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51 शक्तिपीठ(खण्डपीठ): पौराणिक श्लोक, अंग, शक्ति एवं भैरव सहित सम्पूर्ण प्रामाणिक विवरण | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 20 Oct 2026 · ⏱️ 2 मिनट का पठन · 🏷️ 51 शक्तिपीठ(खण्डपीठ), 51 Shakti Peeth, पीठनिर्णय, Pithanirnaya, तन्त्रचूड़ामणि, Tantrachudamani, शक्तिपीठ श्लोक, देवी सती, Devi Sati Shaktipeeth, cdsharma.in, Shakti Peeth Sloka with Meaning, 51 Shakti Peethas List, भैरव और शक्ति

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51 शक्तिपीठ(खण्डपीठ): पौराणिक श्लोक, अंग, शक्ति एवं भैरव सहित सम्पूर्ण प्रामाणिक विवरण | cdsharma.in

दक्ष प्रजापति के यज्ञ-विध्वंस के उपरांत जब देवाधिदेव भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर विकल भाव से तांडव करने लगे, तब संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा हेतु भगवान श्रीविष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया था। जिन-जिन पावन स्थलों पर माता के अंग, प्रत्यंग अथवा आभूषण गिरे, वे स्थल शक्तिपीठ कहलाए।

प्रत्येक शक्तिपीठ में भगवती शक्ति के रूप में तथा भगवान शिव भैरव के रूप में नित्य प्रतिष्ठित हैं। इनका मुख्य प्रमाणिक आधार ग्रन्थ ‘पीठनिर्णय तन्त्र’ (तन्त्रचूड़ामणि) एवं श्रीमद्देवीभागवत महापुराण है। नीचे सभी पीठों का मूल संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद सहित पूर्ण विवरण प्रस्तुत है:

1. हिंगलाज (बलूचिस्तान)

  • स्थान: कराची से 125 किमी उत्तर-पूर्व, हिंगोल नदी तट, बलूचिस्तान (पाकिस्तान)
  • पतित अंग: ब्रह्मरन्ध्र (सिर का ऊपरी भाग)
  • शक्ति: कोट्टरी (कोट्टवीशा/भैरवी) | भैरव: भीमलोचन

हिंगुलायां ब्रह्मरन्ध्रं भैरवो भीमलोचनः।

कोट्टरी सा महामाया त्रिगुणातीता सुन्दरी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: हिंगुला (हिंगलाज) तीर्थ में माता सती का ब्रह्मरन्ध्र गिरा था। वहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति 'कोट्टरी' (महामाया) हैं और उनके भैरव 'भीमलोचन' हैं।

2. शर्कररे / करवीर (सुक्कुर, पाकिस्तान)

  • स्थान: सुक्कुर रेलवे स्टेशन के निकट, सिंध (पाकिस्तान)
  • पतित अंग: त्रिनेत्र (आँख)
  • शक्ति: महिषासुरमर्दिनी | भैरव: क्रोधीश

करवीरे त्रिनेत्रं मे देवी महिषमर्दिनी।

क्रोधीशो भैरवस्तत्र सर्वसिद्धिप्रदायकः॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: करवीर (शर्कररे) क्षेत्र में माता का नेत्र गिरा था। वहाँ की शक्ति 'महिषासुरमर्दिनी' और भैरव 'क्रोधीश' के रूप में पूजित हैं।

3. सुगंधा - सुनंदा (बांग्लादेश)

  • स्थान: शिकारपुर, बरीसाल से 20 किमी दूर, सोंध नदी तट (बांग्लादेश)
  • पतित अंग: नासिका (नाक)
  • शक्ति: सुनंदा | भैरव: त्र्यम्बक

सुगन्धायां नासिका मे देवस्त्र्यम्बक भैरवः।

सुनन्दा नाम सा देवी यत्र सिद्धिर्महेश्वरी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: सुगंधा में भगवती की नासिका गिरी थी। वहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति 'सुनंदा' और भैरव 'त्र्यम्बक' हैं।

4. कश्मीर - महामाया

  • स्थान: अमरनाथ / पहलगाँव के निकट, कश्मीर (भारत)
  • पतित अंग: कण्ठ (गला)
  • शक्ति: महामाया | भैरव: त्रिसन्ध्येश्वर

