✍️ CD Sharma · 📅 20 Oct 2026 · ⏱️ 2 मिनट का पठन · 🏷️ 51 शक्तिपीठ(खण्डपीठ), 51 Shakti Peeth, पीठनिर्णय, Pithanirnaya, तन्त्रचूड़ामणि, Tantrachudamani, शक्तिपीठ श्लोक, देवी सती, Devi Sati Shaktipeeth, cdsharma.in, Shakti Peeth Sloka with Meaning, 51 Shakti Peethas List, भैरव और शक्ति
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दक्ष प्रजापति के यज्ञ-विध्वंस के उपरांत जब देवाधिदेव भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर विकल भाव से तांडव करने लगे, तब संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा हेतु भगवान श्रीविष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया था। जिन-जिन पावन स्थलों पर माता के अंग, प्रत्यंग अथवा आभूषण गिरे, वे स्थल शक्तिपीठ कहलाए।
प्रत्येक शक्तिपीठ में भगवती शक्ति के रूप में तथा भगवान शिव भैरव के रूप में नित्य प्रतिष्ठित हैं। इनका मुख्य प्रमाणिक आधार ग्रन्थ ‘पीठनिर्णय तन्त्र’ (तन्त्रचूड़ामणि) एवं श्रीमद्देवीभागवत महापुराण है। नीचे सभी पीठों का मूल संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद सहित पूर्ण विवरण प्रस्तुत है:
हिंगुलायां ब्रह्मरन्ध्रं भैरवो भीमलोचनः।
कोट्टरी सा महामाया त्रिगुणातीता सुन्दरी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: हिंगुला (हिंगलाज) तीर्थ में माता सती का ब्रह्मरन्ध्र गिरा था। वहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति 'कोट्टरी' (महामाया) हैं और उनके भैरव 'भीमलोचन' हैं।
करवीरे त्रिनेत्रं मे देवी महिषमर्दिनी।
क्रोधीशो भैरवस्तत्र सर्वसिद्धिप्रदायकः॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: करवीर (शर्कररे) क्षेत्र में माता का नेत्र गिरा था। वहाँ की शक्ति 'महिषासुरमर्दिनी' और भैरव 'क्रोधीश' के रूप में पूजित हैं।
सुगन्धायां नासिका मे देवस्त्र्यम्बक भैरवः।
सुनन्दा नाम सा देवी यत्र सिद्धिर्महेश्वरी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: सुगंधा में भगवती की नासिका गिरी थी। वहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति 'सुनंदा' और भैरव 'त्र्यम्बक' हैं।
काश्मीरे कण्ठदेशं च त्रिसन्ध्येश्वरभैरवः।
महामाया भगवती यत्र सिद्धिर्न संशयः॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: कश्मीर में माता सती का कण्ठ गिरा था। वहाँ की शक्ति 'महामाया' और भैरव 'त्रिसन्ध्येश्वर' हैं।
ज्वालामुख्यां तथा जिह्वा देव उन्मत्तभैरवः।
अम्बिका सिद्धिदा नाम सर्वकामप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: ज्वालामुखी तीर्थ में माता की जिह्वा का निपात हुआ था। यहाँ की शक्ति 'सिद्धिदा/अम्बिका' तथा भैरव 'उन्मत्त' हैं।
जालन्धरे स्तनं सव्यं भीषणाख्यस्तु भैरवः।
त्रिपुरमालिनी माता सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: जालंधर में माता सती का स्तन गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति 'त्रिपुरमालिनी' और भैरव 'भीषण' हैं।
वैद्यनाथे च हृदयं वैद्यनाथस्तु भैरवः।
देवता जयदुर्गाख्या सर्वाभीष्टप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: वैद्यनाथ धाम में माता का हृदय गिरा था। यहाँ की शक्ति 'जयदुर्गा' और भैरव 'वैद्यनाथ' हैं।
नेपाले जानुपातो मे कपालि भैरवस्तथा।
महाशिरा च सा देवी सर्वपापप्रणाशिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: नेपाल में माता के दोनों जानु (घुटने) गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'महाशिरा' तथा भैरव 'कपाली' हैं।
मानसे हस्तसंपातो भैरवश्चामराख्यकः।
दाक्षायणी महादेवी साक्षात्कैलासवासिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: मानसरोवर में माता का दायाँ हाथ गिरा था। यहाँ की देवी 'दाक्षायणी' और भैरव 'अमर' हैं।
उत्कले नाभिदेशश्च विमला सा च देवता।
