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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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३१. कर्मकर्तृप्रक्रिया

कर्मकर्तृ · सूत्र 756–756 (1)
यदा कर्मैव कर्तृत्वेन विवक्षितं तदा सकर्मकाणामप्यकर्मकत्वात्कर्तरि भावे च लकारः ॥
जब कर्म ही कर्ता के रूप में विवक्षित हो, तब सकर्मक धातुएँ भी अकर्मक हो जाने से कर्ता और भाव में लकार होता है।

सरल व्याख्या: 'चावल पकता है', 'लकड़ी फटती है' — यहाँ जो वस्तु वास्तव में कर्म है वही कर्ता की तरह कही गई है; इसे कर्मकर्तृ प्रयोग कहते हैं।
७५६ अतिदेशसूत्रम् · कर्तुः कर्मवदतिदेशः अष्टा० 3.1.87
कर्मवत् कर्मणा तुल्यक्रियः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कर्तरि, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
कर्मस्थया क्रियया तुल्यक्रियः कर्ता कर्मवत्स्यात् । कार्यातिदेशोऽयम् । तेन यगात्मनेपदचिण्चिण्वदिटः स्युः । पच्यते फलम् । भिद्यते काष्ठम् । अपाचि । अभेदि । भावे । भिद्यते काष्ठेन ॥ इति कर्मकर्तृप्रक्रिया ॥
हिन्दी अनुवाद
कर्म में स्थित क्रिया के समान क्रिया वाला कर्ता कर्म के समान होता है। यह कार्यातिदेश है; अतः यक्, आत्मनेपद, चिण्, चिण्वदिट् होते हैं। पच्यते फलम्, भिद्यते काष्ठम्, अपाचि, अभेदि। भाव में — भिद्यते काष्ठेन। (कर्मकर्तृ प्रक्रिया समाप्त।)
सरल व्याख्या
जब कर्म स्वयं ही कर्ता बन जाए (फल अपने आप पकता है, लकड़ी अपने आप फटती है) — तब भी कर्मवाच्य जैसे रूप: पच्यते फलम् (फल पकता है)।

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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