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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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२८. आत्मनेपदप्रक्रिया

आत्मनेपद-विधान · सूत्र 727–740 (14)
७२७ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.14
कर्तरि कर्मव्यतिहारे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
क्रियाविनिमये द्योत्ये कर्तर्यात्मनेपदम्। व्यतिलुनीते। अन्यस्य योग्यं लवनं करोतीत्यर्थः॥
हिन्दी अनुवाद
कर्मव्यतिहार (क्रिया के विनिमय/अदला-बदली) के द्योत्य होने पर कर्ता में आत्मनेपद होता है। व्यतिलुनीते — अर्थात् दूसरे के योग्य कटाई करता है।
सरल व्याख्या
एक-दूसरे का काम करने के अर्थ में (व्यति- उपसर्ग के साथ) आत्मनेपद: व्यतिलुनीते।
७२८ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.15
न गतिहिंसार्थेभ्यः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्, कर्म-व्यतिहारे
वृत्तिः
व्यतिगच्छन्ति। व्यतिघ्नन्ति॥
हिन्दी अनुवाद
गति और हिंसा अर्थ वाली (धातुओं) से (कर्मव्यतिहार में आत्मनेपद) नहीं होता। व्यतिगच्छन्ति, व्यतिघ्नन्ति।
सरल व्याख्या
जाना/मारना अर्थ में परस्मैपद ही: व्यतिघ्नन्ति (एक-दूसरे को मारते हैं)।
७२९ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.17
नेर्विशः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
निविशते॥
हिन्दी अनुवाद
नि से परे विश् से (आत्मनेपद)। निविशते।
सरल व्याख्या
नि + विश् → निविशते (बसता है) — आत्मनेपद।
७३० विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.18
परिव्यवेभ्यः क्रियः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
परिक्रीणीते। विक्रीणीते। अवक्रीणीते॥
हिन्दी अनुवाद
परि, वि, अव से परे क्री से (आत्मनेपद)। परिक्रीणीते, विक्रीणीते, अवक्रीणीते।
सरल व्याख्या
विक्रीणीते (बेचता है) — आत्मनेपद, जबकि क्रीणाति (खरीदता है) उभयपदी।
७३१ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.19
विपराभ्यां जेः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
विजयते। पराजयते॥
हिन्दी अनुवाद
वि और परा से परे जि से (आत्मनेपद)। विजयते, पराजयते।
सरल व्याख्या
जि (जीतना) परस्मैपदी है (जयति), पर वि/परा के साथ आत्मनेपद: विजयते, पराजयते।
७३२ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.22
समवप्रविभ्यः स्थः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
संतिष्ठते। अवतिष्ठते। प्रतिष्ठते। वितिष्ठते॥
हिन्दी अनुवाद
सम्, अव, प्र, वि से परे स्था से (आत्मनेपद)। सन्तिष्ठते, अवतिष्ठते, प्रतिष्ठते, वितिष्ठते।
सरल व्याख्या
स्था (तिष्ठति) इन उपसर्गों के साथ आत्मनेपदी: प्रतिष्ठते (प्रस्थान करता है)।
७३३ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.44
अपह्नवे ज्ञः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
शतमपजानीते। अपलपतीत्यर्थः॥
हिन्दी अनुवाद
अपह्नव (मुकरना) अर्थ में ज्ञा से (आत्मनेपद)। शतम् अपजानीते — अर्थात् (सौ रुपये के ऋण से) मुकरता है।
सरल व्याख्या
अपजानीते = इनकार करता है।
७३४ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.45
अकर्मकाच्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्, ज्ञः
वृत्तिः
सर्पिषो जानीते। सर्पिषोपायेन प्रवर्तत इत्यर्थः॥
हिन्दी अनुवाद
अकर्मक (ज्ञा) से भी (आत्मनेपद)। सर्पिषो जानीते — अर्थात् घी के उपाय से प्रवृत्त होता है।
सरल व्याख्या
अकर्मक प्रयोग में जानीते (आत्मनेपद)।
७३५ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.53
