नियत रूप से उपस्थित होने वाला (अर्थ) प्रातिपदिकार्थ है। 'मात्र' शब्द का प्रत्येक के साथ योग — प्रातिपदिकार्थ-मात्र में, लिङ्ग-मात्र अधिक होने पर, परिमाण-मात्र में और संख्या-मात्र में प्रथमा होती है। प्रातिपदिकार्थ-मात्र में — उच्चैः, नीचैः, कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम्। लिङ्ग-मात्र में — तटः, तटी, तटम्। परिमाण-मात्र में — द्रोणो व्रीहिः। वचन = संख्या — एकः, द्वौ, बहवः।
सरल व्याख्या
कारक प्रकरण आरम्भ: केवल शब्द का अर्थ, लिङ्ग, माप या संख्या बतानी हो तो प्रथमा विभक्ति। वाक्य में कर्ता (कर्तृवाच्य में) भी प्रथमा में।
अपादान आदि विशेष (कारकों) से अविवक्षित कारक कर्म-संज्ञक होता है। (कारिका) दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मथ्, मुष् — इनके कर्म से युक्त (दूसरा) अकथित (कारक) कर्म होता है; और नी, हृ, कृष्, वह् का भी। गां दोग्धि पयः (गाय से दूध दुहता है); बलिं याचते वसुधाम्; तण्डुलान् ओदनं पचति; गर्गान् शतं दण्डयति; व्रजम् अवरुणद्धि गाम्; माणवकं पन्थानं पृच्छति; वृक्षम् अवचिनोति फलानि; माणवकं धर्मं ब्रूते/शास्ति; शतं जयति देवदत्तम्; सुधां क्षीरनिधिं मथ्नाति; देवदत्तं शतं मुष्णाति; ग्रामम् अजां नयति/हरति/कर्षति/वहति। यह संज्ञा अर्थ-आश्रित है — बलिं भिक्षते वसुधाम्; माणवकं धर्मं भाषते/अभिधत्ते/वक्ति इत्यादि। (द्वितीया समाप्त।) 'स्वतन्त्रः कर्ता' — क्रिया में स्वतन्त्र रूप से विवक्षित अर्थ कर्ता होता है।
सरल व्याख्या
द्विकर्मक धातुएँ: इनमें दो कर्म होते हैं, दोनों द्वितीया में — गां दोग्धि पयः (गाय से दूध दुहता है), बलिं याचते वसुधाम् (बलि से पृथ्वी माँगता है), ग्रामम् अजां नयति (बकरी को गाँव ले जाता है)।
नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम्, वषट् — इनके योग में चतुर्थी होती है। हरये नमः, प्रजाभ्यः स्वस्ति, अग्नये स्वाहा, पितृभ्यः स्वधा। 'अलम्' से पर्याप्ति (समर्थ) अर्थ का ग्रहण — दैत्येभ्यो हरिः अलं/प्रभुः/समर्थः/शक्तः इत्यादि। (चतुर्थी समाप्त।)
सरल व्याख्या
उपपद विभक्ति: नमः, स्वाहा, स्वस्ति के साथ चतुर्थी — श्रीगणेशाय नमः, इन्द्राय स्वाहा। 'अलम्' = समर्थ अर्थ में भी चतुर्थी।
कारक और प्रातिपदिकार्थ से भिन्न स्व-स्वामि-भाव आदि सम्बन्ध 'शेष' है, उसमें षष्ठी होती है। राज्ञः पुरुषः। कर्म आदि में भी केवल सम्बन्ध की विवक्षा होने पर षष्ठी ही — सतां गतम्, सर्पिषो जानीते, मातुः स्मरति, एधोदकस्योपस्कुरुते, भजे शम्भोश्चरणयोः। (षष्ठी समाप्त।)
सरल व्याख्या
सम्बन्ध (का, के, की) में षष्ठी: राज्ञः पुरुषः (राजा का आदमी)। षष्ठी कारक नहीं, केवल सम्बन्ध है।
अधिकरण में सप्तमी होती है, 'च' से दूर और अन्तिक (निकट) अर्थ वाले (शब्दों) से भी। आधार तीन प्रकार का है — औपश्लेषिक (संपर्क से), वैषयिक (विषय-रूप), अभिव्यापक (व्याप्त)। कटे आस्ते (चटाई पर बैठा है), स्थाल्यां पचति (थाली/हाँडी में पकाता है), मोक्षे इच्छा अस्ति (मोक्ष में इच्छा है), सर्वस्मिन् आत्मा अस्ति (सबमें आत्मा है); वनस्य दूरे अन्तिके वा। (सप्तमी समाप्त। विभक्त्यर्थ पूर्ण।)