काश्मीरे कण्ठदेशं च त्रिसन्ध्येश्वरभैरवः।

महामाया भगवती यत्र सिद्धिर्न संशयः॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: कश्मीर में माता सती का कण्ठ गिरा था। वहाँ की शक्ति 'महामाया' और भैरव 'त्रिसन्ध्येश्वर' हैं।

5. ज्वालामुखी - सिद्धिदा / अंबिका (हिमाचल प्रदेश)

  • स्थान: कांगड़ा जिला, हिमाचल प्रदेश (भारत)
  • पतित अंग: जिह्वा (जीभ)
  • शक्ति: सिद्धिदा (अंबिका) | भैरव: उन्मत्त

ज्वालामुख्यां तथा जिह्वा देव उन्मत्तभैरवः।

अम्बिका सिद्धिदा नाम सर्वकामप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: ज्वालामुखी तीर्थ में माता की जिह्वा का निपात हुआ था। यहाँ की शक्ति 'सिद्धिदा/अम्बिका' तथा भैरव 'उन्मत्त' हैं।

6. जालंधर - त्रिपुरमालिनी (पंजाब)

  • स्थान: जालंधर छावनी, देवी तालाब, पंजाब (भारत)
  • पतित अंग: बायाँ स्तन (वाम वक्ष)
  • शक्ति: त्रिपुरमालिनी | भैरव: भीषण

जालन्धरे स्तनं सव्यं भीषणाख्यस्तु भैरवः।

त्रिपुरमालिनी माता सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: जालंधर में माता सती का स्तन गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति 'त्रिपुरमालिनी' और भैरव 'भीषण' हैं।

7. वैद्यनाथ - जयदुर्गा (झारखण्ड)

  • स्थान: देवघर, वैद्यनाथ धाम, झारखण्ड (भारत)
  • पतित अंग: हृदय
  • शक्ति: जयदुर्गा | भैरव: वैद्यनाथ

वैद्यनाथे च हृदयं वैद्यनाथस्तु भैरवः।

देवता जयदुर्गाख्या सर्वाभीष्टप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: वैद्यनाथ धाम में माता का हृदय गिरा था। यहाँ की शक्ति 'जयदुर्गा' और भैरव 'वैद्यनाथ' हैं।

8. नेपाल - गुह्येश्वरी / महाशिरा

  • स्थान: पशुपतिनाथ मंदिर के निकट, काठमांडू (नेपाल)
  • पतित अंग: दोनों घुटने (जानु)
  • शक्ति: महाशिरा (महामाया) | भैरव: कपाली

नेपाले जानुपातो मे कपालि भैरवस्तथा।

महाशिरा च सा देवी सर्वपापप्रणाशिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: नेपाल में माता के दोनों जानु (घुटने) गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'महाशिरा' तथा भैरव 'कपाली' हैं।

9. मानस - दाक्षायणी (तिब्बत)

  • स्थान: मानसरोवर झील तट, कैलाश पर्वत (तिब्बत)
  • पतित अंग: दायाँ हाथ
  • शक्ति: दाक्षायणी | भैरव: अमर

मानसे हस्तसंपातो भैरवश्चामराख्यकः।

दाक्षायणी महादेवी साक्षात्कैलासवासिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: मानसरोवर में माता का दायाँ हाथ गिरा था। यहाँ की देवी 'दाक्षायणी' और भैरव 'अमर' हैं।

10. विरजा / उत्कल (ओडिशा)

  • स्थान: जाजपुर / पुरी, ओडिशा (भारत)
  • पतित अंग: नाभि
  • शक्ति: विमला (विरजा) | भैरव: जगन्नाथ

उत्कले नाभिदेशश्च विमला सा च देवता।

जगन्नाथस्तु भैरवः सर्वसिद्धिप्रदायकः॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: उत्कल में माता की नाभि गिरी थी। वहाँ की शक्ति 'विमला' और भैरव 'जगन्नाथ' हैं।

11. गंडकी - गंडकी चंडी (नेपाल)

  • स्थान: मुक्तिनाथ, गंडकी नदी तट, पोखरा (नेपाल)
  • पतित अंग: मस्तक / गंडस्थल (कनपटी)
  • शक्ति: गण्डकी चण्डी | भैरव: चक्रपाणि

