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📜 लघुसिद्धान्तकौमुदी

वरदराजाचार्य कृत · पाणिनीय सूत्र, मूल वृत्ति, हिन्दी अनुवाद एवं सरल व्याख्या

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४२. द्वन्द्वः

द्वन्द्व समास · सूत्र 980–987 (8)
९८० संज्ञासूत्रम् · द्वन्द्वसंज्ञा अष्टा० 2.2.29
चार्थे द्वन्द्वः ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: अनेकम्, आकडारात् एका संज्ञा, प्राक्कडारात्समासः, सुप्सुपा, विभाषा
वृत्तिः
अनेकं सुबन्तं चार्थे वर्तमानं वा समस्यते स द्वन्द्वः। समुच्चयान्वाचयेतरेतरयोगसमाहाराश्चार्थाः। तत्र 'ईश्वरं गुरुं च भजस्व' इति परस्परनिरपेक्षस्यानेकस्यैकस्मिन्नन्वयः समुच्चयः। 'भिक्षामट गां चानय' इत्यन्यतरस्यानुषङ्गिकत्वेन अन्वयोऽन्वाचयः। अनयोरसामर्थ्यात्समासो न। 'धवखदिरौ छिन्धि' इति मिलितानामन्वय इतरेतरयोगः। 'संज्ञापरिभाषम्' इति समूहः समाहारः॥
हिन्दी अनुवाद
'च' के अर्थ में वर्तमान अनेक सुबन्त विकल्प से समास पाते हैं, वह द्वन्द्व है। समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग और समाहार — ये 'च' के अर्थ हैं। 'ईश्वरं गुरुं च भजस्व' — परस्पर निरपेक्ष अनेक का एक (क्रिया) में अन्वय समुच्चय है। 'भिक्षाम् अट गां च आनय' — एक का गौण रूप से अन्वय अन्वाचय है। इन दोनों में सामर्थ्य न होने से समास नहीं। 'धवखदिरौ छिन्धि' — मिले हुओं का अन्वय इतरेतरयोग है। 'संज्ञापरिभाषम्' — समूह समाहार है।
सरल व्याख्या
द्वन्द्व = 'और' से जुड़े पदों का समास, दोनों पद प्रधान: रामलक्ष्मणौ (राम और लक्ष्मण), पाणिपादम् (हाथ-पैर का समूह — समाहार)।
९८१ विधिसूत्रम् अष्टा० 2.2.31
राजदन्तादिषु परम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: उपसर्जनं, पूर्वम्, आकडारात् एका संज्ञा, प्राक्कडारात्समासः, सुप्सुपा, विभाषा
वृत्तिः
एषु पूर्वप्रयोगार्हं परं स्यात्। दन्तानां राजानो राजदन्ताः। «धर्मादिष्वनियमः» (वार्त्तिकम्)। अर्थधर्मौ। धर्मार्थावित्यादि॥
हिन्दी अनुवाद
राजदन्त आदि में पूर्व-प्रयोग के योग्य (पद) बाद में होता है। दन्तानां राजानः = राजदन्ताः। (वार्तिक) धर्म आदि में अनियम — अर्थधर्मौ, धर्मार्थौ इत्यादि।
सरल व्याख्या
राजदन्ताः (दाँतों के राजा — आगे के दाँत), जहाँ उपसर्जन बाद में आता है। धर्मार्थौ / अर्थधर्मौ — दोनों क्रम।
९८२ विधिसूत्रम् अष्टा० 2.2.32
द्वन्द्वे घि ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पूर्वम्, आकडारात् एका संज्ञा, प्राक्कडारात्समासः, सुप्सुपा, विभाषा
वृत्तिः
द्वन्द्वे घिसंज्ञं पूर्वं स्यात्। हरिश्च हरश्च हरिहरौ॥
हिन्दी अनुवाद
द्वन्द्व में घि-संज्ञक पहले होता है। हरिश्च हरश्च = हरिहरौ।
सरल व्याख्या
द्वन्द्व में इकारान्त/उकारान्त पद पहले: हरिहरौ।
