॥ श्लोकानां विश्लेषिका ॥ — पदच्छेद, पदपरिचय, पदार्थ, अन्वय, भावार्थ व व्याकरण
"+" = एक ही लिखित शब्द के भीतर सन्धि-विच्छेद · डैश (-) वाले = समास का पूर्वपद
अर्थ: गृ - कु, उत्वम्
संस्कृत: बृहस्पतिः, संस्कारादिकर्तुर्गुरुः · पर्याय: बृहस्पति, सुराचार्य, गीष्पति, धिषण, जीव
सम्भावित विश्लेषण (सबसे सम्भावित पहले):
📗 शब्द-रूपावली में पूरी तालिका
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गुरुः | गुरू | गुरवः |
| द्वितीया | गुरुम् | गुरू | गुरून् |
| तृतीया | गुरुणा | गुरुभ्याम् | गुरुभिः |
| चतुर्थी | गुरवे | गुरुभ्याम् | गुरुभ्यः |
| पञ्चमी | गुरोः | गुरुभ्याम् | गुरुभ्यः |
| षष्ठी | गुरोः | गुर्वोः | गुरूणाम् |
| सप्तमी | गुरौ | गुर्वोः | गुरुषु |
| सम्बोधन | हे गुरो | हे गुरू | हे गुरवः |
रंगीन खाना = आपका लिखा रूप। रूप प्रतिमान (paradigm) से बने हैं; कुछ शब्दों के वैकल्पिक/आर्ष रूप भिन्न हो सकते हैं।
| पदम् | विवरणम् |
|---|---|
| गुरुः | गुरु (पुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन अन्य सम्भावना: गुरु (स्त्री.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन |
गुरुः ➤ गृ - कु, उत्वम्
संस्कृत: बृहस्पतिः, संस्कारादिकर्तुर्गुरुः · पर्याय: बृहस्पति, सुराचार्य, गीष्पति, धिषण, जीव
| शब्द | अमरकोश — विषय, पर्याय |
|---|---|
| गुरु |
देशिक (३.३.२०) — देश |
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इस श्लोक में शब्दों के भीतर कोई सन्धि नहीं पहचानी गई।
कोई समस्त पद नहीं पहचाना गया (या पूरा सामासिक शब्द कोश में सीधे मिल गया)।
कोई कृदन्त पद नहीं पहचाना गया।
कोई तद्धितान्त पद नहीं पहचाना गया।
विश्लेषण-समय: ०.१ सेकण्ड