उदश्चरः सकर्मकात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
धर्ममुच्चरते। उल्लङ्घ्य गच्छतीत्यर्थः॥
हिन्दी अनुवाद
सकर्मक हो तो उत् से परे चर् से (आत्मनेपद)। धर्मम् उच्चरते — अर्थात् (धर्म को) लाँघकर चलता है।
सरल व्याख्या
उच्चरते = उल्लंघन करता है।
७३६ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.54
समस्तृतीयायुक्तात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्, चरः
वृत्तिः
रथेन सञ्चरते॥
हिन्दी अनुवाद
तृतीया से युक्त हो तो सम् से परे चर् से (आत्मनेपद)। रथेन सञ्चरते।
सरल व्याख्या
रथेन सञ्चरते (रथ से घूमता है)।
७३७ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.55
दाणश्च सा चेच्चतुर्थ्यर्थे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्, समः, तृतीयायुक्तात्
वृत्तिः
सम्पूर्वाद्दाणस्तृतीयान्तेन युक्तादुक्तं स्यात् तृतीया चेच्चतुर्थ्यर्थे। दास्या संयच्छते कामी॥
हिन्दी अनुवाद
सम् पूर्वक दाण् से, तृतीयान्त से युक्त होने पर, (आत्मनेपद) होता है, यदि वह तृतीया चतुर्थी के अर्थ में हो। दास्या संयच्छते कामी।
सरल व्याख्या
दास्या संयच्छते = दासी को (कुछ) देता है — तृतीया यहाँ चतुर्थी के अर्थ में।
७३८ अतिदेशसूत्रम् · सन्नन्तपदनिर्णयातिदेशः अष्टा० 1.3.62
पूर्ववत् सनः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
सनः पूर्वो यो धातुस्तेन तुल्यं सन्नन्तादप्यात्मनेपदं स्यात् । एदिधिषते ॥
हिन्दी अनुवाद
सन् से पूर्व जो धातु, उसके समान सन्नन्त से भी आत्मनेपद होता है। एदिधिषते।
सरल व्याख्या
एध् आत्मनेपदी है तो उसका सन्नन्त भी: एदिधिषते (बढ़ना चाहता है)।
७३९ अतिदेशसूत्रम् · कित्त्वातिदेशः अष्टा० 1.2.10
हलन्ताच्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कित्, सन्, च, इकः, झल्
वृत्तिः
इक्समीपाद्धलः परो झलादिः सन् कित्। निविविक्षते॥
हिन्दी अनुवाद
इक् के समीप वाले हल् से परे झलादि सन् कित् होता है। निविविक्षते।
सरल व्याख्या
नि + विश् का सन्नन्त: निविविक्षते (गुण नहीं)।
७४० विधिसूत्रम् अष्टा० 1.3.32
गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु कृञः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: आत्मनेपदम्
वृत्तिः
गन्धनं सूचनम्। उत्कुरुते। सूचयतीत्यर्थः। अवक्षेपणं भर्त्सनम्। श्येनो वर्तिकामुत्कुरुते। भर्त्सयतीत्यर्थः। हरिमुपकुरुते। सेवत इत्यर्थः। परदारान् प्रकुरुते। तेषु सहसा प्रवर्तते। एधोदकस्योपस्कुरुते। गुणमाधत्ते। कथाः प्रकुरुते। प्रकथयतीत्यर्थः। शतं प्रकुरुते। धर्मार्थं विनियुङ्क्ते। एषु किम्? कटं करोति॥ «भुजोऽनवने» [671] - ओदनं भुङ्क्ते । अनवने किम् ? महीं भुनक्ति ॥ इत्यात्मनेपदप्रक्रिया ॥
हिन्दी अनुवाद
गन्धन, अवक्षेपण, सेवन, साहसिक्य, प्रतियत्न, प्रकथन, उपयोग — इन अर्थों में कृञ् से (आत्मनेपद)। गन्धन = सूचना — उत्कुरुते (सूचना देता है)। अवक्षेपण = भर्त्सना — श्येनो वर्तिकाम् उत्कुरुते (बाज़ बटेर को डराता है)। हरिम् उपकुरुते (सेवा करता है)। परदारान् प्रकुरुते (उनमें साहसपूर्वक प्रवृत्त होता है)। एधोदकस्य उपस्कुरुते (गुण का आधान करता है)। कथाः प्रकुरुते (कहता है)। शतं प्रकुरुते (धर्म के लिये लगाता है)। इनमें क्यों? कटं करोति (चटाई बनाता है)। 'भुजोऽनवने' — ओदनं भुङ्क्ते; अनवने क्यों? महीं भुनक्ति। (आत्मनेपद प्रक्रिया समाप्त।)
सरल व्याख्या
कृ के विशेष अर्थों में आत्मनेपद। सामान्य 'करना' में फल दूसरों के लिये हो तो करोति। (आत्मनेपद-व्यवस्था पूर्ण।)

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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