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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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३४. पूर्वकृदन्तम्

पूर्व कृदन्त · सूत्र 780–843 (64)
७८० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.133
ण्वुल्तृचौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
धातोरेतौ स्तः। कर्तरि कृदिति कर्त्रर्थे॥
हिन्दी अनुवाद
धातु से ये दोनों (ण्वुल् और तृच्) होते हैं — 'कर्तरि कृत्' से कर्ता अर्थ में।
सरल व्याख्या
कर्ता (करने वाला) अर्थ में दो प्रमुख प्रत्यय: ण्वुल् (अक) और तृच् (तृ)।
७८१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.1
युवोरनाकौ ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
यु वु एतयोरनाकौ स्तः । कारकः कर्ता ॥
हिन्दी अनुवाद
यु और वु के स्थान पर (क्रमशः) अन और अक होते हैं। कारकः, कर्ता।
सरल व्याख्या
कृ + ण्वुल् (वु → अक) → कारकः (करने वाला); कृ + तृच् → कर्ता। पठ् → पाठकः, नी → नायकः, दा → दायकः।
७८२ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.134
नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
नन्द्यादेर्ल्युः, ग्रह्यादेर्णिनिः, पचादेरच् स्यात्। नन्दयतीति नन्दनः। जनमर्दयतीति जनार्दनः। लवणः। ग्राही। स्थायी। मन्त्री। पचादिराकृतिगणः॥
हिन्दी अनुवाद
नन्दि आदि से ल्यु, ग्रह् आदि से णिनि और पच् आदि से अच् होता है। नन्दयति इति नन्दनः; जनम् अर्दयति इति जनार्दनः; लवणः; ग्राही, स्थायी, मन्त्री। पचादि आकृतिगण है।
सरल व्याख्या
नन्दन (आनन्द देने वाला), जनार्दन; ग्राही (ग्रहण करने वाला), मन्त्री; पचः (पकाने वाला) — अच् से।
७८३ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.135
इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
एभ्यः कः स्यात्। बुधः। कृशः। ज्ञः। प्रियः। किरः॥
हिन्दी अनुवाद
इगुपध (धातु), ज्ञा, प्री, कॄ — इनसे क होता है। बुधः, कृशः, ज्ञः, प्रियः, किरः।
सरल व्याख्या
बुध् → बुधः (जानने वाला/विद्वान्), ज्ञा → ज्ञः, प्री → प्रियः।
७८४ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.136
आतश्चोपसर्गे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, कः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
प्रज्ञः। सुग्लः॥
हिन्दी अनुवाद
उपसर्ग होने पर आकारान्त से भी (क)। प्रज्ञः, सुग्लः।
सरल व्याख्या
प्र + ज्ञा → प्रज्ञः (बुद्धिमान्)।
७८५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.1.144
गेहे कः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, ग्रहः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
गेहे कर्तरि ग्रहेः कः स्यात्। गृहम्॥
हिन्दी अनुवाद
गेह (घर) कर्ता होने पर ग्रह् से क होता है। गृहम्।
सरल व्याख्या
ग्रह् + क → गृहम् (घर — जो ग्रहण करता/रखता है)।
७८६ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.1
कर्मण्यण् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
कर्मण्युपपदे धातोरण् प्रत्ययः स्यात्। कुम्भं करोतीति कुम्भकारः॥
हिन्दी अनुवाद
कर्म उपपद होने पर धातु से अण् प्रत्यय होता है। कुम्भं करोति इति कुम्भकारः।
सरल व्याख्या
उपपद समास: कुम्भ + कृ + अण् → कुम्भकारः (कुम्हार), ग्रन्थकारः, स्वर्णकारः।
७८७ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.3
आतोऽनुपसर्गे कः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, कर्मणि, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
आदन्ताद्धातोरनुपसर्गात्कर्मण्युपपदे कः स्यात्। अणोऽपवादः। आतो लोप इटि च। गोदः। धनदः। कम्बलदः। अनुपसर्गे किम्? गोसन्दायः। «मूलविभुजादिभ्यः कः» (वार्त्तिकम्)। मूलानि विभुजति मूलविभुजो रथः। आकृतिगणोऽयम्। महीध्रः। कुध्रः॥
हिन्दी अनुवाद
उपसर्ग-रहित आकारान्त धातु से कर्म उपपद होने पर क होता है — अण् का अपवाद; 'आतो लोप इटि च' — गोदः, धनदः, कम्बलदः। उपसर्ग-रहित क्यों? गोसन्दायः। (वार्तिक) मूलविभुज आदि से क — मूलानि विभुजति मूलविभुजः रथः; यह आकृतिगण है — महीध्रः, कुध्रः।
