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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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१२. भ्वादयः

भ्वादिगण · सूत्र 371–549 (179)
लट् लिट् लुट् लृट् लेट् लोट् लङ् लिङ् लुङ् लृङ् । एषु पञ्चमो लकारश्छन्दोमात्रगोचरः ॥
लट्, लिट्, लुट्, लृट्, लेट्, लोट्, लङ्, लिङ्, लुङ्, लृङ् — (ये दस लकार हैं)। इनमें पाँचवाँ लकार (लेट्) केवल वेद में प्रयुक्त होता है।

सरल व्याख्या: धातु से काल और भाव बताने के लिये दस 'लकार' हैं — लट् (वर्तमान), लिट् (परोक्ष भूत), लुट् (अनद्यतन भविष्य), लृट् (सामान्य भविष्य), लेट् (केवल वेद), लोट् (आज्ञा), लङ् (अनद्यतन भूत), लिङ् (विधि/आशीर्वाद), लुङ् (सामान्य भूत), लृङ् (हेतुहेतुमद् भूत)। भ्वादिगण की पहली धातु 'भू' से इन सबकी प्रक्रिया दिखाई जाती है।
३७१ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.69
लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, कर्तरि, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
लकाराः सकर्मकेभ्यः कर्मणि कर्तरि च स्युरकर्मकेभ्यो भावे कर्तरि च॥
हिन्दी अनुवाद
लकार सकर्मक धातुओं से कर्म और कर्ता में, तथा अकर्मक धातुओं से भाव और कर्ता में होते हैं।
सरल व्याख्या
तिङन्त प्रकरण का आरम्भ: धातु के बाद लगने वाले 10 लकार (लट् आदि) सकर्मक धातु से कर्तृवाच्य या कर्मवाच्य में, और अकर्मक धातु से कर्तृवाच्य या भाववाच्य में होते हैं।
३७२ अधिकारसूत्रम् · वर्तमानाधिकारः अष्टा० 3.2.123
वर्तमाने लट् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने
वृत्तिः
वर्तमानक्रियावृत्तेर्धातोर्लट् स्यात्। अटावितौ। उच्चारणसामर्थ्याल्लस्य नेत्त्वम्। भू सत्तायाम्॥ 〔धातु 1: भू — सत्तायाम्〕॥ कर्तृविवक्षायां भू ल् इति स्थिते-
हिन्दी अनुवाद
वर्तमान काल की क्रिया को कहने वाली धातु से लट् होता है। (लट् में) अ और ट् इत् हैं; उच्चारण के सामर्थ्य से ल की इत्-संज्ञा नहीं। (धातुपाठ) 'भू' — सत्ता (होना) अर्थ में। कर्ता की विवक्षा में 'भू ल्' ऐसी स्थिति में (आगे)।
सरल व्याख्या
वर्तमान काल (हो रहा है) में लट् लकार: भू + लट् → भवति (होता है)। प्रथम धातु 'भू' (होना) से ही सारी प्रक्रिया समझाई जाती है।
३७३ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.78
तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस् तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
एतेऽष्टादश लादेशाः स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
तिप्, तस्, झि, सिप्, थस्, थ, मिप्, वस्, मस्, त, आताम्, झ, थास्, आथाम्, ध्वम्, इट्, वहि, महिङ् — ये अठारह ल के आदेश होते हैं।
सरल व्याख्या
लकार के स्थान पर आने वाले 18 'तिङ्' प्रत्यय — 9 परस्मैपद (ति, तः, अन्ति; सि, थः, थ; मि, वः, मः) और 9 आत्मनेपद (ते, आते, अन्ते आदि)।
३७४ संज्ञासूत्रम् · परस्मैपदसंज्ञा अष्टा० 1.4.99
लः परस्मैपदम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
लादेशाः परस्मैपदसंज्ञाः स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
ल के आदेश परस्मैपद संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
सब 18 तिङ् सामान्यतः परस्मैपद कहलाते हैं — अगला सूत्र अन्तिम 9 को आत्मनेपद बनाता है।
३७५ संज्ञासूत्रम् · आत्मनेपदसंज्ञा अष्टा० 1.4.100
तङानावात्मनेपदम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लः, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
तङ् प्रत्याहारः शानच्कानचौ चैतत्संज्ञाः स्युः। पूर्वसंज्ञाऽपवादः॥
हिन्दी अनुवाद
तङ् प्रत्याहार (त से महिङ् तक) और शानच्, कानच् — ये आत्मनेपद संज्ञक होते हैं। यह पूर्व संज्ञा का अपवाद है।
सरल व्याख्या
त, आताम्, झ आदि अन्तिम नौ और शानच्-कानच् (कृदन्त) 'आत्मनेपद' हैं। शेष (तिप् से मस् तक) परस्मैपद।
३७६ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.12
अनुदात्तङित आत्मनेपदम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उपदेशे
वृत्तिः
अनुदात्तेतो ङितश्च धातोरात्मनेपदं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
अनुदात्त-इत् (अनुदात्त स्वर इत् वाले) और ङित् धातु से आत्मनेपद होता है।
सरल व्याख्या
धातुपाठ में जिन धातुओं का इत् अनुदात्त है (जैसे एधँ = एध्) या जिनमें ङ् इत् है (शीङ्), वे आत्मनेपदी हैं: एधते, शेते।
३७७ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.72
स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
स्वरितेतो ञितश्च धातोरात्मनेपदं स्यात्कर्तृगामिनि क्रियाफले ॥
हिन्दी अनुवाद
स्वरित-इत् और ञित् धातु से, क्रिया का फल कर्ता को मिले तो, आत्मनेपद होता है।
सरल व्याख्या
उभयपदी धातुएँ (यज्, पच्, कृ — डुकृञ्): फल अपने लिये हो तो आत्मनेपद (यजते = अपने लिये यज्ञ करता है), दूसरे के लिये हो तो परस्मैपद (यजति)।
३७८ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.78
शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कर्तरि
वृत्तिः
आत्मनेपदनिमित्तहीनाद्धातोः कर्तरि परस्मैपदं स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
आत्मनेपद के निमित्त से रहित (शेष) धातु से कर्ता में परस्मैपद होता है।
सरल व्याख्या
जिन धातुओं में आत्मनेपद का कोई कारण नहीं, वे कर्तृवाच्य में परस्मैपदी हैं: भवति, पठति, गच्छति।
३७९ संज्ञासूत्रम् · उत्तमसंज्ञा अष्टा० 1.4.101
तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमाः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
तिङ उभयोः पदयोस्त्रिकाः क्रमादेतत्संज्ञाः स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
दोनों पदों (परस्मैपद, आत्मनेपद) के तिङ् के तीन-तीन (के समूह) क्रमशः प्रथम, मध्यम, उत्तम संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
ति-तः-अन्ति = प्रथम पुरुष, सि-थः-थ = मध्यम पुरुष, मि-वः-मः = उत्तम पुरुष। (संस्कृत का 'प्रथम पुरुष' हिन्दी का अन्य/तृतीय पुरुष है।)
३८० संज्ञासूत्रम् · एकवचनसंज्ञा अष्टा० 1.4.102
तान्येकवचनद्विवचनबहुवचनान्येकशः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: तिङः, त्रीणि, त्रीणि, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
लब्धप्रथमादिसंज्ञानि तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रत्येकमेकवचनादिसंज्ञानि स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
प्रथम आदि संज्ञा पाए हुए तिङ् के तीन-तीन (प्रत्यय) प्रत्येक में क्रमशः एकवचन, द्विवचन, बहुवचन संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
प्रत्येक पुरुष के तीन प्रत्यय: पहला एकवचन, दूसरा द्विवचन, तीसरा बहुवचन।
३८१ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.4.105
युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
तिङ्वाच्यकारकवाचिनि युष्मदि प्रयुज्यमानेऽप्रयुज्यमाने च मध्यमः॥
हिन्दी अनुवाद
तिङ् से वाच्य कारक का बोधक युष्मद् (उपपद) प्रयुक्त हो या न हो, तब मध्यम पुरुष होता है।
सरल व्याख्या
कर्ता 'त्वम्/युवाम्/यूयम्' (तुम) हो तो मध्यम पुरुष: त्वं भवसि। 'त्वम्' न लिखा हो तब भी 'भवसि' से 'तुम' समझा जाता है।
३८२ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.4.107
अस्मद्युत्तमः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: समानाधिकरणे, स्थानिनि, अपि, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
तथाभूतेऽस्मद्युत्तमः॥
हिन्दी अनुवाद
वैसे ही अस्मद् (उपपद) होने पर उत्तम पुरुष होता है।
सरल व्याख्या
कर्ता 'अहम्/आवाम्/वयम्' (मैं/हम) हो तो उत्तम पुरुष: अहं भवामि।
३८३ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.4.108
शेषे प्रथमः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: समानाधिकरणे, स्थानिनि, अपि, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
मध्यमोत्तमयोरविषये प्रथमः स्यात्। भू ति इति जाते॥
हिन्दी अनुवाद
मध्यम और उत्तम के विषय से भिन्न (शेष) में प्रथम पुरुष होता है। 'भू ति' ऐसा बनने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
कर्ता कोई अन्य (सः, रामः, बालकाः) हो तो प्रथम पुरुष: सः भवति।
३८४ संज्ञासूत्रम् · सार्वधातुकसंज्ञा अष्टा० 3.4.113
तिङ्शित्सार्वधातुकम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
तिङः शितश्च धात्वधिकारोक्ता एतत्संज्ञाः स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
धातु-अधिकार में कहे गए तिङ् और शित् (श् इत् वाले) प्रत्यय 'सार्वधातुक' संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
तिप् आदि तिङ् और शप्, श्यन् जैसे श्-इत् वाले प्रत्यय 'सार्वधातुक' कहलाते हैं — लट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ् इन्हीं से बनते हैं।
३८५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.68
कर्तरि शप् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सार्वधातुके, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
कर्त्रर्थे सार्वधातुके परे धातोः शप्॥
हिन्दी अनुवाद
कर्ता अर्थ वाला सार्वधातुक परे रहते धातु से शप् होता है।
सरल व्याख्या
भ्वादिगण की धातु और तिङ् के बीच 'शप्' (अ) जुड़ता है: भू + अ + ति।
३८६ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.84
सार्वधातुकार्धधातुकयोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: गुणः, अङ्गस्य
वृत्तिः
अनयोः परयोरिगन्ताङ्गस्य गुणः। अवादेशः। भवति। भवतः॥
हिन्दी अनुवाद
सार्वधातुक और आर्धधातुक परे रहते इगन्त अङ्ग को गुण होता है; अव् आदेश — भवति, भवतः।
सरल व्याख्या
भू + अ + ति → भो + अ + ति (गुण) → भव् + अ + ति (अयादि) → भवति। इसी प्रकार भवतः।
३८७ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.3
झोऽन्तः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययादीनाम्, अङ्गस्य
वृत्तिः
प्रत्ययावयवस्य झस्यान्तादेशः। अतो गुणे। भवन्ति। भवसि। भवथः। भवथ॥
हिन्दी अनुवाद
प्रत्यय के अवयव झ को 'अन्त' आदेश होता है। 'अतो गुणे' (पररूप) से — भवन्ति। भवसि, भवथः, भवथ।
सरल व्याख्या
झि → अन्ति: भव + अन्ति → भवन्ति (अ + अ = पररूप)। मध्यम पुरुष: भवसि, भवथः, भवथ।
३८८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.101
अतो दीर्घो यञि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सार्वधातुके, अङ्गस्य
वृत्तिः
अतोऽङ्गस्य दीर्घो यञादौ सार्वधातुके। भवामि। भवावः। भवामः। स भवति। तौ भवतः। ते भवन्ति। त्वं भवसि। युवां भवथः। यूयं भवथ। अहं भवामि। आवां भवावः। वयं भवामः॥
हिन्दी अनुवाद
यञादि सार्वधातुक परे रहते अकारान्त अङ्ग को दीर्घ होता है। भवामि, भवावः, भवामः। (प्रयोग) सः भवति, तौ भवतः, ते भवन्ति; त्वं भवसि, युवां भवथः, यूयं भवथ; अहं भवामि, आवां भवावः, वयं भवामः।
सरल व्याख्या
उत्तम पुरुष के मि, वः, मः से पहले अ दीर्घ: भवामि, भवावः, भवामः। (भू धातु लट् लकार पूरा।)
३८९ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.115
परोक्षे लिट् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, अनद्यतने, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
वृत्तिः
भूतानद्यतनपरोक्षार्थवृत्तेर्धातोर्लिट् स्यात्। लस्य तिबादयः॥
हिन्दी अनुवाद
अनद्यतन (आज से पहले का), परोक्ष (वक्ता ने न देखा हो) भूतकाल अर्थ वाली धातु से लिट् होता है। ल के स्थान पर तिप् आदि।
सरल व्याख्या
बहुत पुराना, जो वक्ता ने स्वयं न देखा हो — उस भूतकाल में लिट् लकार: बभूव (हुआ था), जैसे पुराण-कथाओं में।
३९० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.82
परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लिटः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लिटस्तिबादीनां नवानां णलादयः स्युः। भू अ इति स्थिते -
हिन्दी अनुवाद
लिट् के तिप् आदि नौ परस्मैपद (प्रत्ययों) को (क्रमशः) णल्, अतुस्, उस्, थल्, अथुस्, अ, णल्, व, म होते हैं। 'भू अ' ऐसी स्थिति में (आगे)।
सरल व्याख्या
लिट् के अलग प्रत्यय: अ, अतुः, उः; थ, अथुः, अ; अ, व, म।
३९१ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.88
भुवो वुग्लुङ्लिटोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
भुवो वुगागमः स्यात् लुङ्लिटोरचि॥
हिन्दी अनुवाद
लुङ् और लिट् का अच् परे रहते भू को वुक् (व्) आगम होता है।
सरल व्याख्या
भू + अ → भूव् + अ।
३९२ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.8
लिटि धातोरनभ्यासस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अजादेः, द्वितीयस्य, एकाचो द्वे प्रथमस्य
वृत्तिः
लिटि परेऽनभ्यासधात्ववयस्यैकाचः प्रथमस्य द्वे स्त आदिभूतादचः परस्य तु द्वितीयस्य। भूव् भूव् अ इति स्थिते -
हिन्दी अनुवाद
लिट् परे रहते अनभ्यास धातु के अवयव, एकाच् प्रथम (भाग) को द्वित्व होता है; पर आदि में अच् हो तो उससे परे द्वितीय (एकाच्) को। 'भूव् भूव् अ' ऐसी स्थिति में (आगे)।
सरल व्याख्या
लिट् में धातु दोहराई जाती है: भूव् → भूव् भूव्।
३९३ संज्ञासूत्रम् · अभ्याससंज्ञा अष्टा० 6.1.4
पूर्वोऽभ्यासः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अजादेः, द्वितीयस्य, एकाचो द्वे प्रथमस्य
वृत्तिः
अत्र ये द्वे विहिते तयोः पूर्वोऽभ्याससंज्ञः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
