदत्स्वः।
वासो अग्ने विश्वरूपꣳसंव्ययस्व विभावसो॥
-पुनर्जलेन(आचमनम्)।

गन्धम्

ॐ प्रमुन्च धन्वनस्त्वमुभयोरार्त्न्योर्ज्याम।
याश्चते हस्त इषवः पराता भगवोवपः॥
ॐ त्वां गन्धर्वाऽ अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः।
त्वमोषधे सोमोराजा विद्वानयक्ष्मादमुच्यत॥

कुंकुमम्

ॐ इन्द्रस्य रूपमृषयो बलाय कर्णाब्भ्याꣳश्रोतं मृतं गुहाब्भ्याम्।
यवानबर्हिर्श्रुविकेसराणि कर्कन्धु यज्ञे मधुरारघमुखात॥

भस्मम्

ॐ प्रसद्य भस्मना योनिमपश्च पृथिवीमग्ने।
सꣳसृज्य मातृभिष्ट्वं ज्ज्योतिष्मान् पुनराऽसदः॥
ॐ यदङ्गसंसर्गकृता वरेण्यं मौलौनिजे सङ्गमयन्ति देवाः।
देहे सदैवाहितविश्वभारे सारे जगत्या वितनोति भस्म॥

अक्षतम्

ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमशंकराय च मयस्करायच नमः शिवाय च शिवतरायच।
ॐ श्वेतैरखण्डित मनोहरशालिबीजैः संक्षालितैः शुचिजलैश्च सुगन्धिमिश्रैः।
त्वामर्चयामि भगवन्! मनसा सदाहं गौरीपतेमयि निधेहि कृपाकटाक्षम् ॥

सप्तधान्यम्

ॐ व्रीहयश्चमे यवाश्चमे माषाश्चमे तिलाश्चमे मुद्गाश्चमे खल्वाश्चमे प्रियङ्गवश्चमे ऽणचश्चमे श्यामाकाश्चमे नीवाराश्चमे गोधूमाश्चमे मसूराश्चमे यज्ञेनकल्पन्ताम्॥

बिल्वपत्रम्

ॐ नमो बिल्मिने च कवचिने च नमो वर्मिणे च वरुथिने च नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्याय चाहनन्याय च।
ॐ अमृताद्भवं च श्रीवृक्षं शंकरस्य सदाप्रियम्।
बिल्वपत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते सुरेश्वर॥
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम्।
त्रिजन्मपाप संहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
मालूर वृक्ष जनितानि मनोहराणि भक्त्यात्वदर्थमनिशं प्रतिपादितानि।
श्रीबिल्वपत्र विपुलानि समर्पितानि गौरीपते परिगृहाण सुकोमलानि॥

पुष्पम्

ॐ नमः पार्याय चावार्याय च नमः प्रतरणाय चोत्तरणायच नमस्तीर्थ्याय च कूल्याय च नमः शष्प्याय च फेन्न्याय च॥

शमीपत्रम्

ॐ अग्नेस्तनूरसि वाचो विसर्जनं देववीयते त्वा गृह्णामि बृहद्ग्रावासि वानस्पत्यः स इदं देवेब्भ्यो हविः शमीष्व सुशमि शमीष्व। हविष्कृदेहि हविष्कृदेहि॥
ॐ ऋतवस्तऽ ऋतुथा पर्वशमीतारो विशासतु।
संवत्सरस्य तेजसा शमीभीः शम्यन्तुत्वा॥
अमंगलानां शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च।
दुःस्वप्न नाशिनीं धम्यां प्रपद्येऽहं शमींशुभाम्॥

तुलसीमन्जरीम्

ॐ शिवोभव प्रजाब्भ्यो मानुषीब्भ्यस्त्वमंगिरः।
म द्यावा पृथिवीऽ अभिशोचीर्म्मान्तरिक्षम्मावनस्पतीम्॥

कनकपुष्पं फलं वा

ॐ कार्षिरसि समुद्द्रस्य त्वाक्षित्याऽ उन्नयामि।
समापोऽ अद्भिरग्मत समोषधिभिरोषधीः॥
ॐ धीरंधैर्य परीक्षार्थ धारितं परमेष्ठिना।
धत्तूरं कण्टकाकीर्णं गृहाण परमेश्वर॥

सुगन्धित द्रव्यम्

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात्॥
ॐ श्रीकेतकीबकुलचम्पकमल्लिकानां, संभृत्यसार सुचितं किल गन्धद्रव्यम्।
पात्रे हाटकमये मणिरन्जितान्मे। तुलगृहाण जगदीश सुगन्धि युक्ताम्॥