गण्डक्यां गण्डपातश्च चक्रपाणिस्तु भैरवः।

गण्डकी चण्डिका देवी सर्वकामफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: गंडकी नदी के तट पर माता का गंडस्थल गिरा था। यहाँ की देवी 'गण्डकी चण्डी' और भैरव 'चक्रपाणि' हैं।

12. बहुला (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: केतुग्राम, कटुआ, वर्धमान जिला (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: बायाँ हाथ (वामबाहु)
  • शक्ति: बहुला | भैरव: भीरुक

बहुलायां वामबाहुर्भीरुको भैरवः स्मृतः।

बाहुलाख्या महादेवी सर्वैश्वर्यप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: बहुला में माता की बायीं भुजा गिरी थी। यहाँ की देवी 'बहुला' और भैरव 'भीरुक' कहलाते हैं।

13. उज्जयिनी - मांगल्य चंडिका (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: गुस्करा स्टेशन, वर्धमान जिला (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: दायीं कलाई (कूर्पर)
  • शक्ति: मांगल्य चंडिका | भैरव: कपिलाम्बर

उज्जयिन्यां कूर्परश्च कपिलाम्बरभैरवः।

माङ्गल्यचण्डिका नाम देवता सिद्धिदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: उज्जयिनी में माता की दायीं कलाई गिरी थी। यहाँ की शक्ति 'माङ्गल्यचण्डिका' और भैरव 'कपिलाम्बर' हैं।

14. त्रिपुरा - त्रिपुरसुंदरी (त्रिपुरा)

  • स्थान: राधाकिशोरपुर, उदयपुर के निकट, माताबाड़ी पर्वत (त्रिपुरा)
  • पतित अंग: दायाँ पैर
  • शक्ति: त्रिपुरसुंदरी | भैरव: त्रिपुरेश

त्रिपुरायां दक्षिणपादस्त्रिपुरेशस्तु भैरवः।

त्रिपुरसुन्दरी देवी सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: त्रिपुरा में माता का दायाँ पैर गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री 'त्रिपुरसुन्दरी' और भैरव 'त्रिपुरेश' हैं।

15. चट्टल - भवानी (बांग्लादेश)

  • स्थान: चन्द्रनाथ पर्वत शिखर, सीताकुंड, चटगाँव (बांग्लादेश)
  • पतित अंग: दायीं भुजा
  • शक्ति: भवानी | भैरव: चन्द्रशेखर

चट्टले दक्षबाहुर्मे भैरवश्चन्द्रशेखरः।

व्यक्ता सा भवानी देवी कलौ सर्वफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: चट्टल में माता की दायीं भुजा गिरी थी। यहाँ की शक्ति 'भवानी' और भैरव 'चन्द्रशेखर' हैं।

16. त्रिस्रोता - भ्रामरी (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: सालबाड़ी, बोडा मण्डल, जलपाईगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: बायाँ पैर
  • शक्ति: भ्रामरी | भैरव: भैरवेश्वर (अम्बर)

त्रिस्रोतायां वामपादो भ्रामरी भैरवेश्वरः।

ईश्वरो भैरवो यत्र त्रिस्रोतायां प्रतिष्ठिता॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: त्रिस्रोता में माता का बायाँ चरण गिरा था। यहाँ की देवी 'भ्रामरी' और भैरव 'भैरवेश्वर' हैं।

17. कामगिरि - कामाख्या (असम)

  • स्थान: नीलांचल पर्वत, गुवाहाटी (असम)
  • पतित अंग: योनि मण्डल (महामुद्रा)
  • शक्ति: कामाख्या | भैरव: उमानन्द

कामरूपे योनिमुद्रा नीलपर्वतवासिनी।

कामाख्या सा महादेवी उमानन्दस्तु भैरवः॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: कामरूप (नीलांचल पर्वत) पर माता का महामुद्रा भाग गिरा था। यहाँ की शक्ति 'कामाख्या' और भैरव 'उमानन्द' हैं।

18. प्रयाग - ललिता (उत्तर प्रदेश)

  • स्थान: त्रिवेणी संगम, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
  • पतित अंग: हाथ की अँगुलियाँ
  • शक्ति: ललिता | भैरव: भव

प्रयागे ललिता देवी अङ्गुली हस्तयोस्तथा।

भवेति भैरवस्तत्र सर्वकामफलप्रदः॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: तीर्थराज प्रयाग में माता के हाथ की अँगुलियाँ गिरी थीं। यहाँ की शक्ति 'ललिता' और भैरव 'भव' हैं।