सरल व्याख्या
गो + दा → गोदः (गाय देने वाला), धनदः (कुबेर), जलदः (बादल), महीध्रः (पर्वत)।
७८८ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.16
चरेष्टः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, कर्मणि, अनुपसर्गे, सुपि, अधिकरणे, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
अधिकरणे उपपदे। कुरुचरः॥
हिन्दी अनुवाद
अधिकरण उपपद होने पर चर् से ट होता है। कुरुचरः।
सरल व्याख्या
कुरुषु चरति → कुरुचरः; वनचरः, जलचरः।
७८९ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.17
भिक्षासेनादायेषु च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, कर्मणि, अनुपसर्गे, सुपि, चरेः, टः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
भिक्षाचरः। सेनाचरः। आदायेति ल्यबन्तम्। आदायचरः॥
हिन्दी अनुवाद
भिक्षा, सेना, आदाय उपपद होने पर भी (ट)। भिक्षाचरः, सेनाचरः; आदाय — ल्यबन्त — आदायचरः।
सरल व्याख्या
भिक्षाचरः (भिक्षा माँगने वाला), सेनाचरः (सैनिक)।
७९० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.20
कृञो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, कर्मणि, अनुपसर्गे, सुपि, टः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
एषु द्योत्येषु करोतेष्टः स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
हेतु, ताच्छील्य (स्वभाव), आनुलोम्य (अनुकूलता) द्योत्य होने पर कृ से ट होता है।
सरल व्याख्या
यशस्करी विद्या (यश देने वाली), श्राद्धकरः (श्राद्ध करने के स्वभाव वाला)।
७९१ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.3.46
अतः कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णीष्वनव्ययस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: विसर्जनीयस्य, कुप्वोः, सः, षः, अनुत्तरपदस्थस्य, समासे, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्, संहितायाम्
वृत्तिः
आदुत्तरस्यानव्ययस्य विसर्गस्य समासे नित्यं सादेशः करोत्यादिषु परेषु। यशस्करी विद्या। श्राद्धकरः। वचनकरः॥
हिन्दी अनुवाद
अ से परे अव्यय-भिन्न (पद) के विसर्ग को, समास में कृ, कम्, कंस, कुम्भ, पात्र, कुशा, कर्णी परे रहते, नित्य स आदेश होता है। यशस्करी विद्या, श्राद्धकरः, वचनकरः।
सरल व्याख्या
यशः + करी → यशस्करी (विसर्ग → स्)। इसी प्रकार पयस्कामः, अयस्कारः।
७९२ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.28
एजेः खश् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, कर्मणि, अनुपसर्गे, सुपि, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
ण्यन्तादेजेः खश् स्यात्॥
हिन्दी अनुवाद
णिजन्त एज् से खश् होता है।
सरल व्याख्या
जन + एजय (कँपाना) + खश् → जनमेजय।
७९३ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.3.67
अरुर्द्विषदजन्तस्य मुम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: त्रेः, अनव्ययस्य, खिति, उत्तरपदे
वृत्तिः
अरुषो द्विषतोऽजन्तस्य च मुमागमः स्यात्खिदन्ते परे न त्वव्ययस्य। शित्त्वाच्छबादिः। जनमेजयतीति जनमेजयः॥
हिन्दी अनुवाद
खित्-अन्त (प्रत्यय) परे रहते अरुस्, द्विषत् और अजन्त को मुम् आगम होता है, पर अव्यय को नहीं। शित् होने से शप् आदि। जनम् एजयति इति जनमेजयः।
सरल व्याख्या
जन + म् + एजयः → जनमेजयः (प्रजा को कँपाने वाला राजा)। बीच में म् (मुम्) जुड़ता है।
७९४ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.38
प्रियवशे वदः खच् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, कर्मणि, अनुपसर्गे, सुपि, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
प्रियंवदः। वशंवदः॥
हिन्दी अनुवाद
प्रिय और वश उपपद होने पर वद् से खच् होता है। प्रियंवदः, वशंवदः।
सरल व्याख्या
प्रियंवदः (प्रिय बोलने वाला), वशंवदः (आज्ञाकारी)।
७९५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.75
अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, सुपि, अपि, उपसर्गे, विच्, छन्दसि, मनिन्-क्वनिप्-वनिपः, च, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
मनिन् क्वनिप् वनिप् विच् एते प्रत्यया धातोः स्युः॥
हिन्दी अनुवाद
मनिन्, क्वनिप्, वनिप्, विच् — ये प्रत्यय (अन्य) धातुओं से भी होते हैं (प्रयोग में देखे जाते हैं)।
सरल व्याख्या
ये प्रत्यय जहाँ प्रयोग में दिखें, वहाँ मान लिये जाते हैं: सुशर्मा, प्रातरित्वा, विजावा।
७९६ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.8
नेड् वशि कृति ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अङ्गस्य
वृत्तिः
वशादेः कृत इण् न स्यात्॥ शॄ हिंसायाम्॥ सुशर्मा प्रातरित्वा॥
हिन्दी अनुवाद
वशादि (व, र, ल आदि से आरम्भ) कृत् को इट् नहीं होता। शॄ — हिंसा। सुशर्मा, प्रातरित्वा।
सरल व्याख्या
मन्, वन् आदि प्रत्ययों से पहले इ नहीं लगता: शर्मन् (शर्मा)।
७९७ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.41
विड्वनोरनुनासिकस्यात् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: नलोपः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्
वृत्तिः
अनुनासिकस्याऽत्स्यात्। विजायत इति विजावा॥ ओणृ अपनयने॥ अवावा। विच्॥ रुष रिष हिंसायाम्॥ रोट्। रेट्। सुगण्॥
हिन्दी अनुवाद
विट् और वन् परे रहते अनुनासिक को आ होता है। विजायते इति विजावा। ओणृ — हटाना: अवावा। विच् — रुष्, रिष् (हिंसा): रोट्, रेट्; सुगण्।
सरल व्याख्या
विजन् + वन् → विजावा।
७९८ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.76
क्विप् च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, सुपि, उपसर्गे, अपि, छन्दसि, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
अयमपि दृश्यते। उखास्रत्। पर्णध्वत्। वाहभ्रट्॥
हिन्दी अनुवाद
क्विप् भी देखा जाता है। उखास्रत्, पर्णध्वत्, वाहभ्रट्।
सरल व्याख्या
क्विप् (शून्य प्रत्यय) से बने शब्द: उखास्रत् (हाँडी से गिरा)।
७९९ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.78
सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, सुपि, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
अजात्यर्थे सुपि धातोर्णिनिस्ताच्छील्ये द्योत्ये। उष्णभोजी॥
हिन्दी अनुवाद
जाति-भिन्न अर्थ वाले सुबन्त उपपद होने पर, ताच्छील्य (स्वभाव) द्योत्य हो तो धातु से णिनि होता है। उष्णभोजी।
सरल व्याख्या
स्वभाव अर्थ में 'इन्': उष्णभोजी (गरम खाने के स्वभाव वाला), मिष्टभाषी, सत्यवादी।
८०० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.82
मनः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, सुपि, सुपि, णिनिः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
सुपि मन्यतेर्णिनिः स्यात्। दर्शनीयमानी॥
हिन्दी अनुवाद
सुबन्त उपपद होने पर मन् से णिनि होता है। दर्शनीयमानी।
सरल व्याख्या
दर्शनीयमानी (स्वयं को सुन्दर मानने वाला)।
८०१ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.83
आत्ममाने खश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, सुपि, सुपि, णिनिः, मनः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः
वृत्तिः
स्वकर्मके मनने वर्त्तमानान्मन्यतेः सुपि खश् स्यात् चाण्णिनिः। पण्डितमात्मानं मन्यते पण्डितंमन्यः। पण्डितमानी॥
हिन्दी अनुवाद
अपना ही कर्म हो ऐसे मनन (आत्म-मान) में वर्तमान मन् से सुबन्त उपपद होने पर खश् होता है, और 'च' से णिनि। पण्डितम् आत्मानं मन्यते = पण्डितंमन्यः, पण्डितमानी।
सरल व्याख्या
पण्डितंमन्यः (स्वयं को पण्डित मानने वाला) — व्यंग्यार्थक प्रसिद्ध शब्द।
८०२ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.3.66
खित्यनव्ययस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: त्रेः, ह्रस्वः, उत्तरपदे
वृत्तिः
खिदन्ते परे पूर्वपदस्य ह्रस्वः। ततो मुम्। कालिम्मन्या॥
हिन्दी अनुवाद
खित्-अन्त परे रहते (अव्यय-भिन्न) पूर्वपद को ह्रस्व होता है; फिर मुम्। कालिम्मन्या।
सरल व्याख्या
काली + मन्या → कालिम्मन्या (स्वयं को काली मानने वाली)।