यहाँ जो दो (रूप) विहित हैं, उनमें पहला 'अभ्यास' संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
दोहराए गए धातु का पहला भाग 'अभ्यास' कहलाता है — इसी पर विशेष परिवर्तन होते हैं।
३९४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.60
हलादिः शेषः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, अङ्गस्य
वृत्तिः
अभ्यासस्यादिर्हल् शिष्यते अन्ये हलो लुप्यन्ते। इति वलोपः॥
हिन्दी अनुवाद
अभ्यास का आदि हल् शेष रहता है, अन्य हल् लुप्त होते हैं। इससे व का लोप।
सरल व्याख्या
अभ्यास में केवल पहला व्यंजन बचता है: भूव् → भू।
३९५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.59
ह्रस्वः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
अभ्यासस्याचो ह्रस्वः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
अभ्यास के अच् को ह्रस्व होता है।
सरल व्याख्या
भू → भु।
३९६ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.73
भवतेरः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, लिटि, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
भवतेरभ्यासोकारस्य अः स्याल्लिटि॥
हिन्दी अनुवाद
लिट् में भू धातु के अभ्यास के उकार को अ होता है।
सरल व्याख्या
भु → भ।
३९७ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.54
अभ्यासे चर्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: झलाम्, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
अभ्यासे झलां चरः स्युर्जशश्च। झशां जशः खयां चर इति विवेकः। बभूव। बभुवतुः। बभूवुः॥
हिन्दी अनुवाद
अभ्यास में झल् को चर् और जश् होते हैं — झश् को जश् और खय् को चर्, यह विवेक है। बभूव, बभूवतुः, बभूवुः।
सरल व्याख्या
अभ्यास का महाप्राण अल्पप्राण बनता है: भ → ब। परिणाम: बभूव (हुआ था), बभूवतुः, बभूवुः।
३९८ संज्ञासूत्रम् · आर्धधातुकसंज्ञा अष्टा० 3.4.115
लिट् च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आर्धधातुकम्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
लिडादेशस्तिङ्ङार्धधातुकसंज्ञः॥
हिन्दी अनुवाद
लिट् के स्थान पर हुए तिङ् आर्धधातुक संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
लिट् के प्रत्यय आर्धधातुक माने जाते हैं (सार्वधातुक नहीं), इसलिए इनमें शप् नहीं लगता।
३९९ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.35
आर्धधातुकस्येड् वलादेः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
वलादेरार्धधातुरस्येडागमः स्यात्। बभूविथ। बभूवथुः। बभूव। बभूव। बभूविव। बभूविम॥
हिन्दी अनुवाद
वलादि (य को छोड़ व्यंजनादि) आर्धधातुक को इट् (इ) आगम होता है। बभूविथ, बभूवथुः, बभूव; बभूव, बभूविव, बभूविम।
सरल व्याख्या
थ, व, म जैसे व्यंजनादि आर्धधातुक प्रत्ययों से पहले 'इ' जुड़ता है: बभूव् + इ + थ = बभूविथ। (लिट् पूरा।)
४०० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.3.15
अनद्यतने लुट् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, शेषे, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भविष्यति
वृत्तिः
भविष्यत्यनद्यतनेऽर्थे धातोर्लुट् ॥
हिन्दी अनुवाद
अनद्यतन भविष्यत् अर्थ में धातु से लुट् होता है।
सरल व्याख्या
आज के बाद का भविष्य (कल या उसके बाद): लुट् लकार — भविता (होगा)।
४०१ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.33
स्यतासी लृलुटोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
धातोः स्यतासी एतौ प्रत्ययौ स्तो लृलुटोः परतः। शबाद्यपवादः। ऌ इति ऌङॢटोर्ग्रहणम्॥
हिन्दी अनुवाद
लृ और लुट् परे रहते धातु से (क्रमशः) स्य और तासि प्रत्यय होते हैं — यह शप् आदि का अपवाद है। 'ऌ' से लृङ् और लृट् दोनों का ग्रहण।
सरल व्याख्या
लृट्/लृङ् में धातु के बाद 'स्य' और लुट् में 'तास्' जुड़ता है।
४०२ संज्ञासूत्रम् · आर्धधातुकसंज्ञा अष्टा० 3.4.114
आर्धधातुकं शेषः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
तिङशिद्भ्योऽन्यो धातोरिति विहितः प्रत्यय एतत्संज्ञः स्यात् । इट् ॥
हिन्दी अनुवाद
तिङ् और शित् से भिन्न, 'धातोः' (अधिकार) से विहित प्रत्यय आर्धधातुक संज्ञक होता है। इट् (होकर आगे)।
सरल व्याख्या
स्य, तास्, तव्य, क्त, तुमुन् आदि आर्धधातुक हैं — इनसे पहले (यदि धातु 'सेट्' हो) इट् लगता है: भू + इ + ता।
४०३ विधिसूत्रम् अष्टा० 2.4.85
लुटः प्रथमस्य डारौरसः ॥
वृत्तिः
डा रौ रस् एते क्रमात् स्युः। डित्त्वसामर्थ्यादभस्यापि टेर्लोपः। भविता॥
हिन्दी अनुवाद
लुट् के प्रथम पुरुष (के प्रत्ययों) को क्रमशः डा, रौ, रस् होते हैं। डित् होने के सामर्थ्य से भ-भिन्न की भी टि का लोप — भविता।
सरल व्याख्या
भवितास् + डा (आ) → टि (आस्) का लोप → भविता।
४०४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.50
तासस्त्योर्लोपः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सः, सि, अङ्गस्य
वृत्तिः
तासेरस्तेश्च सस्य लोपः स्यात्सादौ प्रत्यये परे॥
हिन्दी अनुवाद
सकारादि प्रत्यय परे रहते तास् और अस् (धातु) के स का लोप होता है।
सरल व्याख्या
भवितास् + सि → भवितासि (एक स् हटता है)।
४०५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.51
रि च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सः, सि, तासस्त्योः, लोपः, अङ्गस्य
वृत्तिः
रादौ प्रत्यये तथा। भवितारौ। भवितारः। भवितासि। भवितास्थः। भवितास्थ। भवितास्मि। भवितास्वः। भवितास्मः॥
हिन्दी अनुवाद
रकारादि प्रत्यय परे रहते भी वैसे ही (लोप)। भवितारौ, भवितारः, भवितासि, भवितास्थः, भवितास्थ, भवितास्मि, भवितास्वः, भवितास्मः।
सरल व्याख्या
लुट् लकार के रूप: भविता, भवितारौ, भवितारः; भवितासि...; भवितास्मि, भवितास्वः, भवितास्मः।
४०६ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.3.13
लृट् शेषे च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, क्रियायाम्, क्रियार्थायाम्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भविष्यति
वृत्तिः
भविष्यदर्थाद्धातोर्लृट् क्रियार्थायां क्रियायां सत्यामसत्यां वा । स्यः । इट् । भविष्यति । भविष्यतः । भविष्यन्ति । भविष्यसि । भविष्यथः । भविष्यथ । भविष्यामि । भविष्यावः । भविष्यामः ॥
हिन्दी अनुवाद
भविष्यत् अर्थ वाली धातु से, क्रियार्थ क्रिया हो या न हो, लृट् होता है। स्य, इट् — भविष्यति, भविष्यतः, भविष्यन्ति, भविष्यसि, भविष्यथः, भविष्यथ, भविष्यामि, भविष्यावः, भविष्यामः।
सरल व्याख्या
सामान्य भविष्य काल लृट्: भू + इ + स्य + ति → भविष्यति (षत्व)। 'होगा'।
४०७ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.3.162
लोट् च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, विधि-निमन्त्रण-आमन्त्रण-अधीष्ट-सम्प्रश्न-प्रार्थनेषु, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
विध्याद्यर्थेषु धातोर्लोट् ॥
हिन्दी अनुवाद
विधि आदि अर्थों में धातु से लोट् होता है।
सरल व्याख्या
आज्ञा, प्रार्थना, आशीर्वाद आदि में लोट् लकार: भवतु (हो), भव (हो जाओ)।
४०८ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.3.173
आशिषि लिङ्लोटौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
हिन्दी अनुवाद
(वृत्ति नहीं) आशीर्वाद अर्थ में लिङ् और लोट् होते हैं।
सरल व्याख्या
आशीर्वाद देने में लोट् (चिरं जीवतु) और आशीर्लिङ् (भूयात्) दोनों।
४०९ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.86
एरुः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोटः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लोट इकारस्य उः। भवतु॥
हिन्दी अनुवाद
लोट् के इकार को उ होता है। भवतु।
सरल व्याख्या
भवति → भवतु; भवन्ति → भवन्तु।
४१० विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.35
तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
आशिषि तुह्योस्तातङ् वा। परत्वात्सर्वादेशः। भवतात्॥
हिन्दी अनुवाद
आशीर्वाद में तु और हि को विकल्प से तातङ् होता है; पर होने से (पूरे के स्थान पर) सर्वादेश — भवतात्।
सरल व्याख्या
आशीर्वाद में 'भवतु' का दूसरा रूप 'भवतात्'।
४११ अतिदेशसूत्रम् · लकारप्रत्ययातिदेशः अष्टा० 3.4.85
लोटो लङ्वत् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लोटस्तामादयस्सलोपश्च॥
हिन्दी अनुवाद
लोट् लङ् के समान होता है — (अर्थात्) ताम् आदि और स-लोप।
सरल व्याख्या
लोट् के द्विवचन/बहुवचन रूप लङ् जैसे बनते हैं।
४१२ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.101
तस्थस्थमिपां तांतंतामः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ङितः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
ङितश्चतुर्णां तामादयः क्रमात्स्युः। भवताम्। भवन्तु॥
हिन्दी अनुवाद
ङित् (लकार) के तस्, थस्, थ, मिप् — इन चार को क्रमशः ताम्, तम्, त, अम् होते हैं। भवताम्, भवन्तु।
सरल व्याख्या
लोट्: भवताम् (वे दो हों), भवन्तु।
४१३ अतिदेशसूत्रम् · अपित्त्वातिदेशः अष्टा० 3.4.87
सेर्ह्यपिच्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोटः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लोटः सेर्हिः सोऽपिच्च॥
हिन्दी अनुवाद
लोट् के सि को हि होता है और वह अपित् होता है।
सरल व्याख्या
मध्यम पुरुष एकवचन सि → हि।
४१४ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.105
अतो हेः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्ङिति, लुक्, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
अतः परस्य हेर्लुक्। भव। भवतात्। भवतम्। भवत॥
हिन्दी अनुवाद
अ से परे हि का लुक् होता है। भव, भवतात्, भवतम्, भवत।
सरल व्याख्या
भव + हि → भव (तुम हो)। इसी प्रकार पठ, गच्छ।
४१५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.89
मेर्निः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोटः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लोटो मेर्निः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
लोट् के मि को नि होता है।
सरल व्याख्या
उत्तम पुरुष एकवचन मि → नि।
४१६ अतिदेशसूत्रम् · पित्त्वातिदेशः अष्टा० 3.4.92
आडुत्तमस्य पिच्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोटः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लोडुत्तमस्याट् स्यात् पिच्च। हिन्योरुत्वं न, इकारोच्चारणसामर्थ्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
लोट् के उत्तम पुरुष को आट् आगम होता है और वह पित् होता है। हि और नि के (इ को) उ नहीं होता — इकार के उच्चारण के सामर्थ्य से।
सरल व्याख्या
भव + आ + नि → भवानि (मैं होऊँ), भवाव, भवाम।
४१७ संज्ञासूत्रम् · निपातसंज्ञा अष्टा० 1.4.80
ते प्राग्धातोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा, प्राग्रीश्वरान्निपाताः
वृत्तिः
ते गत्युपसर्गसंज्ञा धातोः प्रागेव प्रयोक्तव्याः॥
हिन्दी अनुवाद
वे गति और उपसर्ग संज्ञक धातु से पहले ही प्रयोग करने चाहिए।
सरल व्याख्या
उपसर्ग सदा धातु से पहले लगता है: प्र + भवति = प्रभवति।
४१८ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.16
आनि लोट् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रषाभ्याम्, उपसर्गात्, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य लोडादेशस्यानीत्यस्य नस्य णः स्यात्। प्रभवाणि। «दुरः षत्वणत्वयोरुपसर्गत्वप्रतिषेधो वक्तव्यः» (वार्त्तिकम्)। दुःस्थितिः। दुर्भवानि। «अन्तश्शब्दस्याङ्कि विधिणत्वेषूपसर्गत्वं वाच्यम्» (वार्त्तिकम्)। अन्तर्भवाणि॥
हिन्दी अनुवाद
उपसर्ग में स्थित निमित्त से परे लोट् के 'आनि' के न को ण होता है। प्रभवाणि। (वार्तिक) दुर् को षत्व और णत्व में उपसर्ग मानने का निषेध — दुःस्थितिः, दुर्भवानि। (वार्तिक) अन्तर् शब्द को अङ्, कि-विधि और णत्व में उपसर्ग मानना चाहिए — अन्तर्भवाणि।
सरल व्याख्या
प्र + भवानि → प्रभवाणि (र् के कारण ण्)। पर दुर् के साथ नहीं: दुर्भवानि।
४१९ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.99
नित्यं ङितः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोपः, सः, उत्तमस्य, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
सकारान्तस्य ङिदुत्तमस्य नित्यं लोपः। अलोऽन्त्यस्येति सलोपः। भवाव। भवाम॥
हिन्दी अनुवाद
ङित् (लकार) के सकारान्त उत्तम (पुरुष प्रत्यय) का नित्य लोप होता है — 'अलोऽन्त्यस्य' से स-लोप। भवाव, भवाम।
सरल व्याख्या
लोट्/लङ् आदि में वस्, मस् का स् हटता है: भवाव, भवाम। (लोट् पूरा।)
४२० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.111
अनद्यतने लङ् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
वृत्तिः
अनद्यतनभूतार्थवृत्तेर्धातोर्लङ् स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
अनद्यतन भूत अर्थ वाली धातु से लङ् होता है।
सरल व्याख्या
आज से पहले का भूतकाल (कल या पहले): लङ् लकार — अभवत् (हुआ)।
४२१ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.71
लुङ्लङ्लृङ्क्ष्वडुदात्तः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
एष्वङ्गस्याट्॥
हिन्दी अनुवाद
लुङ्, लङ्, लृङ् परे रहते अङ्ग को (उदात्त) अट् आगम होता है।
सरल व्याख्या
लङ्, लुङ्, लृङ् में धातु से पहले 'अ' जुड़ता है: अ + भवत्।
४२२ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.100
इतश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोपः, नित्यम्, ङितः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
