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तर्कसंग्रह (अन्नम्भट्ट): मूल पाठ, हिन्दी अनुवाद एवं दार्शनिक व्याख्या | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 15 Oct 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ तर्कसंग्रह, Tarkasangraha, अन्नम्भट्ट, Annambhatta, न्याय दर्शन, Nyaya Philosophy, वैशेषिक दर्शन, Vaisheshika Darshana, सप्त पदार्थ, Sapta Padartha, नव द्रव्य, Nava Dravya, प्रमाण मीमांसा, Indian Epistemology, तर्कशास्त्र, Indian Logic

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तर्कसंग्रह (अन्नम्भट्ट): मूल पाठ, हिन्दी अनुवाद एवं दार्शनिक व्याख्या | cdsharma.in

तर्कसंग्रहः (Tarkasaṅgrahaḥ)

मूल संस्कृत पाठ, हिन्दी अनुवाद एवं दार्शनिक व्याख्या

महामहोपाध्याय अन्नम्भट्ट विरचित तर्कसंग्रह न्याय और वैशेषिक दर्शन का समन्वयकारी (समानतन्त्र) आधारभूत ग्रन्थ है। इसमें वैशेषिक दर्शन के 'सप्त पदार्थों' की सुव्यवस्थित रूपरेखा के अन्तर्गत न्याय दर्शन के सम्पूर्ण 'प्रमाणशास्त्र' को कुशलतापूर्वक समाहित किया गया है।

१. मङ्गलाचरणम् एवं पदार्थ-विभाग

मङ्गलाचरण

मूल: निधाय हृदि विश्वेशं विधाय गुरुवन्दनम् । बालानां सुखबोधाय क्रियते तर्कसङ्ग्रहः ॥
  • हिन्दी अनुवाद: जगदीश्वर को हृदय में धारण कर तथा गुरुदेव के पावन चरणों की वन्दना करके, बालकों (न्यायशास्त्र में प्रवेश करने वाले नवीन जिज्ञासुओं) के सुगम बोध के लिए 'तर्कसंग्रह' की रचना की जाती है।
  • दार्शनिक व्याख्या: ग्रन्थकार ने यहाँ निर्विघ्न ग्रन्थ-समाप्ति के निमित्त ईश्वर-स्मरण (वस्तु-निर्देशात्मक एवं नमस्कारात्मक मङ्गल) किया है। यहाँ 'बाल' शब्द का अर्थ अबोध शिशु नहीं, अपितु वे अध्येता हैं जिन्होंने व्याकरण-काव्य आदि का अध्ययन कर लिया है, किन्तु न्यायशास्त्र के गहन-गम्भीर ग्रन्थों (जैसे तत्त्वचिन्तामणि या प्रशस्तपादभाष्य) में जिनकी बुद्धि का अभी प्रवेश नहीं हुआ है।

सप्त पदार्थ (Seven Categories)

मूल: द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवायाभावाः सप्त पदार्थाः ॥
  • हिन्दी अनुवाद: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव—ये सात पदार्थ हैं।
  • दार्शनिक व्याख्या: 'पदस्य अर्थः पदार्थः' अर्थात् जो किसी पद (शब्द) का अभिधेय (वाच्य) हो, ज्ञेय (ज्ञान का विषय) हो और प्रमा का विषय बन सके, वह 'पदार्थ' कहलाता है।
  • भाव-पदार्थ (अस्तित्ववान् सत्ताएँ): प्रथम छह पदार्थ (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय)।
  • अभाव-पदार्थ: सातवाँ पदार्थ 'अभाव' (निषेधात्मक सत्ता)। न्याय-वैशेषिक एक यथार्थवादी एवं वस्तुवादी (Realistic) दर्शन है, जो यह स्वीकार करता है कि समस्त प्रमेय वस्तुएँ बाह्य जगत् में मानवीय मन से निरपेक्ष होकर स्वतंत्र रूप से विद्यमान हैं।

२. नव द्रव्यों के लक्षण एवं दार्शनिक व्याख्या

द्रव्य का सामान्य लक्षण: 'क्रियावद् गुणवत् समवायिकारणं द्रव्यम्'—जिसमें कर्म (क्रिया) और गुण समवाय सम्बन्ध से रहते हों, तथा जो कार्य का समवायिकारण बने, उसे द्रव्य कहते हैं। द्रव्यों की कुल संख्या केवल नौ (९) है:

१. पृथिवी

  • मूल लक्षण: गन्धवती पृथिवी।
  • अर्थ: जिसमें गन्ध नामक गुण समवाय सम्बन्ध से रहे, वह पृथिवी है।
  • भेद:
  • नित्य: परमाणुरूप।
  • अनित्य: कार्यरूप। कार्यरूप पुनः तीन प्रकार का है—शरीर (स्थूल पार्थिव शरीर), इन्द्रिय (घ्राण-इन्द्रिय, जो नासिका के अग्रभाग में स्थित है), और विषय (मिट्टी, पाषाण आदि)।
  • दार्शनिक रहस्य: यद्यपि पृथिवी में रूप, रस, स्पर्श आदि गुण भी पाए जाते हैं, तथापि केवल 'गन्ध' ही ऐसा असाधारण गुण है जो जल, तेज आदि अवशिष्ट आठ द्रव्यों में कभी नहीं पाया जाता। अतः गन्ध ही पृथिवी का एकमात्र व्यावर्तक लक्षण है।

२. अप् (जल)

  • मूल लक्षण: शीतस्पर्शवत्य आपः।
  • अर्थ: जिसका स्वाभाविक स्पर्श शीतल हो, वह जल है।
  • भेद: नित्य (परमाणु) एवं अनित्य (कार्य)। कार्यरूप—शरीर (वरुणलोक में), इन्द्रिय (रसना/जिह्वाग्रवर्ती इन्द्रिय), विषय (सरिता, समुद्र, कूप आदि)।
  • दार्शनिक रहस्य: यदि जल अग्नि के संयोग से उष्ण (गरम) प्रतीत होता है, तो भी वह उष्णता औपाधिक (अग्नि-संयोगजन्य) होती है; जल का स्वाभाविक स्पर्श सर्वदा शीतल ही रहता है।

३. तेज

  • मूल लक्षण: उष्णस्पर्शवत्तेजः।
  • अर्थ: जिसका स्वाभाविक स्पर्श उष्ण (गर्म) हो, वह तेज है।
  • भेद: नित्य एवं अनित्य। इसके कार्यरूप विषय चार हैं:
  1. भौम: काष्ठ, ईंधन आदि से प्रज्वलित अग्नि।
  2. दिव्य: विद्युत, आकाशीय बिजली आदि।
  3. औदर्य: पेट में भोजन को पचाने वाली जठराग्नि।
  4. आकरज: खानों से उत्पन्न होने वाले सुवर्ण (सोना), रजत (चाँदी) आदि धातुएँ।
  • दार्शनिक रहस्य: न्याय मत में सुवर्ण (सोना) तैजस द्रव्य है; क्योंकि अत्यधिक ताप देने पर भी इसका अत्यन्त नाश या भस्म रूप में रूपान्तरण नहीं होता। इसका द्रवत्व नैमित्तिक है।

४. वायु

  • मूल लक्षण: रूपरहितस्पर्शवान् वायुः।
  • अर्थ: जो रूपहीन होकर भी स्पर्श गुण से युक्त हो, वह वायु है।
  • भेद: नित्य (परमाणु) एवं अनित्य (कार्य)। शरीर के भीतर सञ्चार करने वाली वायु को प्राण कहते हैं, जो स्थान और क्रिया-भेद से पाँच रूपों में विभक्त है—प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
  • दार्शनिक रहस्य: वायु चक्षुरिन्द्रिय से प्रत्यक्ष नहीं होती (उद्भूत रूप का अभाव होने से), किन्तु त्वचा द्वारा इसके समशीतोष्ण स्पर्श की प्रत्यक्ष प्रतीति होती है।

५. आकाश

  • मूल लक्षण: शब्दगुणकमाकाशम्। तच्चैकं विभु नित्यं च।
  • अर्थ: जिसका असाधारण गुण शब्द है, वह आकाश है। वह एक, सर्वव्यापी (विभु) और नित्य है।
  • दार्शनिक रहस्य: शब्द रूपी कार्य-गुण के समवायिकारण के रूप में आकाश का अनुमान किया जाता है। विभु और निरवयव होने के कारण यह अखण्ड एवं शाश्वत है।