19. जयंती - जयंती (बांग्लादेश)

  • स्थान: कालाजोर, खासी पर्वत, जयंतिया परगना, सिल्हट (बांग्लादेश)
  • पतित अंग: बायीं जंघा
  • शक्ति: जयंती | भैरव: क्रमदीश्वर

जयन्त्यां वामजङ्घा च क्रमदीश्वरभैरवः।

जयन्ती नाम सा देवी सर्वविद्याप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: जयंती क्षेत्र में माता की बायीं जंघा गिरी थी। यहाँ की देवी 'जयंती' और भैरव 'क्रमदीश्वर' हैं।

20. युगाद्या / जुगाद्या (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: खीरग्राम, कटुआ, वर्धमान जिला (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: दाएँ पैर का अँगूठा
  • शक्ति: भूतधात्री (युगाद्या) | भैरव: क्षीरखण्डक

युगाद्यायां दक्षपादाङ्गुष्ठो भूतधात्रिका।

क्षीरखण्डकभैरवः सर्वसिद्धिप्रदायकः॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: युगाद्या में माता के दाएँ चरण का अँगूठा गिरा था। यहाँ की देवी 'भूतधात्री' और भैरव 'क्षीरखण्डक' हैं।

21. कालीपीठ - कालिका (कोलकाता)

  • स्थान: कालीघाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: बाएँ पैर की उँगलियाँ
  • शक्ति: कालिका | भैरव: नकुलीश

कालीपीठे पादाङ्गुल्यो नकुलीशस्तु भैरवः।

देवता कालिका यत्र सर्वकामफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: कालीघाट में माता के बाएँ पैर की उँगलियाँ गिरी थीं। यहाँ की अधिष्ठात्री 'कालिका' और भैरव 'नकुलीश' हैं।

22. किरीट - विमला / भुवनेशी (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: किरीटकोण, लालबाग कोर्ट रोड, मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: किरीट (मुकुट)
  • शक्ति: विमला (भुवनेशी) | भैरव: संवर्त

किरीटकोणे किरीटं मे संवर्ताख्यो हि भैरवः।

विमला नाम सा देवी भुवनेशीति कीर्तिता॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: किरीटकोण में माता का मुकुट गिरा था। यहाँ की शक्ति 'विमला/भुवनेशी' और भैरव 'संवर्त' हैं।

23. वाराणसी - विशालाक्षी (उत्तर प्रदेश)

  • स्थान: मणिकर्णिका घाट, काशी (उत्तर प्रदेश)
  • पतित अंग: कर्णकुण्डल (कान के कुण्डल)
  • शक्ति: विशालाक्षी (मणिकर्णी) | भैरव: कालभैरव

वाराणस्यां विशालाक्षी मणिकर्णीति चोच्यते।

कालभैरवस्तत्रैव कर्णकुण्डलपातनम्॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: काशी में माता के कान के मणिकुण्डल गिरे थे। यहाँ की देवी 'विशालाक्षी' तथा भैरव 'कालभैरव' हैं।

24. कन्याश्रम - शर्वाणी

  • स्थान: कन्याश्रम / कन्याकुमारी
  • पतित अंग: पृष्ठ भाग (पीठ)
  • शक्ति: शर्वाणी (सर्वाणी) | भैरव: निमिष

कन्याश्रमे पृष्ठदेशो निमिषस्तु भैरवः।

शर्वाणी नाम सा देवी सर्वपापहरा परा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: कन्याश्रम में माता का पृष्ठ भाग गिरा था। यहाँ की शक्ति 'शर्वाणी' और भैरव 'निमिष' हैं।

25. कुरुक्षेत्र - सावित्री (हरियाणा)

  • स्थान: थानेसर, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)
  • पतित अंग: गुल्फ (एड़ी/टखना)
  • शक्ति: सावित्री (भद्रकाली) | भैरव: स्थाणु

कुरुक्षेत्रे च गुल्फो मे स्थाणुर्नाम्ना तु भैरवः।

सावित्री नाम सा देवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: कुरुक्षेत्र में माता का गुल्फ गिरा था। यहाँ की देवी 'सावित्री' और भैरव 'स्थाणु' हैं।

26. मणिबंध / पुष्कर - गायत्री (राजस्थान)

