समासः पञ्चधा । तत्र समसनं समासः । स च विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्तः केवलसमासः प्रथमः ॥ १ ॥ प्रायेण पूर्वपदार्थप्रधानोऽव्ययीभावो द्वितीयः ॥ २ ॥ प्रायेणोत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषस्तृतीयः ॥ तत्पुरुषभेदः कर्मधारयः । कर्मधारयभेदो द्विगुः ॥ ३ ॥ प्रायेणान्यपदार्थप्रधानो बहव्रीहिश्चतुर्थः ॥ ४ ॥ प्रायेणोभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः पञ्चमः ॥ ५ ॥ तत्रादौ केवलसमासः ॥
समास पाँच प्रकार का है। संक्षेप करना (समसन) समास है। (1) विशेष संज्ञा से रहित केवल-समास पहला है। (2) प्रायः पूर्वपद के अर्थ की प्रधानता वाला अव्ययीभाव दूसरा है। (3) प्रायः उत्तरपद के अर्थ की प्रधानता वाला तत्पुरुष तीसरा है; तत्पुरुष का भेद कर्मधारय और कर्मधारय का भेद द्विगु है। (4) प्रायः अन्य पद के अर्थ की प्रधानता वाला बहुव्रीहि चौथा है। (5) प्रायः दोनों पदों के अर्थ की प्रधानता वाला द्वन्द्व पाँचवाँ है। उनमें पहले केवल-समास।
सरल व्याख्या: समास के पाँच भेद और उनकी पहचान — किस पद का अर्थ प्रधान है: अव्ययीभाव (पहला पद — उपकृष्णम्), तत्पुरुष (दूसरा पद — राजपुरुषः), बहुव्रीहि (कोई तीसरा — पीताम्बरः), द्वन्द्व (दोनों — रामलक्ष्मणौ)।
सुबन्त, सुबन्त के साथ विकल्प से समास को प्राप्त होता है। समास होने से प्रातिपदिक होकर (बीच के) सुप् का लुक्। दूसरे के अर्थ को कहना 'वृत्ति' है; कृत्, तद्धित, समास, एकशेष, सनाद्यन्त धातु — ये पाँच वृत्तियाँ हैं। वृत्ति के अर्थ का बोध कराने वाला वाक्य 'विग्रह' है; वह लौकिक और अलौकिक दो प्रकार का — 'पूर्वं भूतः' लौकिक, 'पूर्व अम् भूत सु' अलौकिक। भूतपूर्वः — 'भूतपूर्वे चरट्' निर्देश से पूर्वनिपात। (वार्तिक) इव के साथ समास और विभक्ति का अलोप — वागर्थौ इव = वागर्थाविव। (केवल समास समाप्त।)
सरल व्याख्या
समास = दो या अधिक पदों को मिलाकर एक पद बनाना; बीच की विभक्तियाँ हट जाती हैं। समझाने वाला वाक्य 'विग्रह' है। समास के पाँच भेद: केवल, अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि, द्वन्द्व।