६. काल (समय)

  • मूल लक्षण: अतीतादिव्यवहारहेतुः कालः। स चैको विभुर्नित्यश्च।
  • अर्थ: भूत, वर्तमान, भविष्य, ज्येष्ठ, कनिष्ठ आदि व्यवहारों का जो असाधारण कारण है, वह काल है।
  • दार्शनिक रहस्य: काल तत्त्वतः एक, नित्य और विभु है; तथापि सूर्य की गति रूपी उपाधियों (घटी, पल, दिन, मास, वर्ष आदि) के कारण इसमें व्यावहारिक भेद कल्पित किए जाते हैं।

७. दिक् (दिशा)

  • मूल लक्षण: प्राच्यादिव्यवहारहेतुर्दिक्। सा चैका नित्या विभ्वी च।
  • अर्थ: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि स्थानिक व्यवहारों की असाधारण कारण दिक् (दिशा) है।
  • दार्शनिक रहस्य: काल की भाँति दिक् भी तत्त्वतः एक और विभु है। उदयाचल और अस्ताचल आदि उपाधियों के आधार पर इसमें दिशाओं का व्यवहार सिद्ध होता है।

८. आत्मा

  • मूल लक्षण: ज्ञानाधिकरणमात्मा। स द्विविधः—जीवात्मा, परमात्मा चेति।
  • अर्थ: ज्ञान का जो समवायी आश्रय है, वह आत्मा है। वह दो प्रकार का है—जीवात्मा और परमात्मा।
  • दार्शनिक रहस्य:
  • परमात्मा (ईश्वर): सर्वज्ञ, एक, नित्य और सम्पूर्ण सृष्टि का निमित्तकारण है।
  • जीवात्मा: सुख-दुःख की अनुभूति करने वाला, प्रति-शरीर भिन्न (अनेक), नित्य तथा विभु (व्यापक) है।

९. मन

  • मूल लक्षण: सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः। तच्च प्रत्यात्मनियतत्वादनन्तं परमाणुरूपं नित्यं च।
  • अर्थ: सुख, दुःख आदि आन्तरिक विषयों के प्रत्यक्ष का जो अन्तरिन्द्रिय करण है, वह मन है।
  • दार्शनिक रहस्य: मन अणु-परिमाण (परमाणुरूप) है। यदि मन विभु होता, तो चक्षु, श्रोत्र आदि सभी इन्द्रियों का विषयों के साथ युगपत् (एक साथ) सन्निकर्ष होने पर समस्त ज्ञान एक ही क्षण में उत्पन्न हो जाते। ज्ञान का क्रमिक उत्पन्न होना यह प्रमाणित करता है कि मन अणु-परिमाण है।

३. चतुर्विंशति (२४) गुणों का निरूपण

द्रव्य पर आश्रित रहने वाले, स्वयं निष्क्रिय और गुणरहित धर्म गुण कहलाते हैं:

  1. रूप (७ प्रकार): शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश और चित्र (केवल चक्षुग्राह्य)।
  2. रस (६ प्रकार): मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय, तिक्त (रसना-ग्राह्य)।
  3. गन्ध (२ प्रकार): सुरभि (सुगन्ध) और असुरभि (दुर्गन्ध)।
  4. स्पर्श (३ प्रकार): शीत (जल), उष्ण (तेज), अनुष्णाशीत (पृथिवी व वायु)।
  • पीलुपाकवाद: पृथिवी में रूप, रस, गन्ध और स्पर्श अग्नि-संयोग (पाक) से बदल जाते हैं।
  1. संख्या: एक, द्वि आदि गणना व्यवहार की हेतु। एकत्व नित्य व अनित्य दोनों है; द्वित्व आदि सर्वत्र अपेक्षा-बुद्धिजन्य एवं अनित्य हैं।
  2. परिमाण (४ प्रकार): अणु (सूक्ष्म), महत् (विशाल), ह्रस्व और दीर्घ।
  3. पृथक्त्व: 'यह वस्तु इससे भिन्न है'—इस व्यावहारिक भेद का जनक।
  4. संयोग: अप्राप्त वस्तुओं का परस्पर मिलन (अनित्य सम्बन्ध)।
  5. विभाग: संयोग का नाश करने वाला गुण।
  6. परत्व एवं अपरत्व: ज्येष्ठता/दूरता (परत्व) और कनिष्ठता/निकटता (अपरत्व) का बोध कराने वाले गुण।
  7. गुरुत्व: नीचे गिरने (पतन) का असमवायिकारण।
  8. द्रवत्व: बहने (स्यन्दन) का असमवायिकारण। जल में स्वाभाविक (सांसिद्धिक) तथा घृत व स्वर्ण में ताप-जन्य (नैमित्तिक)।
  9. स्नेह: चूर्ण आदि को पिण्ड रूप में बाँधने (गीला करने) का गुण (केवल जल में)।
  10. शब्द: श्रोत्र-इन्द्रिय ग्राह्य गुण, आकाश का धर्म (ध्वन्यात्मक एवं वर्णात्मक)। (अवशिष्ट १० गुणों का विवेचन आगे खण्ड ५ में प्रस्तुत है।)