९८३ विधिसूत्रम् अष्टा० 2.2.33
अजाद्यदन्तम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पूर्वम्, द्वन्द्वे, आकडारात् एका संज्ञा, प्राक्कडारात्समासः, सुप्सुपा, विभाषा
वृत्तिः
द्वन्द्वे पूर्वं स्यात्। ईशकृष्णौ॥
हिन्दी अनुवाद
द्वन्द्व में अजादि अदन्त पहले होता है। ईशकृष्णौ।
सरल व्याख्या
स्वर से आरम्भ, अ से अन्त वाला पद पहले: ईशकृष्णौ।
९८४ विधिसूत्रम् अष्टा० 2.2.34
अल्पाच्तरम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: पूर्वम्, द्वन्द्वे, आकडारात् एका संज्ञा, प्राक्कडारात्समासः, सुप्सुपा, विभाषा
वृत्तिः
शिवकेशवौ॥
हिन्दी अनुवाद
(द्वन्द्व में) कम स्वरों वाला पहले होता है। शिवकेशवौ।
सरल व्याख्या
छोटा (कम स्वर वाला) पद पहले: शिवकेशवौ।
९८५ विधिसूत्रम् अष्टा० 1.2.70
पिता मात्रा ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: एक-शेषः, अन्यतरस्याम्
वृत्तिः
मात्रा सहोक्तौ पिता वा शिष्यते। माता च पिता च पितरौ, मातापितरौ वा॥
हिन्दी अनुवाद
माता के साथ कथन में विकल्प से पिता शेष रहता है। माता च पिता च = पितरौ, मातापितरौ वा।
सरल व्याख्या
पितरौ = माता-पिता (एकशेष)। मातापितरौ भी शुद्ध।
९८६ विधिसूत्रम् अष्टा० 2.4.2
द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: एकवचनम्
वृत्तिः
एषां द्वन्द्व एकवत्। पाणिपादम्। मार्दङ्गिकवैणविकम्। रथिकाश्वारोहम्॥
हिन्दी अनुवाद
प्राणियों के अङ्ग, तूर्य (वाद्य) के अङ्ग और सेना के अङ्गों का द्वन्द्व एकवत् होता है। पाणिपादम्, मार्दङ्गिकवैणविकम्, रथिकाश्वारोहम्।
सरल व्याख्या
समाहार द्वन्द्व (एकवचन नपुंसक): पाणिपादम् (हाथ-पैर), रथिकाश्वारोहम् (रथी और घुड़सवार)।
९८७ विधिसूत्रम् अष्टा० 5.4.106
द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे ॥
अनुवृत्ति/अधिकार: टच्, प्रत्ययः, परश्च, आद्युदात्तश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, समासान्ताः, वा
वृत्तिः
चवर्गान्ताद्दषहान्ताच्च द्वन्द्वाट्टच् स्यात्समाहारे । वाक् च त्वक् च वाक्त्वचम् । त्वक्स्रजम् । शमीदृषदम् । वाक्त्विषम् । छत्रोपानहम् । समाहारे किम् ? प्रावृट्शरदौ ॥ इति द्वन्द्वः ॥ ५ ॥
हिन्दी अनुवाद
चवर्गान्त और द, ष, ह अन्त वाले द्वन्द्व से समाहार में टच् होता है। वाक् च त्वक् च = वाक्त्वचम्; त्वक्स्रजम्, शमीदृषदम्, वाक्त्विषम्, छत्रोपानहम्। समाहार क्यों? प्रावृट्शरदौ। (द्वन्द्व समाप्त।)
सरल व्याख्या
छत्रोपानहम् (छाता और जूता) — अन्त में अ। (द्वन्द्व पूर्ण।)

मूल पाठ: लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य) — डिजिटल पाठ-स्रोत ashtadhyayi.com · हिन्दी अनुवाद व सरल व्याख्या: cdsharma.in

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