जगन्नाथस्तु भैरवः सर्वसिद्धिप्रदायकः॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: उत्कल में माता की नाभि गिरी थी। वहाँ की शक्ति 'विमला' और भैरव 'जगन्नाथ' हैं।
गण्डक्यां गण्डपातश्च चक्रपाणिस्तु भैरवः।
गण्डकी चण्डिका देवी सर्वकामफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: गंडकी नदी के तट पर माता का गंडस्थल गिरा था। यहाँ की देवी 'गण्डकी चण्डी' और भैरव 'चक्रपाणि' हैं।
बहुलायां वामबाहुर्भीरुको भैरवः स्मृतः।
बाहुलाख्या महादेवी सर्वैश्वर्यप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: बहुला में माता की बायीं भुजा गिरी थी। यहाँ की देवी 'बहुला' और भैरव 'भीरुक' कहलाते हैं।
उज्जयिन्यां कूर्परश्च कपिलाम्बरभैरवः।
माङ्गल्यचण्डिका नाम देवता सिद्धिदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: उज्जयिनी में माता की दायीं कलाई गिरी थी। यहाँ की शक्ति 'माङ्गल्यचण्डिका' और भैरव 'कपिलाम्बर' हैं।
त्रिपुरायां दक्षिणपादस्त्रिपुरेशस्तु भैरवः।
त्रिपुरसुन्दरी देवी सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: त्रिपुरा में माता का दायाँ पैर गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री 'त्रिपुरसुन्दरी' और भैरव 'त्रिपुरेश' हैं।
चट्टले दक्षबाहुर्मे भैरवश्चन्द्रशेखरः।
व्यक्ता सा भवानी देवी कलौ सर्वफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: चट्टल में माता की दायीं भुजा गिरी थी। यहाँ की शक्ति 'भवानी' और भैरव 'चन्द्रशेखर' हैं।
त्रिस्रोतायां वामपादो भ्रामरी भैरवेश्वरः।
ईश्वरो भैरवो यत्र त्रिस्रोतायां प्रतिष्ठिता॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: त्रिस्रोता में माता का बायाँ चरण गिरा था। यहाँ की देवी 'भ्रामरी' और भैरव 'भैरवेश्वर' हैं।
कामरूपे योनिमुद्रा नीलपर्वतवासिनी।
कामाख्या सा महादेवी उमानन्दस्तु भैरवः॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: कामरूप (नीलांचल पर्वत) पर माता का महामुद्रा भाग गिरा था। यहाँ की शक्ति 'कामाख्या' और भैरव 'उमानन्द' हैं।
प्रयागे ललिता देवी अङ्गुली हस्तयोस्तथा।
भवेति भैरवस्तत्र सर्वकामफलप्रदः॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: तीर्थराज प्रयाग में माता के हाथ की अँगुलियाँ गिरी थीं। यहाँ की शक्ति 'ललिता' और भैरव 'भव' हैं।
जयन्त्यां वामजङ्घा च क्रमदीश्वरभैरवः।
जयन्ती नाम सा देवी सर्वविद्याप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: जयंती क्षेत्र में माता की बायीं जंघा गिरी थी। यहाँ की देवी 'जयंती' और भैरव 'क्रमदीश्वर' हैं।
युगाद्यायां दक्षपादाङ्गुष्ठो भूतधात्रिका।
क्षीरखण्डकभैरवः सर्वसिद्धिप्रदायकः॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: युगाद्या में माता के दाएँ चरण का अँगूठा गिरा था। यहाँ की देवी 'भूतधात्री' और भैरव 'क्षीरखण्डक' हैं।
कालीपीठे पादाङ्गुल्यो नकुलीशस्तु भैरवः।
देवता कालिका यत्र सर्वकामफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: कालीघाट में माता के बाएँ पैर की उँगलियाँ गिरी थीं। यहाँ की अधिष्ठात्री 'कालिका' और भैरव 'नकुलीश' हैं।
किरीटकोणे किरीटं मे संवर्ताख्यो हि भैरवः।
विमला नाम सा देवी भुवनेशीति कीर्तिता॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: किरीटकोण में माता का मुकुट गिरा था। यहाँ की शक्ति 'विमला/भुवनेशी' और भैरव 'संवर्त' हैं।
वाराणस्यां विशालाक्षी मणिकर्णीति चोच्यते।
कालभैरवस्तत्रैव कर्णकुण्डलपातनम्॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: काशी में माता के कान के मणिकुण्डल गिरे थे। यहाँ की देवी 'विशालाक्षी' तथा भैरव 'कालभैरव' हैं।
कन्याश्रमे पृष्ठदेशो निमिषस्तु भैरवः।
शर्वाणी नाम सा देवी सर्वपापहरा परा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: कन्याश्रम में माता का पृष्ठ भाग गिरा था। यहाँ की शक्ति 'शर्वाणी' और भैरव 'निमिष' हैं।
कुरुक्षेत्रे च गुल्फो मे स्थाणुर्नाम्ना तु भैरवः।