ङितो लस्य परस्मैपदमिकारान्तं यत्तदन्तस्य लोपः। अभवत्। अभवताम्। अभवन्। अभवः। अभवतम्। अभवत। अभवम्। अभवाव। अभवाम॥
हिन्दी अनुवाद
ङित् लकार का जो इकारान्त परस्मैपद, उसके अन्त (इ) का लोप होता है। अभवत्, अभवताम्, अभवन्, अभवः, अभवतम्, अभवत, अभवम्, अभवाव, अभवाम।
सरल व्याख्या
अभवति → अभवत् (इ हटा)। लङ् लकार के रूप पूरे: अभवत्, अभवताम्, अभवन्; अभवः...; अभवम्, अभवाव, अभवाम।
४२३ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.3.161
विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसंप्रश्नप्रार्थनेषु लिङ् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
एष्वर्थेषु धातोर्लिङ् ॥
हिन्दी अनुवाद
विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रश्न, प्रार्थना — इन अर्थों में धातु से लिङ् होता है।
सरल व्याख्या
'चाहिए', निमन्त्रण, अनुरोध, प्रश्न, प्रार्थना में विधिलिङ्: भवेत् (होना चाहिए)।
४२४ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.103
यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लिङः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लिङः परस्मैपदानां यासुडागमो ङिच्च॥
हिन्दी अनुवाद
लिङ् के परस्मैपद (प्रत्ययों) को यासुट् आगम होता है और वह ङित् होता है।
सरल व्याख्या
विधिलिङ् में प्रत्यय से पहले 'यास्' जुड़ता है: भव + यास् + त्।
४२५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.79
लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सार्वधातुके, अङ्गस्य
वृत्तिः
सार्वधातुकलिङोऽनन्त्यस्य सस्य लोपः। इति प्राप्ते -
हिन्दी अनुवाद
सार्वधातुक लिङ् के अनन्त्य स का लोप होता है। यह प्राप्त होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
यास् + त् में बीच का स् हटता है।
४२६ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.80
अतो येयः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सार्वधातुके, अङ्गस्य
वृत्तिः
अतः परस्य सार्वधातुकावयवस्य यास् इत्यस्य इय्। गुणः॥
हिन्दी अनुवाद
अ से परे सार्वधातुक के अवयव 'या' को 'इय्' होता है। गुण।
सरल व्याख्या
भव + इय् + त् → भवे + य् + त् (गुण)।
४२७ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.66
लोपो व्योर्वलि ॥
वृत्तिः
भवेत्। भवेताम्॥
हिन्दी अनुवाद
वल् परे रहते व और य का लोप होता है। भवेत्, भवेताम्।
सरल व्याख्या
भवेय्त् → य् हटकर भवेत् (होना चाहिए)।
४२८ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.108
झेर्जुस् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लिङः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लिङो झेर्जुस् स्यात्। भवेयुः। भवेः। भवेतम्। भवेत। भवेयम्। भवेव। भवेम॥
हिन्दी अनुवाद
लिङ् के झि को जुस् होता है। भवेयुः, भवेः, भवेतम्, भवेत, भवेयम्, भवेव, भवेम।
सरल व्याख्या
विधिलिङ् के रूप: भवेत्, भवेताम्, भवेयुः; भवेः, भवेतम्, भवेत; भवेयम्, भवेव, भवेम।
४२९ संज्ञासूत्रम् · आर्धधातुकसंज्ञा अष्टा० 3.4.116
लिङाशिषि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आर्धधातुकम्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
आशिषि लिङस्तिङार्धधातुकसंज्ञः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
आशीर्वाद में लिङ् के तिङ् आर्धधातुक संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
आशीर्लिङ् के प्रत्यय आर्धधातुक हैं, इसलिए शप् नहीं लगता: भू + यास् + त्।
४३० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.104
किदाशिषि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लिङः, यासुट्, परस्मैपदेषु, उदात्तः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
आशिषि लिङो यासुट् कित्। स्कोः संयोगाद्योरिति सलोपः॥
हिन्दी अनुवाद
आशीर्वाद में लिङ् का यासुट् कित् होता है। 'स्कोः संयोगाद्योः' से स-लोप।
सरल व्याख्या
कित् होने से गुण नहीं होता: भू + यात् → भूयात् (हो — आशीर्वाद)।
४३१ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.1.5
क्ङिति च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: इकः, गुण-वृद्धी, न
वृत्तिः
गित्किन्ङिन्निमित्ते इग्लक्षणे गुणवृद्धी न स्तः। भूयात्। भूयास्ताम्। भूयासुः। भूयाः। भूयास्तम्। भूयास्त। भूयासम्। भूयास्व। भूयास्म॥
हिन्दी अनुवाद
गित्, कित्, ङित् निमित्त होने पर इक् के स्थान पर होने वाले गुण-वृद्धि नहीं होते। भूयात्, भूयास्ताम्, भूयासुः, भूयाः, भूयास्तम्, भूयास्त, भूयासम्, भूयास्व, भूयास्म।
सरल व्याख्या
क्/ग्/ङ् इत् वाले प्रत्ययों से पहले धातु में गुण-वृद्धि नहीं — इसलिए 'भूयात्' (भोयात् नहीं)। आशीर्लिङ् के सब रूप।
४३२ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.110
लुङ् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
वृत्तिः
भूतार्थे धातोर्लुङ् स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
भूत अर्थ में धातु से लुङ् होता है।
सरल व्याख्या
सामान्य भूतकाल (आज का या कभी का) — लुङ् लकार: अभूत् (हुआ)।
४३३ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.3.175
माङि लुङ् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
सर्वलकारापवादः ॥
हिन्दी अनुवाद
माङ् (निषेधार्थक 'मा') के योग में लुङ् होता है — यह सब लकारों का अपवाद है।
सरल व्याख्या
'मा' (मत) के साथ लुङ् लकार आता है, अर्थ भले ही वर्तमान या भविष्य का हो: मा भूत् (न हो)।
४३४ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.3.176
स्मोत्तरे लङ् च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, माङि, लुङ्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
स्मोत्तरे माङि लङ् स्याच्चाल्लुङ्॥
हिन्दी अनुवाद
जिसके बाद 'स्म' हो ऐसे माङ् के योग में लङ् होता है; 'च' से लुङ् भी।
सरल व्याख्या
'मा स्म' के साथ लङ् या लुङ्: मा स्म भवत् / मा स्म भूत्।
४३५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.43
च्लि लुङि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
शबाद्यपवादः॥
हिन्दी अनुवाद
लुङ् परे रहते (धातु से) च्लि होता है — यह शप् आदि का अपवाद है।
सरल व्याख्या
लुङ् में धातु के बाद 'च्लि' प्रत्यय आता है, जो आगे सिच् आदि में बदलता है।
४३६ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.44
च्लेः सिच् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लुङि, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
इचावितौ॥
हिन्दी अनुवाद
च्लि को सिच् होता है; (उसमें) इ और च् इत् हैं।
सरल व्याख्या
च्लि → सिच् → स्: लुङ् का सामान्य चिह्न 'स्' (अभाषीत्, अकार्षीत्)।
४३७ विधिसूत्रम् अष्टा० 2.4.77
गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लुक्
वृत्तिः
एभ्यः सिचो लुक् स्यात्। गापाविहेणादेशपिबती गृह्यते॥
हिन्दी अनुवाद
गा, स्था, घु-संज्ञक, पा, भू — इनसे परस्मैपद में सिच् का लुक् होता है। (यहाँ) 'गा' से इण् का आदेश गा और 'पा' से पिबति (पीना) लिया जाता है।
सरल व्याख्या
इन धातुओं के लुङ् में स् नहीं लगता: अभूत्, अस्थात्, अदात्, अपात्, अगात्।
४३८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.88
भूसुवोस्तिङि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: गुणः, न, पिति, सार्वधातुके, अङ्गस्य
वृत्तिः
भू सू एतयोः सार्वधातुके तिङि परे गुणो न। अभूत्। अभूताम्। अभूवन्। अभूः। अभूतम्। अभूत। अभूवम्। अभूव। अभूम॥
हिन्दी अनुवाद
भू और सू को सार्वधातुक तिङ् परे रहते गुण नहीं होता। अभूत्, अभूताम्, अभूवन्, अभूः, अभूतम्, अभूत, अभूवम्, अभूव, अभूम।
सरल व्याख्या
लुङ्: अ + भू + त् → अभूत् (गुण नहीं)। भू धातु के लुङ् रूप।
४३९ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.74
न माङ्योगे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लुङ्-लङ्-लृङ्क्षु, अट्, आट्, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
अडाटौ न स्तः। मा भवान् भूत्। मा स्म भवत्। मा स्म भूत्॥
हिन्दी अनुवाद
माङ् के योग में अट् और आट् नहीं होते। मा भवान् भूत्, मा स्म भवत्, मा स्म भूत्।
सरल व्याख्या
'मा' के साथ लुङ् में आरम्भिक 'अ' नहीं लगता: मा भूत् (अभूत् नहीं)।
४४० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.3.139
लिङ्निमित्ते लृङ् क्रियातिपत्तौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, भविष्यति, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
हेतुहेतुमद्भावादि लिङ्निमित्तं तत्र भविष्यत्यर्थे ऌङ् स्यात् क्रियाया अनिष्पत्तौ गम्यमानायाम्। अभविष्यत्। अभविष्यताम्। अभविष्यन्। अभविष्यः। अभविष्यतम्। अभविष्यत। अभविष्यम्। अभविष्याव। अभविष्याम। सुवृष्टिश्चेदभविष्यत्तदा सुभिक्षमभविष्यत्, इत्यादि ज्ञेयम्॥ 〔धातु 2: अत — सातत्यगमने〕॥ अतति॥
हिन्दी अनुवाद
हेतु-हेतुमद्भाव आदि लिङ् का निमित्त हो, वहाँ भविष्यत् अर्थ में, क्रिया के न होने की प्रतीति होने पर, लृङ् होता है। अभविष्यत्, अभविष्यताम्, अभविष्यन्... अभविष्याम। 'सुवृष्टिश्चेदभविष्यत्तदा सुभिक्षमभविष्यत्' — यदि अच्छी वर्षा होती तो सुभिक्ष होता — इत्यादि जानना चाहिए। (धातुपाठ 2) अत् — निरन्तर चलना। अतति।
सरल व्याख्या
'अगर ऐसा होता तो वैसा होता' (जो हुआ नहीं) — इस संकेत-अर्थ में लृङ्: अभविष्यत्। फिर दूसरी धातु 'अत्' आरम्भ।
४४१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.70
अत आदेः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, लिटि, दीर्घः, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
अभ्यासस्यादेरतो दीर्घः स्यात् । आत । आततुः । आतुः । आतिथ । आतथुः । आत । आत । आतिव । आतिम । अतिता । अतिष्यति । अततु ॥
हिन्दी अनुवाद
अभ्यास के आदि अ को दीर्घ होता है। आत, आततुः, आतुः, आतिथ, आतथुः, आत, आत, आतिव, आतिम। अतिता, अतिष्यति, अततु।
सरल व्याख्या
अत् के लिट् में अ + अत् → आत (अभ्यास का अ दीर्घ)।
४४२ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.72
आडजादीनाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उदात्तः, लुङ्-लङ्-लृङ्क्षु, अट्, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
अजादेरङ्गस्याट् लुङ्लङॢङ्क्षु। आतत्। अतेत्। अत्यात्। अत्यास्ताम्। लुङि सिचि इडागमे कृते -
हिन्दी अनुवाद
अजादि अङ्ग को लुङ्, लङ्, लृङ् में आट् आगम होता है। आतत्, अतेत्, अत्यात्, अत्यास्ताम्। लुङ् में सिच् में इट् करने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
स्वर से शुरू होने वाली धातुओं में लङ् आदि में 'अ' की जगह 'आ' (वृद्धि): आ + अतत् → आतत्।
४४३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.96
अस्तिसिचोऽपृक्ते ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सार्वधातुके, हलि, ईट्, अङ्गस्य
वृत्तिः
विद्यमानात् सिचोऽस्तेश्च परस्यापृक्तस्य हल ईडागमः ॥
हिन्दी अनुवाद
विद्यमान सिच् और अस् धातु से परे अपृक्त हल् को ईट् आगम होता है।
सरल व्याख्या
लुङ् में स् + त् → स् + ई + त्: इसीलिए 'आतीत्', 'अभाषीत्' में ई।
४४४ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.28
इट ईटि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोपः, सस्य, झलि, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
इटः परस्य सस्य लोपः स्यादीटि परे। «सिज्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः» (वार्त्तिकम्)। आतीत्। आतिष्टाम्॥
हिन्दी अनुवाद
ईट् परे रहते इट् से परे स का लोप होता है। (वार्तिक) सिच् का लोप एकादेश में सिद्ध कहना चाहिए। आतीत्, आतिष्टाम्।
सरल व्याख्या
आत् + इ + स् + ई + त् → स् हटकर आतीत्।
४४५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.109
सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: झेः, जुस्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
सिचोऽभ्यस्ताद्विदेश्च परस्य ङित्संबन्धिनो झेर्जुस्। आतिषुः। आतीः। आतिष्टम्। आतिष्ट। आतिषम्। आतिष्व। आतिष्म। आतिष्यत्॥ 〔धातु 3: षिध — गत्याम्〕॥
हिन्दी अनुवाद
सिच्, अभ्यस्त और विद् से परे ङित्-सम्बन्धी झि को जुस् होता है। आतिषुः, आतीः, आतिष्टम्, आतिष्ट, आतिषम्, आतिष्व, आतिष्म। आतिष्यत्। (धातुपाठ 3) षिध् — गति।
सरल व्याख्या
लुङ् प्रथम पुरुष बहुवचन 'उः' से: आतिषुः, अभूवन् नहीं (वह भू का विशेष)।
४४६ संज्ञासूत्रम् · लघुसंज्ञा अष्टा० 1.4.10
ह्रस्वं लघु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा
हिन्दी अनुवाद
(वृत्ति नहीं) ह्रस्व (स्वर) 'लघु' संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
छोटी मात्रा का स्वर लघु है — यह गुण आदि नियमों में काम आता है।
४४७ संज्ञासूत्रम् · गुरुसंज्ञा अष्टा० 1.4.11
संयोगे गुरु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ह्रस्वम्, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
संयोगे परे ह्रस्वं गुरु स्यात् ॥
हिन्दी अनुवाद
संयोग परे रहते ह्रस्व 'गुरु' संज्ञक होता है।
सरल व्याख्या
ह्रस्व स्वर के बाद संयुक्त व्यंजन हो तो वह गुरु (भारी) माना जाता है — जैसे 'नन्द्' का अ।
४४८ संज्ञासूत्रम् · गुरुसंज्ञा अष्टा० 1.4.12
दीर्घं च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: गुरु, आकडारात् एका संज्ञा
वृत्तिः
गुरु स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
