भाव या कर्म के वाचक सार्वधातुक परे रहते धातु से यक् होता है। भाव = क्रिया; वह भावार्थक लकार से अनूदित होती है। युष्मद्-अस्मद् से सामानाधिकरण्य न होने से प्रथम पुरुष; तिङ् से वाच्य क्रिया अद्रव्य-रूप होने से द्वित्व आदि की प्रतीति नहीं, अतः द्विवचन आदि नहीं, सामान्यतः एकवचन ही। त्वया मया अन्यैः च भूयते। बभूवे।
सरल व्याख्या
कर्मवाच्य/भाववाच्य का चिह्न 'य': भू + य + ते → भूयते (होया जाता है)। भाववाच्य में सदा प्रथम पुरुष एकवचन: मया भूयते, त्वया गम्यते।
उपदेश में अजन्त और हन्, ग्रह्, दृश् को स्य, सिच्, सीयुट्, तास् में भाव-कर्म के गम्यमान होने पर विकल्प से चिण् के समान अङ्ग-कार्य और स्य आदि को इट् होता है। चिण्वद्भाव पक्ष में यह इट्; चिण्वद्भाव से वृद्धि — भाविता/भविता, भाविष्यते/भविष्यते, भूयताम्, अभूयत, भाविषीष्ट/भविषीष्ट।
सरल व्याख्या
कर्मवाच्य लुट्/लृट् में दो रूप: भाविता / भविता; दायिता / दाता।
भाव-कर्म वाचक 'त' परे रहते च्लि को चिण् होता है। अभावि, अभाविष्यत/अभविष्यत। अकर्मक भी उपसर्ग के कारण सकर्मक होता है — अनुभूयते आनन्दः चैत्रेण त्वया मया च; अनुभूयेते, अनुभूयन्ते; त्वम् अनुभूयसे; अहम् अनुभूये; अन्वभावि; अन्वभाविषाताम्/अन्वभविषाताम्। (णिजन्त) णि-लोप — भाव्यते; भावयाञ्चक्रे, भावयाम्बभूवे, भावयामासे; चिण्वदिट्, आभीय होने से असिद्ध होकर णि-लोप — भाविता/भावयिता, भाविष्यते/भावयिष्यते, अभाव्यत, भाव्येत, भाविषीष्ट/भावयिषीष्ट, अभावि, अभाविषाताम्/अभावयिषाताम्। (सन्नन्त) बुभूष्यते। 'अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः' — स्तूयते विष्णुः; स्ताविता/स्तोता; स्ताविष्यते/स्तोष्यते; अस्तावि; अस्ताविषाताम्/अस्तोषाताम्। ऋ (गति) — 'गुणोऽर्ति' से गुण — अर्यते। स्मृ (स्मरण) — स्मर्यते, सस्मरे; 'उपदेश' ग्रहण से चिण्वदिट् — आरिता/अर्ता, स्मारिता/स्मर्ता। 'अनिदिताम्' से न-लोप — स्रस्यते; इदित् का तो — नन्द्यते। सम्प्रसारण — इज्यते।
सरल व्याख्या
कर्मवाच्य लुङ् प्रथम पुरुष एकवचन 'इ' से: अभावि, अकारि (किया गया), अपाठि। उपसर्ग से अकर्मक भी सकर्मक: अनुभूयते आनन्दः (आनन्द अनुभव किया जाता है)। स्तूयते (स्तुति की जाती है), इज्यते (यजन किया जाता है)।