सावित्री नाम सा देवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: कुरुक्षेत्र में माता का गुल्फ गिरा था। यहाँ की देवी 'सावित्री' और भैरव 'स्थाणु' हैं।
मणिबन्धे मणिबन्धौ सर्वानन्दस्तु भैरवः।
गायत्री सा महादेवी सर्वलोकेषु पूजिता॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: पुष्कर में माता के दोनों मणिबंध गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'गायत्री' और भैरव 'सर्वानन्द' हैं।
श्रीशैले च ग्रीवापातः शम्बरानन्दभैरवः।
महालक्ष्मीर्महादेवी सर्वसम्पत्प्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: श्रीशैल में माता की ग्रीवा गिरी थी। यहाँ की शक्ति 'महालक्ष्मी' और भैरव 'शम्बरानन्द' हैं।
काञ्चीदेशे च कङ्कालो भैरवो रुरुसंज्ञकः।
देवगर्भा सा महादेवी सर्वकामप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: कांची में माता का कंकाल (अस्थि) गिरा था। यहाँ की देवी 'देवगर्भा' और भैरव 'रुरु' हैं।
कालमाधवे नितम्बश्चासिताङ्गो हि भैरवः।
काली सा कथिता देवी सर्वकामार्थसाधिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: कालमाधव में माता का वाम नितम्ब गिरा था। यहाँ की शक्ति 'काली' और भैरव 'असितांग' हैं।
शोणाख्यायां दक्षिणनितम्बो भद्रसेनस्तु भैरवः।
नर्मदा सा महादेवी सर्वपापविनाशिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: शोण देश में माता का दायाँ नितम्ब गिरा था। यहाँ की देवी 'नर्मदा' और भैरव 'भद्रसेन' हैं।
रामगिरौ स्तनपातो भैरवश्चण्डसंज्ञकः।
शिवानी नाम सा देवी सर्वकामफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: रामगिरि में माता का दायाँ वक्ष गिरा था। यहाँ की शक्ति 'शिवानी' और भैरव 'चण्ड' हैं।
वृन्दावने केशजालं भूतेशो भैरवस्तथा।
उमा नाम महादेवी सर्वपापप्रणाशिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: वृंदावन में माता के केश और चूड़ामणि गिरे थे। यहाँ की देवी 'उमा' और भैरव 'भूतेश' हैं।
शुचौ देशे दन्तपङ्क्तिरूर्ध्वदन्ता महेश्वरी।
नारायणी संहाराख्यो भैरवस्तत्र कथ्यते॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: शुचि देश में माता के ऊपर के दाँत गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'नारायणी' और भैरव 'संहार' हैं।
पञ्चसागरे चाधोदन्ता वाराही देवता मता।
महारुद्रस्तु भैरवः सर्वकामफलप्रदः॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: पंचसागर में माता के नीचे के दाँत गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'वाराही' और भैरव 'महारुद्र' हैं।
करतोयातटे तल्पं वामनश्चात्र भैरवः।
अपर्णा नाम सा देवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: करतोया नदी के तट पर माता का तल्प गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री 'अपर्णा' और भैरव 'वामन' हैं।
श्रीपर्वते दक्षगुल्फः सुन्दरानन्दभैरवः।
श्रीसुन्दरी सा महादेवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: श्रीपर्वत पर माता की दाहिनी एड़ी गिरी थी। यहाँ की शक्ति 'श्रीसुन्दरी' और भैरव 'सुन्दरानन्द' हैं।
विभाषे वामगुल्फश्च कपाली भैरवः स्मृतः।
कपालिनी महादेवी सर्वकामफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: विभाष में माता का वाम गुल्फ गिरा था। यहाँ की देवी 'कपालिनी' और भैरव 'कपाली' हैं।
प्रभासे चोदरं पातं वक्रतुण्डस्तु भैरवः।
चन्द्रभागा सा महादेवी सर्वपापहरा परा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: प्रभास क्षेत्र में माता का उदर गिरा था। यहाँ की शक्ति 'चंद्रभागा' और भैरव 'वक्रतुण्ड' हैं।
भैरवे त्वोष्ठपातः स्याल्लम्बकर्णस्तु भैरवः।
अवन्ती सा महादेवी सर्वकामफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: भैरव पर्वत (उज्जैन) पर माता का ओष्ठ गिरा था। यहाँ की देवी 'अवन्ती' और भैरव 'लम्बकर्ण' हैं।
जनस्थाने चिबुकं मे विकृताक्षस्तु भैरवः।
