✍️ CD Sharma · 📅 15 Oct 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ तर्कसंग्रह, Tarkasangraha, अन्नम्भट्ट, Annambhatta, न्याय दर्शन, Nyaya Philosophy, वैशेषिक दर्शन, Vaisheshika Darshana, सप्त पदार्थ, Sapta Padartha, नव द्रव्य, Nava Dravya, प्रमाण मीमांसा, Indian Epistemology, तर्कशास्त्र, Indian Logic
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महामहोपाध्याय अन्नम्भट्ट विरचित तर्कसंग्रह न्याय और वैशेषिक दर्शन का समन्वयकारी (समानतन्त्र) आधारभूत ग्रन्थ है। इसमें वैशेषिक दर्शन के 'सप्त पदार्थों' की सुव्यवस्थित रूपरेखा के अन्तर्गत न्याय दर्शन के सम्पूर्ण 'प्रमाणशास्त्र' को कुशलतापूर्वक समाहित किया गया है।
मूल: निधाय हृदि विश्वेशं विधाय गुरुवन्दनम् । बालानां सुखबोधाय क्रियते तर्कसङ्ग्रहः ॥
मूल: द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवायाभावाः सप्त पदार्थाः ॥
द्रव्य का सामान्य लक्षण: 'क्रियावद् गुणवत् समवायिकारणं द्रव्यम्'—जिसमें कर्म (क्रिया) और गुण समवाय सम्बन्ध से रहते हों, तथा जो कार्य का समवायिकारण बने, उसे द्रव्य कहते हैं। द्रव्यों की कुल संख्या केवल नौ (९) है:
द्रव्य पर आश्रित रहने वाले, स्वयं निष्क्रिय और गुणरहित धर्म गुण कहलाते हैं:
लक्षण: सर्वव्यवहारहेतुर्ज्ञानं बुद्धिः। (समस्त सांसारिक व्यवहारों का मूल कारण ज्ञान ही बुद्धि है।)
ज्ञान (बुद्धि) का वर्गीकरण:
कारण के तीन भेद:
कर्म केवल मूर्त द्रव्यों (पृथिवी, जल, तेज, वायु, मन) में रहता है:
अभाव दो मुख्य वर्गों में तथा चार उप-भेदों में विभक्त है:
अन्नम्भट्ट ने इन सातों पदार्थों के निरूपण द्वारा सिद्ध किया कि जगत् का कोई भी प्रमेय इन सात पदार्थों की परिधि से बाहर नहीं है। महर्षि कणाद के वैशेषिक-सूत्र और महर्षि गौतम के न्याय-सूत्र के गूढ़ रहस्यों को सुगम, निर्दोष और वैज्ञानिक परिभाषाओं में प्रस्तुत करना ही 'तर्कसंग्रह' की सर्वोपरि शास्त्रीय महत्ता है।
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