  • स्थान: गायत्री पर्वत, पुष्कर, अजमेर (राजस्थान)
  • पतित अंग: दोनों मणिबंध (कलाई)
  • शक्ति: गायत्री | भैरव: सर्वानन्द

मणिबन्धे मणिबन्धौ सर्वानन्दस्तु भैरवः।

गायत्री सा महादेवी सर्वलोकेषु पूजिता॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: पुष्कर में माता के दोनों मणिबंध गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'गायत्री' और भैरव 'सर्वानन्द' हैं।

27. श्रीशैल - महालक्ष्मी (बांग्लादेश)

  • स्थान: जैनपुर गाँव, सिल्हट जिला (बांग्लादेश)
  • पतित अंग: ग्रीवा (गर्दन)
  • शक्ति: महालक्ष्मी | भैरव: शम्बरानन्द

श्रीशैले च ग्रीवापातः शम्बरानन्दभैरवः।

महालक्ष्मीर्महादेवी सर्वसम्पत्प्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: श्रीशैल में माता की ग्रीवा गिरी थी। यहाँ की शक्ति 'महालक्ष्मी' और भैरव 'शम्बरानन्द' हैं।

28. कांची - देवगर्भा (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: कोपाई नदी तट, बोलपुर, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: कंकाल (अस्थि)
  • शक्ति: देवगर्भा | भैरव: रुरु

काञ्चीदेशे च कङ्कालो भैरवो रुरुसंज्ञकः।

देवगर्भा सा महादेवी सर्वकामप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: कांची में माता का कंकाल (अस्थि) गिरा था। यहाँ की देवी 'देवगर्भा' और भैरव 'रुरु' हैं।

29. कालमाधव - देवी काली (मध्य प्रदेश)

  • स्थान: अमरकंटक, शोण नदी उद्गम गुफा, अनूपपुर (मध्य प्रदेश)
  • पतित अंग: बायाँ नितम्ब
  • शक्ति: काली | भैरव: असितांग

कालमाधवे नितम्बश्चासिताङ्गो हि भैरवः।

काली सा कथिता देवी सर्वकामार्थसाधिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: कालमाधव में माता का वाम नितम्ब गिरा था। यहाँ की शक्ति 'काली' और भैरव 'असितांग' हैं।

30. शोणदेश - नर्मदा / शोणाक्षी (मध्य प्रदेश)

  • स्थान: अमरकंटक, नर्मदा उद्गम स्थल (मध्य प्रदेश)
  • पतित अंग: दायाँ नितम्ब
  • शक्ति: नर्मदा (शोणाक्षी) | भैरव: भद्रसेन

शोणाख्यायां दक्षिणनितम्बो भद्रसेनस्तु भैरवः।

नर्मदा सा महादेवी सर्वपापविनाशिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: शोण देश में माता का दायाँ नितम्ब गिरा था। यहाँ की देवी 'नर्मदा' और भैरव 'भद्रसेन' हैं।

31. रामगिरि - शिवानी (चित्रकूट)

  • स्थान: चित्रकूट / रामगिरि पर्वत (उत्तर प्रदेश/मध्य प्रदेश)
  • पतित अंग: दायाँ स्तन
  • शक्ति: शिवानी | भैरव: चण्ड

रामगिरौ स्तनपातो भैरवश्चण्डसंज्ञकः।

शिवानी नाम सा देवी सर्वकामफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: रामगिरि में माता का दायाँ वक्ष गिरा था। यहाँ की शक्ति 'शिवानी' और भैरव 'चण्ड' हैं।

32. वृंदावन - उमा (उत्तर प्रदेश)

  • स्थान: भूतेश्वर महादेव, मथुरा-वृंदावन (उत्तर प्रदेश)
  • पतित अंग: केशजाल एवं चूड़ामणि
  • शक्ति: उमा | भैरव: भूतेश

वृन्दावने केशजालं भूतेशो भैरवस्तथा।

उमा नाम महादेवी सर्वपापप्रणाशिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: वृंदावन में माता के केश और चूड़ामणि गिरे थे। यहाँ की देवी 'उमा' और भैरव 'भूतेश' हैं।

33. शुचि - नारायणी (तमिलनाडु)

  • स्थान: शुचीन्द्रम, कन्याकुमारी (तमिलनाडु)
  • पतित अंग: ऊर्ध्व दन्त (ऊपरी दाँत)
  • शक्ति: नारायणी | भैरव: संहार

