अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा, प्राक्कडारात्समासः, सुप्सुपा, विभाषा, तत्पुरुषः
वृत्तिः
द्वितीयान्तं श्रितादिप्रकृतिकैः सुबन्तैः सह वा समस्यते स च तत्पुरुषः। कृष्णं श्रितः कृष्णश्रित इत्यादि॥
हिन्दी अनुवाद
द्वितीयान्त (पद), श्रित आदि (शब्द जिनकी प्रकृति हैं ऐसे) सुबन्तों के साथ विकल्प से समास को प्राप्त होता है, और वह तत्पुरुष है। कृष्णं श्रितः = कृष्णश्रितः इत्यादि।
सरल व्याख्या
द्वितीया तत्पुरुष: कृष्णश्रितः (कृष्ण के आश्रित), दुःखातीतः (दुःख को पार किया), ग्रामगतः।
अनुवृत्ति/अधिकार: आकडारात् एका संज्ञा, प्राक्कडारात्समासः, सुप्सुपा, विभाषा, तत्पुरुषः
वृत्तिः
तृतीयान्तं तृतीयान्तार्थकृतगुणवचनेनार्थेन च सह वा प्राग्वत्। शङ्कुलया खण्डः शङ्कुलाखण्डः । धान्येनार्थो धान्यार्थः। तत्कृतेति किम्? अक्ष्णा काणः॥
हिन्दी अनुवाद
तृतीयान्त, तृतीयान्त-अर्थ से किए गए गुणवचन के साथ और 'अर्थ' शब्द के साथ विकल्प से पूर्ववत् (समास)। शङ्कुलया खण्डः = शङ्कुलाखण्डः; धान्येन अर्थः = धान्यार्थः। तत्कृत क्यों? अक्ष्णा काणः (आँख से काना — यहाँ नहीं)।
सरल व्याख्या
तृतीया तत्पुरुष: शङ्कुलाखण्डः (सरौते से किया टुकड़ा), धान्यार्थः (धान्य से प्रयोजन)।
अनुवृत्ति/अधिकार: तृतीया, आकडारात् एका संज्ञा, प्राक्कडारात्समासः, सुप्सुपा, विभाषा, तत्पुरुषः
वृत्तिः
कर्तरि करणे च तृतीया कृदन्तेन बहुलं प्राग्वत्। हरिणा त्रातो हरित्रातः। नखैर्भिन्नः नखभिन्नः। «कृद्ग्रहणे गतिकारकपूर्वस्यापि ग्रहणम्» (वार्त्तिकम्)। नखनिर्भिन्नः॥
हिन्दी अनुवाद
कर्ता और करण में तृतीया, कृदन्त के साथ बहुलता से पूर्ववत् (समास)। हरिणा त्रातः = हरित्रातः; नखैः भिन्नः = नखभिन्नः। (वार्तिक) कृत् के ग्रहण में गति और कारक पूर्व वाले का भी ग्रहण — नखनिर्भिन्नः।
सरल व्याख्या
हरित्रातः (हरि द्वारा रक्षित), नखभिन्नः (नखों से फाड़ा हुआ), देवदत्तः (देव द्वारा दिया)।
चतुर्थ्यन्त के अर्थ के लिये जो (वस्तु), उसके वाचक तथा अर्थ, बलि, हित, सुख, रक्षित के साथ चतुर्थ्यन्त विकल्प से पूर्ववत्। यूपाय दारु = यूपदारु। (वार्तिक) तदर्थ के साथ प्रकृति-विकृति भाव में ही (समास) इष्ट है — अतः यहाँ नहीं: रन्धनाय स्थाली। (वार्तिक) 'अर्थ' के साथ नित्य समास और विशेष्य का लिङ्ग कहना चाहिए — द्विजार्थः सूपः, द्विजार्था यवागूः, द्विजार्थं पयः। भूतबलिः, गोहितम्, गोसुखम्, गोरक्षितम्।
सरल व्याख्या
चतुर्थी तत्पुरुष: यूपदारु (यूप के लिये लकड़ी), गोहितम् (गायों के लिये हितकर), द्विजार्थः (ब्राह्मण के लिये)।
पूर्व, अपर, अधर, उत्तर — ये अवयवी (एकदेशी) के साथ समास पाते हैं, यदि अवयवी एकत्व संख्या वाला हो। यह षष्ठी समास का अपवाद है। पूर्वं कायस्य = पूर्वकायः; अपरकायः। एकाधिकरण क्यों? पूर्वश्छात्राणाम्।