दीर्घ भी गुरु होता है।
सरल व्याख्या
आ, ई आदि दीर्घ स्वर सदा गुरु।
४४९ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.86
पुगन्तलघूपधस्य च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: गुणः, सार्वधातुक-आर्धधातुकयोः, अङ्गस्य
वृत्तिः
पुगन्तस्य लघूपधस्य चाङ्गस्येको गुणः सार्वधातुकार्धधातुकयोः। धात्वादेरिति सः। सेधति। षत्वम्। सिषेध॥
हिन्दी अनुवाद
पुक्-अन्त और लघु-उपधा वाले अङ्ग के इक् को सार्वधातुक-आर्धधातुक परे रहते गुण होता है। 'धात्वादेः' से स — सेधति। षत्व — सिषेध।
सरल व्याख्या
धातु की उपधा में ह्रस्व इ/उ/ऋ हो (लघु) तो गुण: सिध् → सेधति, बुध् → बोधति, वृत् → वर्तते।
४५० अतिदेशसूत्रम् · कित्त्वातिदेशः अष्टा० 1.2.5
असंयोगाल्लिट् कित् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अपित्
वृत्तिः
असंयोगात्परोऽपिल्लिट् कित् स्यात्। सिषिधतुः। सिषिधुः। सिषेधिथ। सिषिधथुः। सिषिध। सिषेध। सिषिधिव। सिषिधिम। सेधिता। सेधिष्यति। सेधतु। असेधत्। सेधेत्। सिध्यात्। असेधीत्। असेधिष्यत्। एवम् - 〔धातु 4: चिती — संज्ञाने〕॥ 〔धातु 5: शुच — शोके〕 〔धातु 6: गद — व्यक्तायां वाचि〕 ॥ गदति॥
हिन्दी अनुवाद
असंयोग से परे अपित् लिट् कित् होता है। सिषिधतुः, सिषिधुः, सिषेधिथ, सिषिधथुः, सिषिध, सिषेध, सिषिधिव, सिषिधिम। सेधिता, सेधिष्यति, सेधतु, असेधत्, सेधेत्, सिध्यात्, असेधीत्, असेधिष्यत्। इसी प्रकार — (धातु 4) चिती — जानना; (5) शुच् — शोक; (6) गद् — स्पष्ट बोलना। गदति।
सरल व्याख्या
लिट् के द्विवचन-बहुवचन (अतुः, उः) कित् होने से गुण नहीं: सिषिधतुः। एकवचन (णल्) में गुण: सिषेध। इसी तरह चेतति, शोचति।
४५१ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.17
नेर्गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रषाभ्याम्, उपसर्गात्, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य नेर्नस्य णो गदादिषु परेषु। प्रणिगदति॥
हिन्दी अनुवाद
उपसर्ग में स्थित निमित्त से परे 'नि' के न को गद्, नद्, पत्, पद्, घु-संज्ञक, मा, स्यति, हन्, या, वा, द्रा, प्सा, वप्, वह्, शम्, चि, दिह् — इन (धातुओं) के परे रहते ण होता है। प्रणिगदति।
सरल व्याख्या
प्र + नि + गदति → प्रणिगदति (नि का न् → ण्)।
४५२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.62
कुहोश्चुः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
अभ्यासकवर्गहकारयोश्चवर्गादेशः॥
हिन्दी अनुवाद
अभ्यास के कवर्ग और हकार को चवर्ग आदेश होता है।
सरल व्याख्या
अभ्यास में क → च, ग → ज, ह → ज: गद् → जगाद, कृ → चकार, हस् → जहास।
४५३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.116
अत उपधायाः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वृद्धिः, अचः, ञ्णिति, अङ्गस्य
वृत्तिः
उपधाया अतो वृद्धिः स्यात् ञिति णिति च प्रत्यये परे। जगाद। जगदतुः। जगदुः। जगदिथ। जगदथुः। जगद॥
हिन्दी अनुवाद
ञित् और णित् प्रत्यय परे रहते उपधा के अ को वृद्धि होती है। जगाद, जगदतुः, जगदुः, जगदिथ, जगदथुः, जगद।
सरल व्याख्या
लिट् के णल् (णित्) से पहले उपधा अ → आ: जगाद, पपाठ, चकार।
४५४ अतिदेशसूत्रम् · णित्त्वातिदेशः अष्टा० 7.1.91
णलुत्तमो वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सर्वनामस्थाने, णित्, अङ्गस्य
वृत्तिः
उत्तमो णल् वा णित्स्यात्। जगाद, जगद। जगदिव। जगदिम। गदिता। गदिष्यति। गदतु। अगदत्। गदेत्। गद्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
उत्तम (पुरुष का) णल् विकल्प से णित् होता है। जगाद, जगद; जगदिव, जगदिम। गदिता, गदिष्यति, गदतु, अगदत्, गदेत्, गद्यात्।
सरल व्याख्या
लिट् उत्तम पुरुष एकवचन के दो रूप: जगाद / जगद।
४५५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.7
अतो हलादेर्लघोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सिचि, वृद्धिः, परस्मैपदेषु, न, इटि, विभाषा, अङ्गस्य
वृत्तिः
हलादेर्लघोरकारस्य वृद्धिर्वेडादौ परस्मैपदे सिचि। अगादीत्, अगदीत्। अगदिष्यत्॥ 〔धातु 7: णद — अव्यक्ते शब्दे〕॥
हिन्दी अनुवाद
हलादि (धातु) के लघु अकार को इडादि परस्मैपद सिच् परे रहते विकल्प से वृद्धि होती है। अगादीत्, अगदीत्; अगदिष्यत्। (धातु 7) णद् — अव्यक्त शब्द।
सरल व्याख्या
लुङ् में दो रूप: अगादीत् / अगदीत्; अपाठीत् / अपठीत्।
४५६ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.65
णो नः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उपदेशे, धात्वादेः
वृत्तिः
धात्वादेर्णस्य नः। णोपदेशास्त्वनर्द्नाटिनाथ्नाध्नन्दनक्कनॄनृतः॥
हिन्दी अनुवाद
धातु के आदि ण को न होता है। ण-उपदेश वाली धातुएँ — नृत्, नन्द्, नर्द्, नक्क्, नाट्, नाथ्, नाध्, नॄ को छोड़कर (सब नकारादि)।
सरल व्याख्या
धातुपाठ में अधिकतर नकारादि धातुएँ 'ण' से पढ़ी गई हैं (णद्, णम्) — प्रयोग में न: नदति, नमति।
४५७ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.4.14
उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रषाभ्याम्, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य णोपदेशस्य धातोर्नस्य णः। प्रणदति। प्रणिनदति। नदति। ननाद॥
हिन्दी अनुवाद
उपसर्ग में स्थित निमित्त से परे ण-उपदेश धातु के न को, समास न होने पर भी, ण होता है। प्रणदति, प्रणिनदति। नदति, ननाद।
सरल व्याख्या
प्र + नदति → प्रणदति; प्र + नमति → प्रणमति।
४५८ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.120
अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्ङिति, एत्, हौ, अभ्यासलोपः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
लिण्निमित्तादेशादिकं न भवति यदङ्गं तदवयवस्यासंयुक्तहल्मध्यस्थस्यात एत्वमभ्यासलोपश्च किति लिटि। नेदतुः। नेदुः॥
हिन्दी अनुवाद
लिट् के निमित्त से जिसके आदि में आदेश न हुआ हो, ऐसे अङ्ग के, असंयुक्त दो हलों के बीच स्थित अ को एत्व और अभ्यास का लोप होता है, कित् लिट् परे रहते। नेदतुः, नेदुः।
सरल व्याख्या
नद् के लिट् द्विवचन में ननद् + अतुः → नेदतुः (अभ्यास हटा, अ → ए)। इसी प्रकार पच् → पेचतुः, पठ् → पेठतुः।
४५९ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.121
थलि च सेटि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: एत्, हौ, अभ्यासलोपः, एकहल्मध्ये, अनादेशादेः, लिटि, अतः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
प्रागुक्तं स्यात्। नेदिथ। नेदथुः। नेद। ननाद, ननद। नेदिव। नेदिम। नदिता। नदिष्यति। नदतु। अनदत्। नदेत्। नद्यात्। अनादीत्, अनदीत्। अनदिष्यत्॥ 〔धातु 8: टुनदि — समृद्धौ〕॥
हिन्दी अनुवाद
सेट् थल् परे रहते भी पूर्वोक्त (एत्व-अभ्यासलोप) होता है। नेदिथ, नेदथुः, नेद, ननाद, ननद, नेदिव, नेदिम। नदिता, नदिष्यति, नदतु, अनदत्, नदेत्, नद्यात्, अनादीत्, अनदीत्, अनदिष्यत्। (धातु 8) टुनदि — समृद्धि।
सरल व्याख्या
इट् सहित 'थ' में भी: नेदिथ, पेचिथ।
४६० संज्ञासूत्रम् · इत्संज्ञा अष्टा० 1.3.5
आदिर्ञिटुडवः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उपदेशे, इत्
वृत्तिः
उपदेशे धातोराद्या एते इतः स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
उपदेश में धातु के आदि ञि, टु, डु इत् होते हैं।
सरल व्याख्या
धातुपाठ में 'टुनदि', 'डुकृञ्' जैसे आरम्भिक अंश केवल संकेत हैं: नन्द्, कृ।
४६१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.58
इदितो नुम् धातोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
नन्दति। ननन्द। नन्दिता। नन्दिष्यति। नन्दतु। अनन्दत्। नन्देत्। नन्द्यात्। अनन्दीत्। अनन्दिष्यत्। ॥ 〔धातु 9: अर्च — पूजायाम्〕 ॥ अर्चति॥
हिन्दी अनुवाद
इदित् (इ इत् वाली) धातु को नुम् होता है। नन्दति, ननन्द, नन्दिता, नन्दिष्यति, नन्दतु, अनन्दत्, नन्देत्, नन्द्यात्, अनन्दीत्, अनन्दिष्यत्। (धातु 9) अर्च् — पूजा। अर्चति।
सरल व्याख्या
जिन धातुओं में 'इ' इत् है (नदि, वदि), उनमें न् जुड़ता है: नद् → नन्द् → नन्दति (प्रसन्न होता है)।
४६२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.71
तस्मान्नुड् द्विहलः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, लिटि, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
द्विहलो धातोर्दीर्घीभूतात्परस्य नुट् स्यात्। आनर्च। आनर्चतुः। अर्चिता। अर्चिष्यति। अर्चतु। आर्चत्। अर्चेत्। अर्च्यात्। आर्चीत्। आर्चिष्यत्॥ 〔धातु 10: व्रज — गतौ〕 ॥ व्रजति। वव्राज। व्रजिता। व्रजिष्यति। व्रजतु। अव्रजत्। व्रजेत्। व्रज्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
दीर्घ हुए (अभ्यास) से परे दो हल् वाली धातु को नुट् होता है। आनर्च, आनर्चतुः, अर्चिता, अर्चिष्यति, अर्चतु, आर्चत्, अर्चेत्, अर्च्यात्, आर्चीत्, आर्चिष्यत्। (धातु 10) व्रज् — जाना। व्रजति, वव्राज, व्रजिता, व्रजिष्यति, व्रजतु, अव्रजत्, व्रजेत्, व्रज्यात्।
सरल व्याख्या
अर्च् के लिट् में आ + न् + अर्च → आनर्च।
४६३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.3
वदव्रजहलन्तस्याचः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सिचि, वृद्धिः, परस्मैपदेषु, अङ्गस्य
वृत्तिः
एषामचो वृद्धिः सिचि परस्मैपदेषु। अव्राजीत्। अव्रजिष्यत्॥ 〔धातु 11: कटे — वर्षावरणयोः〕॥ कटति। चकाट। चकटतुः। कटिता। कटिष्यति। कटतु। अकटत्। कटेत्। कट्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
वद्, व्रज् और हलन्त (धातुओं) के अच् को परस्मैपद सिच् में वृद्धि होती है। अव्राजीत्, अव्रजिष्यत्। (धातु 11) कटे — वर्षा और आवरण। कटति, चकाट, चकटतुः, कटिता, कटिष्यति, कटतु, अकटत्, कटेत्, कट्यात्।
सरल व्याख्या
लुङ् में व्रज् → अव्राजीत्, वद् → अवादीत्।
४६४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.5
ह्म्यन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सिचि, वृद्धिः, परस्मैपदेषु, न, इटि, अङ्गस्य
वृत्तिः
हमयान्तस्य क्षणादेर्ण्यन्तस्य श्वयतेरेदितश्च वृद्धिर्नेडादौ सिचि । अकटीत् । अकटिष्यत् ॥ 〔धातु 12: गुपू — रक्षणे〕॥
हिन्दी अनुवाद
ह, म, य अन्त वाली, क्षण् आदि, णिजन्त, श्वि और एदित् (ए इत् वाली) धातुओं को इडादि सिच् में वृद्धि नहीं होती। अकटीत्, अकटिष्यत्। (धातु 12) गुपू — रक्षा।
सरल व्याख्या
कटे (एदित्) के लुङ् में वृद्धि नहीं: अकटीत् (अकाटीत् नहीं)।
४६५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.28
गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
एभ्य आयः प्रत्ययः स्यात् स्वार्थे ॥
हिन्दी अनुवाद
गुपू, धूप्, विच्छ्, पण्, पन् — इनसे स्वार्थ में 'आय' प्रत्यय होता है।
सरल व्याख्या
गुप् + आय → गोपाय: गोपायति (रक्षा करता है)।
४६६ संज्ञासूत्रम् · धातुसंज्ञा अष्टा० 3.1.32
सनाद्यन्ता धातवः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
सनादयः कमेर्णिङन्ताः प्रत्यया अन्ते येषां ते धातुसंज्ञकाः। धातुत्वाल्लडादयः। गोपायति॥
हिन्दी अनुवाद
सन् आदि (सन् से लेकर कमि के णिङ् तक के) प्रत्यय जिनके अन्त में हों, वे धातु संज्ञक होते हैं। धातु होने से लट् आदि — गोपायति।
सरल व्याख्या
प्रत्यय जोड़कर बना नया रूप (गोपाय, पाठय, पिपठिष) भी धातु माना जाता है, इसलिए इसमें फिर सब लकार लगते हैं।
४६७ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.31
आयादय आर्धधातुके वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
आर्धधातुकविवक्षायामायादयो वा स्युः। «कास्यनेकाच आम् वक्तव्यः» (वार्त्तिकम्) । लिटि आस्कासोराम्विधानान्मस्य नेत्त्वम्॥
हिन्दी अनुवाद
आर्धधातुक की विवक्षा में आय आदि (प्रत्यय) विकल्प से होते हैं। (वार्तिक) कास् धातु और अनेकाच् (धातु) से (लिट् में) आम् कहना चाहिए। लिट् में आस्-कास् से आम् के विधान से (आम् के) म की इत्-संज्ञा नहीं।
सरल व्याख्या
आर्धधातुक (लिट्, लुट् आदि) में 'आय' लगाना वैकल्पिक: गोपायिता / गोपिता / गोप्ता।
४६८ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.48
अतो लोपः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, आर्धधातुके
वृत्तिः
आर्धधातुकोपदेशे यददन्तं तस्यातो लोप आर्धधातुके॥
हिन्दी अनुवाद
आर्धधातुक के उपदेश-काल में जो अदन्त हो, उसके अ का आर्धधातुक परे रहते लोप होता है।
सरल व्याख्या
गोपाय + इता → गोपाय् + इता (अ हटा) → गोपायिता।
४६९ विधिसूत्रम् अष्टा० 2.4.81
आमः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लुक्, लेः
वृत्तिः
आमः परस्य लुक्॥
हिन्दी अनुवाद
आम् से परे (लिट् प्रत्यय) का लुक् होता है।
सरल व्याख्या
गोपायाम् + लिट् → लिट् लुप्त।
४७० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.40
कृञ् चानुप्रयुज्यते लिटि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आम्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
आमन्ताल्लिट्पराः कृभ्वस्तयोऽनुप्रयुज्यन्ते। तेषां द्वित्वादि॥
हिन्दी अनुवाद
आमन्त से (परे) लिट्-पर कृ, भू, अस् (धातुएँ) अनुप्रयुक्त होती हैं; उनको द्वित्व आदि।
सरल व्याख्या
अनेकाच् धातुओं का लिट् बनाने के लिये 'आम्' + कृ/भू/अस् का लिट् जोड़ा जाता है: गोपायाञ्चकार, गोपायाम्बभूव, गोपायामास।
४७१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.66
उरत् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
अभ्यासऋवर्णस्यात् प्रत्यये। रपरः। हलादिः शेषः। वृद्धिः। गोपायाञ्चकार। द्वित्वात्परत्वाद्यणि प्राप्ते -
हिन्दी अनुवाद