४. ज्ञान एवं प्रमाण-मीमांसा (Epistemology)

बुद्धि (ज्ञान) का स्वरूप

लक्षण: सर्वव्यवहारहेतुर्ज्ञानं बुद्धिः। (समस्त सांसारिक व्यवहारों का मूल कारण ज्ञान ही बुद्धि है।)

ज्ञान (बुद्धि) का वर्गीकरण:

  • १. स्मृति (Memory): संस्कारमात्र से उत्पन्न होने वाला ज्ञान स्मृति कहलाता है।
  • २. अनुभव (Experience): स्मृति से भिन्न समस्त ज्ञान अनुभव है। इसके दो भेद हैं:
  • क. यथार्थ अनुभव (प्रमा - Valid Cognition): वस्तु जैसी है, उसका वैसा ही यथार्थ ज्ञान होना प्रमा है। इसके चार प्रकार हैं:
  1. प्रत्यक्ष (Indriyardha-sannikarsha)
  2. अनुमिति (Inference)
  3. उपमिति (Comparison/Analogy)
  4. शाब्द (Verbal Testimony)
  • ख. अयथार्थ अनुभव (अप्रमा - Invalid Cognition): जो वस्तु जैसी नहीं है, उसमें वैसा ज्ञान होना। इसके तीन प्रकार हैं:
  1. संशय (Doubt - जैसे: 'यह स्थाणु है या पुरुष?')
  2. विपर्यय (Error/Illusion - जैसे: सीप में चाँदी का भ्रम)
  3. तर्क (Hypothetical Reasoning - जैसे: 'यदि वह्नि न होती तो धुआँ भी न होता')

कारण-कार्य सिद्धान्त

  • कारण: जो कार्य से पूर्व नियमपूर्वक विद्यमान रहे और अनन्यथासिद्ध हो ('कार्यनियतपूर्ववृत्ति कारणम्' )।
  • करण: व्यापारवान् असाधारण कारण को करण कहते हैं ('व्यापारवदसाधारणं कारणं करणम्' )।

कारण के तीन भेद:

  1. समवायिकारण: जिसमें समवाय सम्बन्ध से कार्य उत्पन्न होता है; जैसे—तन्तु (धागे) पट (वस्त्र) के प्रति, और मृत्तिका घट के प्रति। (यह केवल द्रव्य ही हो सकता है)।
  2. असमवायिकारण: जो कारण कार्य के साथ अथवा समवायिकारण के साथ एक ही आधार में समवाय सम्बन्ध से रहे; जैसे—तन्तु-संयोग पट का असमवायिकारण है।
  3. निमित्तकारण: समवायी और असमवायी से भिन्न समस्त साधक कारण; जैसे—तुरी, वेमा, जुलाहा आदि।

चत्वारि प्रमाणानि (चार प्रमाण)

