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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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११. अव्ययानि

अव्यय · सूत्र 366–370 (5)
३६६ संज्ञासूत्रम् · अव्ययसंज्ञा अष्टा० 1.1.37
स्वरादिनिपातमव्ययम् ॥
वृत्तिः
स्वरादयो निपाताश्चाव्ययसंज्ञाः स्युः। स्वर्। अन्तर्। प्रातर्। पुनर्। सनुतर्। उच्चैस्। नीचैस्। शनैस्। ऋधक्। ऋते। युगपत्। आरात्। पृथक्। ह्यस्। श्वस्। दिवा। रात्रौ। सायम्। चिरम्। मनाक्। ईषत्। जोषम्। तूष्णीम्। बहिस्। अवस्। समया। निकषा। स्वयम्। वृथा। नक्तम्। नञ्। हेतौ। इद्धा। अद्धा। सामि। वत्। ब्राह्मणवत्। क्षत्रियवत्। सना। सनत्। सनात्। उपधा। तिरस्। अन्तरा। अन्तरेण। ज्योक्। कम्। शम्। सहसा। विना। नाना। स्वस्ति। स्वधा। अलम्। वषट्। श्रौषट्। वौषट्। अन्यत्। अस्ति। उपांशु। क्षमा। विहायसा। दोषा। मृषा। मिथ्या। मुधा। पुरा। मिथो। मिथस्। प्रायस्। मुहुस्। प्रवाहुकम्। प्रवाहिका। आर्यहलम्। अभीक्ष्णम्। साकम्। सार्धम्। नमस्। हिरुक्। धिक्। अथ। अम्। आम्। प्रताम्। प्रशान्। प्रतान्। मा। माङ्। आकृतिगणोऽयम्। च । वा। ह। अह। एव। एवम्। नूनम्। शश्वत्। युगपत्। भूयस्। कूपत्। कुवित्। नेत्। चेत्। चणकच्चित्। यत्र। नह। हन्त। माकिः। माकिम्। नकिः। नकिम्। माङ्। नञ्। यावत्। तावत्। त्वै। द्वै। न्वै। रै। श्रौषट्। वौषट्। स्वाहा। स्वधा। वषट्। तुम्। तथाहि। खलु। किल। अथो। अथ। सुष्ठु। स्म। आदह। «उपसर्गविभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च» (गणसूत्रम्)। अवदत्तम्। अहंयुः। अस्तिक्षीरा। अ। आ। इ। ई। उ। ऊ। ए। ऐ। ओ। औ। पशु। शुकम्। यथाकथाच। पाट्। प्याट्। अङ्ग। है। हे। भोः। अये। द्य। विषु। एकपदे। युत्। आतः। चादिरप्याकृतिगणः॥ तसिलादयः प्राक् पाशपः। शस्प्रभृतयः प्राक् समासान्तेभ्यः। अम्। आम्। कृत्वोर्थाः। तसिवती। नानाञौ। एतदन्तमप्यव्ययम्॥
हिन्दी अनुवाद
स्वर् आदि (शब्द) और निपात अव्यय-संज्ञक होते हैं। (स्वरादि गण) स्वर्, अन्तर्, प्रातर्, पुनर्, सनुतर्, उच्चैस्, नीचैस्, शनैस्, ऋधक्, ऋते, युगपत्, आरात्, पृथक्, ह्यस्, श्वस्, दिवा, रात्रौ, सायम्, चिरम्, मनाक्, ईषत्, जोषम्, तूष्णीम्, बहिस्, अवस्, समया, निकषा, स्वयम्, वृथा, नक्तम्, नञ्, हेतौ, इद्धा, अद्धा, सामि, वत् (ब्राह्मणवत्, क्षत्रियवत्), सना, सनत्, सनात्, उपधा, तिरस्, अन्तरा, अन्तरेण, ज्योक्, कम्, शम्, सहसा, विना, नाना, स्वस्ति, स्वधा, अलम्, वषट्, श्रौषट्, वौषट्, अन्यत्, अस्ति, उपांशु, क्षमा, विहायसा, दोषा, मृषा, मिथ्या, मुधा, पुरा, मिथो, मिथस्, प्रायस्, मुहुस्, प्रवाहुकम्, प्रवाहिका, आर्यहलम्, अभीक्ष्णम्, साकम्, सार्धम्, नमस्, हिरुक्, धिक्, अथ, अम्, आम्, प्रताम्, प्रशान्, प्रतान्, मा, माङ् — यह आकृतिगण है। (चादि निपात) च, वा, ह, अह, एव, एवम्, नूनम्, शश्वत्, भूयस्, कुवित्, नेत्, चेत्, यत्र, हन्त, यावत्, तावत्, स्वाहा, स्वधा, तथाहि, खलु, किल, अथो, सुष्ठु, स्म इत्यादि। (गणसूत्र) उपसर्ग, विभक्ति और स्वर के प्रतिरूपक भी — अवदत्तम्, अहंयुः, अस्तिक्षीरा; अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ; अङ्ग, है, हे, भोः, अये इत्यादि — चादि भी आकृतिगण है। (तद्धित में) तसिल् आदि (पाशप् से पहले के), शस् आदि (समासान्त से पहले के), अम्, आम्, कृत्वसुच्-अर्थक, तसि, वति, ना, नाञ् — इन प्रत्ययों से अन्त होने वाले शब्द भी अव्यय हैं।