प्रत्यय परे रहते अभ्यास के ऋवर्ण को अ होता है; र-पर; 'हलादिः शेषः'; वृद्धि — गोपायाञ्चकार। द्वित्व से पर होने से यण् प्राप्त होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
कृ के लिट् में अभ्यास कृ → क → च (चुत्व): चकार।
४७२ अतिदेशसूत्रम् · स्थानिवद्भावातिदेशः अष्टा० 1.1.59
द्विर्वचनेऽचि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: स्थानिवत्, आदेशः
वृत्तिः
द्वित्वनिमित्तेऽचि अच आदेशो न द्वित्वे कर्तव्ये। गोपायाञ्चक्रतुः॥
हिन्दी अनुवाद
द्वित्व के निमित्त अच् परे रहते, द्वित्व करना हो तो अच् को आदेश नहीं होता। गोपायाञ्चक्रतुः।
सरल व्याख्या
पहले द्वित्व, फिर यण्: चकृ + अतुः → चक्रतुः।
४७३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.10
एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: न, इट्, अङ्गस्य
वृत्तिः
उपदेशे यो धातुरेकाजनुदात्तश्च तत आर्धधातुकस्येण्न । ऊदॄदन्तैर्योतिरुक्ष्णुशीङ्स्नुनुक्षुश्विडीङ्श्रिभिः । वृड्वृञ्भ्यां च विनैकाचोऽजन्तेषु निहताः स्मृताः ॥ कान्तेषु शक्लेकः । चान्तेषु पच्-मुच्-रिच्-वच्-विच्-सिचः षट् । छान्तेषु प्रच्छेकः । जान्तेषु त्यज्-निजिर्-भज्-भञ्ज्-भुज्-भ्रस्ज्-मस्ज्-यज्-युज्-रुज्-रञ्ज्-विजिर्-स्वञ्ज्-सञ्ज्-सृजः पञ्चदश । दान्तेषु अद्-क्षुद्-खिद्-छिद्-तुद्-नुद्-पद्य-भिद्-विद्यति-विनद्-विन्द्-शद्-स्विद्-स्विद्य-स्कन्द्-हदः डश । धान्तेषु क्रुध्-क्षुध्-बुध्य-बन्ध्-युध्-रुध्-राध्-व्यध्-साध्-शुध्-सिद्ध्या एकादश । नान्तेषु मन्य-हनी द्वौ । पान्तेषु आप्-छुप्-क्षिप्-तप्-तिप्-तृप्य-दृप्य-लिप्-लुप्-वप्-शप्-स्वप्-सृप्स्त्रयोदश । भान्तेषु यभ्-रभ्-लभस्त्रयः । मान्तेषु गम्-नम्-यम्-रमश्चत्वारः । शान्तेषु क्रुश्-दंश्-दिश्-दृश्-मृश्-रिश्-रुश्-लिश्-विश्-स्पृशो दश । षान्तेषु कृष्-त्विष्-तुष्-द्विष्-दुष्-पुष्य-विष्-विष्-शिष्-शुष्-श्लिष्या एकादश ॥ सान्तेषु घस्-वसती द्वौ । हान्तेषु दह्-दिह्-दुह्-नह्-मिह्-रुह्-लिह्-वहोऽष्टौ । अनुदात्ता हलन्तेषु धातवस्त्र्यधिकं शतम् । गोपायाञ्चकर्थ । गोपायाञ्चक्रथुः । गोपायाञ्चक्र । गोपायञ्चकार, गोपायाञ्चकर । गोपायाञ्चकृव । गोपायाञ्चकृम । गोपायाम्बभूव, गोपायामास । जुगोप । जुगुपतुः । जुगुपुः ॥
हिन्दी अनुवाद
उपदेश में जो धातु एकाच् और अनुदात्त हो, उससे आर्धधातुक को इट् नहीं होता। (कारिका) ऊकारान्त, ॠकारान्त, यु, रु, क्ष्णु, शीङ्, स्नु, नु, क्षु, श्वि, डीङ्, श्रि, वृङ्, वृञ् को छोड़कर एकाच् अजन्त धातुएँ अनुदात्त (अनिट्) मानी गई हैं। (हलन्त अनिट् धातुएँ) ककारान्त में शक्; चकारान्त में पच्, मुच्, रिच्, वच्, विच्, सिच्; छकारान्त में प्रच्छ्; जकारान्त में त्यज्, निज्, भज्, भञ्ज्, भुज्, भ्रस्ज्, मस्ज्, यज्, युज्, रुज्, रञ्ज्, विज्, स्वञ्ज्, सञ्ज्, सृज्; दकारान्त में अद्, क्षुद्, खिद्, छिद्, तुद्, नुद्, पद्, भिद्, विद्, विनद्, विन्द्, शद्, स्विद्, स्कन्द्, हद्; धकारान्त में क्रुध्, क्षुध्, बुध्, बन्ध्, युध्, रुध्, राध्, व्यध्, साध्, शुध्, सिध्; नकारान्त में मन्, हन्; पकारान्त में आप्, छुप्, क्षिप्, तप्, तिप्, तृप्, दृप्, लिप्, लुप्, वप्, शप्, स्वप्, सृप्; भकारान्त में यभ्, रभ्, लभ्; मकारान्त में गम्, नम्, यम्, रम्; शकारान्त में क्रुश्, दंश्, दिश्, दृश्, मृश्, रिश्, रुश्, लिश्, विश्, स्पृश्; षकारान्त में कृष्, त्विष्, तुष्, द्विष्, दुष्, पुष्, पिष्, विष्, शिष्, शुष्, श्लिष्; सकारान्त में घस्, वस्; हकारान्त में दह्, दिह्, दुह्, नह्, मिह्, रुह्, लिह्, वह् — हलन्तों में अनुदात्त धातुएँ एक सौ तीन हैं। गोपायाञ्चकर्थ, गोपायाञ्चक्रथुः, गोपायाञ्चक्र, गोपायाञ्चकार/गोपायाञ्चकर, गोपायाञ्चकृव, गोपायाञ्चकृम; गोपायाम्बभूव, गोपायामास। जुगोप, जुगुपतुः, जुगुपुः।
सरल व्याख्या
यह 'अनिट्' धातुओं की प्रसिद्ध सूची है — इनसे तव्य, तुमुन्, ता आदि से पहले 'इ' नहीं लगता: पक्ता, कर्तुम्, गन्तव्यम् (पचिता, करितुम् नहीं)। बाकी धातुएँ सेट् हैं: भविता, पठितुम्।
४७४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.44
स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आर्धधातुकस्य, इट्, वलादेः, अङ्गस्य
वृत्तिः
स्वरत्यादेरूदितश्च परस्य वलादेरार्धधातुकस्येड् वा स्यात्। जुगोपिथ, जुगोप्थ। गोपायिता, गोपिता, गोप्ता। गोपायिष्यति, गोपिष्यति, गोप्स्यति। गोपायतु। अगोपायत्। गोपायेत्। गोपाय्यात्, गुप्यात्। अगोपायीत्॥
हिन्दी अनुवाद
स्वृ, सू (सूति), सू (सूयति), धूञ् और ऊदित् (ऊ इत् वाली) धातुओं से परे वलादि आर्धधातुक को विकल्प से इट् होता है। जुगोपिथ, जुगोप्थ। गोपायिता, गोपिता, गोप्ता। गोपायिष्यति, गोपिष्यति, गोप्स्यति। गोपायतु, अगोपायत्, गोपायेत्, गोपाय्यात्, गुप्यात्, अगोपायीत्।
सरल व्याख्या
गुपू (ऊदित्) के तीन-तीन रूप: गोपायिता / गोपिता / गोप्ता (रक्षा करेगा)।
४७५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.4
नेटि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: परस्मैपदेषु, वृद्धिः, सिचि, वदव्रजहलन्तस्य, अचः, अङ्गस्य
वृत्तिः
इडादौ सिचि हलन्तस्य वृद्धिर्न। अगोपीत्, अगौप्सीत्॥
हिन्दी अनुवाद
इडादि सिच् परे रहते हलन्त को वृद्धि नहीं होती। अगोपीत्, अगौप्सीत्।
सरल व्याख्या
इट् वाले लुङ् में वृद्धि नहीं (अगोपीत्), बिना इट् में वृद्धि (अगौप्सीत्)।
४७६ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.26
झलो झलि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोपः, सस्य, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
झलः परस्य सस्य लोपो झलि। अगौप्ताम्। अगौप्सुः। अगौप्सीः। अगौप्तम्। अगौप्त। अगौप्सम्। अगौप्स्व। अगौप्स्म। अगोपायिष्यत्, अगोपिष्यत्, अगोप्स्यत्॥॥ 〔धातु 13: क्षि — क्षये〕॥ क्षयति। चिक्षाय। चिक्षियतुः। चिक्षियुः। एकाचेति निषेधे प्राप्ते -
हिन्दी अनुवाद
झल् से परे स का झल् परे रहते लोप होता है। अगौप्ताम्, अगौप्सुः, अगौप्सीः, अगौप्तम्, अगौप्त, अगौप्सम्, अगौप्स्व, अगौप्स्म। अगोपायिष्यत्, अगोपिष्यत्, अगोप्स्यत्। (धातु 13) क्षि — क्षय। क्षयति, चिक्षाय, चिक्षियतुः, चिक्षियुः। 'एकाच' से (इट्) निषेध प्राप्त होने पर (आगे)।
सरल व्याख्या
दो व्यंजनों के बीच का स् हटता है: अगौप्स्ताम् → अगौप्ताम्।
४७७ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.13
कृसृभृवृस्तुद्रुस्रुश्रुवो लिटि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: न, इट्, अङ्गस्य
वृत्तिः
क्रादिभ्य एव लिट इण्न स्यादन्यस्मादनिटोऽपि स्यात् ॥
हिन्दी अनुवाद
कृ, सृ, भृ, वृ, स्तु, द्रु, स्रु, श्रु — इन्हीं से लिट् को इट् नहीं होता; अन्य (धातु) से अनिट् होने पर भी (लिट् में इट्) होता है।
सरल व्याख्या
लिट् में प्रायः सब धातुएँ सेट् हैं (चिक्षियिव); केवल ये आठ धातुएँ अनिट्: चकृव, शुश्रुव।
४७८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.61
अचस्तास्वत् थल्यनिटो नित्यम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वलादेः, इट्, आर्धधातुकस्य, न, तासि, अङ्गस्य
वृत्तिः
उपदेशेऽजन्तो यो धातुस्तासौ नित्यानिट् ततस्थल इण् न॥
हिन्दी अनुवाद
उपदेश में जो अजन्त धातु, तास् में नित्य अनिट् हो, उससे (परे) थल् को इट् नहीं होता।
सरल व्याख्या
स्वरान्त अनिट् धातुओं के लिट् 'थ' में इ नहीं — (भारद्वाज के मत से विकल्प, आगे देखें)।
४७९ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.62
उपदेशेऽत्वतः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वलादेः, इट्, आर्धधातुकस्य, न, तासि, नित्यम्, थलि, अनिटः, अङ्गस्य
वृत्तिः
उपदेशेऽकारवतस्तासौ नित्यानिटः परस्य थल इण् न स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
उपदेश में अकारवान् (धातु), जो तास् में नित्य अनिट् हो, उससे परे थल् को इट् नहीं होता।
सरल व्याख्या
जैसे पच् (अनिट्, अ वाली) → पपक्थ (थल् में इ नहीं) — विकल्प से पेचिथ भी।
४८० विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.63
ऋतो भारद्वाजस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वलादेः, इट्, आर्धधातुकस्य, न, तासि, नित्यम्, थलि, अनिटः, अङ्गस्य
वृत्तिः
तासौ नित्यानिट ऋदन्तादेव थलो नेट् भारद्वाजस्य मते। तेन अन्यस्य स्यादेव। अयमत्र संग्रहः- अजन्तोऽकारवान्वा यस्तास्यनिट् थलि वेडयम् । ऋदन्त ईदृङ्निन्तयानिट् क्राद्यन्यो लिटि सेड् भवेत् ॥ चिक्षयिथ, चिक्षेथ । चिक्षियथुः । चिक्षिय । चिक्षाय, चिक्षय । चिक्षियिव । चिक्षियिम । क्षेता । क्षेष्यति । क्षयतु । अक्षयत् । क्षयेत् ॥
हिन्दी अनुवाद
भारद्वाज के मत में तास् में नित्य अनिट् ऋदन्त (धातु) से ही थल् को इट् नहीं होता; अतः अन्य से (इट्) होता ही है। यहाँ संग्रह (कारिका) है — अजन्त या अकारवान् जो तास् में अनिट्, उसे थल् में विकल्प से इट्; ऐसा ऋदन्त (थल् में) नित्य अनिट्; क्रादि (आठ) से अन्य लिट् में सेट् होते हैं। चिक्षयिथ, चिक्षेथ; चिक्षियथुः, चिक्षिय; चिक्षाय, चिक्षय; चिक्षियिव, चिक्षियिम। क्षेता, क्षेष्यति, क्षयतु, अक्षयत्, क्षयेत्।
सरल व्याख्या
सार: लिट् के 'थ' में स्वरान्त/अ-वाली अनिट् धातुओं को इ वैकल्पिक (चिक्षयिथ/चिक्षेथ), ऋकारान्त को नहीं (चकर्थ), बाकी को अवश्य।
४८१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.25
अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्ङिति, यि, अङ्गस्य
वृत्तिः
अजन्ताङ्गस्य दीर्घो यादौ प्रत्यये न तु कृत्सार्वधातुकयोः । क्षीयात् ॥
हिन्दी अनुवाद
अजन्त अङ्ग को यकारादि प्रत्यय परे रहते दीर्घ होता है, पर कृत् और सार्वधातुक में नहीं। क्षीयात्।
सरल व्याख्या
आशीर्लिङ् में क्षि + यात् → क्षीयात्, जि → जीयात्।
४८२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.1
सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
इगन्ताङ्गस्य वृद्धिः स्यात् परस्मैपदे सिचि। अक्षैषीत्। अक्षेष्यत्॥ 〔धातु 14: तप — संतापे〕 ॥ तपति। तताप। तेपतुः। तेपुः। तेपिथ, ततप्थ। तेपिव। तेपिम। तप्ता। तप्स्यति। तपतु। अतपत्। तपेत्। तप्यात्। अताप्सीत्। अताप्ताम्। अतप्स्यत्॥ 〔धातु 15: क्रमु — पादविक्षेपे〕 ॥
हिन्दी अनुवाद
परस्मैपद सिच् परे रहते इगन्त अङ्ग को वृद्धि होती है। अक्षैषीत्, अक्षेष्यत्। (धातु 14) तप् — सन्ताप। तपति, तताप, तेपतुः, तेपुः, तेपिथ, ततप्थ, तेपिव, तेपिम, तप्ता, तप्स्यति, तपतु, अतपत्, तपेत्, तप्यात्, अताप्सीत्, अताप्ताम्, अतप्स्यत्। (धातु 15) क्रमु — पैर रखना (चलना)।
सरल व्याख्या
लुङ् में इ/उ/ऋ-अन्त धातु की वृद्धि: क्षि → अक्षैषीत्, नी → अनैषीत्, कृ → अकार्षीत्।
४८३ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.70
वा भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सार्वधातुके, कर्तरि, श्यन्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
एभ्यः श्यन्वा कर्त्रर्थे सार्वधातुके परे। पक्षे शप्॥
हिन्दी अनुवाद
भ्राश्, भ्लाश्, भ्रम्, क्रम्, क्लम्, त्रस्, त्रुट्, लष् — इनसे कर्ता-अर्थक सार्वधातुक परे रहते विकल्प से श्यन् होता है; पक्ष में शप्।
सरल व्याख्या
इन धातुओं के दो प्रकार के रूप: भ्रमति / भ्राम्यति, क्रामति / क्राम्यति।
४८४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.76
क्रमः परस्मैपदेषु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: दीर्घः, शिति, अङ्गस्य
वृत्तिः
क्रमो दीर्घः परस्मैपदे शिति। क्राम्यति, क्रामति। चक्राम। क्रमिता। क्रमिष्यति। क्राम्यतु, क्रामतु। अक्राम्यत्, अक्रामत्। क्राम्येत्, क्रामेत्। क्रम्यात्। अक्रमीत्। अक्रमिष्यत्॥ 〔धातु 16: पा — पाने〕 ॥
हिन्दी अनुवाद
परस्मैपद शित् परे रहते क्रम् को दीर्घ होता है। क्राम्यति, क्रामति; चक्राम, क्रमिता, क्रमिष्यति, क्राम्यतु/क्रामतु, अक्राम्यत्/अक्रामत्, क्राम्येत्/क्रामेत्, क्रम्यात्, अक्रमीत्, अक्रमिष्यत्। (धातु 16) पा — पीना।
सरल व्याख्या
क्रम् → क्रामति (आ दीर्घ)। आत्मनेपद में नहीं: आक्रमते।
४८५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.78
पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्त्तिसर्त्तिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यर्च्छधौशीयसीदाः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: शिति, अङ्गस्य
वृत्तिः
पादीनां पिबादयः स्युरित्संज्ञकशकारादौ प्रत्यये परे। पिबादेशोऽदन्तस्तेन न गुणः। पिबति॥
हिन्दी अनुवाद
पा, घ्रा, ध्मा, स्था, म्ना, दाण्, दृश्, ऋ (अर्ति), सृ (सर्ति), शद्, सद् — इनको इत्-संज्ञक शकारादि प्रत्यय परे रहते (क्रमशः) पिब, जिघ्र, धम, तिष्ठ, मन, यच्छ, पश्य, ऋच्छ, धौ, शीय, सीद आदेश होते हैं। पिब आदेश अदन्त है, अतः गुण नहीं — पिबति।
सरल व्याख्या
प्रसिद्ध आदेश: पा → पिबति, घ्रा → जिघ्रति, स्था → तिष्ठति, दृश् → पश्यति, सद् → सीदति, दा → यच्छति, गम् नहीं (वह अलग)।
४८६ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.34
आत औ णलः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
आदन्ताद्धातोर्णल औकारादेशः स्यात्। पपौ॥
हिन्दी अनुवाद
आदन्त धातु से णल् को औकार आदेश होता है। पपौ।
सरल व्याख्या
आकारान्त धातुओं के लिट् एकवचन में 'औ': पा → पपौ, दा → ददौ, स्था → तस्थौ।
४८७ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.64
आतो लोप इटि च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, क्ङिति, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, आर्धधातुके
वृत्तिः