८०३ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.85
करणे यजः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, णिनिः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
वृत्तिः
करणे उपपदे भूतार्थे यजेर्णिनिः कर्तरि। सोमेनेष्टवान् सोमयाजी। अग्निष्टोमयाजी॥
हिन्दी अनुवाद
करण उपपद होने पर भूत अर्थ में यज् से कर्ता में णिनि होता है। सोमेन इष्टवान् = सोमयाजी; अग्निष्टोमयाजी।
सरल व्याख्या
सोमयाजी (जिसने सोम-यज्ञ किया हो)।
८०४ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.94
दृशेः क्वनिप् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
वृत्तिः
कर्मणि भूते। पारं दृष्टवान् पारदृश्वा॥
हिन्दी अनुवाद
कर्म (उपपद) और भूत अर्थ में दृश् से क्वनिप् होता है। पारं दृष्टवान् = पारदृश्वा।
सरल व्याख्या
पारदृश्वा (जिसने पार देख लिया — पारंगत)।
८०५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.95
राजनि युधिकृञः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, क्वनिप्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
वृत्तिः
क्वनिप्स्यात्। युधिरन्तर्भावितण्यर्थः। राजानं योधितवान् राजयुध्वा। राजकृत्वा॥
हिन्दी अनुवाद
राजन् (कर्म-उपपद) होने पर युध् और कृञ् से क्वनिप् होता है; युध् में णिच् का अर्थ अन्तर्भूत है। राजानं योधितवान् = राजयुध्वा; राजकृत्वा।
सरल व्याख्या
राजयुध्वा (जिसने राजा को लड़ाया)।
८०६ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.96
सहे च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, क्वनिप्, युधि-कृञः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
वृत्तिः
कर्मणीति निवृत्तम्। सह योधितवान् सहयुध्वा। सहकृत्वा॥
हिन्दी अनुवाद
'सह' उपपद होने पर भी; (यहाँ) 'कर्मणि' निवृत्त। सह योधितवान् = सहयुध्वा; सहकृत्वा।
सरल व्याख्या
सहयुध्वा (साथ लड़ने वाला)।
८०७ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.97
सप्तम्यां जनेर्डः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
हिन्दी अनुवाद
(वृत्ति नहीं) सप्तम्यन्त उपपद होने पर जन् से ड होता है।
सरल व्याख्या
सरसि जायते → सरसिज / सरोज (कमल), जलज, पङ्कज।
८०८ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.3.14
तत्पुरुषे कृति बहुलम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: हलदन्तात्, सप्तम्याः, अलुग्, उत्तरपदे
वृत्तिः
ङेरलुक्। सरसिजम्, सरोजम्॥
हिन्दी अनुवाद
कृत् परे रहते तत्पुरुष में बहुलता से ङि (सप्तमी) का अलुक् होता है। सरसिजम्, सरोजम्।
सरल व्याख्या
सप्तमी विभक्ति बनी रह सकती है: सरसिजम् (सरसि + जम्) या लुप्त होकर सरोजम्।
८०९ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.99
उपसर्गे च संज्ञायाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, जनेः, डः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
वृत्तिः
प्रजा स्यात्संततौ जने ॥
हिन्दी अनुवाद
संज्ञा में उपसर्ग (उपपद) होने पर भी (जन् से ड)। प्रजा — सन्तान और जनता अर्थ में।
सरल व्याख्या
प्र + जन् → प्रजा (सन्तान/जनता)।
८१० संज्ञासूत्रम् · निष्ठासंज्ञा अष्टा० 1.1.26
क्तक्तवतू निष्ठा ॥
वृत्तिः
एतौ निष्ठासंज्ञौ स्तः॥
हिन्दी अनुवाद
क्त और क्तवतु 'निष्ठा' संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
क्त (त) और क्तवतु (तवत्) — भूतकालिक कृदन्त 'निष्ठा' कहलाते हैं।
८११ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.102
निष्ठा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
वृत्तिः
भूतार्थवृत्तेर्धातोर्निष्ठा स्यात्। तत्र तयोरेवेति भावकर्मणोः क्तः। कर्तरि कृदिति कर्तरि क्तवतुः। उकावितौ। स्नातं मया। स्तुतस्त्वया विष्णुः। विश्वं कृतवान् विष्णुः॥
हिन्दी अनुवाद
भूत अर्थ वाली धातु से निष्ठा होती है। उनमें 'तयोरेव' से भाव-कर्म में क्त, 'कर्तरि कृत्' से कर्ता में क्तवतु; (दोनों में) उ और क् इत् हैं। स्नातं मया (भाव), स्तुतः त्वया विष्णुः (कर्म), विश्वं कृतवान् विष्णुः (कर्ता)।