आभूषणम्

ॐ युवंतमिन्द्रा पर्व्वताः पुरोयुधा योनऽ एतन्याद पतन्तमिद्धत वज्रेणतन्तमिद्धतम्।
दूरेतत्ताय छन्त्सद्गहन यदिनक्षत्॥
वज्रमाणिक्यवैदूर्यमुक्ता विद्रुममण्डितम्।
पुष्पराग समायुक्तं भूषणं प्रतिगृह्यताम्॥

नानापरिमल द्रव्यम्

ॐ अहिरिव भोगैः पर्येतिबाहुं ज्यायाहेतिं परिबाधमानः।
हस्तघ्नो विश्वावयुनानि विद्वान पुमान पुमाꣳसं परिपातु विश्वतः॥
ॐ श्वेतातिरेणु सहितं शुभरक्तचूर्णं सिंदूरचूर्ण विपुलान्वित पीतचूर्णम्।
कर्पूरकेसर सुगन्धि सुवासितं च सौभाग्य चूर्णमुररी कुरु दीनबन्धो॥

सिन्दूरम्

ॐ सिन्धोरिव प्राध्वनो शूघनाशोवातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः।
घृतस्य धाराअरुषोनवाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः॥

धूपम्

ॐ या ते हेतिर्मीढुष्टम हस्ते वभूव ते धनुः।
तयाऽस्मान्विश्व तस्त्वयक्ष्मया परिभुज॥
ॐ कालाङ्गुरोश्च घृतमिश्रित गुग्गुलस्य, धूपोमयाविरचितो भवतः पुरस्तात्।
आघ्राय तं शुचि मनोहर गन्धचूर्णं, तूर्णं विनाशय महेश्वर मोहजालम्॥

दीपम्

ॐ परितेधन्वनो हेतिरस्मान् वृणक्तुविश्वतः।
अथोयइषुधिस्तवारे अस्मन्निधेहितम्॥
ॐ पूर्णे घृतेन गिरिजेश सुवर्णपात्रे, कौसुम्भ सूत्र दृढ़वर्तिविराजमानः।
दीपः पुरस्तव मयारचितो य एष, शीघ्रं विनाशयतु मे दुरितान्धकारम्॥

नैवेद्यम्

ॐ अवतत्य धनुष्ट्वꣳसहस्राक्षशतेषुधे।
निशीर्य शल्यानां मुखाशिवो नः सुमना भव॥
ॐ जिह्वासुधां कनकपात्र विराजमान मन्त्रादिकं मधुरशाकफलावलीढम्।
पंचामृतल्पुतमनेकविधं रसौधं संकल्पितं त्वमुररी कुरु दीनबन्धोः॥
ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा। ॐ व्यानाय स्वाहा। ॐ उदानाय स्वाहा। ॐ समानाय स्वाहा॥

आचमनीयं जलम्

मध्ये जलम्
ॐ नमः सोभ्याय च प्रतिसर्याय च नमो याम्याय च क्षेम्याय च नमः श्लोक्याय च वसान्याय च नमः उर्वर्याय च खल्याय च॥

करोद्वर्तनम्

ॐ सिन्चति परिषिन्चन्त्युत्सिन्चन्ति पुनन्ति च।
सुरायै बभ्रवै मदे किन्त्वो वदति किन्त्वः॥
ॐ अꣳशुना ते अꣳशुः पृच्यतां परुषा परु।
गन्धस्ते सोममवतु मदायरसो ऽअच्युतः॥

ताम्बूलम्

ॐ नमस्त आयुधायानातनाय धृष्णवे।
उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने॥
ॐ मानस्तोके तनये मान आयुषिमानो गोषुमानो अश्वेषुरीरिषः।
मानो वीरान् रुद्रभामिनोवधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे॥

पूगीफलम्

ॐ इमारुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्रभरामहेमतीः।
यथाशमसद्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम्॥

लवंगम्

ॐ सोमाय लवानालभते त्वष्ट्रे कौलीकान् गोषादिर्देवानां पत्नीब्भ्यः कुलीका देवजामिब्भ्योऽग्नये गृहपतये पारुष्णान्॥

इलायचिम्

ॐ ये पथां पथिरक्षय ऽऐलवृदाऽ आयुर्युधः।
तेषाꣳसहस्त्रयोजनेऽव धन्न्वानि तन्न्मसि॥

जायफलम्

ॐ त्वमग्नेद्युभिस्त्वमाशु शुक्षणिस्त्व मदब्भ्यस्त्व मश्मनस्परि त्वं वनेब्भ्य त्वमोषधिब्भ्य स्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः॥

जावित्री

ॐ यावतिद्याधा पृथिवी यावच्च सप्त सिन्धवो वितस्थिरे।
तावन्तमिन्द्र ते ग्रहमूर्जा गृह्णाम्यक्षितं मयि गृह्णाम्यक्षितम्॥