शुचौ देशे दन्तपङ्क्तिरूर्ध्वदन्ता महेश्वरी।

नारायणी संहाराख्यो भैरवस्तत्र कथ्यते॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: शुचि देश में माता के ऊपर के दाँत गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'नारायणी' और भैरव 'संहार' हैं।

34. पंचसागर - वाराही

  • स्थान: पंचसागर (अविज्ञात तंत्रोक्त स्थल)
  • पतित अंग: अधोदन्त (निचले दाँत)
  • शक्ति: वाराही | भैरव: महारुद्र

पञ्चसागरे चाधोदन्ता वाराही देवता मता।

महारुद्रस्तु भैरवः सर्वकामफलप्रदः॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: पंचसागर में माता के नीचे के दाँत गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'वाराही' और भैरव 'महारुद्र' हैं।

35. करतोयातट - अपर्णा (बांग्लादेश)

  • स्थान: भवानीपुर, बोगरा, करतोया नदी तट (बांग्लादेश)
  • पतित अंग: तल्प (कटिभूषण / नूपुर)
  • शक्ति: अपर्णा | भैरव: वामन

करतोयातटे तल्पं वामनश्चात्र भैरवः।

अपर्णा नाम सा देवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: करतोया नदी के तट पर माता का तल्प गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री 'अपर्णा' और भैरव 'वामन' हैं।

36. श्रीपर्वत - श्रीसुंदरी (लद्दाख / कुर्नूल)

  • स्थान: लद्दाख / अथवा श्रीशैलम, कुर्नूल (आंध्र प्रदेश)
  • पतित अंग: दक्षिण गुल्फ (दाहिनी एड़ी)
  • शक्ति: श्रीसुंदरी | भैरव: सुन्दरानन्द

श्रीपर्वते दक्षगुल्फः सुन्दरानन्दभैरवः।

श्रीसुन्दरी सा महादेवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: श्रीपर्वत पर माता की दाहिनी एड़ी गिरी थी। यहाँ की शक्ति 'श्रीसुन्दरी' और भैरव 'सुन्दरानन्द' हैं।

37. विभाष - कपालिनी (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: तामलुक (ताम्रलिप्त), पूर्व मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: वाम गुल्फ (बायीं एड़ी)
  • शक्ति: कपालिनी (भीमरूप) | भैरव: कपाली (शर्वानन्द)

विभाषे वामगुल्फश्च कपाली भैरवः स्मृतः।

कपालिनी महादेवी सर्वकामफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: विभाष में माता का वाम गुल्फ गिरा था। यहाँ की देवी 'कपालिनी' और भैरव 'कपाली' हैं।

38. प्रभास - चंद्रभागा (गुजरात)

  • स्थान: सोमनाथ मंदिर के निकट, वेरावल (गुजरात)
  • पतित अंग: उदर (पेट)
  • शक्ति: चंद्रभागा | भैरव: वक्रतुण्ड

प्रभासे चोदरं पातं वक्रतुण्डस्तु भैरवः।

चन्द्रभागा सा महादेवी सर्वपापहरा परा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: प्रभास क्षेत्र में माता का उदर गिरा था। यहाँ की शक्ति 'चंद्रभागा' और भैरव 'वक्रतुण्ड' हैं।

39. भैरवपर्वत - अवंती (मध्य प्रदेश)

  • स्थान: क्षिप्रा नदी तट, भैरव पर्वत, उज्जैन (मध्य प्रदेश)
  • पतित अंग: ऊर्ध्व ओष्ठ (ऊपरी होंठ)
  • शक्ति: अवंती | भैरव: लम्बकर्ण

भैरवे त्वोष्ठपातः स्याल्लम्बकर्णस्तु भैरवः।

अवन्ती सा महादेवी सर्वकामफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: भैरव पर्वत (उज्जैन) पर माता का ओष्ठ गिरा था। यहाँ की देवी 'अवन्ती' और भैरव 'लम्बकर्ण' हैं।

40. जनस्थान - भ्रामरी (महाराष्ट्र)

  • स्थान: पंचवटी, गोदावरी घाटी, नासिक (महाराष्ट्र)
  • पतित अंग: चिबुक (ठोड़ी)
  • शक्ति: भ्रामरी | भैरव: विकृताक्ष

