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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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२२. ण्यन्तप्रक्रिया

णिजन्त (प्रेरणार्थक) · सूत्र 694–700 (7)
६९४ संज्ञासूत्रम् · कारकसंज्ञा अष्टा० 1.4.54
स्वतन्त्रः कर्ता ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा, कारके
वृत्तिः
क्रियायां स्वातन्त्र्येण विवक्षितोऽर्थः कर्ता स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
क्रिया में स्वतन्त्र रूप से विवक्षित (कहा गया) अर्थ 'कर्ता' होता है।
सरल व्याख्या
जो क्रिया को स्वतन्त्र होकर करे वह कर्ता है — 'रामः पठति' में राम।
६९५ संज्ञासूत्रम् · कारकसंज्ञा अष्टा० 1.4.55
तत्प्रयोजको हेतुश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कर्ता, आकडारात् एका संज्ञा, कारके
वृत्तिः
कर्तुः प्रयोजको हेतुसंज्ञः कर्तृसंज्ञश्च स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
कर्ता का प्रयोजक (प्रेरक) 'हेतु' संज्ञक और 'कर्ता' संज्ञक भी होता है।
सरल व्याख्या
जो किसी दूसरे से काम कराए (प्रेरक), वह 'हेतु' भी है और 'कर्ता' भी — 'गुरुः शिष्यं पाठयति' में गुरु।
६९६ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.26
हेतुमति च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: णिच्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
प्रयोजकव्यापारे प्रेषणादौ वाच्ये धातोर्णिच् स्यात्। भवन्तं प्रेरयति भावयति॥
हिन्दी अनुवाद
प्रयोजक के व्यापार — प्रेषण (भेजना/प्रेरित करना) आदि — के वाच्य होने पर धातु से णिच् होता है। भवन्तं प्रेरयति = भावयति।
सरल व्याख्या
यह प्रेरणार्थक (णिजन्त) क्रिया है: पठति → पाठयति (पढ़वाता है), भवति → भावयति (होने देता है/भावना करता है), गच्छति → गमयति।
६९७ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.80
ओः पुयण्ज्यपरे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अभ्यासस्य, इत्, सनि, अङ्गस्य, अभ्यासस्य
वृत्तिः
सनि परे यदङ्गं तदवयवाभ्यासोकारस्य इत्स्यात् पवर्गयण्जकारेष्ववर्णपरेषु परतः॥ अबीभवत्॥ 〔धातु 1: ष्ठा — गतिनिवृत्तौ〕 ॥
हिन्दी अनुवाद
सन् परे रहते जो अङ्ग, उसके अवयव अभ्यास के उकार को इ होता है, पवर्ग, यण् और जकार — जिनके बाद अवर्ण हो — परे रहते। अबीभवत्। (धातु 1) ष्ठा — रुकना।
सरल व्याख्या
भू (णिजन्त) का लुङ्: अबीभवत् (बु → बी)।
६९८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.3.36
अर्तिह्रीव्लीरीक्नूयीक्ष्माय्यातां पुङ्णौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
स्थापयति॥
हिन्दी अनुवाद
ऋ, ह्री, व्ली, री, क्नूयी, क्ष्मायी और आकारान्त (धातुओं) को णि परे रहते पुक् (प्) आगम होता है। स्थापयति।
सरल व्याख्या
आकारान्त धातुओं के णिजन्त में प् जुड़ता है: स्था → स्थापयति, दा → दापयति, ज्ञा → ज्ञापयति।
६९९ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.5
तिष्ठतेरित् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: णौ, चङि, अङ्गस्य
वृत्तिः
उपधाया इदादेशः स्याच्चङ्परे णौ। अतिष्ठिपत्॥ 〔धातु 2: घट — चेष्टायाम्〕 ॥
हिन्दी अनुवाद
चङ्-पर णि परे रहते स्था की उपधा को इत् आदेश होता है। अतिष्ठिपत्।
सरल व्याख्या
स्थापयति का लुङ्: अतिष्ठिपत्।
७०० विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.92
मितां ह्रस्वः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अचि, उपधायाः, णौ, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
घटादीनां ज्ञपादीनां चोपधाया ह्रस्वः स्याण्णौ । घटयति ॥ 〔धातु 3: ज्ञप — ज्ञाने ज्ञापने च〕 ॥ ज्ञपयति । अजिज्ञपत् ॥ इति ण्यन्तप्रक्रिया ॥
हिन्दी अनुवाद
णि परे रहते घटादि और ज्ञपादि (मित् धातुओं) की उपधा को ह्रस्व होता है। घटयति। (धातु 3) ज्ञप् — जानना और जनाना: ज्ञपयति, अजिज्ञपत्। (णिजन्त प्रक्रिया समाप्त।)
सरल व्याख्या
घट् → घटयति (घाटयति नहीं)। (णिजन्त पूर्ण।)

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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