ऋतुफलम्

ॐ उदीचीमारोहानुष्टुत्वावतु वैराजꣳसामैक विꣳशस्तोमः शरदृतः फलं द्रविणम्। सीसेन तन्त्रं मनसा मनीषिण ऽऊर्णा सूत्रेण कवयोवयन्ति। अश्विना यज्ञꣳसविता सरस्वतीन्द्रस्य रूपंवरुणोभिषज्यन्। अश्विना धर्मं पातꣳहाध्वनि महर्दिवाभिरुतिभिः॥

सुगन्धित द्रव्यम्

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात्॥
ॐ श्रीकेतकीबकुलचम्पकमल्लिकानां, संभृत्यसार सुचितं किल गन्धद्रव्यम्।
पात्रे हाटकमये मणिरन्जितान्मे। तुलगृहाण जगदीश सुगन्धि युक्ताम्॥

श्रीफलम्

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।
बृहस्पति प्रसूतास्तानो मुन्चन्त्वꣳहसः॥

दक्षिणा द्रव्यम्

ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
सदाधार पृथिवींद्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम्॥

प्रार्थना

शान्तं पद्मासनस्थं शशिधर मुकुटं पन्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।
शूलं वज्रं च खड्गं परशुमभयदं दक्षिणाङ्गे वहन्तम्॥
नगं पाशं च घण्टां डमरुक सहितं साङ्कुशं वामभागे।
ननालंकार युक्तं स्फटिक मणिनिभं पार्वतीशं नमामि ॥
(स्मरामि)॥
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दशाक्षर मन्त्र- “ॐ नमो भगवते रुद्राय”

विनियोग

ॐ दशाक्षर मन्त्रस्य प्रजापति ऋषिः रुद्रो देवता विराट छन्दः दशाक्षर मन्त्र जपे विनियोगः॥

ध्यानम्

ॐ अनादि निधनो रुद्रो गीयते श्रुतिभिः सदा।
राजसेन समं रुद्रस्त्रितयं सद्य संस्थितम्॥
नमामि त्वां विशालाक्ष नीलग्रीव नमोऽस्तुते।
त्रिनेत्राय नमस्तुभ्यमुमादेहार्ध धारिणे॥
“ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः प्रपन्नपारिजाताय स्वाहा”।
इदमष्टोत्तर शतं जप्त्वा दशांशाहुतिं दद्यात्।

ततो संकल्पः

ॐ अद्य गोत्रः प्रवरः शर्मा (वर्मा/गुप्तः/दासः) अहं रुद्राभिषेककर्मानुष्ठानसिद्धिद्वारा श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीपरमेश्वरप्रत्यर्थं च होमं करिष्ये।

पंचभूसंस्कार

१- तीन कुशोंसे वेदी अथवा ताम्रकुण्डका दक्षिणसे उत्तरकी ओर परिमार्जन करे तथा उन कुशोंको ईशान दिशामें फेंक दे (दर्भैः परिसमुह्य)।
२- गोबर और जल से लीप दे (गोमयोदकेनोपलिप्य)।
३- स्रुवा अथवा कुशमूलसे पश्चिमसे पूर्वकी ओर प्रादेशमात्र (दस अंगुल लंबी) तीन रेखाएँ दक्षिणसे प्रारम्भ कर उत्तरकी ओर खींचे (वजेणोल्लिख्य)।
४- उल्लेखन क्रमसे दक्षिण अनामिका और अंगूठेसे रेखाओं पर से मिट्टी निकालकर बांये हाथ में तीन बार रखकर पुनः सब मिट्टी दाहिने हाथमें रख ले और उसे उत्तरकी ओर फेंक दे (अनामिकान्गुष्ठाभ्यां मृदमुद्धृत्य)।
५- पुनः जलसे कुण्ड या स्थण्डिलको सींच दे (उदकेनाभ्युक्ष्य)।

अग्निस्थापनम्

ॐ अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे। देवाँ२ आ सादयादिह।
इस मन्त्रसे अग्नि-स्थापन के पश्चात् कुशोंसे परिस्तरण करे। कुण्ड या स्थण्डिलके पूर्व उत्तराग्र तीन कुश या दूर्वा रखे। दक्षिणभागमें पूर्वाग्र तीन कुश या दूर्वा रखे। पश्चिममें उत्तराग्र तीन कुश या दूर्वा रखे। उत्तर भागमें पूर्वाग्र तीन कुश या दूर्वा रखे ।

अग्निध्यानम्

ॐ चत्वारि श्रृंगा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य। त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यां२ आ विवेश।
ॐ मुखं यः सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक् तथा।
पितृणां च नमस्तस्मै विष्णवे पावकात्मने॥
ॐ अग्ने शाण्डिल्यगोत्र मेषध्वज प्राङ्मुखा मम सम्मुखो भव।
“ॐ पावकाग्नये नमः” इस मन्त्र से पंचोपचार (गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य से) पूजन करे।

