(तनादिगण। धातु 1: तनु — फैलाना।) 'तनादिकृञ्भ्य उः' से — तनोति/तनुते, ततान/तेने, तनितासि/तनितासे, तनिष्यति/तनिष्यते, तनोतु, तनुताम्, अतनोत्/अतनुत, तनुयात्/तन्वीत, तन्यात्/तनिषीष्ट, अतानीत्/अतनीत्। (सूत्र) तनादि से सिच् का त और थास् परे रहते विकल्प से लुक् होता है — अतत/अतनिष्ट, अतथाः/अतनिष्ठाः, अतनिष्यत्/अतनिष्यत। (2) षणु — दान: सनोति, सनुते।
सरल व्याख्या
तनादिगण में 'उ' जुड़ता है: तन् → तनोति (फैलाता है), कृ → करोति। आत्मनेपद लुङ् के दो रूप: अतत / अतनिष्ट।
सन् और झलादि कित्-ङित् परे रहते इन (जन्, सन्, खन्) को आकार अन्तादेश होता है। असात/असनिष्ट। (धातु 3) क्षणु — हिंसा: क्षणोति/क्षणुते; 'ह्म्यन्त' से वृद्धि नहीं — अक्षणीत्, अक्षत/अक्षणिष्ट, अक्षथाः/अक्षणिष्ठाः। (4) क्षिणु — (हिंसा) भी: प्रत्यय न होने पर लघूपध को विकल्प से गुण — क्षेणोति/क्षिणोति, क्षेणिता, अक्षेणीत्, अक्षित/अक्षेणिष्ट। (5) तृणु — खाना: तृणोति/तर्णोति, तृणुते/तर्णुते। (6) डुकृञ् — करना: करोति। 'अत उत् सार्वधातुके' — उ-प्रत्ययान्त कृञ् के अ को सार्वधातुक कित्-ङित् परे रहते उ होता है — कुरुतः।
म और व परे रहते करोति के प्रत्यय-उकार का नित्य लोप होता है। कुर्वः, कुर्मः। कुरुते; चकार/चक्रे; कर्तासि/कर्तासे; करिष्यति/करिष्यते; करोतु, कुरुताम्; अकरोत्, अकुरुत।
सरल व्याख्या
कृ के लट् उत्तम पुरुष: करोमि, कुर्वः, कुर्मः (उ अवश्य हटता है)। लिट् चकार, लृट् करिष्यति, लङ् अकरोत्।
समवाय (संघात) अर्थ में भी सम्-परि पूर्वक कृ को सुट् होता है — भूषण और संघात अर्थ में। संस्करोति — अर्थात् अलंकृत करता है। संस्कुर्वन्ति — अर्थात् इकट्ठे होते हैं। सम् पूर्वक को कहीं भूषण से भिन्न में भी सुट् — 'संस्कृतं भक्षाः' इस ज्ञापक से।
सरल व्याख्या
संस्करोति (सँवारता है), परिष्करोति (परिष्कार करता है)। 'संस्कृत' (परिष्कृत भाषा/भोजन) इसी से।
उप से परे कृञ् को प्रतियत्न, वैकृत, वाक्याध्याहार इन अर्थों में, और 'च' से पूर्वोक्त दोनों अर्थों में भी सुट् होता है। प्रतियत्न = गुण का आधान; वैकृत = विकार; वाक्याध्याहार = अपेक्षित एक भाग की पूर्ति। उपस्कृता कन्या, उपस्कृताः ब्राह्मणाः, एधो दकस्योपस्कुरुते, उपस्कृतं भुङ्क्ते, उपस्कृतं ब्रूते। (धातु 7) वनु — माँगना: वनुते। (8) मनु — जानना: मनुते, मेने, मनिता, मनिष्यते, मनुताम्, अमनुत, मन्वीत, मनिषीष्ट, अमत/अमनिष्ट, अमनिष्यत। (तनादिगण समाप्त।)
सरल व्याख्या
उपस्कृत = सँवारा/विकृत/पूरा किया हुआ; 'उपस्कर' (सामग्री) इसी से। (तनादि पूर्ण।)