सरल व्याख्या
भूतकाल के कृदन्त: क्त (कर्मवाच्य) — 'कृतः' (किया गया), क्तवतु (कर्तृवाच्य) — 'कृतवान्' (किया)। रामः ग्रन्थं पठितवान् = रामेण ग्रन्थः पठितः।
८१२ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.42
रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
रदाभ्यां परस्य निष्ठातस्य नः स्यात् निष्ठापेक्षया पूर्वस्य धातोर्दस्य च॥ शॄ हिंसायाम्॥ ॠत इत्। रपरः। णत्वम्। शीर्णः। भिन्नः। छिन्नः॥
हिन्दी अनुवाद
र और द से परे निष्ठा के त को न होता है, और निष्ठा की अपेक्षा पूर्व धातु के द को भी। शॄ — हिंसा: 'ॠत इत्', र-पर, णत्व — शीर्णः। भिन्नः, छिन्नः।
सरल व्याख्या
भिद् + त → भिन्न (द् और त् दोनों न्), छिद् → छिन्न, शॄ → शीर्ण (जीर्ण-शीर्ण)।
८१३ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.43
संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: निष्ठातः, नः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
निष्ठातस्य नः स्यात्। द्राणः। ग्लानः॥
हिन्दी अनुवाद
संयोगादि, आकारान्त, यण्-वाली धातु से निष्ठा के त को न होता है। द्राणः, ग्लानः।
सरल व्याख्या
ग्लै → ग्लानः (थका हुआ), म्लै → म्लानः।
८१४ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.44
ल्वादिभ्यः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: निष्ठातः, नः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
एकविंशतेर्लूञादिभ्यः प्राग्वत्। लूनः॥ ज्या धातुः॥ ग्रहिज्येति संप्रसारणम्॥
हिन्दी अनुवाद
लूञ् आदि इक्कीस (धातुओं) से भी पूर्ववत् (त को न)। लूनः। ज्या धातु — 'ग्रहिज्या' से सम्प्रसारण।
सरल व्याख्या
लू (काटना) → लूनः (काटा हुआ), धू → धूनः।
८१५ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.2
हलः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: दीर्घः, सम्प्रसारणस्य, अङ्गस्य
वृत्तिः
अङ्गावयवाद्धलः परं यत्संप्रसारणं तदन्तस्य दीर्घः। जीनः॥
हिन्दी अनुवाद
अङ्ग के अवयव हल् से परे जो सम्प्रसारण, तदन्त को दीर्घ होता है। जीनः।
सरल व्याख्या
ज्या → जि → जीनः (वृद्ध/जीर्ण)।
८१६ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.45
ओदितश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: निष्ठातः, नः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
भुजो भुग्नः। टुओश्वि, उच्छूनः॥
हिन्दी अनुवाद
ओदित् (धातुओं) से भी (निष्ठा के त को न)। भुज् → भुग्नः; टुओश्वि → उच्छूनः।
सरल व्याख्या
भुग्न (मुड़ा हुआ), उच्छून (सूजा हुआ)।
८१७ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.51
शुषः कः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: निष्ठातः, नः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
निष्ठातस्य कः॥ शुष्कः॥
हिन्दी अनुवाद
शुष् से निष्ठा के त को क होता है। शुष्कः।
सरल व्याख्या
शुष् + त → शुष्कः (सूखा)।
८१८ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.52
पचो वः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: निष्ठातः, नः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
पक्वः॥ क्षै क्षये॥
हिन्दी अनुवाद
पच् से (निष्ठा के त को) व होता है। पक्वः। क्षै — क्षय।
सरल व्याख्या
पच् + त → पक्वः (पका हुआ)।
८१९ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.53
क्षायो मः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: निष्ठातः, नः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
क्षामः॥
हिन्दी अनुवाद
क्षै से (निष्ठा के त को) म होता है। क्षामः।
सरल व्याख्या
क्षै → क्षामः (दुबला)।
८२० विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.52
निष्ठायां सेटि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: नलोपः, लोपः, णेः, अङ्गस्य, असिद्धवदत्राभात्, आर्धधातुके
वृत्तिः
णेर्लोपः। भावितः। भावितवान्। दृह हिंसायाम्॥
हिन्दी अनुवाद