जनस्थाने चिबुकं मे विकृताक्षस्तु भैरवः।

भ्रामरी सा महादेवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: जनस्थान (नासिक) में माता की ठोड़ी गिरी थी। यहाँ की शक्ति 'भ्रामरी' और भैरव 'विकृताक्ष' हैं।

41. सर्वशैल - राकिणी (आंध्र प्रदेश)

  • स्थान: कोटिलिंगेश्वर, राजमुंद्री, गोदावरी तट (आंध्र प्रदेश)
  • पतित अंग: वाम गंड (बायाँ गाल)
  • शक्ति: राकिणी | भैरव: वत्सनाभ

सर्वशैले वामगण्डो वत्सनाभस्तु भैरवः।

राकिणी सा महादेवी सर्वकामफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: सर्वशैल में माता का वाम गंड गिरा था। यहाँ की शक्ति 'राकिणी' और भैरव 'वत्सनाभ' हैं।

42. गोदावरीतीर - विश्वेश्वरी (आंध्र प्रदेश)

  • स्थान: गोदावरी नदी तट, कोटिलिंगेश्वर (आंध्र प्रदेश)
  • पतित अंग: दक्षिण गंड (दायाँ गाल)
  • शक्ति: विश्वेश्वरी | भैरव: दण्डपाणि

गोदावरीतटे गण्डो दण्डपाणिस्तु भैरवः।

विश्वेशी सा महादेवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: गोदावरी तट पर माता का दायाँ गाल गिरा था। यहाँ की शक्ति 'विश्वेश्वरी' और भैरव 'दण्डपाणि' हैं।

43. रत्नावली - कुमारी (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: रत्नाकर नदी तट, खानाकुल-कृष्णानगर, हुगली (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: दायाँ स्कन्ध (कन्धा)
  • शक्ति: कुमारी | भैरव: शिव

रत्नावल्यां दक्षस्कन्धः शिवश्च भैरवः स्मृतः।

कुमारी सा महादेवी सर्वकामफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: रत्नावली में माता का दायाँ स्कन्ध गिरा था। यहाँ की देवी 'कुमारी' और भैरव 'शिव' हैं।

44. मिथिला - उमा / महादेवी (भारत-नेपाल सीमा)

  • स्थान: जनकपुर / उच्चैठ भगवती, मधुबनी (भारत-नेपाल सीमा)
  • पतित अंग: बायाँ स्कन्ध
  • शक्ति: उमा (महादेवी) | भैरव: महोदर

मिथिलायामुमा देवी महोदरो हि भैरवः।

स्कन्धो वामो भगवत्याः सर्वसिद्धिफलप्रदः॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: मिथिला में भगवती का बायाँ कन्धा गिरा था। यहाँ की देवी 'उमा' और भैरव 'महोदर' हैं।

45. नलहाटी - कालिका तारापीठ (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: नलहाटी स्टेशन के पास, वीरभूम (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: नली (पैर की हड्डी/अस्थि)
  • शक्ति: कालिका | भैरव: योगेश

नलहाट्यां नलीपातो योगेशो भैरवस्तथा।

कालिका सा महादेवी सर्वपापप्रणाशिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: नलहाटी में माता के पैर की नली गिरी थी। यहाँ की देवी 'कालिका' और भैरव 'योगेश' हैं।

46. कर्णाट - जयदुर्गा

  • स्थान: कर्णाट देश (प्राचीन तंत्रोक्त अज्ञात स्थल)
  • पतित अंग: दोनों कान (कर्णयुगल)
  • शक्ति: जयदुर्गा | भैरव: अभिरु

कर्णाटे चोभयौ कर्णौ जयदुर्गा सुरारिहा।

अभिरूर्भैरवस्तत्र सर्वकामफलप्रदः॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: कर्णाट देश में माता के दोनों कान गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'जयदुर्गा' और भैरव 'अभिरु' हैं।

47. वक्रेश्वर - महिषमर्दिनी (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: पापहर नदी तट, दुबराजपुर, वीरभूम (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: मन (भ्रूमध्य)
  • शक्ति: महिषमर्दिनी | भैरव: वक्रनाथ

वक्रेश्वरे मनःपातं वक्रनाथस्तु भैरवः।

महिषमर्दिनी देवी सर्वकामफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: वक्रेश्वर में माता का मन (भ्रूमध्य) गिरा था। यहाँ की शक्ति 'महिषमर्दिनी' और भैरव 'वक्रनाथ' हैं।