सरल व्याख्या
अव्यय वे शब्द हैं जिनका रूप कभी नहीं बदलता। स्वर् (स्वर्ग), प्रातः, पुनः, उच्चैः, शनैः, ह्यः (कल), श्वः (आने वाला कल), च, वा, एव, इति, खलु, किल, नमः, स्वस्ति, स्वाहा — सब अव्यय। तद्धित के यत्र, तत्र, कुतः, सर्वथा, द्विधा आदि भी अव्यय हैं।
३६७ संज्ञासूत्रम् · अव्ययसंज्ञा अष्टा० 1.1.39
कृन्मेजन्तः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अव्ययम्
वृत्तिः
कृद्यो मान्त एजन्तश्च तदन्तमव्ययं स्यात्। स्मारं स्मारम्। जीवसे। पिबध्यै॥
हिन्दी अनुवाद
जो कृत्-प्रत्यय मकारान्त या एजन्त हो, तदन्त (शब्द) अव्यय होता है। स्मारं स्मारम्, जीवसे, पिबध्यै।
सरल व्याख्या
णमुल् (अम्) वाले शब्द 'स्मारं स्मारम्' (याद कर-करके), और वैदिक 'जीवसे' (जीने के लिये) अव्यय हैं।
३६८ संज्ञासूत्रम् · अव्ययसंज्ञा अष्टा० 1.1.40
क्त्वातोसुन्कसुनः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अव्ययम्
वृत्तिः
एतदन्तमव्ययम्। कृत्वा। उदेतोः। विसृपः॥
हिन्दी अनुवाद
क्त्वा, तोसुन्, कसुन् — इनसे अन्त होने वाला (शब्द) अव्यय होता है। कृत्वा, उदेतोः, विसृपः।
सरल व्याख्या
क्त्वा-प्रत्ययान्त (कृत्वा, गत्वा, पठित्वा) अव्यय हैं — इनका रूप नहीं बदलता।
३६९ संज्ञासूत्रम् · अव्ययसंज्ञा अष्टा० 1.1.41
अव्ययीभावश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अव्ययम्
वृत्तिः
अधिहरि॥
हिन्दी अनुवाद
अव्ययीभाव समास भी (अव्यय होता है)। अधिहरि।
सरल व्याख्या
अव्ययीभाव समास से बने शब्द (अधिहरि, यथाशक्ति, प्रतिदिनम्) अव्यय हैं।
३७० विधिसूत्रम् अष्टा० 2.4.82
अव्ययादाप्सुपः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लुक्
वृत्तिः
अव्ययाद्विहितस्यापः सुपश्च लुक् । तत्र शालायाम् ॥ सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥ वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः । आपं चैव हलन्तानां यथा वाचा निशा दिशा ॥ वहागः, अवगाहः । पिधानम्, अपिधानम् ॥
हिन्दी अनुवाद
अव्यय से विहित आप् (स्त्रीप्रत्यय) और सुप् का लुक् होता है। तत्र शालायाम्। (श्लोक) जो तीनों लिङ्गों, सब विभक्तियों और सब वचनों में समान रहे, विकार को प्राप्त न हो, वह अव्यय है। (श्लोक) भागुरि आचार्य अव और अपि उपसर्गों के अ का लोप, तथा हलन्त (स्त्रीलिङ्ग) शब्दों को आप् (आ) चाहते हैं — जैसे वाचा, निशा, दिशा। वगाहः, अवगाहः; पिधानम्, अपिधानम्।
सरल व्याख्या
अव्यय के बाद आई विभक्ति लुप्त हो जाती है — इसलिए 'तत्र' सदा 'तत्र' ही रहता है। भागुरि के मत से 'अपिधानम्' का 'पिधानम्' और 'अवगाह' का 'वगाह' भी शुद्ध है। (अव्यय प्रकरण पूर्ण।)

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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