स्मृतिबोधिन्युपपदे भूतानद्यतने धातोर्लृट् । लङोऽपवादः ॥ वस निवासे ॥ स्मरसि कृष्ण गोकुले वत्स्यामः । एवं बुध्यसे, चेतयसे इत्यादिप्रयोगेऽपि ॥
हिन्दी अनुवाद
स्मृति-बोधक उपपद होने पर अनद्यतन भूत में धातु से लृट् होता है — लङ् का अपवाद। वस् — निवास। स्मरसि कृष्ण गोकुले वत्स्यामः (कृष्ण! याद है, हम गोकुल में रहते थे)। इसी प्रकार 'बुध्यसे', 'चेतयसे' आदि के प्रयोग में भी।
सरल व्याख्या
'याद है?' के साथ भूतकाल के लिये लृट् (भविष्य रूप) का प्रयोग: स्मरसि... वत्स्यामः।
वर्तमाने ये प्रत्यया उक्तास्ते वर्तमानसामीप्ये भूते भविष्यति च वा स्युः। कदागतोऽसि। अयमागच्छामि, अयमागमं वा। कदा गमिष्यसि। एष गच्छामि, गमिष्यामि वा॥
हिन्दी अनुवाद
वर्तमान के समीप वाले भूत और भविष्यत् में, वर्तमान के लिये कहे गए प्रत्यय विकल्प से होते हैं। कदा आगतोऽसि? अयम् आगच्छामि / अयम् आगमम्। कदा गमिष्यसि? एष गच्छामि / गमिष्यामि।
सरल व्याख्या
'अभी आया', 'अभी जाता हूँ' — निकट भूत/भविष्य में लट्: एष गच्छामि (बस जा रहा हूँ)।
हेतु-हेतुमत् (कारण-कार्य) भाव में विकल्प से लिङ् होता है। कृष्णं नमेत् चेत् सुखं यायात् / कृष्णं नंस्यति चेत् सुखं यास्यति। (वार्तिक) भविष्यत् में ही इष्ट है — यहाँ नहीं: हन्ति इति पलायते। 'विधिनिमन्त्रण' से लिङ् — विधि = प्रेरणा, भृत्य आदि निम्न को प्रवृत्त करना — यजेत; निमन्त्रण = अनिवार्य नियोग, आवश्यक श्राद्ध-भोजन आदि में दौहित्र आदि को प्रवृत्त करना — इह भुञ्जीत; आमन्त्रण = इच्छानुसार करने की अनुमति — इह आसीत; अधीष्ट = सत्कारपूर्वक व्यापार — पुत्रम् अध्यापयेद् भवान्; सम्प्रश्न = निर्णय पूछना — किं भो वेदम् अधीयीय उत तर्कम्; प्रार्थना = याचना — भो भोजनं लभेय। इसी प्रकार लोट्। (लकारार्थ प्रक्रिया समाप्त। तिङन्त प्रकरण पूर्ण।)
सरल व्याख्या
'यदि... तो...' में लिङ् या लृट्: कृष्णं नमेत् चेत् सुखं यायात्। विधिलिङ् के छह अर्थों के उदाहरण — आज्ञा (यजेत), निमन्त्रण (इह भुञ्जीत), अनुमति (इह आसीत), अनुरोध, प्रश्न, प्रार्थना। (तिङन्त प्रकरण पूर्ण।)