सेट् निष्ठा परे रहते णि का लोप होता है। भावितः, भावितवान्। दृह् — हिंसा।
सरल व्याख्या
णिजन्त का क्त: भावि + इत → भावितः (भावना किया गया); कारितः, पाठितः।
८२१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.20
दृढः स्थूलबलयोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: न, इट्, निष्ठायाम्, अङ्गस्य
वृत्तिः
स्थूले बलवति च निपात्यते॥
हिन्दी अनुवाद
स्थूल और बलवान् अर्थ में 'दृढ' निपातन होता है।
सरल व्याख्या
दृढ = मजबूत।
८२२ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.42
दधातेर्हिः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ति, किति, अङ्गस्य
वृत्तिः
तादौ किति। हितम्॥
हिन्दी अनुवाद
तकारादि कित् परे रहते धा को 'हि' होता है। हितम्।
सरल व्याख्या
धा + त → हितम् (रखा हुआ/हितकर); निहित, विहित।
८२३ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.4.46
दो दद् घोः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: ति, किति, अङ्गस्य
वृत्तिः
घुसंज्ञकस्य दा इत्यस्य दथ् स्यात् तादौ किति। चर्त्वम्। दत्तः॥
हिन्दी अनुवाद
तकारादि कित् परे रहते घु-संज्ञक 'दा' को 'दथ्' होता है; चर्त्व — दत्तः।
सरल व्याख्या
दा + त → दत्तः (दिया हुआ)।
८२४ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.106
लिटः कानज्वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, छन्दसि, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
हिन्दी अनुवाद
(वृत्ति नहीं) लिट् के स्थान पर विकल्प से कानच् होता है।
सरल व्याख्या
लिट् का कृदन्त रूप: कानच् (आन)।
८२५ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.107
क्वसुश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, छन्दसि, लिटः, वा, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भूते
वृत्तिः
लिटः कानच् क्वसुश्च वा स्तः । तङानावात्मनेपदम् । चक्राणः ॥
हिन्दी अनुवाद
लिट् के स्थान पर कानच् और क्वसु विकल्प से होते हैं। 'तङानावात्मनेपदम्' — चक्राणः।
सरल व्याख्या
परोक्ष भूत के कृदन्त: चक्राणः (जिसने किया), जगन्वान् (गया हुआ) — ये प्रायः वेद/काव्य में।
८२६ विधिसूत्रम् अष्टा० 8.2.65
म्वोश्च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: मः, नः, धातोः, पदस्य, पूर्वत्रासिद्धम्
वृत्तिः
मान्तस्य धातोर्नत्वं म्वोः परतः। जगन्वान्॥
हिन्दी अनुवाद
म और व परे रहते मकारान्त धातु (के म) को न होता है। जगन्वान्।
सरल व्याख्या
जगम् + वस् → जगन्वान्।
८२७ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.124
लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने
वृत्तिः
अप्रथमान्तेन समानाधिकरणे लट एतौ वा स्तः। शबादि। पचन्तं चैत्रं पश्य॥
हिन्दी अनुवाद
प्रथमान्त से भिन्न (पद) से समानाधिकरण होने पर लट् के स्थान पर ये (शतृ और शानच्) विकल्प से होते हैं; शप् आदि — पचन्तं चैत्रं पश्य।
सरल व्याख्या
वर्तमानकालिक कृदन्त: शतृ (परस्मैपद) — पचत् (पकाता हुआ), शानच् (आत्मनेपद) — पचमान। पचन्तं चैत्रं पश्य (पकाते हुए चैत्र को देखो)।
८२८ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.82
आने मुक् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अतः, अङ्गस्य
वृत्तिः
अदन्ताङ्गस्य मुगागमः स्यादाने परे। पचमानं चैत्रं पश्य। लडित्यनुवर्तमाने पुनर्लड्ग्रहणात् प्रथमासामानाधिकरण्येऽपि क्वचित्। सन् द्विजः॥
हिन्दी अनुवाद
आन परे रहते अदन्त अङ्ग को मुक् आगम होता है। पचमानं चैत्रं पश्य। 'लट्' की अनुवृत्ति होने पर भी पुनः लट्-ग्रहण से प्रथमा-समानाधिकरण में भी कहीं-कहीं — सन् द्विजः।
सरल व्याख्या
पच + म् + आन → पचमान; वर्धमान, शयान (अदन्त न होने से म् नहीं)। 'सन्' (होता हुआ) प्रथमा में भी।
८२९ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.1.36
विदेः शतुर्वसुः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अन्यतरस्याम्, अङ्गस्य
वृत्तिः
वेत्तेः परस्य शतुर्वसुरादेशो वा। विदन्। विद्वान्॥
हिन्दी अनुवाद