अजाद्योरार्धधातुकयोः क्ङिदिटोः परयोरातो लोपः। पपतुः। पपुः। पपिथ, पपाथ। पपथुः। पप। पपौ। पपिव। पपिम। पाता। पास्यति। पिबतु। अपिबत्। पिबेत्॥
हिन्दी अनुवाद
अजादि कित्-ङित् आर्धधातुक और इट् परे रहते आ का लोप होता है। पपतुः, पपुः, पपिथ, पपाथ, पपथुः, पप, पपौ, पपिव, पपिम। पाता, पास्यति, पिबतु, अपिबत्, पिबेत्।
सरल व्याख्या
पा + अतुः → पप् + अतुः → पपतुः।
४८८ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.67
एर्लिङि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्ङिति, आतः, घु-मा-स्था-गा-पा-जहाति-साम्, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, आर्धधातुके
वृत्तिः
घुसंज्ञकानां मास्थादीनां च एत्वं स्यादार्धधातुके किति लिङि। पेयात्। गातिस्थेति सिचो लुक्। अपात्। अपाताम्॥
हिन्दी अनुवाद
घु-संज्ञक (दा, धा) और मा, स्था आदि को आर्धधातुक कित् लिङ् परे रहते एत्व होता है। पेयात्। 'गातिस्था' से सिच् का लुक् — अपात्, अपाताम्।
सरल व्याख्या
आशीर्लिङ्: पा → पेयात्, दा → देयात्, स्था → स्थेयात्।
४८९ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.110
आतः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: झेः, जुस्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
सिज्लुकि आदन्तादेव झेर्जुस्॥
हिन्दी अनुवाद
सिच् का लुक् होने पर आदन्त से ही झि को जुस् होता है।
सरल व्याख्या
अपात् के बहुवचन में 'उः': अप + उः।
४९० विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.96
उस्यपदान्तात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, आत्, पररूपम्, संहितायाम्, एकः पूर्वपरयोः
वृत्तिः
अपदान्तादकारादुसि पररूपमेकादेशः। अपुः। अपास्यत्॥ 〔धातु 17: ग्लै — हर्षक्षये〕 ॥ ग्लायति॥
हिन्दी अनुवाद
अपदान्त अ से उस् परे रहते पररूप एकादेश होता है। अपुः, अपास्यत्। (धातु 17) ग्लै — हर्ष का क्षय (थकना)। ग्लायति।
सरल व्याख्या
अपा + उः → अपुः (आ + उ = उ, पररूप)। इसी प्रकार अदुः, अस्थुः।
४९१ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.45
आदेच उपदेशेऽशिति ॥
वृत्तिः
उपदेशे एजन्तस्य धातोरात्वं न तु शिति। जग्लौ। ग्लाता। ग्लास्यति। ग्लायतु। अग्लायत्। ग्लायेत्॥
हिन्दी अनुवाद
उपदेश में एजन्त धातु को आत्व होता है, पर शित् परे रहते नहीं। जग्लौ, ग्लाता, ग्लास्यति, ग्लायतु, अग्लायत्, ग्लायेत्।
सरल व्याख्या
ग्लै, ध्यै, गै जैसी ऐ-अन्त धातुएँ आर्धधातुक में आ-अन्त बन जाती हैं: ग्लै → ग्ला → ग्लाता; पर लट् (शित्) में ग्लायति।
४९२ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.68
वाऽन्यस्य संयोगादेः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्ङिति, आतः, घु-मा-स्था-गा-पा-जहाति-साम्, एः, लिङि, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, आर्धधातुके
वृत्तिः
घुमास्थादेरन्यस्य संयोगादेर्धातोरात एत्वं वार्धधातुके किति लिङि। ग्लेयात्, ग्लायात्॥
हिन्दी अनुवाद
घु, मा, स्था आदि से भिन्न, संयोगादि धातु के आ को आर्धधातुक कित् लिङ् परे रहते विकल्प से एत्व होता है। ग्लेयात्, ग्लायात्।
सरल व्याख्या
आशीर्लिङ् के दो रूप: ग्लेयात् / ग्लायात्।
४९३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.73
यमरमनमातां सक् च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वलादेः, इट्, आर्धधातुकस्य, सिचि, परस्मैपदेषु, अङ्गस्य
वृत्तिः
एषां सक् स्यादेभ्यः सिच इट् स्यात्परस्मैपदेषु। अग्लासीत्। अग्लास्यत्॥ 〔धातु 18: ह्वृ — कौटिल्ये〕 ॥ ह्वरति॥
हिन्दी अनुवाद
यम्, रम्, नम् और आकारान्त (धातुओं) को सक् (स्) आगम होता है और इनसे (परे) परस्मैपद में सिच् को इट् होता है। अग्लासीत्, अग्लास्यत्। (धातु 18) ह्वृ — कुटिलता। ह्वरति।
सरल व्याख्या
लुङ्: अ + ग्ला + स् + इ + स् + ईत् → अग्लासीत्; यम् → अयंसीत्।
४९४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.10
ऋतश्च संयोगादेर्गुणः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लिटि, अङ्गस्य
वृत्तिः
ऋदन्तस्य संयोगादेरङ्गस्य गुणो लिटि। उपधाया वृद्धिः। जह्वार। जह्वरतुः। जह्वरुः। जह्वर्थ। जह्वरथुः। जह्वर। जह्वार, जह्वर। जह्वरिव। जह्वरिम। ह्वर्ता॥
हिन्दी अनुवाद
संयोगादि ऋदन्त अङ्ग को लिट् में गुण होता है; उपधा-वृद्धि — जह्वार, जह्वरतुः, जह्वरुः, जह्वर्थ, जह्वरथुः, जह्वर, जह्वार/जह्वर, जह्वरिव, जह्वरिम। ह्वर्ता।
सरल व्याख्या
ह्वृ (संयोग से आरम्भ) के लिट् द्विवचन में भी गुण: जह्वरतुः (कित् होने पर भी)।
४९५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.70
ऋद्धनोः स्ये ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आर्धधातुकस्य, इट्, वलादेः, अङ्गस्य
वृत्तिः
ऋतो हन्तेश्च स्यस्येट् । ह्वरिष्यति । ह्वरतु । अह्वरत् । ह्वरेत् ॥
हिन्दी अनुवाद
ऋदन्त और हन् से (परे) स्य को इट् होता है। ह्वरिष्यति, ह्वरतु, अह्वरत्, ह्वरेत्।
सरल व्याख्या
ऋकारान्त धातुएँ अनिट् होने पर भी लृट् में इट्: करिष्यति, हरिष्यति, हनिष्यति।
४९६ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.29
गुणोऽर्तिसंयोगाद्योः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: यि, अकृत्सार्वधातुकयोः, ऋतः, शयग्लिङ्क्षु, अङ्गस्य
वृत्तिः
अर्तेः संयोगादेरृदन्तस्य च गुणः स्याद्यकि यादावार्धधातुके लिङि च। ह्वर्यात्। अह्वार्षीत्। अह्वरिष्यत्॥ 〔धातु 19: श्रु — श्रवणे〕 ॥
हिन्दी अनुवाद
ऋ (अर्ति) और संयोगादि ऋदन्त को यक्, यकारादि आर्धधातुक और लिङ् में गुण होता है। ह्वर्यात्, अह्वार्षीत्, अह्वरिष्यत्। (धातु 19) श्रु — सुनना।
सरल व्याख्या
आशीर्लिङ्: ह्वर्यात् (गुण)। स्मृ → स्मर्यात्।
४९७ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.74
श्रुवः शृ च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सार्वधातुके, कर्तरि, श्नुः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
श्रुवः शृ इत्यादेशः स्यात् श्नुप्रत्ययश्च । शृणोति ॥
हिन्दी अनुवाद
श्रु को 'शृ' आदेश और श्नु प्रत्यय होता है। शृणोति।
सरल व्याख्या
श्रु (सुनना) का लट्: शृ + नु + ति → शृणोति (णत्व, गुण)।
४९८ अतिदेशसूत्रम् · ङित्त्वातिदेशः अष्टा० 1.2.4
सार्वधातुकमपित् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ङित्
वृत्तिः
अपित्सार्वधातुकं ङिद्वत्। शृणुतः॥
हिन्दी अनुवाद
अपित् सार्वधातुक ङित् के समान होता है। शृणुतः।
सरल व्याख्या
तस्, अन्ति आदि अपित् प्रत्यय ङित् जैसे — इसलिए गुण नहीं: शृणुतः (शृणोतः नहीं)।
४९९ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.87
हुश्नुवोः सार्वधातुके ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, यण्, अनेकाचः, असंयोगपूर्वस्य, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
हुश्नुवोरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्योवर्णस्य यण् स्यादचि सार्वधातुके। शृण्वन्ति। शृणोषि। शृणुथः। शृणुथ। शृणोमि॥
हिन्दी अनुवाद
हु और श्नु (प्रत्ययान्त) के, अनेकाच्, असंयोग-पूर्व उवर्ण को अजादि सार्वधातुक परे रहते यण् होता है। शृण्वन्ति, शृणोषि, शृणुथः, शृणुथ, शृणोमि।
सरल व्याख्या
शृणु + अन्ति → शृण्वन्ति।
५०० विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.107
लोपश्चास्यान्यतरस्यां म्वोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्ङिति, असंयोगपूर्वात्, उतः, च, प्रत्ययात्, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
असंयोगपूर्वस्य प्रत्ययोकारस्य लोपो वा म्वोः परयोः। शृण्वः, शृणुवः। शृण्मः, शृणुमः। शुश्राव। शुश्रुवतुः। शुश्रुवुः। शुश्रोथ। शुश्रुवथुः। शुश्रुव। शुश्राव, शुश्रव। शुश्रुव। शुश्रुम। श्रोता। श्रोष्यति। शृणोतु, शृणुतात्। शृणुताम्। शृण्वन्तु॥
हिन्दी अनुवाद
असंयोग-पूर्व प्रत्यय के उकार का म और व परे रहते विकल्प से लोप होता है। शृण्वः/शृणुवः, शृण्मः/शृणुमः। शुश्राव, शुश्रुवतुः, शुश्रुवुः, शुश्रोथ, शुश्रुवथुः, शुश्रुव, शुश्राव/शुश्रव, शुश्रुव, शुश्रुम। श्रोता, श्रोष्यति। शृणोतु, शृणुतात्, शृणुताम्, शृण्वन्तु।
सरल व्याख्या
शृणुवः / शृण्वः दोनों। श्रु के लिट्: शुश्राव (सुना था); लुट्: श्रोता; लृट्: श्रोष्यति।
५०१ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.106
उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्ङिति, लुक्, हेः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
असंयोगपूर्वात्प्रत्ययोतो हेर्लुक्। शृणु, शृणुतात्। शृणुतम्। शृणुत। गुणावादेशौ। शृणवानि। शृणवाव। शृणवाम। अशृणोत्। अशृणुताम्। अशृण्वन्। अशृणोः। अशृणुतम्। अशृणुत। अशृणवम्। अशृण्व, अशृणुव। अशृण्म, अशृणुम। शृणुयात्। शृणुयाताम्। शृणुयुः। शृणुयाः। शृणुयातम्। शृणुयात। शृणुयाम्। शृणुयाव। शृणुयाम। श्रूयात्। अश्रौषीत्। अश्रोष्यत्॥ 〔धातु 20: गमॢ — गतौ〕॥
हिन्दी अनुवाद
असंयोग-पूर्व प्रत्यय के उ से परे हि का लुक् होता है। शृणु, शृणुतात्, शृणुतम्, शृणुत। गुण-अवादेश — शृणवानि, शृणवाव, शृणवाम। अशृणोत्, अशृणुताम्, अशृण्वन्, अशृणोः, अशृणुतम्, अशृणुत, अशृणवम्, अशृण्व/अशृणुव, अशृण्म/अशृणुम। शृणुयात्, शृणुयाताम्, शृणुयुः... शृणुयाम। श्रूयात्, अश्रौषीत्, अश्रोष्यत्। (धातु 20) गमॢ — जाना।
सरल व्याख्या
लोट् मध्यम पुरुष: शृणु (सुनो)। श्रु के शेष लकार।
५०२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.77
इषुगमियमां छः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: शिति, अङ्गस्य
वृत्तिः
एषां छः स्यात् शिति। गच्छति। जगाम॥
हिन्दी अनुवाद
इष्, गम्, यम् को शित् परे रहते छ होता है। गच्छति, जगाम।
सरल व्याख्या
गम् → गच्छति (जाता है), यम् → यच्छति, इष् → इच्छति।
५०३ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.98
गमहनजनखनघसां लोपः क्ङित्यनङि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, उपधायाः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
एषामुपधाया लोपोऽजादौ क्ङिति न त्वङि। जग्मतुः। जग्मुः। जगमिथ, जगन्थ। जग्मथुः। जग्म। जगाम, जगम। जग्मिव। जग्मिम। गन्ता॥
हिन्दी अनुवाद
गम्, हन्, जन्, खन्, घस् — इनकी उपधा का अजादि कित्-ङित् परे रहते लोप होता है, पर अङ् में नहीं। जग्मतुः, जग्मुः, जगमिथ/जगन्थ, जग्मथुः, जग्म, जगाम/जगम, जग्मिव, जग्मिम। गन्ता।
सरल व्याख्या
जगम् + अतुः → जग्मतुः (अ हटा)। हन् → जघ्नतुः।
५०४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.58
गमेरिट् परस्मैपदेषु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आर्धधातुकस्य, इट्, वलादेः, से, अङ्गस्य
वृत्तिः
गमेः परस्य सादेरार्धधातुकस्येट् स्यात् परस्मैपदेषु। गमिष्यति। गच्छतु। अगच्छत्। गच्छेत्। गम्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
परस्मैपद में गम् से परे सकारादि आर्धधातुक को इट् होता है। गमिष्यति, गच्छतु, अगच्छत्, गच्छेत्, गम्यात्।
सरल व्याख्या
गम् अनिट् है, फिर भी लृट् में: गमिष्यति (जाएगा)।
५०५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.55
पुषादिद्युताद्यॢदितः परस्मैपदेषु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लुङि, च्लेः, अङ्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
श्यन्विकरणपुषादेर्द्युतादेरॢदितश्च च्लेरङ् परस्मैपदेषु। अगमत्। अगमिष्यत्॥ इति परस्मैपदिनः ॥
हिन्दी अनुवाद
श्यन्-विकरण वाली पुष् आदि, द्युत् आदि और ऌदित् (ऌ इत् वाली) धातुओं से (परे) च्लि को परस्मैपद में अङ् होता है। अगमत्, अगमिष्यत्। (यहाँ परस्मैपदी धातुएँ समाप्त।)
सरल व्याख्या
गमॢ (ऌदित्) का लुङ्: अगमत् (गया)। (भ्वादि की परस्मैपदी धातुएँ पूर्ण।)
५०६ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.79
टित आत्मनेपदानां टेरे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
॥ अथ आत्मनेपदिनः ॥ 〔धातु 1: एध — वृद्धौ〕 ॥ टितो लस्यात्मनेपदानां टेरेत्वम्। एधते॥
हिन्दी अनुवाद
(अब आत्मनेपदी धातुएँ। धातु 1: एध् — बढ़ना।) टित् लकार के आत्मनेपद (प्रत्ययों) की टि को एत्व होता है। एधते।
सरल व्याख्या
आत्मनेपद में त → ते, आताम् → आते आदि: एध + अ + ते → एधते (बढ़ता है)।
५०७ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.81
आतो ङितः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सार्वधातुके, इयः, अतः, अङ्गस्य
वृत्तिः
अतः परस्य ङितामाकारस्य इय् स्यात्। एधेते। एधन्ते॥
हिन्दी अनुवाद
अ से परे ङित् (प्रत्ययों) के आकार को इय् होता है। एधेते, एधन्ते।
सरल व्याख्या
एध + आते → एध + इय् + ते → एधेते।
५०८ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.80
थासस्से ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: टितः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
टितो लस्य थासः से स्यात्। एधसे। एधेथे। एधध्वे। अतो गुणे। एधे। एधावहे। एधामहे॥
हिन्दी अनुवाद
टित् लकार के थास् को से होता है। एधसे, एधेथे, एधध्वे। 'अतो गुणे' से — एधे, एधावहे, एधामहे।
सरल व्याख्या
आत्मनेपद लट् पूरा: एधते, एधेते, एधन्ते; एधसे, एधेथे, एधध्वे; एधे, एधावहे, एधामहे।
५०९ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.36
इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लिटि, आम्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
इजादिर्यो धातुर्गुरुमानृच्छत्यन्यस्तत आम् स्याल्लिटि॥
हिन्दी अनुवाद
जो धातु इजादि (इ आदि स्वर से आरम्भ) और गुरुमान् हो, ऋच्छ् को छोड़कर, उससे लिट् में आम् होता है।