भ्रामरी सा महादेवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: जनस्थान (नासिक) में माता की ठोड़ी गिरी थी। यहाँ की शक्ति 'भ्रामरी' और भैरव 'विकृताक्ष' हैं।
सर्वशैले वामगण्डो वत्सनाभस्तु भैरवः।
राकिणी सा महादेवी सर्वकामफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: सर्वशैल में माता का वाम गंड गिरा था। यहाँ की शक्ति 'राकिणी' और भैरव 'वत्सनाभ' हैं।
गोदावरीतटे गण्डो दण्डपाणिस्तु भैरवः।
विश्वेशी सा महादेवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: गोदावरी तट पर माता का दायाँ गाल गिरा था। यहाँ की शक्ति 'विश्वेश्वरी' और भैरव 'दण्डपाणि' हैं।
रत्नावल्यां दक्षस्कन्धः शिवश्च भैरवः स्मृतः।
कुमारी सा महादेवी सर्वकामफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: रत्नावली में माता का दायाँ स्कन्ध गिरा था। यहाँ की देवी 'कुमारी' और भैरव 'शिव' हैं।
मिथिलायामुमा देवी महोदरो हि भैरवः।
स्कन्धो वामो भगवत्याः सर्वसिद्धिफलप्रदः॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: मिथिला में भगवती का बायाँ कन्धा गिरा था। यहाँ की देवी 'उमा' और भैरव 'महोदर' हैं।
नलहाट्यां नलीपातो योगेशो भैरवस्तथा।
कालिका सा महादेवी सर्वपापप्रणाशिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: नलहाटी में माता के पैर की नली गिरी थी। यहाँ की देवी 'कालिका' और भैरव 'योगेश' हैं।
कर्णाटे चोभयौ कर्णौ जयदुर्गा सुरारिहा।
अभिरूर्भैरवस्तत्र सर्वकामफलप्रदः॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: कर्णाट देश में माता के दोनों कान गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'जयदुर्गा' और भैरव 'अभिरु' हैं।
वक्रेश्वरे मनःपातं वक्रनाथस्तु भैरवः।
महिषमर्दिनी देवी सर्वकामफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: वक्रेश्वर में माता का मन (भ्रूमध्य) गिरा था। यहाँ की शक्ति 'महिषमर्दिनी' और भैरव 'वक्रनाथ' हैं।
यशौरे पाणिपद्मं च चण्डश्च भैरवस्तथा।
यशोरेश्वरी सा देवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: यशोर में माता के हाथ और पैर के तलवे गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'यशोरेश्वरी' और भैरव 'चण्ड' हैं।
अट्टाहासे त्वोष्ठपातो विश्वेशो भैरवस्तथा।
फुल्लरा नाम सा देवी सर्वकामफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: अट्टाहास में माता का अधरोष्ठ गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री 'फुल्लरा' और भैरव 'विश्वेश' हैं।
नन्दीपुरे कण्ठहारो नन्दिकेश्वरभैरवः।
नन्दिनी नाम सा देवी सर्वपापहरा परा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: नंदीपुर में वटवृक्ष के समीप माता का कंठहार गिरा था। यहाँ की शक्ति 'नंदिनी' और भैरव 'नंदिकेश्वर' हैं।
लङ्कायां नूपुरं पातं राक्षसेश्वरो भैरवः।
इन्द्राक्षी नाम सा देवी सर्वकामफलप्रदा॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: लंका में माता का नूपुर गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति 'इन्द्राक्षी' और भैरव 'राक्षसेश्वर' हैं।
विराटे पादाङ्गुली च अमृतातख्यस्तु भैरवः।
अम्बिका नाम सा देवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: विराटनगर में माता के पैर की उँगलियाँ गिरी थीं। यहाँ की शक्ति 'अंबिका' और भैरव 'अमृत' हैं।
मागधे दक्षिणा जङ्घा व्योमकेशस्तु भैरवः।
सर्वानन्दकरी नाम सर्वकामार्थसाधिनी॥
— पीठनिर्णय तन्त्र
श्लोकार्थ: मगध क्षेत्र में माता की दाहिनी जंघा गिरी थी। यहाँ की देवी 'सर्वानन्दकरी' और भैरव 'व्योमकेश' हैं।
मुख्य तंत्र ग्रन्थ 'पीठनिर्णय' के अनुसार 51 शक्तिपीठों की मान्यता सर्वोपरि है। विभिन्न उप-तंत्रों और क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार विराट एवं मगध को मिलाकर इनकी संख्या 52 या 53 भी मानी जाती है। इन पावन पीठों का दर्शन एवं स्मरण साधक के समस्त पापों का शमन कर अभीष्ट फल प्रदान करता है।
अभी कोई कमेंट नहीं — सबसे पहले आप लिखें!