विद् (जानना) से परे शतृ को विकल्प से वसु आदेश होता है। विदन्, विद्वान्।
सरल व्याख्या
विद्वान् (जानने वाला) = विदन् — 'विद्वान्' इसी से।
८३० संज्ञासूत्रम् · सत्संज्ञा अष्टा० 3.2.127
तौ सत् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने
वृत्तिः
तौ शतृशानचौ सत्संज्ञौ स्तः॥
हिन्दी अनुवाद
वे दोनों — शतृ और शानच् — 'सत्' संज्ञक होते हैं।
सरल व्याख्या
शतृ-शानच् का सामूहिक नाम 'सत्'।
८३१ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.3.14
लृटः सद् वा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, शेषे, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, भविष्यति
वृत्तिः
व्यवस्थितविभाषेयम् । तेनाप्रथमासामानाधिकरण्ये प्रत्ययोत्तरपदयोः सम्बोधने लक्षणहेत्वोश्च नित्यम् । करिष्यन्तं करिष्यमाणं पश्य ॥
हिन्दी अनुवाद
लृट् के स्थान पर विकल्प से सत् (शतृ-शानच्) होते हैं। यह व्यवस्थित विभाषा है; अतः अप्रथमा-समानाधिकरण, प्रत्यय, उत्तरपद, सम्बोधन, लक्षण और हेतु में नित्य। करिष्यन्तं करिष्यमाणं पश्य।
सरल व्याख्या
भविष्यत्कालिक कृदन्त: करिष्यत् (करने वाला होगा), करिष्यमाण।
८३२ अधिकारसूत्रम् · ताच्छील्याधिकारः अष्टा० 3.2.134
आक्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने, आ क्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु
वृत्तिः
क्विपमभिव्याप्य वक्ष्यमाणाः प्रत्ययास्तच्छीलादिषु कर्तृषु बोध्याः ॥
हिन्दी अनुवाद
क्विप् तक कहे जाने वाले प्रत्यय तच्छील, तद्धर्म और तत्साधुकारी कर्ताओं में समझने चाहिए।
सरल व्याख्या
आगे के प्रत्यय 'स्वभाव से करने वाला', 'धर्म से करने वाला', 'अच्छी तरह करने वाला' अर्थ देते हैं।
८३३ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.135
तृन् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने, आ क्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु
वृत्तिः
कर्ता कटान्॥
हिन्दी अनुवाद
(उक्त अर्थों में) तृन् होता है। कर्ता कटान् (चटाइयाँ बनाने के स्वभाव वाला)।
सरल व्याख्या
तृन् (तृच् से भिन्न) — स्वभाव अर्थ में; इसके कर्म में द्वितीया: कर्ता कटान्।
८३४ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.155
जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङः षाकन् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने, आ क्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु
हिन्दी अनुवाद
(वृत्ति नहीं) जल्प्, भिक्ष्, कुट्ट्, लुण्ट्, वृङ् — इनसे षाकन् होता है।
सरल व्याख्या
जल्पाकः (बकवादी), भिक्षाकः (भिखारी)।
८३५ संज्ञासूत्रम् · इत्संज्ञा अष्टा० 1.3.6
षः प्रत्ययस्य ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उपदेशे, इत्, आदिः
वृत्तिः
प्रत्ययस्यादिः ष इत्संज्ञः स्यात्। जल्पाकः। भिक्षाकः। कुट्टाकः। लुण्टाकः। वराकः। वराकी॥
हिन्दी अनुवाद
प्रत्यय का आदि ष इत्-संज्ञक होता है। जल्पाकः, भिक्षाकः, कुट्टाकः, लुण्टाकः, वराकः, वराकी।
सरल व्याख्या
षाकन् का ष् इत् है (ष-इत् से स्त्रीलिङ्ग में ङीष्: वराकी)।
८३६ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.168
सनाशंसभिक्ष उः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने, आ क्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु
वृत्तिः
चिकीर्षुः । आशंसुः । भिक्षुः ॥
हिन्दी अनुवाद
सन्नन्त, आशंस्, भिक्ष् से उ होता है। चिकीर्षुः, आशंसुः, भिक्षुः।
सरल व्याख्या
चिकीर्षुः (करने का इच्छुक), जिज्ञासुः, भिक्षुः।
८३७ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.177
भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपॄजुग्रावस्तुवः क्विप् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने, आ क्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु
वृत्तिः
विभ्राट्। भाः॥
हिन्दी अनुवाद
भ्राज्, भास्, धुर्व्, द्युत्, ऊर्ज्, पॄ, जु, ग्रावस्तु — इनसे क्विप् होता है। विभ्राट्, भाः।
सरल व्याख्या
भास् + क्विप् → भाः (प्रकाश)।