अग्निप्रार्थना

रक्तमाल्याम्बरधरं रक्त पद्मासन स्थितम्।
स्वाहा स्वधा वषट्कारै रन्कितं मेष वाहनम्॥
शतं मंगलकं रौद्रं वह्निमावाह्याम्यहम्।
त्वं मुखं सर्वदेवानां सप्तार्चिर मितद्युते॥
-इसके पश्चात् हवन करें।
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ततो महिम्नपाठं कुर्यात्
॥श्रीशिवमहिम्नः स्तोत्रम्॥
पुष्पदन्त उवाच महिम्नः पारं ते परम विदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मा दीना मपि तदव सन्नास्त्वयि गिरः।
अथावाच्यः सर्वः स्वमति परिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥१॥
अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो-
रतद्व्या वृत्या यं चकित मभि धत्ते श्रुतिरपि।
मधुस्फीता वाचः परम ममृतं निर्मित वत-
स्तव ब्रह्मन् किं वागपि सुर गुरोर्विस्मय पदम्।
मम त्वेतां वाणीं गुण कथन पुण्येन भवतः पुना मीत्यर्थेऽ स्मिन् पुर मथन बुद्धि र्व्यसिता॥३॥
तवैश्वर्यं यत्तत् जग दुदय रक्षा प्रलय कृत् त्रयी वस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु।
अभव्या नामस्मिन् वरद रमणीयाम रमणीं विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः॥४॥
किमीहः किं कायः स खलु किमु पायस्त्रि भुवनं किमाधारो धाता सृजति किमु पादान इति च।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्य नव सर दुःस्थो हतधियः कुतर्कोऽयं कांश्चिन् मुखर यति मोहाय जगतः॥५॥
अजन्मानो लोकाः किम वय ववन्तो ऽपि जगता-
मधिष्ठातारं किं भव विधिर नादृत्य भवति।
अनीशो वा कुर्याद् भुवन जनने कः परिकरो यतो मन्दास् त्वां प्रत्य मरवर संशेरत इमे॥६॥
त्रयी सांख्यं योगः पशुपति मतं वैष्णव मिति प्रभिन्ने प्रस्थाने पर मिद मदः पथ्य मिति च।
रुचीनां वैचित्र्या दृजु कुटिल नाना पथ जुषां नृणामेको गम्यस् त्वमसि पय सामर्णव इव॥७॥
महोक्षः खट्वाङ्गं परशु रजिनं भस्म फणिनः कपालं चेती यत्तव वरद तन्त्रोप करणम्।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति च भवद् भ्रुप्रणिहितां न हि स्वात्मा रामं विषय मृग तृष्णा भ्रमयति॥८॥
ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकल मपरस् त्व ध्रुवमिदं परो ध्रौव्या ध्रौव्ये जगति गदति व्यस्त विषये।
समस्तेऽप्ये तस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव स्तु वन्जि ह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता॥९॥
तवैश्वर्यं यत्नाद् यदु परि विरिन्चो हरि रधः परिच्छेतुं याता वनल मनल स्कन्ध वपुषः।
ततो भक्ति श्रद्धा भर गुरु गृणद्भ्यां गिरिश यत् स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनु वृत्तिर्न फलति॥१०॥
अयत्ना दापाद्य त्रिभुवन मवैर व्यतिकरं दशास्यो यद् बाहून भृत रण कण्डू पर वशान्।
शिरः पद्म श्रेणी रचित चरणाम्भो रुह बलेः स्थिरायास् त्वद् भक्तेस् त्रिपुर हर विस्फूर्जित मिदम्॥११॥
अमुष्य त्वत्सेवा समधि गत सारं भुजवनं बलात् कैलाशऽपि त्वदधि वसतौ विक्रमयतः।
अलभ्या पाताले ऽप्यलस चलिताङ्गुष्ठ शिरसि प्रतिष्ठा त्वय्या सीद् ध्रुव मुप चितो मुह्यति खलः॥१२॥
यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चै रपि सती-
मधस्चक्रे बाणः परिजन विधेय स्त्रिभुवनः।
न तत्चित्रं तस्मिन् वरि वसि तरि त्वच्चरणयो-
र्न कस्याप्युन् नत्यै भवति शिरसस् त्वय्य वनतिः॥१३॥
अकाण्ड ब्रह्माण्ड क्षय चकित देवा सुर कृपा-
विधेयस्या ऽऽसीद्यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन भय भंग व्यसनिनः॥१४॥
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।
स पश्यन्नीश त्वामित रसुर साधारण मभूत् स्मरः स्मर्तव्यात्मा नहि वशिषु पथ्यः परिभवः॥१५॥
मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुजपरिघ रुग्णग्रहगणम्।
मुहुर्द्यौर्दौःस्थ्यं यात्य निभृत जटाताडित तटा जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता॥१६॥
वियद्व्यापी तारा गण गुणित फेनोद्गमरुचिः प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते।
जगद् द्वीपाकारं जलधि वलयं तेन कृतमि-
त्यने नैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः॥१७॥
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो रथान्गे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृण माडम्बर विधि र्विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः॥१८॥
हरिस्ते साहस्रं कमलबलिमाधाय पदयो-
र्यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम्।
गतो भक्त्युदे्रकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्॥१९ क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः॥२०॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता-
मृषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः।
क्रतुभेषस्त्वत्तः क्रतुफलविधान व्यसनिनो धु्रवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः॥२१॥
प्रजानाथं नाथ प्रसभ मभिकं स्वां दुहितरं गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः॥२२॥
स्वलावन्याशंसा धृतधनुष मन्हाय तृणवत् पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत देहार्धघटना-
दवैति त्वा मद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः॥२३॥
श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचरा-
श्चिताभस्मालेपः स्रगपि नृकरोटीपरिकरः।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं तथापि स्मर्तृणां वरद परमं मंगलमसि॥२४॥
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्संगितदृशः।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये दधत्यन्तस्तत्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान्॥२५॥
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह-
स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च।
परिच्छन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रतु गिरं न विद्नस्तत्तत्वं वयमिह तु यत्वं न भवसि॥२६॥
त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा-
नकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम्॥२७॥
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहां-
स्तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि प्रियायास्मै धाम्ने प्रविहितनमस्योऽस्मि भवते॥२८॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः॥२९॥
बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः।
जनसुखकृते सत्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः प्रहमसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः॥३०॥
कृशपरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं क्व च तव गुणसीमोल्लंघिनी शश्वदृद्धिः।
इति चकित ममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद् वरद चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम्॥३१॥
असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥३२॥
असुर सुर मुनीन्द्रै रर्चितस्येन्दुमौले-
र्ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।
सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार॥३३॥
अहरहर नवद्यं धूर्जटेः स्तात्रमेतत् पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान् यः।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथात्र प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च॥३४॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः। अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्वं गुरोः परम्॥३५॥
दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः। महिम्नः स्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥३६॥
कुसुम दशन नामा सर्वगन्धर्वराजः शिशुशशिधर मौले र्देवदेवस्य दासः।
स खलुनिजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात् स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्यदिव्यं महिम्नः॥३७॥
सुरवर मुनिपुज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं पठति यदि मनुष्यः प्रान्जलिर्नान्यचेताः।
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्॥३८॥
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गंधर्व भाषितम्। अनौपम्यं मनोहारि शिवमीश्वरवर्णनम्॥३९॥
इत्येषा वान्गमयी पूजा श्रीमच्छन्करपादयोः। अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः॥४०॥
तव तत्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर। यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः॥४१॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः। सर्वपापविनिमुक्तः शिवलोके महीयते॥४२॥
श्रीपुष्पदन्त मुखपंकज निर्गतेन स्तोत्रेण किल्बिष हरेण हरप्रियेण।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः॥४३॥
॥ श्रीशिवमहिम्नः स्तोत्रं सम्पूर्णम्॥
¥¨🪔 ध्यान, शान्तिपाठ, महानीराजन, आरती, प्रदक्षिणा व पुष्पाञ्जलि▾