१. प्रत्यक्ष प्रमाण

  • लक्षण: इन्द्रिय और वस्तु के सन्निकर्ष से उत्पन्न यथार्थ ज्ञान प्रत्यक्ष है।
  • भेद:
  • निर्विकल्पक प्रत्यक्ष: नाम, जाति, गुण आदि विशेषणों से रहित प्राथमिक निष्प्रकारक ज्ञान (जैसे—'कुछ है')।
  • सविकल्पक प्रत्यक्ष: नाम, जाति, गुण आदि से युक्त सुस्पष्ट सप्रकारक ज्ञान (जैसे—'यह घट है')।
  • षड्विध इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष (छह सम्बन्ध):
  1. संयोग: चक्षु का घट से सम्बन्ध।
  2. संयुक्त-समवाय: घट के रूप का प्रत्यक्ष।
  3. संयुक्त-समवेत-समवाय: रूप में 'रूपत्व' जाति का प्रत्यक्ष।
  4. समवाय: कर्ण-विवर में शब्द का प्रत्यक्ष।
  5. समवेत-समवाय: शब्द में 'शब्दत्व' जाति का प्रत्यक्ष।
  6. विशेषण-विशेष्यभाव: अभाव और समवाय का प्रत्यक्ष (जैसे—'घटाभाववद् भूतलम्')।

२. अनुमान प्रमाण

  • लक्षण: अनुमिति ज्ञान के करण को अनुमान कहते हैं।
  • परामर्श: 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः'—'यह पर्वत अग्नि की व्याप्ति वाले धुएँ से युक्त है'—यह ज्ञान परामर्श है, और इसके अनन्तर उत्पन्न ज्ञान ('पर्वत अग्नि वाला है') अनुमिति है।
  • व्याप्ति: 'यत्र यत्र धूमस्तत्राग्निरिति साहचर्यनियमो व्याप्तिः'—साध्य और साधन का नित्य साहचर्य नियम।
  • अनुमान के भेद:
  • स्वार्थानुमान: स्वयं के संशय-निवारण हेतु मानसिक चिन्तन।
  • परार्थानुमान: दूसरों के बोध के लिए पञ्चावयव वाक्यों का प्रयोग:
  1. प्रतिज्ञा: पर्वतो वह्निमान् (पर्वत अग्नि वाला है)।
  2. हेतु: धूमवत्त्वात् (क्योंकि इसमें धुआँ है)।
  3. उदाहरण: यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान्, यथा महानसः (जहाँ धुआँ है वहाँ अग्नि है, जैसे रसोईघर)।
  4. उपनय: तथा चायम् (वैसा ही धुआँ इस पर्वत पर भी है)।
  5. निगमन: तस्मात्तथा (अतः यह पर्वत अग्नि वाला है)।
  • हेत्वाभास (दोषपूर्ण हेतु): सव्यभिचार (अनैकान्तिक), विरुद्ध, सत्प्रतिपक्ष, असिद्ध, और बाधित।

३. उपमान प्रमाण

  • लक्षण: संज्ञा (नाम) और संज्ञी (वस्तु) के सम्बन्ध का ज्ञान कराने वाला प्रमाण उपमान है। इसका करण 'सादृश्य-ज्ञान' है।
  • उदाहरण: "जंगली गाय (नीलगाय/गवय) गाय जैसी होती है"—यह सुनकर वन में सादृश्य देखकर "यह नीलगाय है" ऐसा ज्ञान होना।

४. शब्द प्रमाण

  • लक्षण: आप्तवाक्यं शब्दः। आप्त (यथार्थवक्ता) पुरुष का कथन शब्द प्रमाण है।
  • वाक्यार्थ-बोध के तीन अनिवार्य तत्त्व:
  1. आकांक्षा: एक पद के बिना दूसरे पद के अर्थ की अपूर्णता।
  2. योग्यता: पदों के अर्थ में परस्पर बाधा या विरोध न होना।
  3. सन्निधि (आसक्ति): पदों का बिना अनावश्यक अन्तराल के उच्चारण होना।

५. अवशिष्ट गुण, कर्म एवं अन्य पदार्थ

अवशिष्ट आठ गुण

  • सुख: जो सबके लिए स्वभावतः अनुकूल हो।
  • दुःख: जो सबके लिए स्वभावतः प्रतिकूल और हेय हो।
  • इच्छा: किसी वस्तु को पाने की अभिलाषा।
  • द्वेष: क्रोध अथवा अप्रीति।
  • प्रयत्न: आत्मा का संकल्प अथवा चेष्टा।
  • धर्म: विहित कर्मों से उत्पन्न अदृष्ट पुण्य।
  • अधर्म: निषिद्ध कर्मों से उत्पन्न पाप।
  • संस्कार (३ प्रकार): वेग (गतिशीलता), भावना (स्मृति का जनक संस्कार), स्थितिस्थापक (वस्तु को पुनः पूर्वावस्था में लाने वाला गुण)।