८३८ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.21
राल्लोपः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्वि-झलोः, क्ङिति, च्छ्-वोः, अङ्गस्य
वृत्तिः
रेफाच्छ्वोर्लोपः क्वौ झलादौ क्ङिति। धूः। विद्युत्। ऊर्क। पूः। दृशिग्रहणस्यापकर्षाज्जवतेर्दीर्घः। जूः। ग्रावस्तुत्। «क्विब्वचिप्रच्छ्यायतस्तुकटप्रुजुश्रीणां दीर्घोऽसम्प्रसारणं च» (वार्त्तिकम्)। वक्तीति वाक्॥
हिन्दी अनुवाद
रेफ से परे छ और व का क्वि और झलादि कित्-ङित् परे रहते लोप होता है। धूः, विद्युत्, ऊर्क्, पूः। 'दृशि' ग्रहण के अपकर्ष से जु को दीर्घ — जूः; ग्रावस्तुत्। (वार्तिक) क्विप् में वच्, प्रच्छ्, आयतस्तु, कटप्रु, जु, श्रि को दीर्घ और सम्प्रसारण का अभाव — वक्ति इति वाक्।
सरल व्याख्या
धुर्व् → धूः (धुरा), द्युत् → विद्युत् (बिजली), वच् → वाक् (वाणी)।
८३९ विधिसूत्रम् अष्टा० 6.4.19
च्छ्वोः शूडनुनासिके च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: क्वि-झलोः, क्ङिति, अङ्गस्य
वृत्तिः
सतुक्कस्य छस्य वस्य च क्रमात् श् ऊठ् इत्यादेशौ स्तोऽनुनासिके क्वौ झलादौ च क्ङिति। पृच्छतीति प्राट्। आयतं स्तौतीति आयतस्तूः। कटं प्रवते कटप्रूः। जूरुक्तः। श्रयति हरिं श्रीः॥
हिन्दी अनुवाद
तुक् सहित छ और व को क्रमशः श और ऊठ् आदेश होते हैं, अनुनासिक, क्वि और झलादि कित्-ङित् परे रहते। पृच्छति इति प्राट्; आयतं स्तौति इति आयतस्तूः; कटं प्रवते कटप्रूः; जूः (कहा जा चुका); श्रयति हरिं श्रीः।
सरल व्याख्या
प्रच्छ् → प्राट् (पूछने वाला), श्रि → श्रीः (जो हरि का आश्रय लेती है — लक्ष्मी)।
८४० विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.182
दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, ष्ट्रन्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने
वृत्तिः
दाबादेः ष्ट्रन् स्यात्करणेर्थे । दात्यनेन दात्रम्। नेत्रम्॥
हिन्दी अनुवाद
दाप्, नी, शस्, यु, युज्, स्तु, तुद्, सि, सिच्, मिह्, पत्, दंश्, नह् — इनसे करण अर्थ में ष्ट्रन् होता है। दाति अनेन = दात्रम्; नेत्रम्।
सरल व्याख्या
करण (साधन) अर्थ में 'त्र': दा → दात्रम् (हँसिया), नी → नेत्रम् (आँख — जो ले जाती है), स्तु → स्तोत्रम्, शस् → शस्त्रम्।
८४१ विधिसूत्रम् अष्टा० 7.2.9
तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृति, न, इट्, अङ्गस्य
वृत्तिः
एषां दशानां कृत्प्रत्ययानामिण् न। शस्त्रम्। योत्रम्। योक्त्रम्। स्तोत्रम्। तोत्त्रम्। सेत्रम्। सेक्त्रम्। मेढ्रम्। पत्त्रम्। दंष्ट्रा। नद्ध्री॥
हिन्दी अनुवाद
ति, तु, त्र, त, थ, सि, सु, सर, क, स — इन दस कृत् प्रत्ययों को इट् नहीं होता। शस्त्रम्, योत्रम्, योक्त्रम्, स्तोत्रम्, तोत्त्रम्, सेत्रम्, सेक्त्रम्, मेढ्रम्, पत्त्रम्, दंष्ट्रा, नद्ध्री।
सरल व्याख्या
इन प्रत्ययों से पहले इ नहीं: शस्त्र (शसित्र नहीं), दंष्ट्रा (दाढ़), पत्त्र (पंख/पत्ता)।
८४२ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.184
अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, करणे, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने
वृत्तिः
अरित्रम् । लवित्रम् । धुवित्रम् । सवित्रम् । खनित्रम् । सहित्रम् । चरित्रम् ॥
हिन्दी अनुवाद
ऋ, लू, धू, सू, खन्, सह्, चर् — इनसे इत्र होता है। अरित्रम्, लवित्रम्, धुवित्रम्, सवित्रम्, खनित्रम्, सहित्रम्, चरित्रम्।
सरल व्याख्या
खनित्रम् (कुदाल), चरित्रम् (आचरण), अरित्रम् (पतवार)।
८४३ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.2.185
पुवः संज्ञायाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, करणे, इत्रः, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने
वृत्तिः
पवित्रम् ॥ इति पूर्वकृदन्तम् ॥
हिन्दी अनुवाद
संज्ञा में पू से (इत्र)। पवित्रम्। (पूर्वकृदन्त समाप्त।)
सरल व्याख्या
पू + इत्र → पवित्रम्। (पूर्वकृदन्त पूर्ण।)

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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