सरल व्याख्या
पूर्वकायः (शरीर का अगला भाग) — यहाँ 'पूर्व' पहले आता है (कायपूर्व नहीं)।
सप्तम्यन्त, शौण्ड आदि के साथ पूर्ववत्। अक्षेषु शौण्डः = अक्षशौण्डः इत्यादि। 'द्वितीया' 'तृतीया' इत्यादि के योगविभाग से अन्यत्र भी तृतीया आदि विभक्तियों का प्रयोग के अनुसार समास समझना चाहिए।
सरल व्याख्या
सप्तमी तत्पुरुष: अक्षशौण्डः (जुए में चतुर), शास्त्रप्रवीणः, कलाकुशलः।
अनुवृत्ति/अधिकार: समानाधिकरणेन, दिक्सङ्ख्ये, आकडारात् एका संज्ञा, प्राक्कडारात्समासः, सुप्सुपा, विभाषा, तत्पुरुषः
वृत्तिः
तद्धितार्थे विषये उत्तरपदे च परतः समाहारे च वाच्ये दिक्संख्ये प्राग्वत्। पूर्वस्यां शालायां भवः - पूर्वा शाला इति समासे जाते «सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवद्भावः» (वार्त्तिकम्)॥
हिन्दी अनुवाद
तद्धितार्थ के विषय में, उत्तरपद परे रहते और समाहार वाच्य होने पर दिक्-संख्या पूर्ववत् (समास पाती हैं)। पूर्वस्यां शालायां भवः — 'पूर्वा शाला' ऐसा समास होने पर — (वार्तिक) सर्वनाम को वृत्ति-मात्र में पुंवद्भाव।
सरल व्याख्या
दिशा/संख्या का समास तीन स्थितियों में भी: तद्धित-प्रत्यय के लिये, उत्तरपद आगे हो तो, और समाहार में।
ञित् और णित् तद्धित परे रहते स्वरों में आदि अच् को वृद्धि होती है; 'यस्येति च' — पौर्वशालः (पूर्व शाला में होने वाला)। पञ्च गावः धनं यस्य — इस त्रिपद बहुव्रीहि में — (वार्तिक) द्वन्द्व-तत्पुरुष में उत्तरपद होने पर नित्य समास कहना चाहिए।
सरल व्याख्या
तद्धित में प्रथम स्वर की वृद्धि: दशरथ → दाशरथि, शिव → शैव, वसुदेव → वासुदेव। यह बहुत महत्त्वपूर्ण नियम है।
भेदक (विशेषण), भेद्य (विशेष्य) समानाधिकरण के साथ बहुलता से पूर्ववत् (समास पाता है)। नीलम् उत्पलम् = नीलोत्पलम्। बहुल ग्रहण से कहीं नित्य — कृष्णसर्पः; कहीं नहीं — रामो जामदग्न्यः।
सरल व्याख्या
कर्मधारय: नीलोत्पलम् (नीला कमल), महापुरुषः, सज्जनः। 'कृष्णसर्प' सदा समास में (एक जाति का नाम)।
उपमान (शब्द) सामान्य-धर्म वाचक (शब्दों) के साथ (समास पाते हैं)। घन इव श्यामः = घनश्यामः। (वार्तिक) शाकपार्थिव आदि की सिद्धि के लिये उत्तरपद-लोप का उपसंख्यान — शाकप्रियः पार्थिवः = शाकपार्थिवः; देवपूजकः ब्राह्मणः = देवब्राह्मणः।
ऊरी आदि, च्वि-प्रत्ययान्त और डाच्-प्रत्ययान्त क्रिया के योग में गति-संज्ञक होते हैं। ऊरीकृत्य, शुक्लीकृत्य, पटपटाकृत्य। सुपुरुषः। (वार्तिक) प्र आदि गत आदि अर्थ में प्रथमान्त के साथ — प्रगतः आचार्यः = प्राचार्यः। (वार्तिक) अति आदि क्रान्त आदि अर्थ में द्वितीयान्त के साथ — 'अतिक्रान्तो मालाम्' इस विग्रह में (आगे)।
