क्यच् और क्यङ् परे रहते नान्त ही पद होता है, अन्य नहीं। न-लोप — राजीयति। नान्त ही क्यों? वाच्यति। 'हलि च' — गीर्यति, पूर्यति। धातु का ही (हो तब); नहीं तो — दिवम् इच्छति = दिव्यति।
हल् से परे क्यच् और क्यङ् का आर्धधातुक में विकल्प से लोप होता है; 'आदेः परस्य'; 'अतो लोपः'; उसके स्थानिवत् होने से लघूपध-गुण नहीं — समिधिता, समिध्यिता।
उपमान-रूप कर्म-सुबन्त से आचार (व्यवहार) अर्थ में क्यच् होता है। पुत्रम् इव आचरति = पुत्रीयति छात्रम् (छात्र के साथ पुत्र जैसा व्यवहार करता है); विष्णूयति द्विजम्। (वार्तिक) सब प्रातिपदिकों से विकल्प से क्विप् कहना चाहिए। 'अतो गुणे' — कृष्ण इव आचरति = कृष्णति; स्व इव आचरति = स्वति; सस्वौ।
सरल व्याख्या
'के समान व्यवहार करना' अर्थ में भी नामधातु: पुत्रीयति (पुत्रवत् मानता है), कृष्णति (कृष्ण जैसा आचरण करता है)।
शब्द, वैर, कलह, अभ्र, कण्व, मेघ — इन कर्मों से 'करता है' अर्थ में क्यङ् होता है। (गणसूत्र) शब्दं करोति = शब्दायते। (गणसूत्र) 'तत्करोति तदाचष्टे' (उसे करता है/कहता है) — इस अर्थ में णिच्। (वार्तिक) प्रातिपदिक से धातु-अर्थ में बहुलता से इष्ठ के समान णिच् होता है — अर्थात् इष्ठ प्रत्यय में जैसे प्रातिपदिक को पुंवद्भाव, र-भाव, टि-लोप, विन्-मतुप्-लोप, यण्-आदि-लोप, प्र-स्थ-स्फ आदि आदेश, भ-संज्ञा होते हैं, वैसे णि में भी; इससे अ-लोप — घटं करोति आचष्टे वा = घटयति। (नामधातु समाप्त।)
सरल व्याख्या
शब्दायते (शब्द करता है), कलहायते (झगड़ता है), मेघायते। संज्ञा से णिच्: घटयति (घड़ा बनाता है)। (नामधातु पूर्ण।)