पञ्च कर्माणि (पाँच क्रियाएँ)

कर्म केवल मूर्त द्रव्यों (पृथिवी, जल, तेज, वायु, मन) में रहता है:

  1. उत्क्षेपण: ऊपर की ओर फेंकना।
  2. अवक्षेपण: नीचे की ओर गिराना।
  3. आकुञ्चन: समेटना अथवा सिकोड़ना।
  4. प्रसारण: फैलाना या विस्तृत करना।
  5. गमन: चलना, घूमना, कम्पन आदि अवशिष्ट समस्त गतियाँ।

सामान्य (Universal)

  • लक्षण: नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्।
  • अर्थ: जो नित्य हो, एक हो और अनेक व्यक्तियों में समवाय सम्बन्ध से अनुगत रहे, वह 'सामान्य' (जाति) है; जैसे सभी मनुष्यों में रहने वाला 'मनुष्यत्व'। इसके दो भेद हैं—पर (अधिक व्यापक, जैसे 'सत्ता') और अपर (कम व्यापक, जैसे 'घटत्व')।

विशेष (Particularity)

  • लक्षण: नित्यद्रव्यवृत्तयो व्यावृत्तबुद्धिहेतवो विशेषाः।
  • अर्थ: नित्य द्रव्यों (परमाणुओं, मुक्त आत्माओं आदि) में परस्पर भेद करने वाला अन्तिम व्यावर्तक धर्म 'विशेष' कहलाता है। यह वैशेषिक दर्शन की अपनी मौलिक अवधारणा है।

समवाय (Inherence)

  • लक्षण: नित्यसम्बन्धः समवायः। अयुतसिद्धवृत्तिः।
  • अर्थ: दो अयुतसिद्ध पदार्थों के बीच रहने वाला नित्य सम्बन्ध 'समवाय' है।
  • अयुतसिद्ध सम्बन्ध:
  • अवयव और अवयवी (तन्तु और पट)
  • गुण और गुणी (श्वेतता और शंख)
  • क्रिया और क्रियावान् (दौड़ना और धावक)
  • जाति और व्यक्ति (गोत्व और गाय)
  • विशेष और नित्यद्रव्य

अभाव (Non-existence)

अभाव दो मुख्य वर्गों में तथा चार उप-भेदों में विभक्त है:

  • १. संसर्गाभाव (सम्बन्ध का अभाव): जहाँ दो वस्तुओं के बीच किसी सम्बन्ध का अभाव हो। इसके तीन प्रकार हैं:
  • क. प्रागभाव: कार्य की उत्पत्ति से पूर्व उसका अभाव। यह अनादि है किन्तु कार्य की उत्पत्ति के साथ समाप्त (सान्त) हो जाता है।
  • ख. प्रध्वंसाभाव: वस्तु के विनाश के पश्चात् होने वाला अभाव। यह विनाश से उत्पन्न (सादि) होता है, किन्तु कभी समाप्त नहीं होता (अनन्त)।
  • ग. अत्यन्ताभाव: जो भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में किसी अधिकरण में न रहे (त्रैकालिक अभाव); जैसे—'वायु में रूप का अभाव'।
  • २. अन्योन्याभाव (तादात्म्य या भेद का अभाव): परस्पर भेद, अर्थात् 'एक वस्तु का दूसरी वस्तु न होना'।
  • उदाहरण: 'घटः पटो न भवति' (घड़ा कपड़ा नहीं है)।

उपसंहार

अन्नम्भट्ट ने इन सातों पदार्थों के निरूपण द्वारा सिद्ध किया कि जगत् का कोई भी प्रमेय इन सात पदार्थों की परिधि से बाहर नहीं है। महर्षि कणाद के वैशेषिक-सूत्र और महर्षि गौतम के न्याय-सूत्र के गूढ़ रहस्यों को सुगम, निर्दोष और वैज्ञानिक परिभाषाओं में प्रस्तुत करना ही 'तर्कसंग्रह' की सर्वोपरि शास्त्रीय महत्ता है।

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