सरल व्याख्या
एध्, ईक्ष् जैसी स्वरादि धातुएँ जिनमें गुरु वर्ण हो, उनका लिट् 'आम्' से: एधाञ्चक्रे, ईक्षाञ्चक्रे।
५१० विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.63
आम्प्रत्ययवत् कृञोऽनुप्रयोगस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
आम्प्रत्ययो यस्मादित्यतद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः। आम्प्रकृत्या तुल्यमनुप्रयुज्यमानात् कृञोऽप्यात्मनेपदम्॥
हिन्दी अनुवाद
'आम्प्रत्ययः' — जिससे आम् प्रत्यय हो (अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि)। आम् की प्रकृति के समान अनुप्रयुक्त कृञ् से भी आत्मनेपद होता है।
सरल व्याख्या
एध् आत्मनेपदी है, तो उसके साथ जुड़ा कृ भी आत्मनेपद में: एधाञ्चक्रे (चकार नहीं)।
५११ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.81
लिटस्तझयोरेशिरेच् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लिडादेशयोस्तझयोरेश् इरेजेतौ स्तः। एधाञ्चक्रे। एधाञ्चक्राते। एधाञ्चक्रिरे। एधाञ्चकृषे। एधाञ्चक्राथे॥
हिन्दी अनुवाद
लिट् के स्थान पर हुए त और झ को (क्रमशः) एश् और इरेच् होते हैं। एधाञ्चक्रे, एधाञ्चक्राते, एधाञ्चक्रिरे, एधाञ्चकृषे, एधाञ्चक्राथे।
सरल व्याख्या
आत्मनेपद लिट् प्रत्यय: ए, आते, इरे; से, आथे, ध्वे; ए, वहे, महे — चक्रे, चक्राते, चक्रिरे।
५१२ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.78
इणः षीध्वंलुङ्लिटां धोऽङ्गात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सः, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्, अपदान्तस्य मूर्धन्यः, इण्कोः
वृत्तिः
इणन्तादङ्गात्परेषां षीध्वंलुङ्लिटां धस्य ढः स्यात्॥ एधाञ्चकृढ्वे। एधाञ्चक्रे। एधाञ्चकृवहे। एधाञ्चकृमहे। एधाम्बभूव। एधामास। एधिता। एधितारौ। एधितारः। एधितासे। एधितासाथे॥
हिन्दी अनुवाद
इणन्त अङ्ग से परे षीध्वम्, लुङ् और लिट् के ध को ढ होता है। एधाञ्चकृढ्वे, एधाञ्चक्रे, एधाञ्चकृवहे, एधाञ्चकृमहे; एधाम्बभूव, एधामास। एधिता, एधितारौ, एधितारः, एधितासे, एधितासाथे।
सरल व्याख्या
इ/उ/ऋ आदि अन्त वाले अङ्ग के बाद ध्वे → ढ्वे: चकृढ्वे।
५१३ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.25
धि च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोपः, सस्य, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
धादौ प्रत्यये परे सस्य लोपः। एधिताध्वे॥
हिन्दी अनुवाद
धकारादि प्रत्यय परे रहते (तास् के) स का लोप होता है। एधिताध्वे।
सरल व्याख्या
एधितास् + ध्वे → एधिताध्वे।
५१४ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.52
ह एति ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सः, सि, तासस्त्योः, लोपः, अङ्गस्य
वृत्तिः
तासस्त्योः सस्य हः स्यादेति परे । एधिताहे , एधितास्वहे । एधितास्महे । एधिष्यते । एधिष्येते । एधिष्यन्ते । एधिष्यसे । एधिष्येथे । एधिष्यध्वे । एधिष्ये । एधिष्यावहे । एधिष्यामहे ॥
हिन्दी अनुवाद
ए परे रहते तास् और अस् के स को ह होता है। एधिताहे, एधितास्वहे, एधितास्महे। एधिष्यते, एधिष्येते, एधिष्यन्ते, एधिष्यसे, एधिष्येथे, एधिष्यध्वे, एधिष्ये, एधिष्यावहे, एधिष्यामहे।
सरल व्याख्या
लुट् उत्तम पुरुष एकवचन: एधितास् + ए → एधिताहे। लृट्: एधिष्यते।
५१५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.90
आमेतः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोटः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लोट एकारस्याम् स्यात्। एधताम्। एधेताम्। एधन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद
लोट् के एकार को आम् होता है। एधताम्, एधेताम्, एधन्ताम्।
सरल व्याख्या
आत्मनेपद लोट्: एधते → एधताम्।
५१६ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.91
सवाभ्यां वामौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोटः, एतः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
सवाभ्याम् परस्य लोडेतः क्रमाद्वामौ स्तः। एधस्व। एधेथाम्। एधध्वम्॥
हिन्दी अनुवाद
स और व से परे लोट् के ए को क्रमशः व और अम् होते हैं। एधस्व, एधेथाम्, एधध्वम्।
सरल व्याख्या
मध्यम पुरुष: एधसे → एधस्व (बढ़ो)।
५१७ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.93
एत ऐ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोटः, उत्तमस्य, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लोडुत्तमस्य एत ऐ स्यात्। एधै। एधावहै। एधामहै॥ आटश्च। ऐधत। ऐधेताम्। ऐधन्त। ऐधथाः। ऐधेथाम्। ऐधध्वम्। ऐधे। ऐधावहि। ऐधामहि॥
हिन्दी अनुवाद
लोट् के उत्तम (पुरुष) के ए को ऐ होता है। एधै, एधावहै, एधामहै। 'आटश्च' (से वृद्धि) — ऐधत, ऐधेताम्, ऐधन्त, ऐधथाः, ऐधेथाम्, ऐधध्वम्, ऐधे, ऐधावहि, ऐधामहि।
सरल व्याख्या
लोट् उत्तम: एधै। लङ् (आट् + एध → ऐध): ऐधत, ऐधेताम्, ऐधन्त।
५१८ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.102
लिङस्सीयुट् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
सलोपः। एधेत। एधेयाताम्॥
हिन्दी अनुवाद
लिङ् को सीयुट् आगम होता है; स-लोप — एधेत, एधेयाताम्।
सरल व्याख्या
आत्मनेपद विधिलिङ्: एध + ईय् + त → एधेत।
५१९ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.105
झस्य रन् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लिङः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लिङो झस्य रन् स्यात्। एधेरन्। एधेथाः। एधेयाथाम्। एधेध्वम्॥
हिन्दी अनुवाद
लिङ् के झ को रन् होता है। एधेरन्, एधेथाः, एधेयाथाम्, एधेध्वम्।
सरल व्याख्या
विधिलिङ् बहुवचन: एधेरन्।
५२० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.106
इटोऽत् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लिङः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लिङादेशस्य इटोऽत्स्यात्। एधेय। एधेवहि। एधेमहि॥
हिन्दी अनुवाद
लिङ् के स्थान पर हुए इट् को अत् होता है। एधेय, एधेवहि, एधेमहि।
सरल व्याख्या
विधिलिङ् उत्तम पुरुष: एधेय।
५२१ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.4.107
सुट् तिथोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लिङः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, लस्य
वृत्तिः
लिङस्तथोः सुट्। यलोपः। आर्धधातुकत्वात्सलोपो न। एधिषीष्ट। एधिषीयास्ताम्। एधिषीरन्। एधिषीष्ठाः। एधिषीयास्थाम्। एधिषीध्वम्। एधिषीय। एधिषीवहि। एधिषीमहि। ऐधिष्ट। ऐधिषाताम्॥
हिन्दी अनुवाद
लिङ् के त और थ को सुट् आगम होता है; य-लोप; आर्धधातुक होने से स-लोप नहीं। एधिषीष्ट, एधिषीयास्ताम्, एधिषीरन्, एधिषीष्ठाः, एधिषीयास्थाम्, एधिषीध्वम्, एधिषीय, एधिषीवहि, एधिषीमहि। ऐधिष्ट, ऐधिषाताम्।
सरल व्याख्या
आत्मनेपद आशीर्लिङ्: एधिषीष्ट। लुङ्: ऐधिष्ट।
५२२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.5
आत्मनेपदेष्वनतः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययादीनाम्, झः, अत्, अङ्गस्य
वृत्तिः
अनकारात्परस्यात्मनेपदेषु झस्य अदित्यादेशः स्यात्। ऐधिषत। ऐधिष्ठाः। ऐधिषाथाम्। ऐधिढ्वम्। ऐधिषि। ऐधिष्वहि। ऐधिष्महि। ऐधिष्यत। ऐधिष्येताम्। ऐधिष्यन्त। ऐधिष्यथाः। ऐधिष्येथाम्। ऐधिष्यध्वम्। ऐधिष्ये। ऐधिष्यावहि। ऐधिष्यामहि॥ 〔धातु 2: कमु — कान्तौ〕 ॥
हिन्दी अनुवाद
अकार-भिन्न से परे आत्मनेपद में झ को 'अत्' आदेश होता है। ऐधिषत, ऐधिष्ठाः, ऐधिषाथाम्, ऐधिढ्वम्, ऐधिषि, ऐधिष्वहि, ऐधिष्महि। ऐधिष्यत, ऐधिष्येताम्, ऐधिष्यन्त... ऐधिष्यामहि। (धातु 2) कमु — कामना।
सरल व्याख्या
लुङ् बहुवचन: ऐधिषत (अन्त नहीं, अत)। एध् के सब लकार पूर्ण।
५२३ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.30
कमेर्णिङ् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
स्वार्थे। ङित्त्वात्तङ्। कामयते॥
हिन्दी अनुवाद
कम् से स्वार्थ में णिङ् होता है; ङित् होने से तङ् (आत्मनेपद) — कामयते।
सरल व्याख्या
कम् + णिङ् (इ) → कामि → कामयते (चाहता है)।
५२४ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.55
अयामन्ताल्वाय्येत्न्विष्णुषु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: नलोपः, णेः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, आर्धधातुके
वृत्तिः
आम् अन्त आलु आय्य इत्नु इष्णु एषु णेरयादेशः स्यात्। कामयाञ्चक्रे। आयादय इति णिङ् वा। चकमे। चकमाते। चकमिरे। चकमिषे। चकमाथे। चकमिध्वे। चकमे। चकमिवहे। चकमिमहे। कामयिता। कामयितासे। कमिता। कामयिष्यते, कमिष्यते। कामयताम्। अकामयत। कामयेत। कामयिषीष्ट॥
हिन्दी अनुवाद
आम्, अन्त, आलु, आय्य, इत्नु, इष्णु — इनके परे रहते णि को अय् आदेश होता है। कामयाञ्चक्रे। 'आयादयः' से णिङ् विकल्प से — चकमे, चकमाते, चकमिरे, चकमिषे, चकमाथे, चकमिध्वे, चकमे, चकमिवहे, चकमिमहे। कामयिता, कामयितासे, कमिता; कामयिष्यते, कमिष्यते; कामयताम्, अकामयत, कामयेत, कामयिषीष्ट।
सरल व्याख्या
आर्धधातुक में णिङ् वैकल्पिक, अतः कम् के दो प्रकार के रूप: कामयाञ्चक्रे / चकमे, कामयिता / कमिता।
५२५ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.79
विभाषेटः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सः, इणः, धः, अङ्गात्, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्, अपदान्तस्य मूर्धन्यः, इण्कोः
वृत्तिः
इणः परो य इट् ततः परेषां षीध्वंलुङ्लिटां धस्य वा ढः। कामयिषीढ्वम्, कामयिषीध्वम्। कमिषीष्ट। कमिषीध्वम्॥
हिन्दी अनुवाद
इण् से परे जो इट्, उससे परे षीध्वम्, लुङ्, लिट् के ध को विकल्प से ढ होता है। कामयिषीढ्वम्, कामयिषीध्वम्; कमिषीष्ट, कमिषीध्वम्।
सरल व्याख्या
इट् के बाद ध्वम् → ढ्वम् विकल्प से।
५२६ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.48
णिश्रिद्रुस्रुभ्यः कर्तरि चङ् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लुङि, च्लेः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
ण्यन्तात् श्र्यादिभ्यश्च च्लेश्चङ् स्यात् कर्त्रर्थे लुङि परे। अकामि अ त इति स्थिते -
हिन्दी अनुवाद
णिजन्त और श्रि, द्रु, स्रु से (परे) च्लि को कर्ता-अर्थक लुङ् परे रहते चङ् होता है। 'अकामि अ त' ऐसी स्थिति में (आगे)।
सरल व्याख्या
णिजन्त धातुओं का लुङ् 'चङ्' (अ) से और द्वित्व सहित बनता है: अचीकमत, अपीपठत्।
५२७ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.51
णेरनिटि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: नलोपः, लोपः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, आर्धधातुके
वृत्तिः
अनिडादावार्धधातुके परे णेर्लोपः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
अनिडादि आर्धधातुक परे रहते णि का लोप होता है।
सरल व्याख्या
कामि + अ → काम् + अ।
५२८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.1
णौ चङ्युपधाया ह्रस्वः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
चङ्परे णौ यदङ्गं तस्योपधाया ह्रस्वः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
चङ्-पर णि परे रहते जो अङ्ग, उसकी उपधा को ह्रस्व होता है।
सरल व्याख्या
काम् → कम्।
५२९ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.11
चङि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अजादेः, द्वितीयस्य, धातोः, अनभ्यासस्य, एकाचो द्वे प्रथमस्य
वृत्तिः
चङि परे अनभ्यासस्य धात्ववयवस्यैकाचः प्रथमस्य द्वे स्तोऽजादेर्द्वितीयस्य॥
हिन्दी अनुवाद
चङ् परे रहते अनभ्यास धातु-अवयव के प्रथम एकाच् को द्वित्व होता है, अजादि के द्वितीय को।
सरल व्याख्या
कम् → कम् कम् → (अभ्यास) चकम्।
५३० अतिदेशसूत्रम् · सन्वदतिदेशः अष्टा० 7.4.93
सन्वल्लघुनि चङ्परेऽनग्लोपे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
चङ्परे णौ यदङ्गं तस्य योऽभ्यासो लघुपरः, तस्य सनीव कार्यं स्याण्णावग्लोपेऽसति॥
हिन्दी अनुवाद
चङ्-पर णि परे रहते जो अङ्ग, उसका जो अभ्यास लघु-पर हो, उसे सन् के समान कार्य होता है, यदि णि में अक् का लोप न हुआ हो।
सरल व्याख्या
अभ्यास के बाद लघु वर्ण हो तो सन्-जैसे परिवर्तन (अ → इ, दीर्घ) होते हैं।
५३१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.79
सन्यतः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, इत्, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
अभ्यासस्यात इत् स्यात् सनि॥
हिन्दी अनुवाद
सन् परे रहते अभ्यास के अ को इ होता है।
सरल व्याख्या
चकम् → चिकम्।
५३२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.94
दीर्घो लघोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, लघुनि, चङ्परे, अनग्लोपे, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
लघोरभ्यासस्य दीर्घः स्यात् सन्वद्भावविषये। अचीकमत, णिङ्भावपक्षे - «कमेश्च्लेश्चङ् वाच्यः» (वार्त्तिकम्)। अचकमत। अकामयिष्यत, अकमिष्यत॥ 〔धातु 3: अय — गतौ〕 ॥ अयते॥
हिन्दी अनुवाद
सन्वद्भाव के विषय में लघु अभ्यास को दीर्घ होता है। अचीकमत। णिङ् न होने के पक्ष में — (वार्तिक) कम् से च्लि को चङ् कहना चाहिए — अचकमत। अकामयिष्यत, अकमिष्यत। (धातु 3) अय् — जाना। अयते।
सरल व्याख्या
अ + चीकम् + अ + त → अचीकमत (उसने चाहा)। णिजन्त लुङ् की यही विशिष्ट रचना है: अपीपठत्, अजीजनत्।
५३३ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.19
उपसर्गस्यायतौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: रः, लः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