उपसर्जन जो गो शब्द और स्त्रीप्रत्ययान्त, तदन्त प्रातिपदिक को ह्रस्व होता है। अतिमालः। (वार्तिक) अव आदि क्रुष्ट आदि अर्थ में तृतीयान्त के साथ — अवक्रुष्टः कोकिलया = अवकोकिलः। (वार्तिक) परि आदि ग्लान आदि अर्थ में चतुर्थ्यन्त के साथ — परिग्लानः अध्ययनाय = पर्यध्ययनः। (वार्तिक) निर् आदि क्रान्त आदि अर्थ में पञ्चम्यन्त के साथ — निष्क्रान्तः कौशाम्ब्याः = निष्कौशाम्बिः।
सरल व्याख्या
अतिमालः (माला को लाँघने वाला — माला → माल ह्रस्व)। निष्कौशाम्बिः (कौशाम्बी से निकला)।
उपपद (सुबन्त) समर्थ के साथ नित्य समास पाता है; यह समास तिङन्त का नहीं होता। कुम्भं करोति इति कुम्भकारः। अतिङ् क्यों? मा भवान् भूत् — 'माङि लुङ्' में सप्तमी-निर्देश से माङ् उपपद है (पर समास नहीं)। (परिभाषा) गति, कारक, उपपद का कृदन्तों के साथ समास सुप् की उत्पत्ति से पहले होता है — व्याघ्री, अश्वक्रीती, कच्छपी इत्यादि।
सरल व्याख्या
उपपद समास: कुम्भकारः, जलदः, सर्वज्ञः — कृदन्त के साथ नित्य।
संख्या या अव्यय आदि में हो ऐसे अङ्गुलि-अन्त तत्पुरुष से अच् समासान्त होता है। द्वे अङ्गुली प्रमाणम् अस्य = द्व्यङ्गुलम्; निर्गतम् अङ्गुलिभ्यः = निरङ्गुलम्।
रात्र, अह्न, अह — इन अन्त वाले द्वन्द्व और तत्पुरुष पुंलिङ्ग में ही होते हैं। अहश्च रात्रिश्च = अहोरात्रः; सर्वरात्रः, संख्यातरात्रः। संख्या-पूर्व रात्र नपुंसक — द्विरात्रम्, त्रिरात्रम्।
सरल व्याख्या
अहोरात्रः (दिन-रात — पुंलिङ्ग), पर नवरात्रम्, त्रिरात्रम् (नपुंसक)।
द्वन्द्व और तत्पुरुष का लिङ्ग अन्तिम पद जैसा होता है। कुक्कुटमयूर्यौ इमे, मयूरीकुक्कुटौ इमौ। (परिभाषा) द्विगु, प्राप्त, आपन्न, अलम्-पूर्व और गति समासों में (इसका) निषेध कहना चाहिए — पञ्चसु कपालेषु संस्कृतः पञ्चकपालः पुरोडाशः।
सरल व्याख्या
द्वन्द्व-तत्पुरुष का लिङ्ग अन्तिम पद से: कुक्कुटमयूर्यौ (मयूरी स्त्रीलिङ्ग, अन्त में)।
प्राप्त और आपन्न द्वितीयान्त के साथ समास पाते हैं, और इनको अकार अन्तादेश होता है। प्राप्तः जीविकां = प्राप्तजीविकः; आपन्नजीविकः। अलं कुमार्यै = अलंकुमारिः — इसी ज्ञापक से समास। निष्कौशाम्बिः।
अर्धर्चादयः शब्दाः पुंसि क्लीबे च स्युः । अर्धर्चः । अर्धर्चम् । एवं ध्वजतीर्थशरीरमण्डपयूपदेहाङ्कुशपात्रसूत्रादयः । सामान्ये नपुंसकम् । मृदु पचति । प्रातः कमनीयम् ॥ इति तत्पुरुषः ॥ ३ ॥
हिन्दी अनुवाद
अर्धर्च आदि शब्द पुंलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं। अर्धर्चः, अर्धर्चम्। इसी प्रकार ध्वज, तीर्थ, शरीर, मण्डप, यूप, देह, अङ्कुश, पात्र, सूत्र आदि। सामान्य (अर्थ) में नपुंसक — मृदु पचति, प्रातः कमनीयम्। (तत्पुरुष समाप्त।)
सरल व्याख्या
कुछ शब्द दोनों लिङ्गों में: तीर्थः/तीर्थम्, देहः/देहम्, पात्रः/पात्रम्। क्रियाविशेषण नपुंसक: मृदु पचति। (तत्पुरुष पूर्ण।)