✍️ CD Sharma · 📅 27 Oct 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ निर्वाण षटकम्, Nirvana Shatkam, आदि शंकराचार्य, Adi Shankaracharya, शिवोहम्, Shivoham, आत्म षटकम्, Atma Shatkam, अद्वैत वेदान्त, Advaita Vedanta, निर्वाण षटकम् हिन्दी अर्थ, Nirvana Shatkam with Hindi Meaning, संस्कृत स्तोत्र, Sanskrit Stotra
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जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित 'निर्वाण षटकम्' (जिन्हें 'आत्म षटकम्' भी कहा जाता है) अद्वैत वेदान्त का सर्वोत्कृष्ट सार-संक्षेप है। जब ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर आचार्य गोविन्द भगवत्पाद ने बालक शंकर से पूछा—"कस्त्वम्?" (तुम कौन हो?), तब आचार्य शंकर ने जो छः श्लोक अपने स्वरूप के परिचय में उच्चारित किए, वही कालांतर में 'निर्वाण षटकम्' के रूप में अमर हुए।
यहाँ आत्मा को देह, मन, बुद्धि, प्राण, कर्म, सम्बन्ध और प्रकृति के विकारों से सर्वथा पृथक मानकर विशुद्ध चैतन्य तत्त्व—'शिव' घोषित किया गया है।
मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ १॥
सरल भावार्थ: मैं न मन हूँ, न बुद्धि हूँ, न अहंकार हूँ और न ही चित्त (अंतःकरण चतुष्टय) हूँ। मैं न कान हूँ, न जिह्वा हूँ, न नासिका हूँ और न ही दोनों नेत्र (ज्ञानेन्द्रियाँ) हूँ। मैं न आकाश हूँ, न पृथ्वी हूँ, न अग्नि हूँ और न ही वायु (पंचमहाभूत) हूँ। मैं तो विशुद्ध चैतन्य और आनन्द-स्वरूप परमात्मा 'शिव' हूँ, मैं ही शिव हूँ।
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ २॥
सरल भावार्थ: मैं न प्राण संज्ञक जीवनी शक्ति हूँ और न ही पाँचों प्रकार की वायु (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) हूँ। मैं न शरीर के सात धातु (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) हूँ और न ही पाँचों आवरण (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोश) हूँ। मैं न वाणी, हाथ, पैर हूँ और न ही उत्सर्जन व जनन की इन्द्रियाँ (कर्मेन्द्रियाँ) हूँ। मैं तो विशुद्ध चैतन्य और आनन्द-स्वरूप परमात्मा 'शिव' हूँ, मैं ही शिव हूँ।
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ ३॥
सरल भावार्थ: मुझमें न तो राग (आसक्ति) है और न ही द्वेष (घृणा) है; न लोभ है और न कोई मोह है। मुझमें न कोई मद (अहंकार) है और न किसी के प्रति ईर्ष्या (मात्सर्य) का भाव है। मैं चारों पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के भी बंधनों से परे हूँ। मैं तो विशुद्ध चैतन्य और आनन्द-स्वरूप परमात्मा 'शिव' हूँ, मैं ही शिव हूँ।
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ ४॥
सरल भावार्थ: मैं न पुण्य हूँ और न पाप; न भौतिक सुख हूँ और न कोई दुःख। मैं न कोई मन्त्र हूँ, न तीर्थ क्षेत्र, न वेद और न ही यज्ञ अनुष्ठान। न मैं भोग की क्रिया हूँ, न उपभोग की जाने वाली वस्तु (भोज्य), और न ही उसका उपभोग करने वाला कर्ता/भोक्ता। मैं तो विशुद्ध चैतन्य और आनन्द-स्वरूप परमात्मा 'शिव' हूँ, मैं ही शिव हूँ।
न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ ५॥
सरल भावार्थ: मुझे न मृत्यु का भय है, न कोई संशय और न ही मुझमें वर्ण अथवा जाति का कोई भेद है। न मेरे कोई पिता हैं, न माता हैं और न ही मेरा कोई भौतिक जन्म हुआ है। न कोई मेरा सगा-सम्बन्धी है, न मित्र, न कोई गुरु और न ही मैं किसी का शिष्य हूँ। मैं समस्त लौकिक उपाधियों से रहित विशुद्ध चैतन्य और आनन्द-स्वरूप परमात्मा 'शिव' हूँ, मैं ही शिव हूँ।
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न बन्धः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ ६॥
सरल भावार्थ: मैं समस्त विकल्पों, संशयों और कल्पनाओं से परे निर्विकल्प हूँ; मेरा कोई भौतिक आकार नहीं, मैं निराकार हूँ। सर्वव्यापक (विभु) होने के कारण मैं समस्त इन्द्रियों में और सर्वत्र अंतर्निहित हूँ। मैं न किसी सांसारिक संग से बंधा हूँ और न किसी बंधन से मुक्त होने की चेष्टा में हूँ, क्योंकि मैं स्वतः बंधनहीन हूँ। मैं तो केवल विशुद्ध ज्ञान, चैतन्य और परमानन्द-स्वरूप 'शिव' हूँ, मैं ही शिव हूँ।
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