ध्यानम्

ॐ त्रिशूलधारिणे तुभ्यं भूतानां पतये नमः।
द्रव्यहीनैर्क्रियाहीनैर्मन्त्रहीनै सुरेश्वर॥
कृतं वाप्यकृतं वापि क्षन्तुमर्हसि शंकर।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि त्वद्गतिः परमेश्वर॥
चतुःस्वस्ति पयः पन्च षड्विष्णोद्वादशदेवता।
द्यौः शान्तिः पठेन्नित्यं महापातक नाशनम्॥

शान्तिपाठः

ॐ स्वस्ति न ऽइन्द्रोवृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो ऽअरिष्टनेमिः स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ पयः पृथिव्यां पय ऽओषधीषु पयोदिव्यंतरिक्षे पयोधाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तुमह्यम्॥
ॐ विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रेस्त्थोविष्णोः स्यूरसि विष्णोध्रुवोऽसि विष्णवे त्वा॥
ॐ अग्निदेवता वातो देवता सूर्योदेवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रादेवतादित्यादेवता मरुतो देवाता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता॥
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षꣳशान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिः रोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्वꣳशान्तिः शान्तिरेवशान्ति सामाशान्तिरेधि॥
॥ सुशान्तिर्भवतु॥
मेरुमंदर तल्यार्थं यत्पापं कुरुते नरः। रुद्रप्रार्थि च यत्पापं न कन्याहय विक्रयोः॥

