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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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३५. उणादयः

उणादि प्रत्यय · सूत्र 844–844 (1)
कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण् ॥ १ ॥ करोतीति कारुः । वातीति वायुः । पायुर्गुदम् । जायुरौषधम् । मायुः पित्तम् । स्वादुः । साध्नोति परकार्यमिति साधुः । आशु शीघ्रम् ॥
'कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्' (उणादि सूत्र 1) — कृ, वा, पा, जि, मि, स्वद्, साध्, अश् से उण् प्रत्यय होता है। करोति इति कारुः (कारीगर); वाति इति वायुः; पायुः = गुदा; जायुः = औषध; मायुः = पित्त; स्वादुः; साध्नोति परकार्यम् इति साधुः (जो दूसरों का कार्य सिद्ध करे); आशु = शीघ्र।

सरल व्याख्या: उणादि प्रत्ययों का यह पहला सूत्र दिखाता है कि वायु, साधु, स्वादु, आशु जैसे सामान्य शब्द भी धातुओं से ही बने हैं।
८४४ विधिसूत्रम् अष्टा० 3.3.1
उणादयो बहुलम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: कृत्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, धातोः, वर्तमाने
वृत्तिः
एते वर्तमाने संज्ञायां च बहुलं स्युः । केचिदविहिता अप्यूह्याः ॥ संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे । कार्याद्विद्यादनूबन्धमेतच्छास्त्रमुणादिषु ॥ इत्युणादयः ॥
हिन्दी अनुवाद
उण् आदि प्रत्यय वर्तमान काल और संज्ञा में बहुलता से होते हैं; कुछ अविहित भी अनुमान से जानने चाहिए। (कारिका) संज्ञा-शब्दों में धातु-रूप और उनके बाद प्रत्यय (पहचानें), और कार्य से अनुबन्ध (इत्) को जानें — यह उणादि में शास्त्र (रीति) है। (उणादि समाप्त।)
सरल व्याख्या
कारु, वायु, साधु, गुरु जैसे शब्द 'उणादि' प्रत्ययों से बने हैं — इनकी व्युत्पत्ति शब्द देखकर अनुमान से की जाती है। (प्रकरण-भूमिका में 'उण्' के उदाहरण दिए गए हैं।)

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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