अयतिपरस्योपसर्गस्य यो रेफस्तस्य लत्वं स्यात्। प्लायते। पलायते॥
हिन्दी अनुवाद
अय् (धातु) जिसके परे हो ऐसे उपसर्ग के रेफ को लत्व होता है। प्लायते, पलायते।
सरल व्याख्या
परा + अयते → पलायते (भागता है), प्र + अयते → प्लायते।
५३४ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.37
दयायासश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लिटि, आम्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
दय् अय् आस् एभ्य आम् स्याल्लिटि। अयाञ्चक्रे। अयिता। अयिष्यते। अयताम्। आयत। अयेत। अयिषीष्ट। विभाषेटः। अयिषीढ्वम्, अयिषीध्वम्। आयिष्ट। आयिढ्वम्, आयिध्वम्। आयिष्यत॥ 〔धातु 4: द्युत — दीप्तौ〕 ॥ द्योतते॥
हिन्दी अनुवाद
दय्, अय्, आस् — इनसे लिट् में आम् होता है। अयाञ्चक्रे, अयिता, अयिष्यते, अयताम्, आयत, अयेत, अयिषीष्ट; 'विभाषेटः' — अयिषीढ्वम्/अयिषीध्वम्; आयिष्ट, आयिढ्वम्/आयिध्वम्, आयिष्यत। (धातु 4) द्युत् — चमकना। द्योतते।
सरल व्याख्या
अय् का लिट्: अयाञ्चक्रे।
५३५ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.67
द्युतिस्वाप्योः सम्प्रसारणम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
अनयोरभ्यासस्य सम्प्रसारणं स्यात्। दिद्युते॥
हिन्दी अनुवाद
द्युत् और स्वाप् (णिजन्त स्वप्) के अभ्यास को सम्प्रसारण होता है। दिद्युते।
सरल व्याख्या
द्युत् के लिट् में अभ्यास द्यु → दि: दिद्युते।
५३६ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.91
द्युद्भ्यो लुङि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कर्तरि, कर्तरि, परस्मैपदम्, वा
वृत्तिः
द्युतादिभ्यो लुङः परस्मैपदं वा स्यात् । पुषादीत्यङ् । अद्युतत्, अद्योतिष्ट । अद्योतिष्यत ॥ एवं ॥ 〔धातु 5: श्विता — वर्णे〕 ॥ 〔धातु 6: ञिमिदा — स्नेहने〕 ॥ 〔धातु 7: ञिष्विदा — स्नेहनमोचनयोः〕 ॥ मोहनयोरित्येके ॥ ञिक्ष्विदा चेत्येके ॥ 〔धातु 8: रुच — दीप्तावभिप्रीतौ च〕॥ 〔धातु 9: घुट — परिवर्तने〕॥ 〔धातु 10: शुभ — दीप्तौ〕 ॥ 〔धातु 11: क्षुभ — संचलने〕॥ 〔धातु 12-13: णभ तुभ — हिंसायाम्〕 ॥ 〔धातु 14-15-16: स्रंसु भ्रंसु ध्वंसु — अवस्रंसने〕 ॥ ध्वंसु गतौ च ॥ 〔धातु 17: स्रम्भु — विश्वासे〕॥ 〔धातु 18: वृतु — वर्तने〕॥ तर्तते । ववृते । वर्तिता ॥
हिन्दी अनुवाद
द्युत् आदि से लुङ् में विकल्प से परस्मैपद होता है; 'पुषादि' से अङ् — अद्युतत्, अद्योतिष्ट; अद्योतिष्यत। इसी प्रकार — (धातु 5) श्विता — वर्ण; (6) ञिमिदा — स्नेह; (7) ञिष्विदा — स्नेहन और मोचन (कुछ के मत में मोहन; कुछ ञिक्ष्विदा भी); (8) रुच् — दीप्ति और प्रीति; (9) घुट् — परिवर्तन; (10) शुभ् — दीप्ति; (11) क्षुभ् — संचलन; (12-13) णभ्, तुभ् — हिंसा; (14-16) स्रंसु, भ्रंसु, ध्वंसु — गिरना (ध्वंसु गति में भी); (17) स्रम्भु — विश्वास; (18) वृतु — वर्तन (होना)। वर्तते, ववृते, वर्तिता।
सरल व्याख्या
द्युतादि (रुच्, शुभ्, वृत् आदि) आत्मनेपदी हैं, पर लुङ् में परस्मैपद भी: अरुचत् / अरोचिष्ट।
५३७ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.92
वृद्भ्यः स्यसनोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कर्तरि, कर्तरि, परस्मैपदम्, वा
वृत्तिः
वृतादिभ्यः पञ्चभ्यो वा परस्मैपदं स्यात्स्ये सनि च ॥
हिन्दी अनुवाद
वृत् आदि पाँच से स्य और सन् में विकल्प से परस्मैपद होता है।
सरल व्याख्या
वृत् का लृट्: वर्त्स्यति (परस्मैपद) / वर्तिष्यते (आत्मनेपद)।
५३८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.59
न वृद्भ्यश्चतुर्भ्यः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: वलादेः, इट्, आर्धधातुकस्य, से, परस्मैपदेषु, अङ्गस्य
वृत्तिः
वृतुवृधुशृधुस्यन्दूभ्यः सकारादेरार्धधातुकस्येण् न स्यात् तङानयोरभावे। वर्त्स्यति, वर्तिष्यते। वर्तताम्। अवर्तत। वर्तेत। वर्तिषीष्ट। अवर्तिष्ट। अवर्त्स्यत्, अवर्तिष्यत॥ 〔धातु 19: दद — दाने〕॥ ददते॥
हिन्दी अनुवाद
वृत्, वृध्, शृध्, स्यन्द् — इनसे (परे) सकारादि आर्धधातुक को, तङ् और आन के अभाव में, इट् नहीं होता। वर्त्स्यति, वर्तिष्यते; वर्तताम्, अवर्तत, वर्तेत, वर्तिषीष्ट, अवर्तिष्ट; अवर्त्स्यत्, अवर्तिष्यत। (धातु 19) दद् — देना। ददते।
सरल व्याख्या
परस्मैपद रूप में इ नहीं (वर्त्स्यति), आत्मनेपद में इ (वर्तिष्यते)।
५३९ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.126
न शसददवादिगुणानाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्ङिति, अभ्यासलोपः, अतः, थलि, सेटि, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
शसेर्ददेर्वकारादीनां गुणशब्देन विहितो योऽकारस्तस्य एत्त्वाभ्यासलोपौ न। दददे। दददाते। दददिरे। ददिता। ददिष्यते। ददताम्। अददत। ददेत। ददिषीष्ट। अददिष्ट। अददिष्यत॥ 〔धातु 20: त्रपूष् — लज्जायाम्〕॥ त्रपते॥
हिन्दी अनुवाद
शस्, दद्, वकारादि धातुओं और गुण शब्द से विहित अकार को एत्व और अभ्यास-लोप नहीं होते। दददे, दददाते, दददिरे; ददिता, ददिष्यते, ददताम्, अददत, ददेत, ददिषीष्ट, अददिष्ट, अददिष्यत। (धातु 20) त्रपूष् — लज्जा। त्रपते।
सरल व्याख्या
दद् के लिट् में 'देदे' नहीं, 'दददे'।
५४० विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.122
तॄफलभजत्रपश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्ङिति, अभ्यासलोपः, अतः, थलि, सेटि, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
एषामत एत्त्वमभ्यासलोपश्च स्यात् किति लिटि सेटि थलि च। त्रेपे। त्रपिता, त्रप्ता। त्रपिष्यते, त्रप्स्यते। त्रपताम्। अत्रपत। त्रपेत। त्रपिषीष्ट, त्रप्सीष्ट। अत्रपिष्ट, अत्रप्त। अत्रपिष्यत, अत्रप्स्यत ॥ इत्यात्मनेपदिनः॥
हिन्दी अनुवाद
तॄ, फल्, भज्, त्रप् — इनके अ को एत्व और अभ्यास-लोप होते हैं, कित् लिट् और सेट् थल् परे रहते। त्रेपे; त्रपिता, त्रप्ता; त्रपिष्यते, त्रप्स्यते; त्रपताम्, अत्रपत, त्रपेत, त्रपिषीष्ट/त्रप्सीष्ट, अत्रपिष्ट/अत्रप्त, अत्रपिष्यत/अत्रप्स्यत। (आत्मनेपदी धातुएँ समाप्त।)
सरल व्याख्या
त्रप् (लजाना) → त्रेपे; भज् → भेजे (संयोग होने पर भी)। (भ्वादि आत्मनेपदी पूर्ण।)
५४१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.28
रिङ् शयग्लिङ्क्षु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: यि, अकृत्सार्वधातुकयोः, ऋतः, अङ्गस्य
वृत्तिः
॥ अथ उभयपदिनः ॥ 〔धातु 1: श्रिञ् — सेवायाम्〕 ॥ श्रयति, श्रयते। शिश्राय, शिश्रिये। श्रयितासि, श्रयितासे। श्रयिष्यति, श्रयिष्यते। श्रयतु, श्रयताम्। अश्रयत्, अश्रयत। श्रयेत्, श्रयेत। श्रीयात्, श्रयिषीष्ट। चङ्। अशिश्रियत्, अशिश्रियत। अश्रयिष्यत्, अश्रयिष्यत॥ 〔धातु 2: भृञ् — भरणे〕 ॥ भरति, भरते। बभार। बभ्रतुः। बभ्रुः। बभर्थ। बभृव। बभृम। बभ्रे। बभृषे। भर्तासि, भर्तासे। भरिष्यति, भरिष्यते। भरतु, भरताम्। अभरत्, अभरत। भरेत्, भरेत॥ «रिङ् शयग्लिङ्क्षु» । शे यकि यादावार्धधातुके लिङि च ऋतो रिङ् आदेशः स्यात्। रीङि प्रकृते रिङ्विधानसामर्थ्याद्दीर्घो न। भ्रियात्॥
हिन्दी अनुवाद
(अब उभयपदी धातुएँ। धातु 1: श्रिञ् — सेवा।) श्रयति/श्रयते, शिश्राय/शिश्रिये, श्रयितासि/श्रयितासे, श्रयिष्यति/श्रयिष्यते, श्रयतु/श्रयताम्, अश्रयत्/अश्रयत, श्रयेत्/श्रयेत, श्रीयात्/श्रयिषीष्ट; चङ् — अशिश्रियत्/अशिश्रियत; अश्रयिष्यत्/अश्रयिष्यत। (धातु 2) भृञ् — भरण। भरति/भरते, बभार, बभ्रतुः, बभ्रुः, बभर्थ, बभृव, बभृम, बभ्रे, बभृषे, भर्तासि/भर्तासे, भरिष्यति/भरिष्यते, भरतु/भरताम्, अभरत्/अभरत, भरेत्/भरेत। (सूत्र) श, यक् और यकारादि आर्धधातुक लिङ् परे रहते ऋ को रिङ् आदेश होता है; रीङ् प्रसक्त होने पर भी रिङ् के विधान के सामर्थ्य से दीर्घ नहीं — भ्रियात्।
सरल व्याख्या
उभयपदी धातुओं के दोनों पदों में रूप: भरति / भरते। आशीर्लिङ् में ऋ → रि: भृ → भ्रियात्, कृ → क्रियात्, हृ → ह्रियात्।
५४२ अतिदेशसूत्रम् · कित्त्वातिदेशः अष्टा० 1.2.12
उश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कित्, झल्, लिङ्-सिचौ, आत्मनेपदेषु
वृत्तिः
ऋवर्णात्परौ झलादी लिङ्सिचौ कितौ स्तस्तङि। भृषीष्ट। भृषीयास्ताम्। अभार्षीत्॥
हिन्दी अनुवाद
ऋवर्ण से परे झलादि लिङ् और सिच् तङ् (आत्मनेपद) में कित् होते हैं। भृषीष्ट, भृषीयास्ताम्; अभार्षीत्।
सरल व्याख्या
आत्मनेपद आशीर्लिङ् में गुण नहीं: भृषीष्ट। परस्मैपद लुङ् में वृद्धि: अभार्षीत्।
५४३ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.27
ह्रस्वादङ्गात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: लोपः, सस्य, झलि, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
सिचो लोपो झलि। अभृत। अभृषाताम्। अभरिष्यत्, अभरिष्यत॥ 〔धातु 3: हृञ् — हरणे〕 ॥ हरति, हरते। जहार। जहर्थ। जह्रिव। जह्रिम। जह्रे। जह्रिषे। हर्तासि, हर्तासे। हरिष्यति, हरिष्यते। हरतु, हरताम्। अहरत्, अहरत। हरेत्, हरेत। ह्रियात्, हृषीष्ट। हृषीयास्ताम्। अहार्षीत्, अहृत। अहरिष्यत्, अहरिष्यत॥ 〔धातु 4: धृञ् — धारणे〕 ॥ धरति, धरते॥ 〔धातु 5: णीञ् — प्रापणे〕॥ नयति, नयते॥ 〔धातु 6: डुपचष् — पाके〕 ॥ पचति, पचते। पपाच। पेचिथ, पपक्थ। पेचे। पक्तासि, पक्तासे॥ 〔धातु 7: भज — सेवायाम्〕 ॥ भजति, भजते। बभाज, भेजे। भक्तासि, भक्तासे। भक्ष्यति, भक्ष्यते। अभाक्षीत्, अभक्त। अभक्षाताम्॥ 〔धातु 8: यज — देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु〕 ॥ यजति, यजते॥
हिन्दी अनुवाद
ह्रस्वान्त अङ्ग से परे सिच् का झल् परे रहते लोप होता है। अभृत, अभृषाताम्; अभरिष्यत्/अभरिष्यत। (धातु 3) हृञ् — हरण। हरति/हरते, जहार, जहर्थ, जह्रिव, जह्रिम, जह्रे, जह्रिषे, हर्तासि/हर्तासे, हरिष्यति/हरिष्यते, हरतु/हरताम्, अहरत्/अहरत, हरेत्/हरेत, ह्रियात्/हृषीष्ट, हृषीयास्ताम्, अहार्षीत्/अहृत, अहरिष्यत्/अहरिष्यत। (धातु 4) धृञ् — धारण: धरति/धरते। (5) णीञ् — ले जाना: नयति/नयते। (6) डुपचष् — पकाना: पचति/पचते, पपाच, पेचिथ/पपक्थ, पेचे, पक्तासि/पक्तासे। (7) भज् — सेवा: भजति/भजते, बभाज, भेजे, भक्तासि/भक्तासे, भक्ष्यति/भक्ष्यते, अभाक्षीत्, अभक्त, अभक्षाताम्। (8) यज् — देवपूजा, संगतिकरण, दान: यजति/यजते।
सरल व्याख्या
आत्मनेपद लुङ् में स् हटता है: अभृत, अहृत, अकृत। साथ में हृ, धृ, नी, पच्, भज्, यज् जैसी प्रमुख उभयपदी धातुओं के रूप।
५४४ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.17
लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सम्प्रसारणम्, वचि-स्वपि-यजादीनाम्, ग्रहि-ज्या-वयि-व्यधि-वष्टि-विचति-वृश्चति-पृच्छति-भृज्जतीनाम्
वृत्तिः
वच्यादीनां ग्रह्यादीनां चाभ्यासस्य सम्प्रसारणं लिटि। इयाज॥
हिन्दी अनुवाद
लिट् में वच् आदि और ग्रह् आदि दोनों प्रकार की धातुओं के अभ्यास को सम्प्रसारण होता है। इयाज।
सरल व्याख्या
यज् के लिट् में अभ्यास य → इ: इयाज (यज्ञ किया था)। वच् → उवाच।
५४५ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.1.15
वचिस्वपियजादीनां किति ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: सम्प्रसारणम्
वृत्तिः
वचिस्वप्योर्यजादीनां च संप्रसारणं स्यात् किति। ईजतुः। ईजुः। इयजिथ, इयष्ठ। ईजे। यष्टा॥
हिन्दी अनुवाद
वच्, स्वप् और यज् आदि को कित् परे रहते सम्प्रसारण होता है। ईजतुः, ईजुः, इयजिथ/इयष्ठ, ईजे। यष्टा।
सरल व्याख्या
यज् + अतुः → इज् → ईजतुः; वच् → ऊचतुः; स्वप् → सुषुपतुः।
५४६ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.41
षढोः कः सि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
यक्ष्यति, यक्ष्यते। इज्यात्, यक्षीष्ट। अयाक्षीत्, अयष्ट॥ 〔धातु 9: वह — प्रापणे〕 ॥ वहति, वहते। उवाह। ऊहतुः। ऊहुः। उवहिथ॥
हिन्दी अनुवाद
स परे रहते ष और ढ को क होता है। यक्ष्यति/यक्ष्यते, इज्यात्/यक्षीष्ट, अयाक्षीत्/अयष्ट। (धातु 9) वह् — ले जाना। वहति/वहते, उवाह, ऊहतुः, ऊहुः, उवहिथ।
सरल व्याख्या
यज् → यष् (षत्व) + स्यति → यक्ष्यति (ष् → क्, फिर षत्व)। लिखना: यक्ष्यति (यज्ञ करेगा)।
५४७ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.40
झषस्तथोर्धोऽधः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
झषः परस्योस्तथोर्धः स्यान्न तु दधातेः॥
हिन्दी अनुवाद
झष् से परे त और थ को ध होता है, पर धा (दधाति) से नहीं।
सरल व्याख्या
वह्/दुह्/लभ् आदि के बाद त → ध: लभ् + त → लब्ध, दुह् + त → दुग्ध (घ् के बाद)।
५४८ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.13
ढो ढे लोपः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
हिन्दी अनुवाद
(वृत्ति नहीं) ढ परे रहते ढ का लोप होता है।
सरल व्याख्या
दो ढ् आएँ तो पहला ढ् हट जाता है: वढ् + ढा → व + ढा।
५४९ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.3.112
सहिवहोरोदवर्णस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ढ्रलोपे, दीर्घः, उत्तरपदे
वृत्तिः
अनयोरवर्णस्य ओत्स्याड्ढलोपे । अवोढ । ऊहे । वोढा । वक्ष्यति । अवाक्षीत् । अवोढाम् । अवाक्षुः । अवाक्षीः । अवोढम् । अवोढ । अवाक्षम् । अवाक्ष्व । अवाक्ष्म । अवोढ । अवक्षाताम् । अवक्षत । अवोढाः । अवक्षाथाम् । अवोढ्वम् । अवक्षि । अवक्ष्वहि । अवक्ष्महि ॥
हिन्दी अनुवाद
ढ-लोप होने पर सह् और वह् के अवर्ण को ओ होता है। अवोढ, ऊहे, वोढा, वक्ष्यति, अवाक्षीत्, अवोढाम्, अवाक्षुः... अवोढ, अवक्षाताम्, अवक्षत... अवक्ष्महि।
सरल व्याख्या
वह् + ता → वढ् + ढा → (ढ्-लोप, अ → ओ) वोढा (ढोएगा)। सह् → सोढा।

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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