महानीराजनम्

ॐ इदꣳहविः प्रजननं मे अस्तु दशवीरꣳसर्वगणꣳस्वस्तये।
आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लाकसन्यभयसनि।
अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयोरेतो अस्मासु धत्त।
ॐ आरार्त्रिपार्थिवꣳरजः पितुर प्रायि धामभिः।
दिवः सदाꣳसि बृहती वितिष्ठस आत्वेषं वर्तते तमः॥
ॐ अग्निदेवता वातो देवता सूर्योदेवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रादेवतादित्यादेवता मरुतो देवाता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता॥
॥ आरती॥
ॐ जय शिव ॐकारा हर हर शिव ॐकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धंगी धारा॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुडासन वृषवाहन साजे॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
दो भुज चारु चतुर्भुज दशभुज ते सोहे।
तीनो रूप निरखता त्रिभुवन मन मोहे॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
अक्षमाला वनमाल रुण्डमाला धारी।
चन्दन मृगमद चन्दा भाले शुभकारी॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघाम्बर अंगे।
सनकादिक प्रभुतादिक भूतादिक संगे॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
करमध्ये सुकमण्डलु चक्रत्रिशुल धर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जगपालनकर्ता॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनो एका॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
सच्चिदानंद पराप्पर सज्जन हितकारी।
जय जय साम्बसदाशिव जय जय त्रिपुरारी॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
त्रिगुण स्वामीजी की आरती जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित पावै॥
ॐ हर हर हर महादेव॥
ॐ जय शिव ॐकारा हर हर शिव ॐकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धंगी धारा॥
ॐ हर हर हर महादेव॥

प्रदक्षिणा

ॐ नतं विदाधय इमा जनानन्य युष्माक मन्तरं बभूव।
निहारेण प्रवृता जल्पाचा सुतृपउक्थ सासश्चरन्ति॥
ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषन्गिणः।
तेषाꣳसहस्र योजनेव धन्वानि तन्मसि॥
वृषं चण्डं वृषं चैव सोमसूत्रं पुनवृषम्।
पुनश्च सोमसूत्रं च पुनश्चण्डं पुनवृषम्॥
यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च।
तनि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणां पदे पदे॥

नीराजन दर्शनम्

ॐ पृष्टो दिवि पृष्टो अग्निः पृथिव्यां पृष्टो विश्वा ओषधीरा विवेश।
वैश्वानरः सहसा पृष्टाऽग्निः स नो दिवा सरिषण्पातुनक्तम्॥

पुष्पान्जलिम्

मानस्तोके तनये मान आयुषि मानो गोषु मानो अश्वेषु रीरिषः।
मानो वीरान्रुद्रभामिनो वधीर्हविष्मतः सदमित्वा हवामहे॥
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारं।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि॥
मंदारमाला कुलितालकायै कपालमान्कृत शेखराय।
दिव्यांबरायै च दिगंबराय नमः शिवायै च नमः शिवाय॥
आत्मा त्वं गिरिजामतिः सहचरा प्राणाः शरीरं गृहं,
पूजाते विषयोपभोग रचना निद्रा समाधिः स्थितिः।
संचारः पदयोः प्रदक्षिण विधिः स्तोत्राणि सर्वागिरो,
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥
करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधम्।
विहितम विहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥
ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे।
स मे कामान् कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु।
कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः॥
ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भोज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं समन्त पर्यायी स्यात् सार्वभौमः सार्वायुषआन्तादापरार्धात् पृथिव्यै समुद्रपर्यन्ताया एकराडिति तदप्येषश्लोकोऽ भिगीतो मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसनगृहे।
आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति॥
ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्।
सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावा भूमि जनयन देव एकः॥
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
ॐ सुभगायै विद्महे यशोमालिन्यै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात्॥
हरविश्वखिलाधार निराधार निराश्रय।
पुष्पान्जलिमिदं शम्भो गृहाण वरदोभव॥
रूपं देहि जयं देहि सर्व कामांश्च देहि मे।
श्रद्ध्या सिक्तया भक्त्या हार्द प्रेम्णा समर्पितः।
मन्त्रपुष्पान्जलिश्चायं कृपया प्रतिगृह्यताम्॥
नानासुगन्धि पुष्पाणि यथा कालोद्भवानि च।
पुष्पान्जलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वर॥

अर्घ्यम्

रक्ष रक्ष महादेव रक्ष त्रैलाक्य रक्षक।
भक्तानामभयं कर्ता त्राताभव भवार्णवात्॥
वरदत्वं वरं देहि वान्छितं वान्छितार्थद।
अनेन सफलार्घ्येण फलदोस्तु सदामम॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं रत्नानि विविधानि च।
गृहाणार्घ्यं महादेव परिपूर्णं फलं भवेत्॥

