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श्रीशाकम्भरी पञ्चकम्: सम्पूर्ण संस्कृत श्लोक, अर्थ एवं फलश्रुति | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 19 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ श्रीशाकम्भरी पञ्चकम्, Shakambhari Panchakam, माँ शाकम्भरी स्तोत्र, Devi Shakambhari, शंकराचार्य कृत स्तोत्र, Adi Shankaracharya Stotra, शाकम्भरी नवरात्रि, Shakambhari Mata Aarti Stuti, cdsharma.in

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श्रीशाकम्भरी पञ्चकम्: सम्पूर्ण संस्कृत श्लोक, अर्थ एवं फलश्रुति | cdsharma.in

॥ श्रीशाकम्भरीपञ्चकम् ॥

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी द्वारा विरचित 'श्री शाकम्भरी पञ्चकम्' भगवती जगदम्बा के शाकम्भरी स्वरूप की एक अत्यंत दुर्लभ और सिद्ध स्तुति है। इस स्तोत्र की विलक्षण विशेषता यह है कि इसके प्रथम पाँचों श्लोक क्रमशः "श्री", "शा", "क", "भ", और "री" अक्षरों से प्रारंभ होकर साक्षात् भगवती के "श्रीशाकम्भरी" नाम को प्रकट करते हैं।

मूल स्तोत्र एवं हिन्दी भावार्थ

श्रीवल्लभसोदरी श्रितजनश्चिद्दायिनी श्रीमती श्रीकण्ठार्धशरीरगा श्रुतिलसन्माणिक्यताटङ्कका। श्रीचक्रान्तरवासिनी श्रुतिशिरः सिद्धान्तमार्गप्रिया श्रीवाणी गिरिजात्मिका भगवती शाकम्भरी पातु माम्॥१॥

  • भावार्थ: जो भगवान श्रीहरि (श्रीवल्लभ) की भगिनी हैं, आश्रित भक्तों को दिव्य ज्ञान व चैतन्य प्रदान करने वाली हैं, परम ऐश्वर्यमयी हैं, भगवान श्रीकण्ठ (महादेव) के वामांग में विराजित हैं, जिनके कानों में वेदों के सारभूत माणिक्य-जड़ित कुण्डल सुशोभित हैं, जो श्रीचक्र के अंतःस्थल में निवास करती हैं, वेदों के शिरोभाग (उपनिषदों) के सिद्धांत मार्ग से प्रसन्न होने वाली हैं तथा महालक्ष्मी, महासरस्वती व पार्वती स्वरूपा हैं—ऐसी भगवती शाकम्भरी मेरी रक्षा करें।

शान्ता शारदचन्द्रसुन्दरमुखी शाल्यन्नभोज्यप्रिया

शाकैः पालितविष्टपा शतदृशा शाकोल्लसद्विग्रहा। श्यामाङ्गी शरणागतार्तिशमनी शक्रादिभिः शंसिता शङ्कर्यष्टफलप्रदा भगवती शाकम्भरी पातु माम्॥२॥

  • भावार्थ: जो परम शांत स्वभाव वाली हैं, शरद ऋतु के चंद्रमा के समान जिनका मुखमंडल परम सुंदर है, जिन्हें शालि (चावल) के अन्न का नैवेद्य प्रिय है, जिन्होंने भयंकर अनावृष्टि के समय अपने शरीर से उत्पन्न शाक, फल एवं औषधियों से सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण किया, जो सौ नेत्रों (शताक्षी) से सुशोभित हैं, जिनका विग्रह शाकों और वनस्पतियों से उल्लसित है, श्याम वर्ण की कांति वाली, शरणागतों के दुखों का शमन करने वाली, देवराज इंद्र आदि देवताओं द्वारा स्तुत तथा अष्ट सिद्धियों को देने वाली कल्याणकारी भगवती शाकम्भरी मेरी रक्षा करें।

कञ्जाक्षी कलशी भवादिविनुता कात्यायनी कामदा कल्याणी कमलालया करकृताम्भोजासिखेटाभया। कादम्बवासवमोदिनी कुचलसत्काश्मीरजालेपना कस्तूरीतिलकाञ्चिता भगवती शाकम्भरी पातु माम्॥३॥

