'उसका प्रकृत-वचन' अर्थ में मयट् होता है। प्रचुरता से प्रस्तुत = प्रकृत; उसका वचन = प्रतिपादन; भाव या अधिकरण में ल्युट्। पहले (भाव) में — प्रकृतम् अन्नम् = अन्नमयम्, अपूपमयम्; दूसरे (अधिकरण) में — अन्नमयः यज्ञः, अपूपमयं पर्व।
सरल व्याख्या
प्रचुरता अर्थ में मय: अन्नमयः यज्ञः (जिसमें अन्न प्रचुर हो), आनन्दमयः (आनन्द से भरपूर)।
बहु और अल्प अर्थ वाले कारक से विकल्प से शस् होता है। बहूनि ददाति = बहुशः; अल्पशः। (वार्तिक) आदि आदि से तसि का उपसंख्यान — आदौ = आदितः; मध्यतः, अन्ततः, पृष्ठतः, पार्श्वतः; यह आकृतिगण है; स्वरेण = स्वरतः; वर्णतः।
(वार्तिक) 'अभूततद्भाव' (जो पहले वैसा न था उसका वैसा होना) कहना चाहिए। विकार-रूपता को प्राप्त होने वाली प्रकृति में वर्तमान विकार-शब्द से स्वार्थ में विकल्प से च्वि होता है, कृ, भू, अस् के योग में।
सरल व्याख्या
जो वैसा नहीं था उसे वैसा बनाना/होना — च्वि (ई): अकृष्णः कृष्णः क्रियते → कृष्णीकरोति।
च्वि परे रहते अवर्ण को ई होता है। (च्वि के) व का लोप होने पर च्व्यन्त होने से अव्यय। अकृष्णः कृष्णः सम्पद्यते तं करोति = कृष्णीकरोति; ब्रह्मीभवति, गङ्गीस्यात्। (वार्तिक) अव्यय को च्वि में ईत्व नहीं कहना चाहिए — दोषाभूतम् अहः, दिवाभूता रात्रिः।
सरल व्याख्या
कृष्णीकरोति (काला करता है), शुक्लीकरोति, ब्रह्मीभवति (ब्रह्म हो जाता है), स्वीकरोति (अपना बनाता है — स्वीकार)।
दो अच् (स्वर) ही जिसका अवर (न्यूनतम) है, उससे कम नहीं — अर्थात् अनेकाच् — ऐसा आधा भाग जिसका हो, ऐसे अव्यक्त-अनुकरण (ध्वनि-अनुकरण) से, 'इति' परे न हो तो, कृ-भू-अस् के योग में डाच् होता है। (वार्तिक) डाच् विवक्षित होने पर बहुलता से द्वित्व — इससे डाच् की विवक्षा में द्वित्व। (वार्तिक) डाच्-पर आम्रेडित में नित्य (पररूप) कहना चाहिए — डाच्-पर जो आम्रेडित, उसके परे रहते पूर्व-पर वर्णों का पररूप; इससे त और प का प — पटपटाकरोति। अव्यक्त-अनुकरण क्यों? ईषत्करोति। द्व्यजवरार्ध क्यों? श्रत्करोति। अवर क्यों? खरटखरटाकरोति। अनिति क्यों? पटिति करोति। (स्वार्थिक समाप्त। तद्धित प्रकरण पूर्ण।)
सरल व्याख्या
ध्वनि-अनुकरण से क्रिया: पटपटाकरोति (पट-पट की आवाज़ करता है)। पर 'पटिति करोति' (इति हो तो नहीं)। (तद्धित प्रकरण पूर्ण।)