॥ श्लोकानां विश्लेषिका ॥ — पदच्छेद, पदपरिचय, पदार्थ, अन्वय, भावार्थ व व्याकरण
"+" = एक ही लिखित शब्द के भीतर सन्धि-विच्छेद · डैश (-) वाले = समास का पूर्वपद
अर्थ: हरा, हरा-पीला
संस्कृत: पर्याय: सर्प, पृदाकु, भुजग, भुजङ्ग, अहि
व्युत्पत्ति: हृ + इन
सम्भावित विश्लेषण (सबसे सम्भावित पहले):
📗 शब्द-रूपावली में पूरी तालिका
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | हरि | हरिणी | हरीणि |
| द्वितीया | हरि | हरिणी | हरीणि |
| तृतीया | हरिणा | हरिभ्याम् | हरिभिः |
| चतुर्थी | हरिणे / हरये | हरिभ्याम् | हरिभ्यः |
| पञ्चमी | हरिणः / हरेः | हरिभ्याम् | हरिभ्यः |
| षष्ठी | हरिणः / हरेः | हरिणोः / हर्योः | हरीणाम् |
| सप्तमी | हरिणि / हरौ | हरिणोः / हर्योः | हरिषु |
| सम्बोधन | हे हरि / हे हरे | हे हरिणी | हे हरीणि |
रंगीन खाना = आपका लिखा रूप। रूप प्रतिमान (paradigm) से बने हैं; कुछ शब्दों के वैकल्पिक/आर्ष रूप भिन्न हो सकते हैं।
| पदम् | विवरणम् |
|---|---|
| हरि | हरि (नपुं.) — सम्बोधन, एकवचन अन्य सम्भावना: हरि (नपुं.) — प्रथमा विभक्ति, एकवचन | हरि (नपुं.) — द्वितीया विभक्ति, एकवचन |
हरि ➤ हरा, हरा-पीला
संस्कृत: पर्याय: सर्प, पृदाकु, भुजग, भुजङ्ग, अहि
| शब्द | अमरकोश — विषय, पर्याय |
|---|---|
| हरि |
साँप के और नाम (१.८.९) — लेलिहान, द्विरसन, गोकर्ण, कंचुकी, कुम्भीनस, फणधर, भोगधर सिंह के नाम (२.५.१) — सिंह, मृगेन्द्र, पंचास्य, हर्यक्ष, केसरी, कण्ठीरव, मृगरिपु, मृगदृष्टि |
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इस श्लोक में शब्दों के भीतर कोई सन्धि नहीं पहचानी गई।
कोई समस्त पद नहीं पहचाना गया (या पूरा सामासिक शब्द कोश में सीधे मिल गया)।
कोई कृदन्त पद नहीं पहचाना गया।
कोई तद्धितान्त पद नहीं पहचाना गया।
विश्लेषण-समय: ०.१ सेकण्ड