प्रणाम

नमः सर्वहितार्थाय जगदाधार हेतवे।
साष्टान्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मयाकृतः॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मनावानु सृतस्वभावात्।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै सदाशिवायेति समर्पयेत्तत्॥

प्रार्थना

भूत्यालेपन भूषितः प्रविलसन्नेत्राग्नि दीपान्कुरः,
कण्ठे पन्नगपुष्पदाम सुभगो गंगाजलैः पूरितः।
ईषत्ताम्र जटाऽग्र पल्लवयुतो न्यस्ते जगन्मण्डपे,
शम्भुर्मन्गल कुम्भतामुपगतो भूयात् सतां श्रेयसे॥
¥à🔱 श्रीरुद्राष्टकम्▾
॥ रुद्राष्टकम् ॥
नमामि शमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेद स्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाश वासं भजेऽहम्॥१॥
निराकार मोन्कार मूलं तुरीयं गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसार पारं नतोऽहम्॥२॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारुगंगा लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजन्गा॥३॥
चलत्कुण्डलं भू्रसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥४॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटि प्रकाशं।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानी पतिं भावगम्यं॥५॥
क्लातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानंददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥६॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजंतीह लोके परेवानराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति संतापनाशं प्रसीद प्रभा ेसर्वभूतादिवासम्॥७॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदाशंभु तुभ्यम्।
जराजन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभोपाहि आपन्नमामीश शंभो॥८॥
रुद्राष्टकमिदं प्राक्तं विपे्रण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥
सुनि बिनती सर्वग्य शिव देखि विप्र अनुराग।
पुनि मन्दिर नभबानी भई द्विजवर वर माग॥
जौ प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु॥
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरई भुलान।
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपासिन्धु भगवान॥
शंकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।
साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहि काल॥
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क्षमाप्रार्थना

पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्पा पाप सम्भवः। त्राहि मां पार्वती नाथ सर्वपाप हरो भव॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं महेश्वर। यत्पूजितं महादेव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेवशरणं मम। तस्मात्कारुण्य भावेन क्षमस्व परमेश्वर॥
यदक्षर पदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत्। तत्सर्वं क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर॥
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखात्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेवतच्छम्भोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥
यस्यस्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्योवन्दे तमीश्वरम्॥
ॐ नमः सर्वहितार्थाय जगदाधार हेतवे। साष्टान्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः॥
करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधम्।
विहितम विहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥

विसर्जनम्

ॐ हरो महेश्वरः शम्भोः शूलपाणे पिनाकधृक् ।
शिवः पशुपतिश्चैव महादेव विसर्जनम् ।
ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः।
भवे भवे नाति भवे भवस्य मां भवोद्भवाय नमः॥
वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमःकालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो नमोन्मनाय नमः॥
अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोर घोर तरेभ्यः।
सवेभ्यः सवशर्वेभ्यो नमस्तेऽ अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
कृताऽकृता ज्ञप्तं क्षमस्व मम कृतां पूजां च गृहीत्वा।
मम हृदि महाँ कैलाशे वा सुखं चिरं तिष्ठ॥
ईशानः सर्वविद्याना मोंकारः परमेश्वरः।
मंदिरं गच्छ देवेश पुनरागमनाय च॥
ॐ ईशानः सर्व विद्यानां ईश्वरः सर्व भूतानां।
ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मा शिवोमेऽअस्तु सदाशिवोऽम्॥
ॐ हर हर कैलाशं गच्छ पुनर्मृत्तिका भव ॥ बम बम॥

कपोलनाड़नम्

निरावलम्बस्य ममावलम्बं विपाटिताशेषविपत्कदम्बं।
मदीयपापाचल पात सम्बं प्रवर्ततां वाचि सदैव बम्बम्॥

अर्पणम्

अनेनाऽऽवाहनादि षोडशोपचारैः अन्योपचारैश्च यथा ज्ञानेन यथामिलितोपचार द्रव्यैः कृतेन पूजनाख्येन कर्मणा ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीभवानीशंकरमहारुद्र देवताः प्रीयन्तां न मम॥
॥ ॐ तत्सद्ब्रह्माऽर्पण मस्तु॥