48. यशोर - यशोरेश्वरी (बांग्लादेश)

  • स्थान: ईश्वरीपुर, श्याम नगर, खुलना (बांग्लादेश)
  • पतित अंग: पाणिपद्म (हाथ-पैर के तलवे)
  • शक्ति: यशोरेश्वरी | भैरव: चण्ड

यशौरे पाणिपद्मं च चण्डश्च भैरवस्तथा।

यशोरेश्वरी सा देवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: यशोर में माता के हाथ और पैर के तलवे गिरे थे। यहाँ की शक्ति 'यशोरेश्वरी' और भैरव 'चण्ड' हैं।

49. अट्टाहास - फुल्लरा (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: लाभपुर स्टेशन के पास, वीरभूम (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: अधरोष्ठ (निचला होंठ)
  • शक्ति: फुल्लरा | भैरव: विश्वेश

अट्टाहासे त्वोष्ठपातो विश्वेशो भैरवस्तथा।

फुल्लरा नाम सा देवी सर्वकामफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: अट्टाहास में माता का अधरोष्ठ गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री 'फुल्लरा' और भैरव 'विश्वेश' हैं।

50. नंदीपूर - नंदिनी (पश्चिम बंगाल)

  • स्थान: सैंथिया, वीरभूम (पश्चिम बंगाल)
  • पतित अंग: कण्ठहार (गले का हार)
  • शक्ति: नंदिनी | भैरव: नंदिकेश्वर

नन्दीपुरे कण्ठहारो नन्दिकेश्वरभैरवः।

नन्दिनी नाम सा देवी सर्वपापहरा परा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: नंदीपुर में वटवृक्ष के समीप माता का कंठहार गिरा था। यहाँ की शक्ति 'नंदिनी' और भैरव 'नंदिकेश्वर' हैं।

51. लंका - इंद्राक्षी (श्रीलंका)

  • स्थान: त्रिंकोमाली (त्रिकोणेश्वर मंदिर क्षेत्र), श्रीलंका
  • पतित अंग: नूपुर (पायल)
  • शक्ति: इंद्राक्षी | भैरव: राक्षसेश्वर

लङ्कायां नूपुरं पातं राक्षसेश्वरो भैरवः।

इन्द्राक्षी नाम सा देवी सर्वकामफलप्रदा॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: लंका में माता का नूपुर गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति 'इन्द्राक्षी' और भैरव 'राक्षसेश्वर' हैं।

52. विराट - अंबिका (राजस्थान)

  • स्थान: विराटनगर (बैराठ), जयपुर के निकट (राजस्थान)
  • पतित अंग: पादांगुलि (पैर की उँगलियाँ)
  • शक्ति: अंबिका | भैरव: अमृत

विराटे पादाङ्गुली च अमृतातख्यस्तु भैरवः।

अम्बिका नाम सा देवी सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: विराटनगर में माता के पैर की उँगलियाँ गिरी थीं। यहाँ की शक्ति 'अंबिका' और भैरव 'अमृत' हैं।

53. मगध - सर्वानन्दकरी (बिहार)

  • स्थान: पटनदेवी, पटना / गया क्षेत्र (बिहार)
  • पतित अंग: दाहिनी जंघा
  • शक्ति: सर्वानन्दकरी | भैरव: व्योमकेश

मागधे दक्षिणा जङ्घा व्योमकेशस्तु भैरवः।

सर्वानन्दकरी नाम सर्वकामार्थसाधिनी॥

— पीठनिर्णय तन्त्र

श्लोकार्थ: मगध क्षेत्र में माता की दाहिनी जंघा गिरी थी। यहाँ की देवी 'सर्वानन्दकरी' और भैरव 'व्योमकेश' हैं।

विशेष निष्कर्ष:

मुख्य तंत्र ग्रन्थ 'पीठनिर्णय' के अनुसार 51 शक्तिपीठों की मान्यता सर्वोपरि है। विभिन्न उप-तंत्रों और क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार विराट एवं मगध को मिलाकर इनकी संख्या 52 या 53 भी मानी जाती है। इन पावन पीठों का दर्शन एवं स्मरण साधक के समस्त पापों का शमन कर अभीष्ट फल प्रदान करता है।

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