  • भावार्थ: जो कमल के समान विशाल नयनों वाली हैं, अमृतमय कलश धारण करने वाली, ब्रह्मा-शिव आदि देवों द्वारा वंदित, कात्यायनी, समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली, परम कल्याणी, कमल पर विराजमान, अपने कर-कमलों में कमल, खड्ग (तलवार), खेट (ढाल) और अभयमुद्रा धारण करने वाली, कदंब वन की सुवास से आनंदित, वक्षःस्थल पर केसर का लेप लगाने वाली तथा ललाट पर कस्तूरी के तिलक से सुशोभित भगवती शाकम्भरी मेरी रक्षा करें।

भक्तानन्दविधायिनी भवभयप्रध्वंसिनी भैरवी भर्मालङ्कृतिभासुरा भुवनभीकृद् दुर्गदर्पापहा। भूभृन्नायकनन्दिनी भुवनसूर्भास्यत्परः कोटिभा भौमानन्दविहारिणी भगवती शाकम्भरी पातु माम्॥४॥

  • भावार्थ: जो अपने भक्तों को परमानंद प्रदान करने वाली हैं, संसार के जन्म-मरण रूपी भय का नाश करने वाली, भैरवी स्वरूपा, सुवर्ण के आभूषणों से देदीप्यमान, तीनों लोकों को भयभीत करने वाले दुर्गमासुर के दर्प और अहंकार का दलन करने वाली, पर्वतराज हिमालय की कन्या, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जन्म देने वाली जगन्माता, करोड़ों सूर्यों के समान दिव्य प्रभा वाली तथा पृथ्वी पर आनंदपूर्वक विहार करने वाली भगवती शाकम्भरी मेरी रक्षा करें।

रीताम्नायशिखासु रक्तदशना राजीवपत्रेक्षणा राकाराजकरावदातहसिता राकेन्दुबिम्बस्थिता।

रुद्राणी रजनीकरार्भकलसन्मौली रजोरूपिणी रक्षःशिक्षणदीक्षिता भगवती शाकम्भरी पातु माम्॥५॥

  • भावार्थ: जो वेदों की परम पावन ऋचाओं में विराजमान हैं, जिनकी दंतपंक्ति रक्तवर्ण की दिव्य आभा से युक्त है, कमल दल के समान जिनके नेत्र हैं, पूर्णिमा के चंद्रमा की शीतल किरणों जैसी जिनकी उज्ज्वल मुस्कान है, जो पूर्ण चंद्र-बिम्ब में स्थित हैं, रुद्राणी, मस्तक पर बाल-चंद्र को धारण करने वाली, सृष्टि रचना हेतु रजोगुण धारण करने वाली तथा दुष्ट दैत्यों को दंडित करने की दीक्षा में तत्पर भगवती शाकम्भरी मेरी रक्षा करें।

फलश्रुति

श्लोकानामिह पञ्चकं पठति

यः स्तोत्रात्मकं शर्मदं,

सर्वापत्तिविनाशकं प्रतिदिनं

भक्त्या त्रिसन्ध्यं नरः।

आयुःपूर्णमपारमर्थममलां

कीर्तिं प्रजामक्षयां,

शाकम्भर्यनुकम्पया स लभते

विद्यां च विश्वार्थकाम्॥६॥


॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं शाकम्भरीपञ्चकं सम्पूर्णम् ॥

  • भावार्थ: जो मनुष्य समस्त आपत्तियों और संकटों का नाश करने वाले तथा परम आनंद देने वाले इस पावन पञ्चक स्तोत्र का नित्य तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में भक्तिभाव से पाठ करता है, वह माँ शाकम्भरी की अहैतुकी अनुकंपा से पूर्ण दीर्घायु, अपार धन-धान्य, निर्मल कीर्ति, अक्षय कुल-संतान तथा समस्त सांसारिक व पारमार्थिक मनोरथों को सिद्ध करने वाली दिव्य विद्या प्राप्त करता है।

पाठ विधि एवं लाभ

  • नित्य पाठ: इस स्तोत्र का पाठ शाकम्भरी नवरात्रि (पौष शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा), शुक्रवार अथवा प्रतिदिन प्रातः स्नानादि के उपरांत भगवती के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करके करना चाहिए।
  • अन्न व धन-धान्य वृद्धि: घर में अन्न, शाक अथवा आर्थिक समृद्धि की कमी होने पर इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से फलदायी माना गया है।
  • संकट निवारण: अकाल, महामारी, गंभीर शारीरिक व्याधि अथवा अकारण उत्पन्न होने वाले संकटों के निवारण हेतु इसका संपुट पाठ अत्यंत प्रभावकारी है।

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