आशीर्वादः

अक्षत पुष्प फलेन
पुनस्त्वादित्या रुद्रा वसवः समिन्धतां पुनब्रह्मणो वसुनीथ यज्ञैः।
घृतेन तन्वं वर्धय स्वसत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः॥
दीर्घायुस्त ओषधे खनिता यस्मै च त्वा खनाम्यहम्।
अथो त्वं दीर्घायुर्भूत्वा शतवल्शा विरोहतात्॥
आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायता माराष्ट्रे राजन्यः शूर इष व्योति व्याधि महारथो जायतान्दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वा नाशुः सप्तिः पुरंधिर्योषा जिष्णुरथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमान वीरो जायतान्निकामे निकामेनः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यतां योगक्षेमो नः कल्पताम्॥
विविस्वन्नदित्यैषते सोमपीथस्तस्मिन्मत्स्व।
श्रदस्मैन रोवचसे दधातन यदाशीर्द्दादम्पतीवामवश्नुतः॥
पुमान पुत्रो जायते विन्दतेव स्वधा विश्वाहारप एधते गृहे॥
श्रीवर्चस्वमायुष्य मारोग्यमाविधात् पवमानं महीयते।
धान्यधनं पशुं बहु पुत्रलाभं शत संवत्सरं दीर्घमायुः॥
शतमानं भवति शतायुर्वै पुरुषः शतेन्द्रियः आयुरात्मन्धृते॥
॥ ॐ शान्तिः। ॐ शान्तिः। ॐ शान्तिः॥
¦¥🧺 शिवपूजन-सामग्री सूची▾
रोड़ीअबीर बुक्कासुखी पीसी हल्दीसिंदूरगुग्गल - प्रत्येक ५ ग्रामधूपबत्ती १पैकेटकपूर ५ ग्रामपान १०नगलौंगइलायचीफुटी सुपारी- प्रत्येक ५ग्रामपुजा हल्दीसुपारी- २५नगपंचामृत (गाय का- दूध,दही,घी,शक्कर,मधुरस)पंचगब्य(गाय का- दूध,दही,घी,मूत्र,गोमय)गंगाजलपंचमेवा (काजू,किशमिश,छुआरा,बादाम,फलीदाना)पॉंच प्रकार के ऋतुफलमिठाईशाकल्य-(चॉंवल,गेंहू,तिल,जौं,गुड़,घी)-आवश्यकतानुसारपीली सरसों ५ग्रामपापड़ १ पैकेटसप्तधान्य-(गेंहू,जौं,मूंग,सांवा,कुकनी,चना,धान)सप्तौषधि- (कूट, जटामासी, हल्दी, दारुहल्दी, मुर्राजड़ी, शिलाजीत, चंदन, बच, चंपक, नागरमोथा)सप्तमृतिका (हाथी,घोड़ा,रथ,गौशाला,वाल्मीक,तालाब,चौराहा)उड़द दालदूबीतुलसीपत्रपंचपल्लव(पीपल,गूलर,पाकड़,आम,बरगद)नवग्रह होम लकड़ीआमलकड़ीशुद्धजलभस्मरुद्राक्षकी मालाकुशपुष्पअक्षत(सफेद अक्षत, पीला अक्षत)बेलपत्र सादा एवं १०८ विल्वपत्रों में चंदन से राम लिखा हुआगन्नारसगुलाबजलवर्षाजलअभ्रकसुगन्धित तैलइत्रवस्त्र (दो साड़ी दो धोती)यज्ञोपवितमौलीधागामलयागिरिचंदनरक्तचंदनगोपीचंदन(मिट्टी चंदन)कुमकुमशमीपत्रतुलसीपत्र एवं मंजरीधतूराफल एवं पुष्पकनेरपुष्पमंदारपुष्पआंकपुष्पलालसफेद एवं अन्य पुष्पचांदी का छल्लादीपबत्तीनैवेद्य- चनादाल भीगा हुआमिठाईबतासापानसुपारीलवंगइलायचीजायफलजावित्रीनारियलदक्षिणाद्रव्य(छुट्टे)यवतिलहरिद्राचूर्णआमपत्रअष्टगंधहवनसामग्रीपार्थिव शिवलिंग सपरिवारदोनापत्तल।

📜 यह पाठ पं. छत्रधर शर्मा द्वारा संकलित "श्रीरुद्राभिषेकम्" (२०१५) से है — मूल पुस्तक कृतिदेव (पुराने) फ़ॉन्ट में थी, जिसे यूनिकोड में बदला गया है। मूल में "रु" अनेक स्थानों पर "रू" टंकित था (जैसे रूद्र, पुरूष) — उसे शुद्ध रूप "रु" किया गया है; वैदिक अनुस्वार "ꣳ" (गुँ) चिह्न से दिखाया गया है। संकल्प-खण्ड व शिववास/अग्निवास साइट के पंचांग-इंजन से जोड़े गए हैं। स्वर-चिह्न (उदात्त/अनुदात्त) मूल में नहीं हैं; वैदिक पाठ गुरु-मुख से सीखकर ही करें। सम्बन्धित: आरती व व्रत-कथा · संकल्प-मन्त्र · पूजा-योग्यता

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